Brahma Purana· Brahma Purāṇa
167
अध्याय 167 / 246

Adhyaya 167

33 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ33 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय १६७

श्लोक 1

विप्रतीर्थम् इति ख्यातं तथा नारायणं विदुः तस्याख्यानं प्रवक्ष्यामि शृणु विस्मयकारकम्

vipratīrtham iti khyātaṃ tathā nārāyaṇaṃ viduḥ tasyākhyānaṃ pravakṣyāmi śṛṇu vismayakārakam

हिन्दी अर्थ

स्थित हुईं, वह सब स्थान मातृतीर्थ माना जाता गणेशजी-जैसा पुत्र उत्पन्न हो गया। इससे सम्पूर्ण है। वे सभी तीर्थ देवताओंके लिये भी सेव्य हैं, जगत्में महान् उत्सव छा गया है।' यह बात उन फिर मनुष्य आदिके लिये तो बात ही क्या है। देवताओने अपने मुखसे कही थी, जो नवजात शिवजीके कथनानुसार उन तीर्थोमें किया हुआ शिशुके रूपमें गणेशजीको नमस्कार करके कृतार्थ

English

He had three step-brothers, viz. Ravana, Kumbhakarna and Vibhlsana. They were very powerful, endowed with unmeasured luster. They were his enemies as well.

अध्याय १६७

श्लोक 2

अन्तर्वेद्यां द्विजः कश्चिद् ब्राह्मणो वेदपारगः तस्य पुत्रा महाप्राज्ञा गुणरूपदयान्विताः

antarvedyāṃ dvijaḥ kaścid brāhmaṇo vedapāragaḥ tasya putrā mahāprājñā guṇarūpadayānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

स्नान, दान और तर्पण--सब अक्षय होता है। जो हुए थे। माताको गोदमें बैठे हुए और माताके

English

On hearing those words of their mother, O sage, the three brothers went to the forest and performed penance.

अध्याय १६७

श्लोक 3

तेषां कनीयान् यो भ्राता शान्तो गुणगणैर् वृतः आसन्दिव इति ख्यातः सर्वज्ञानो महामतिः

teṣāṃ kanīyān yo bhrātā śānto guṇagaṇair vṛtaḥ āsandiva iti khyātaḥ sarvajñāno mahāmatiḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्य मातृतीथोके इस उपाख्यानको प्रतिदिन सुनता, स्मरण रखता और पढ़ता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है।

English

The divine voice became auspicious. What should take place is like what has already taken place. What is about to be given is like what has already been given. What should be attained is like what has already been attained.

अध्याय १६७

श्लोक 4

विवाहाय पिता तस्माऐ आसन्दिवाय यत्नवान् एतस्मिन्न् अन्तरे रात्रौ सुप्तं तं द्विजपुत्रकम्

vivāhāya pitā tasmāai āsandivāya yatnavān etasminn antare rātrau suptaṃ taṃ dvijaputrakam

हिन्दी अर्थ

मातृतीर्थके अनन्तर अविध्नतीर्थ है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। नारद! वहाँका

English

His father diligently (arranged) for his marriage a bed-seat; in the meantime at night, that Brahmin's son lay asleep,

अध्याय १६७

श्लोक 5

अविष्णुस्मरणं सौम्यशिरस्कम् असमाहितम् आसन्दिवं क्रूररूपा राक्षसी कामरूपिणी

aviṣṇusmaraṇaṃ saumyaśiraskam asamāhitam āsandivaṃ krūrarūpā rākṣasī kāmarūpiṇī

हिन्दी अर्थ

“एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर देवताओंका यज्ञ आरम्भ हुआ, किन्तु विघ्न-दोषके कारण

English

without remembrance of Vishnu, his head gentle, inattentive, on the seat; a cruel-formed Rakshasi, assuming forms at will,

अध्याय १६७

श्लोक 6

तम् आदायागमच् छीघ्रं गौतम्या दक्षिणे तटे श्रीगिरेर् उत्तरे पारे बहुब्राह्मणसेवितम्

tam ādāyāgamac chīghraṃ gautamyā dakṣiṇe taṭe śrīgirer uttare pāre bahubrāhmaṇasevitam

हिन्दी अर्थ

मना करनेपर भी उन्होंने पिताके ललारमें स्थित चन्द्रमाको बलपूर्वक पकड़कर उनकी जटाओंमें छिपा दिया, यह गणेशजीका बालविनोद था।

English

taking him, quickly came to the south bank of the Gautami, on the northern shore of Shrigiri, served by many Brahmins,

अध्याय १६७

श्लोक 7

नगरं धर्मनिलयं लक्ष्म्या निलयम् एव च तत्र राजा बृहत्कीर्तिः सर्वक्षत्रगुणान्वितः

nagaraṃ dharmanilayaṃ lakṣmyā nilayam eva ca tatra rājā bṛhatkīrtiḥ sarvakṣatraguṇānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

माताके स्तनोंका दूध इसलिये पीते रहे कि कहीं बड़े भैया कार्तिकेय भी आकर न पीने लगें। उनको बुद्धिमें बालस्वभाववश भाईके प्रति इर्ष्या भर गयी थी। यह देखकर भगवान् शंकरने

English

a city that was the abode of dharma and of Lakshmi. There the king Brihatkirti, endowed with all Kshatriya virtues,

अध्याय १६७

श्लोक 8

तस्यामितक्षेमसुभिक्षयुक्तं निशावसाने द्विजपुत्रयुक्ता सा राक्षसी तत् पुरम् आससाद मनोज्ञरूपाणि बिभर्ति नित्यम्

tasyāmitakṣemasubhikṣayuktaṃ niśāvasāne dvijaputrayuktā sā rākṣasī tat puram āsasāda manojñarūpāṇi bibharti nityam

हिन्दी अर्थ

उसकी समाप्ति नहीं हुई। तब सब देवताओंनेविनोदवश कहा-- विघ्नराज! तुम बहुत दूध मुझसे और भगवान् विष्णुसे इसका कारण पीते हो, इसलिये लम्बोदर हो जाओ।' यों

English

of immeasurable welfare and plenty — at the night's end that Rakshasi with the Brahmin's son approached that city, ever bearing charming forms.

अध्याय १६७

श्लोक 9

सा कामरूपेण चरत्य् अशेषां महीम् इमां तेन समं द्विजेन गोदावरीदक्षिणतीरभागे वृद्धाकृतिस् तं द्विजम् आह भीमा

sā kāmarūpeṇa caraty aśeṣāṃ mahīm imāṃ tena samaṃ dvijena godāvarīdakṣiṇatīrabhāge vṛddhākṛtis taṃ dvijam āha bhīmā

हिन्दी अर्थ

कहकर उन्होंने उनका नाम “लम्बोदर' रख दिया। देवसमुदायसे घिरे हुए महेश्वरने कहा-- 'बेटा! तुम्हारा नृत्य होना चाहिए।' यह सुनकर उन्होंने अपने घूँघुरकी आवाजसे ही शंकरजीको

English

She roams this entire earth in forms at will; with that Brahmin on the south bank region of the Godavari, the terrible one in the form of an old woman spoke to the Brahmin:

अध्याय १६७

श्लोक 10

एषा तु गङ्गा द्विजमुख्य संध्या उपास्यतां विप्रवरैः समेत्य यथोचितं विप्रवरास् तु काले नोपासते यत्नत एव संध्याम्

eṣā tu gaṅgā dvijamukhya saṃdhyā upāsyatāṃ vipravaraiḥ sametya yathocitaṃ vipravarās tu kāle nopāsate yatnata eva saṃdhyām

हिन्दी अर्थ

संतुष्ट कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवने अपने पुत्रको गणेशके पदपर अभिषिक्त कर दिया। जो एक हाथमें विघ्नपाश और दूसरे हाथसे कंधेपर कुठार लिये रहते हैं तथा पूजा न पानेपर अपनी

English

"This, best of Brahmins, is the Ganga; let the twilight worship be done together with the best Brahmins; but the best Brahmins at the proper time do not carefully perform the twilight worship —

अध्याय १६७

श्लोक 11

नीचास् त एवाभिहिताः सुरेशैर् अन्त्यावसायिप्रवरास् त एते अहं जनित्री तव चेति वाच्यं नो चेद् इदानीं त्वम् उपैषि नाशम्

nīcās ta evābhihitāḥ sureśair antyāvasāyipravarās ta ete ahaṃ janitrī tava ceti vācyaṃ no ced idānīṃ tvam upaiṣi nāśam

हिन्दी अर्थ

माताके कार्यमें भी विघ्न डाल देते हैं, उन विघ्नराजके समान दूसरा कौन है। जो धर्म, अर्थ और काम आदिमें सबसे पहले पूजनीय हैं तथा

English

they are called low by the lords of gods, the best among the last-born outcastes. You must say, 'I am your mother'; if not, you will now meet destruction.

अध्याय १६७

श्लोक 12

मद्वाक्यकर्तासि यदि द्विजेन्द्र सुखं करिष्ये तव यत् प्रियं च पुनश् च देशं निलयं गुरूंश् च संप्रापयिष्ये ननु सत्यम् एतत्

madvākyakartāsi yadi dvijendra sukhaṃ kariṣye tava yat priyaṃ ca punaś ca deśaṃ nilayaṃ gurūṃś ca saṃprāpayiṣye nanu satyam etat

हिन्दी अर्थ

करते हैं, जिनके पूजनका फल कभी नष्ट नहीं होता, उन प्रथम-पूजनीय गणेशको हम पहले ॐ A मस्तक नवाते हें । जिनकी पूजासे सबको प्रार्थनाके एक स्वरसे कहा-- ऐसा ही होगा।' यज्ञ समाप्त अनुरूप सब प्रकारके फलको सिद्धि दृष्टिगोचर होनेपर देवता अपने-अपने स्थानको चले गये।

English

If you do my word, best of Brahmins, I shall do what is pleasing and happy for you, and bring you again to your country, home and elders; this is truth."

अध्याय १६७

श्लोक 13

स प्राह का त्वं द्विजपुंगवो ऽपि सोवाच तं राक्षसी कामरूपा विश्वासयन्ती शपथैर् अनेकैस् तं भ्रान्तचित्तं मुनिराजपुत्रम्

sa prāha kā tvaṃ dvijapuṃgavo 'pi sovāca taṃ rākṣasī kāmarūpā viśvāsayantī śapathair anekais taṃ bhrāntacittaṃ munirājaputram

हिन्दी अर्थ

होती है, जिन्हें अपने स्वतन्त्र सामर्थ्यपर अत्यन्त तबसे वह तीर्थ अविघ्न तीर्थ” कहलाने लगा। गर्व है, उन बन्धुप्रिय मूषकवाहन गणेशजीकी हम वह मनुष्यांकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला स्तुति करते हैं। जिन्होंने अपने सरस संगीत, तथा सम्पूर्ण विघ्नोंको मिटानेवाला है। नृत्य, समस्त मनोरथोंकी सिद्धि तथा विनोदके अविध्नतीर्थके बाद शेषतीर्थ है, वह भी

English

He said, "Who are you?" and the Rakshasi taking forms at will, assuring that confused-minded son of the sage-king with many oaths, said to him:

अध्याय १६७

श्लोक 14

कङ्कालिनी नाम जगत्प्रसिद्धा विप्रो ऽपि ताम् आह निवेदितं यत् तद् एव कर्तास्मि न संशयो ऽत्र यत् तत् प्रियं वच्मि करोमि चैव

kaṅkālinī nāma jagatprasiddhā vipro 'pi tām āha niveditaṃ yat tad eva kartāsmi na saṃśayo 'tra yat tat priyaṃ vacmi karomi caiva

हिन्दी अर्थ

द्वारा माता पार्वतीको पूर्ण संतुष्ट किया है, उन समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। मैं उसके अत्यन्त संतुष्ट हृदयवाले श्रीगणेशको हम शरण स्वरूपका वर्णन करता हूँ। रसातलके स्वामी लेते हैं । महानाग शेष सम्पूर्ण नागोंके साथ रसातलमें इस प्रकार देवताओंके स्तवन करनेपर गणेशजीने रहनेके लिये गये। परंतु राक्षसों, हैत्यों और

English

"I am known in the world as Kankalini." The Brahmin too said to her: "What you tell me I shall do, no doubt; whatever is pleasing I say and I do."

अध्याय १६७

श्लोक 15

तद् विप्रवचनं श्रुत्वा राक्षसी कामरूपिणी वृद्धा तथापि चार्वङ्गी दिव्यालंकारभूषणा

tad vipravacanaṃ śrutvā rākṣasī kāmarūpiṇī vṛddhā tathāpi cārvaṅgī divyālaṃkārabhūṣaṇā

हिन्दी अर्थ

उनसे कहा--' देवताओ ! अब तुम्हारे यज्ञमें विघ्न दानवोंने, जिनका रसातलमें पहलेसे ही प्रवेश हो नहीं पड़ेगा।' जब देवयज्ञ निर्विघ्न पूरा हो गया चुका था, नागराजको वहाँसे निकाल दिया। तब तब गणेशजीने उन देवताओंसे कहा-- जो लोग वे मेरे पास आकर बोले--' भगवन्! आपने इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उन्हें राक्षसोंको तथा हमलोगोंको भी रसातल दे रखा

English

Hearing the Brahmin's words, the Rakshasi taking forms at will, though old, became lovely-limbed, adorned with divine ornaments and jewels.

अध्याय १६७

श्लोक 16

द्विजम् आदाय सर्वत्र मत्सुतो ऽयं गुणाकरः एवं वदन्ती सर्वत्र याति वक्ति करोति च

dvijam ādāya sarvatra matsuto 'yaṃ guṇākaraḥ evaṃ vadantī sarvatra yāti vakti karoti ca

हिन्दी अर्थ

कभी दरिद्रता और दुःखका सामना नहीं करना है, किंतु हैत्य और राक्षस हमें वहाँ स्थान नहीं पड़ेगा। जो इस तीर्थमें आलस्य छोड़कर भक्तिपूर्वक देना चाहते; इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ।' स्नान और दान करेंगे, उनके शुभ कार्य निर्विध्न तब मैंने नागसे कहा-- तुम गौतमीके तटपर सिद्ध होंगे। इस बातका आपलोग भी अनुमोदन जाओ, वहाँ महादेवजीकी स्तुति करनेसे तुम्हारा

English

Taking the Brahmin everywhere, saying "This is my son, a mine of virtues," she goes, speaks and acts everywhere.

अध्याय १६७

श्लोक 17

तं विप्रं रूपसौभाग्यवयोविद्याविभूषितम् तां च वृद्धां गुणोपेताम् अस्य मातेति मेनिरे

taṃ vipraṃ rūpasaubhāgyavayovidyāvibhūṣitam tāṃ ca vṛddhāṃ guṇopetām asya māteti menire

हिन्दी अर्थ

करें।' उनके इतना कहनेके साथ ही देवताओंने मनोरथ पूर्ण होगा। उनके सिवा दूसरा कोई तीनों

English

They took that Brahmin, adorned with beauty, fortune, youth and learning, and that old woman, endowed with virtues, to be his mother.

अध्याय १६७

श्लोक 18

तत्र द्विजवरः कश्चित् स्वां कन्यां भूषणान्विताम् राक्षसीं तां पुरस्कृत्य प्रादात् तस्मै द्विजातये

tatra dvijavaraḥ kaścit svāṃ kanyāṃ bhūṣaṇānvitām rākṣasīṃ tāṃ puraskṛtya prādāt tasmai dvijātaye

हिन्दी अर्थ

अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा २०१

English

There a certain excellent Brahmin, putting that Rakshasi in front, gave his adorned daughter to that Brahmin.

अध्याय १६७

श्लोक 19

सा कन्या तं पतिं प्राप्य कृतार्थास्मीत्य् अचिन्तयत् स द्विजो ऽपि गुणैर् युक्तां पत्नीं दृष्ट्वा सुदुःखितः

sā kanyā taṃ patiṃ prāpya kṛtārthāsmīty acintayat sa dvijo 'pi guṇair yuktāṃ patnīṃ dṛṣṭvā suduḥkhitaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकोंमें ऐसा नहीं है, जो सबके मनोरथ सिद्ध फिर भगवान् शेषेश्वरका दर्शन करनेके लिये वे कर सके। मेरे कहनेसे शेषनाग वहाँ गये और गौतमी-तटपर लौट आये नागराज जिस मार्गसे गङ्गामें स्नान करके हाथ जोड़कर देवेश्वर महादेवकी आये थे, उसमें रसातलसे वहाँतक छेद हो गया स्तुति करने लगे--' तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् था। उस बिलसे गौतमी गङ्गाका अत्यन्त पुण्यदायक

English

That maiden, getting him as husband, thought, "I am fulfilled"; the Brahmin, seeing his wife endowed with virtues, was greatly distressed:

अध्याय १६७

श्लोक 20

माम् इयं भक्षयेद् एव राक्षसी पापरूपिणी किं करोमि क्व गच्छामि कस्यैतत् कथयामि वा

mām iyaṃ bhakṣayed eva rākṣasī pāparūpiṇī kiṃ karomi kva gacchāmi kasyaitat kathayāmi vā

हिन्दी अर्थ

शंकरको नमस्कार है। जो दक्षयज्ञके विध्वंसक, जल पातालगङ्गामें जा मिला। इस प्रकार उन जगतूके आदि विधाता तथा त्रिभुवनरूप हैं, उन दोनोंका संगम हुआ। भगवान् शेषेश्वरके सामने भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके सहस्रों एक विशाल कुण्ड बनाकर शेषनागने उसमें हवन मस्तक हैं, उन भगवान् सदाशिवको नमस्कार है। किया। उस कुण्डमें सदा अग्निदेव स्थित रहते

English

"This evil-natured Rakshasi will surely eat me. What shall I do, where shall I go, to whom shall I tell this?

अध्याय १६७

श्लोक 21

महत् संकटम् आपन्नं रक्षयिष्यति को ऽत्र माम् भार्या ममेयं कल्याणी गुणरूपवयोयुता एनाम् अप्य् अशुभाकस्माद् भक्षयिष्यति राक्षसी

mahat saṃkaṭam āpannaṃ rakṣayiṣyati ko 'tra mām bhāryā mameyaṃ kalyāṇī guṇarūpavayoyutā enām apy aśubhākasmād bhakṣayiṣyati rākṣasī

हिन्दी अर्थ

सबका संहार करनेवाले रुद्रदेवको नमस्कार है । हैं। उसमें गङ्गाके जलका संगम होनेसे वह जल भगवन्! आप सोम, सूर्य, अग्नि और जलरूप गरम हो गया। महायशस्वी शेषनाग महादेवजीकी हैं; आपको नमस्कार है। जो सर्वदा सर्वस्वरूप आराधना करके पुनः अपने अभीष्ट स्थान और कालरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार रसातलमें चले गये। तबसे वह तीर्थ नागतीर्थ एवं

English

I have fallen into great peril; who here will protect me? This wife of mine is auspicious, endowed with virtue, beauty and youth; the Rakshasi will suddenly eat her too, inauspiciously."

अध्याय १६७

श्लोक 22

एतस्मिन्न् अन्तरे तत्र भार्या सा गुणशालिनी वृद्धाप्य् अतिदुराधर्षा सा गता कुत्रचित् तदा

etasminn antare tatra bhāryā sā guṇaśālinī vṛddhāpy atidurādharṣā sā gatā kutracit tadā

हिन्दी अर्थ

है। सर्वेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। सर्वव्यापी शेषतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण सोमेश्वर ! मेरी रक्षा कोजिये। जगन्नाथ ! आपको अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला, पवित्र तथा रोग नमस्कार है। मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये।' और दरिद्रताका नाशक है। उससे आयु एवं

English

In the meantime his wife, full of virtue, and the old woman too, hard to approach, then went somewhere.

अध्याय १६७

श्लोक 23

प्रश्रयावनता भूत्वा बाला चापि पतिव्रता भर्तारं दुःखितं ज्ञात्वा पतिं प्राह रहः शनैः

praśrayāvanatā bhūtvā bālā cāpi pativratā bhartāraṃ duḥkhitaṃ jñātvā patiṃ prāha rahaḥ śanaiḥ

हिन्दी अर्थ

इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महेश्वरने नागराजको लक्ष्मीकी भी प्रापि होती है। वह पवित्र तीर्थ मनोवाञ्छित वर दिया, जो देवताओंसे शत्रुता स्नान और दानसे मोक्ष देनेवाला है। जो मनुष्य रखनेवाले हैत्य, दानव तथा राक्षसोंके विनाशमें इस प्रसङ्गका भक्तिपूर्वक श्रवण, पाठ अथवा सहायक था। भगवान्ने शेषनागको शूल देकर मनन करता है, उसको सब कामनाएँ पूर्ण होती

English

Bowing with modesty, young and devoted to her husband, knowing her husband distressed, she said slowly to him in private:

अध्याय १६७

श्लोक 24

कस्मात् ते दुःखम् आपन्नं स्वामिंस् तत्त्वं वदस्व मे

kasmāt te duḥkham āpannaṃ svāmiṃs tattvaṃ vadasva me

हिन्दी अर्थ

कहा-'इससे अपने शत्रुओंका संहार करो।' हैं। जहाँ शेषेश्वरतीर्थ है और जहाँ शक्ति प्रदान भगवान् शिवको यह आज्ञा पाकर शेषनाग सर्पोके करनेवाले भगवान् शिव हैं, वहाँ गौतमीके दोनों साथ रसातलमें गये। वहाँ उन्होंने शूलसे अपने तटोंपर इक्कीस सौ तीर्थ हैं, जो सब प्रकारकी शत्रु हैत्य, दानव तथा राक्षसोंका वध किया और सम्पत्ति देनेवाले हैं।

English

"Why has distress come to you, master? Tell me the truth."

अध्याय १६७

श्लोक 25

शनैः प्रोवाच तां भार्यां यथावत् पूर्वविस्तरम् किम् अकथ्यं प्रिये मित्रे कुलीनायां च योषिति

śanaiḥ provāca tāṃ bhāryāṃ yathāvat pūrvavistaram kim akathyaṃ priye mitre kulīnāyāṃ ca yoṣiti

हिन्दी अर्थ

अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ, धान्यतीर्थ और विदर्भा-संगम तथा रेवती-संगम-तीर्थकी महिमा

English

He slowly told his wife all as it was, in full detail from before: "What cannot be told, dear, to a friend and a woman of good family?"

अध्याय १६७

श्लोक 26

भर्तृवाक्यं निशम्येदं प्रोवाच वदतां वरा

bhartṛvākyaṃ niśamyedaṃ provāca vadatāṃ varā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी कहते हैं-गोदावरीके उत्तर-तटपर विन्ध्यपर्वतके समीप गये। उन्होंने देखा नगश्रेष्ठ अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थं हैं । विन्ध्य असंख्य वृक्षोंसे व्याप्त, सैकड़ों शिखरोंसे उनका फल सुनो। पूर्वकालकी बात है-देवताओंने घिरा हुआ और बहुत ही ऊँचा है। ऊँचाईमें वह महर्षि अगस्त्यसे अनुरोध किया था कि आप मेरुगिरि और सूर्यसे टक्कर ले रहा है। मुनिके

English

Hearing her husband's words, the best of speakers said:

अध्याय १६७

श्लोक 27

अनात्मनः सर्वतो ऽपि भयम् अस्ति गृहेष्व् अपि कुतो भयं ह्य् आत्मवतां किं पुनर् गौतमीतटे

anātmanaḥ sarvato 'pi bhayam asti gṛheṣv api kuto bhayaṃ hy ātmavatāṃ kiṃ punar gautamītaṭe

हिन्दी अर्थ

विन्ध्यपर्वतको आदेश देकर ऊपर उठनेसे रोकें। आनेपर विन्ध्यपर्वतने उनका आतिथ्य-सत्कार महर्षि अगस्त्य धीरे-धीरे सहस्रो मुनियोंके साथ किया। मुनिश्रेष्ठ आगस्त्यने सब ब्राह्मणोंके साथ

English

"For one without self-control there is fear everywhere, even in houses; where is fear for those with self-control, much less on the Gautami's bank?

अध्याय १६७

श्लोक 28

वसतां विष्णुभक्तानां विरक्तानां विवेकिनाम् अत्र स्नात्वा शुचिर् भूत्वा स्तुहि देवम् अनामयम्

vasatāṃ viṣṇubhaktānāṃ viraktānāṃ vivekinām atra snātvā śucir bhūtvā stuhi devam anāmayam

हिन्दी अर्थ

विन्ध्यगिरिकी प्रशंसा की और देवताओंका कार्य और पिप्पल गुरु। पिप्पलने पहलेकी ही भाँति सिद्ध करनेके लिये इस प्रकार कहा--' पर्वतश्रेष्ठ! अन्य शिष्योंके समान शनैश्वको भी अपना मैं तत्त्वदर्शी मुनियोंके साथ तीर्थयात्राके उद्देश्यसे आहार बनाया, किंतु उदरमें प्रवेश करनेपर शनिने दक्षिण दिशाकी यात्रा करना चाहता हूँ, तुम मुझे उसकी आँतोंपर दृष्टि डाली । उनके देखते ही वह

English

Among those living there, devoted to Vishnu, dispassionate and discerning — bathe here, become pure, and praise the god who is free from all ills."

अध्याय १६७

श्लोक 29

एतद् आकर्ण्य गङ्गायां स्नात्वा विगतकल्मषः तुष्टाव गौतमीतीरे द्विजो नारायणं तथा

etad ākarṇya gaṅgāyāṃ snātvā vigatakalmaṣaḥ tuṣṭāva gautamītīre dvijo nārāyaṇaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

जानेका मार्ग दो। मैं तुमसे आतिथ्यमें यही मागता भी जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार उन हुँ-जबतक लौट न आउँ, तबतक तुम नीचे दोनोंको मारकर सूर्यपुत्र शनैश्वरने मुनियोंसे पूछा-- होकर ही रहना। इसके विपरीत न करना।' अब मेरे लिये कौन-सा कार्य है? आपलोग विन्ध्यपर्वतने कहा-- बहुत अच्छा। ऐसा हीबतायें।' मुनियोंको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने

English

Hearing this, the Brahmin bathed in the Ganga, free of sin, and praised Narayana on the Gautami's bank:

अध्याय १६७

श्लोक 30

त्वम् अन्तरात्मा जगतो ऽस्य नाथ त्वम् एव कर्तास्य मुकुन्द हर्ता त्वं पालकः पालयसे न दीनम् अनाथबन्धो नरसिंह कस्मात्

tvam antarātmā jagato 'sya nātha tvam eva kartāsya mukunda hartā tvaṃ pālakaḥ pālayase na dīnam anāthabandho narasiṃha kasmāt

हिन्दी अर्थ

करूगा।' महर्षि अगस्त्य उन मुनियोंके साथ शनिको इच्छानुसार वर देना चाहा। शनैश्चर दक्षिण दिशामें चले गये। वे धीरे-धीरे गौतमीके बोले--'जो मेरे दिनको नियमसे रहकर अश्वत्थका तटपर पहुँचकर सांवत्सरिक यज्ञमें दीक्षित हो स्पर्श करें, उनके सब कार्य सिद्ध हो जायँ और गये। उन्होंने ऋषियोंके साथ एक वर्षतकके लिये मेरे द्वारा होनेवाली पीड़ा भी उन्हें न हो। जो

English

"You are the inner Self of this world, lord; you alone are its maker, Mukunda, and its destroyer; you are its protector, you protect; why not the wretched, protector of the unprotected, Narasimha?"

अध्याय १६७

श्लोक 31

श्रुत्वैतत् प्रार्थनं तस्य जगच्छोकनिवारणः नारायणो ऽपि तां पापां निजघान स राक्षसीम्

śrutvaitat prārthanaṃ tasya jagacchokanivāraṇaḥ nārāyaṇo 'pi tāṃ pāpāṃ nijaghāna sa rākṣasīm

हिन्दी अर्थ

यज्ञ आरम्भ कर दिया। मनुष्य अश्वत्थतीर्थमें स्नान करें, उनके भी सब उन दिनों कैटभके दो पापी पुत्र राक्षस धर्मके कार्य सिद्ध हो जायँ। जो मानव शनिवारको कण्टक हो रहे थे। उनका नाम था--अश्वत्थ और प्रातःकाल उठकर अश्वत्थका स्पर्श करते हैं, पिप्पल। वे देवलोकमें भी प्रसिद्ध थे। ब्राह्मणोंको उनकी समस्त ग्रहपीड़ा दूर हो जाय।' तबसे उस

English

Hearing his prayer, Narayana, remover of the world's grief, killed that sinful Rakshasi.

अध्याय १६७

श्लोक 32

सुदर्शनेन चक्रेण सहस्रारेण भास्वता तस्मै प्रादाद् वरान् इष्टान् प्रापयच् च गुरुं प्रभुः

sudarśanena cakreṇa sahasrāreṇa bhāsvatā tasmai prādād varān iṣṭān prāpayac ca guruṃ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

पीड़ा देना उनका नित्यका काम था। ब्राह्मणोंका तीर्थको अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ कष्ट देख महर्षिगण गोदावरीके दक्षिणतटपर भी कहते हैं। अगस्त्य, सात्रिक, याञ्चिक और नियमपूर्वक तपस्या करनेवाले सूर्यपुत्र शनैश्वरके सामग आदि सोलह हजार एक सौ आठ तीर्थ पास गये और उनसे उन राक्षसोंके सब अत्याचार वहाँ वास करते हैं। उन तीर्थोमें किया हुआ स्नान

English

With the shining thousand-spoked Sudarshana discus, the lord gave him desired boons and brought him to his teacher.

अध्याय १६७

श्लोक 33

ततः प्रभृति तत् तीर्थं विप्रं नारायणं विदुः स्नानदानेन पूजाद्यैर् यत्र सिध्यति वाञ्छितम्

tataḥ prabhṛti tat tīrthaṃ vipraṃ nārāyaṇaṃ viduḥ snānadānena pūjādyair yatra sidhyati vāñchitam

हिन्दी अर्थ

कह सुनाये। यह सुनकर शनैश्चर ब्राह्मणके वेशमें और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है। रहनेवाले अश्वत्थ नामक राक्षसके पास गये और इसके आगे विख्यात सोमतीर्थ है। उसमें स्वयं भी ब्राह्मण बनकर उन्होंने उसको परिक्रमा स्नान और दान करनेसे सोमपानका फल मिलता को। उन्हें परिक्रमा करते देख राक्षसने ब्राह्मण ही है। ओषधियाँ पूर्वकालसे ही सम्पूर्ण जगत्को

English

From then on that holy place is known as the Brahmin Narayana; where wishes are fulfilled by bathing, giving, worship and the like.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_brahmapurANa-1-246.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brahma Purana — Chapter 167
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.