Brahma Purana· Brahma Purāṇa
168
अध्याय 168 / 246

Adhyaya 168

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अध्याय १६८

श्लोक 1

भानुतीर्थम् इति ख्यातं त्वाष्ट्रं माहेश्वरं तथा ऐन्द्रं याम्यं तथाग्नेयं सर्वपापप्रणाशनम्

bhānutīrtham iti khyātaṃ tvāṣṭraṃ māheśvaraṃ tathā aindraṃ yāmyaṃ tathāgneyaṃ sarvapāpapraṇāśanam

हिन्दी अर्थ

समझा और प्रतिदिनकी भाँति माया करके उस माताएँ हैं। उन्हींमें यज्ञ, स्वाध्याय और धर्मकार्य पापी राक्षसने उनको भी अपना ग्रास बना लिया। प्रतिष्ठित है। ओषधियोंसे ही समस्त रोगोंका उसके शरीरमें प्रवेश करके शनिने उसकी आंतोंको निवारण होता है। उन्हींसे अन्नकी उत्पत्ति और देखा। शनिकी दृष्टि पड़ते ही वह पापात्मा राक्षस सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। एक दिन ओषधियोंने

English

Any substance, e.g. clarified butter, food etc. to be offered as oblation, to gods; opposed to 'Kavya' or what is offered to ancestors.

अध्याय १६८

श्लोक 2

अभिष्टुत इति ख्यातो राजासीत् प्रियदर्शनः हयमेधेन पुण्येन यष्टुम् आरब्धवान् सुरान्

abhiṣṭuta iti khyāto rājāsīt priyadarśanaḥ hayamedhena puṇyena yaṣṭum ārabdhavān surān

हिन्दी अर्थ

वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति क्षणभरमें जलकर मुझसे कहा--' सुरश्रेष्ठ ! हमलोगोंको एक ऐसा भस्म हो गया। अश्वत्थको भस्म करके वेपति दीजिये, जो राजा हो।' उनकी बात सुनकर ब्राह्मणरूपधारी शनि दूसरे राक्षसके पास गये। मैंने कहा-'तुम सबको राजा पतिरूपमें प्राप्त वहाँ उन्होंने अपनेको वेदाध्ययन करनेवाले ब्राह्मणके होगा।' तब उन्होंने पुन: प्रश्‍न किया- 'इसके

English

O Agni, resuscitate the lives of Devas by means of Havya and those of pitrs by means of Kavya. By the cooking of food and the splitting of seeds resuscitate all human beings.

अध्याय १६८

श्लोक 3

तत्रर्त्विजः षोडश स्युर् वसिष्ठात्रिपुरोगमाः क्षत्रिये यजमाने तु यज्ञभूमिः कथं भवेत्

tatrartvijaḥ ṣoḍaśa syur vasiṣṭhātripurogamāḥ kṣatriye yajamāne tu yajñabhūmiḥ kathaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

रूपमें उपस्थित किया, मानो वे विनीत शिष्य थे लिये हमें कहाँ जाना होगा ?' मैंने कहा--

English

There the officiating priests were sixteen, led by Vasishtha and Atri; but when the sacrificer is a Kshatriya, how can there be a ground for sacrifice?

अध्याय १६८

श्लोक 4

ब्राह्मणे दीक्षिते राजा भुवं दास्यति यज्ञियाम् भूपतौ दीक्षिते दाता को भवेत् को नु याचते

brāhmaṇe dīkṣite rājā bhuvaṃ dāsyati yajñiyām bhūpatau dīkṣite dātā ko bhavet ko nu yācate

हिन्दी अर्थ

अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा २०३

English

When a Brahmin is initiated the king gives land fit for sacrifice; but when the king is initiated, who would give, and who would ask?

अध्याय १६८

श्लोक 5

याच्ञेयम् अखिलाशर्मजननी पापरूपिणी केनाप्य् अतो न कार्यैव क्षत्रियेण विशेषतः

yācñeyam akhilāśarmajananī pāparūpiṇī kenāpy ato na kāryaiva kṣatriyeṇa viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

' माताओ! तुम गौतमीके तटपर जाओ । गौतमीके प्रात किया, वह सोमतीर्थके नामसे प्रसिद्ध प्रसन्न होनेपर तुम्हें लोकपूजित राजाकी प्राप्ति हुआ। वहाँ स्नान और दान करनेसे पितर स्वर्गमें होगी।' यह सुनकर वे वहाँ गयीं और गौतमीकी जाते हें । जो प्रतिदिन इस प्रसङ्गको पढ़ता, सुनता स्तुति करने लगीं। अथवा भक्तिपूर्वक स्मरण करता है, वह दीर्घायु,

English

This begging is the mother of all misery and sinful in form; therefore no one, especially a Kshatriya, should do it.

अध्याय १६८

श्लोक 6

एवं मीमांसमानेषु ब्राह्मणेषु परस्परम् तत्र प्राह महाप्राज्ञो वसिष्ठो धर्मवित्तमः

evaṃ mīmāṃsamāneṣu brāhmaṇeṣu parasparam tatra prāha mahāprājño vasiṣṭho dharmavittamaḥ

हिन्दी अर्थ

ओषधियाँ बोली -- भगवान् शंकरकी प्रियतमा पुत्रवान् और धनवान् होता है। पुण्यसलिला गौतमी! यदि आप इस भूतलपर न तदनन्तर धान्यतीर्थ है, जो मनुष्योंकी सब आतीं तो संसारके प्राणी, जो नाना प्रकारकी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है । वह सुकाल उपस्थित पापराशियोँसे तिरस्कृत एवं दुःखी हो रहे हैं, क्या करनेवाला, कल्याणप्रद तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी

English

While the Brahmins were thus debating among themselves there, the greatly wise Vasishtha, best knower of dharma, said:

अध्याय १६८

श्लोक 7

राज्ञि दीक्षायमाणे तु सूर्यो याच्यो भुवं प्रति देहि मे देव सवितर् यजनं देवतोचितम्

rājñi dīkṣāyamāṇe tu sūryo yācyo bhuvaṃ prati dehi me deva savitar yajanaṃ devatocitam

हिन्दी अर्थ

करते । नदीश्वरि! भूमण्डलके मनुष्योंके सौभाग्यका आपत्तिसे मुक्त करनेवाला है । राजा सोमको पतिरूपमें अनुमान कौन कर सकता है, जिनके महापातकोंका पाकर ओषधियाँ बहुत प्रसन्न हुई थीं । उन्होंने सब नाश करनेवाली आप जगन्माता गङ्गा उनके लिये लोगों तथा गङ्गाजीके सामने यह अभीष्ट वचन सदा ही सुलभ हैं। तीनों लोकोंकी वन्दनीया कहा--' वेदमें एक पवित्र गाथा है, जिसे वेदोंके

English

"When the king is being initiated, the Sun should be asked for land: 'Give me, god Savitri, a sacrificial ground fit for the gods.'

अध्याय १६८

श्लोक 8

दैवं क्षत्रम् असि ब्रह्मन् भूतनाथ नमो ऽस्तु ते याचितः सविता राज्ञा देवानां यजनं शुभम्

daivaṃ kṣatram asi brahman bhūtanātha namo 'stu te yācitaḥ savitā rājñā devānāṃ yajanaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

जगज्जननी गङ्गा! आपके वैभवको कोई नहीं विद्वान् जानते हें । जिस भूमिमें फसल उगी हुई है, जानता; क्योंकि कामदेवके शत्रु भगवान् शंकर वह माताके समान किंवा साक्षात् माता ही है। जो भी आपको सदा मस्तकपर लिये रहते हैं। गङ्गाजीके समीप उसका दान करता है, वह मनोवाञज्छित फल देनेवाली माता! तुम्हें नमस्कार समस्त अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है।

English

'You are the divine power, Brahman, lord of beings; salutation to you.' Asked by the king, Savitri gives a pure sacrificial ground of the gods, king; so ask the lord, the Day-maker."

अध्याय १६८

श्लोक 9

ददात्य् एव ततो राजन् प्रार्थयेशं दिवाकरम्

dadāty eva tato rājan prārthayeśaṃ divākaram

हिन्दी अर्थ

है। पापोंका विनाश करनेवाली ब्रह्ममयी देवी ! जो मानव खेती लगी हुई भूमि, गौ तथा ओषधियोंको तुम्हें नमस्कार है । भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप ब्राह्मणके लिये भक्तिपूर्वक निकली हुई गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् दान देता है, उसका किया हुआ सब दान अक्षय शंकरको जटासे प्रकट हुई गौतमी देवी! तुम्हें होता है तथा वह अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त

English

Saying "So be it," praised, with faith he begged the Sun, god of gods, Day-maker, of the nature of Hari and Isha:

अध्याय १६८

श्लोक 10

तथेत्य् उक्त्वाभिष्टुतो ऽपि देवदेवं दिवाकरम् श्रद्धया प्रार्थयाम् आस हरीशाजात्मकं रविम्

tathety uktvābhiṣṭuto 'pi devadevaṃ divākaram śraddhayā prārthayām āsa harīśājātmakaṃ ravim

हिन्दी अर्थ

नमस्कार है। कर लेता है। ओषधियाँ सोम राजाकी प्रिया हैं

English

"Give, Savitri, a sacrificial ground for the gods; salutation to you." Since the Sun is the divine Kshatra, land was thus given to the king; Savitri, the lord of gods, said, "I give."

अध्याय १६८

श्लोक 11

देवानां यजनं देहि सवितस् ते नमो ऽस्तु ते

devānāṃ yajanaṃ dehi savitas te namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्तुति करनेवाली ओषधियोंसे और सोम भी ओषधियोंके पति हैं-यह जानकर गङ्घाजीने कहा-- देवियो! बताओ, तुम्हें क्या जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ओषधि (अन्न) दान करता दूँ?” ओषधियाँ बोलीं--' जगन्माता ! हमें अत्यन्त है, वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको पाता और तेजस्वी राजाको पतिरूपमें दीजिये।' गङ्गाजीने ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। ओषधियाँ राजा

English

One who performs a sacrifice thus has no misfortune; likewise at a horse-sacrifice, the session with Brahmins versed in the Vedas.

अध्याय १६८

श्लोक 12

क्षत्रं दैवं यतः सूर्यो दत्ता भूर् भूपतेस् ततः सविता देवदेवेशो ददामीत्य् अभ्यभाषत

kṣatraṃ daivaṃ yataḥ sūryo dattā bhūr bhūpates tataḥ savitā devadeveśo dadāmīty abhyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

कहा-- माता ओषधियो ! मैं अमृतरूप हूँ। तुम सोमसे बातचीत करती हुई कहती हैं-' राजन् ! भी अमृतस्वरूपा हो। अत: तुम्हें तुम्हारे योग्य ही हम ब्रह्मरूपिणी और प्राणरूपिणी हैं। जो हमें अमृतात्मा सोमको पतिरूपमें देती हूँ।' गौतमीके ब्राह्मणोंको दान करे, उसे तुम पार लगाओ। इस वरदानका देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा तथा स्थावर-जङ्गमरूप जितना भी जगत् है, वह सब

English

Where the Sun came to the king when begun and praised, to give the gods' sacrificial ground, that is called Bhanu-tirtha.

अध्याय १६८

श्लोक 13

एवं करोति यो यज्ञं तस्य रिष्टिर् न काचन तथा वाजिमखे सत्त्रे ब्राह्मणैर् वेदपारगैः

evaṃ karoti yo yajñaṃ tasya riṣṭir na kācana tathā vājimakhe sattre brāhmaṇair vedapāragaiḥ

हिन्दी अर्थ

ओषधियोंने भी अनुमोदन किया। इसके बाद वे हमलोगोंसे व्याप्त है। हव्य, कव्य, अमृत तथा जो सब अपने-अपने स्थानको चली गयीं। जिस कुछ भी भोजनके काम आता है, वह हमारा ही स्थानपर ओषधियोंने समस्त पाप-संतापका निवारण श्रेष्ठ अंश है-यह जानकर जो अन्नका दान करनेवाले अमृतस्वरूप राजा सोमको पतिरूपमें करता है, राजन्! उसे पार लगाओ। राजा सोम!

English

That excellent horse-sacrifice, the gods' rite, was joined with the gods; but Daityas, Danavas and others, destroyers of sacrifice,

अध्याय १६८

श्लोक 14

प्रारब्धे ऽभिष्टुता राज्ञा यत्रागाद् भूपतिं रविः देवानां यजनं दातुं भानुतीर्थं तद् उच्यते

prārabdhe 'bhiṣṭutā rājñā yatrāgād bhūpatiṃ raviḥ devānāṃ yajanaṃ dātuṃ bhānutīrthaṃ tad ucyate

हिन्दी अर्थ

जो भक्तिपूर्वक इस वैदिको गाथाका श्रवण, स्मरण कठने कहा--'मैं विद्यार्थी हूँ और इसी उद्देश्यसे

English

all wearing Brahmin disguise, singing like Sama-singers, those greatly wise ones also entered there unhindered.

अध्याय १६८

श्लोक 15

तं देवक्रतुम् उत्कृष्टं हयमेधं सुरैर् युतम् दैत्याश् च दनुजाश् चैव तथान्ये यज्ञघातकाः

taṃ devakratum utkṛṣṭaṃ hayamedhaṃ surair yutam daityāś ca danujāś caiva tathānye yajñaghātakāḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा पाठ करे, उसे तुम पार लगाओ।

English

They reviled the cups, vessels, soma and cup-ladles, the soma-drinking, the oblation-giving, the priests and the king;

अध्याय १६८

श्लोक 16

ब्रह्मवेषधराः सर्वे गायन्तः सामगा इव ते ऽपि तत्र महाप्राज्ञाः प्राविशन्न् अनिवारिताः

brahmaveṣadharāḥ sarve gāyantaḥ sāmagā iva te 'pi tatra mahāprājñāḥ prāviśann anivāritāḥ

हिन्दी अर्थ

गङ्गाके किनारे जिस स्थानपर राजा सोमके साथ ओषधियोंने इस वैदिकी गाथाका पाठ किया था, वह धान्यतीर्थ कहलाता है। उस दिनसे उसके कई नाम हो गये-औक्‍षध्यतीर्थ,

English

some threw them away, other Asuras laughed. Their conduct was not known, sage, except to Vishvarupa.

अध्याय १६८

श्लोक 17

चमसानि च पात्राणि सोमं चषालम् एव च सोमपानं हविस् त्यागम् ऋत्विजो भूपतिं तथा

camasāni ca pātrāṇi somaṃ caṣālam eva ca somapānaṃ havis tyāgam ṛtvijo bhūpatiṃ tathā

हिन्दी अर्थ

सौम्यतीर्थ, अमृततीर्थ, वेदगाथातीर्थ और मातृतीर्थ । जो मनुष्य इन तीर्थोमें स्नान, जप, होम, दान, पितृ-तर्पण और अन्न-दान करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। वहाँ

English

Vishvarupa too said to his father, "These are Daityas." Hearing his son's word, Tvashta said to the gods:

अध्याय १६८

श्लोक 18

निन्दन्ति निक्षिपन्त्य् अन्ये हसन्त्य् अन्ये तथासुराः तेषां चेष्टां न जानन्ति विश्वरूपं विना मुने

nindanti nikṣipanty anye hasanty anye tathāsurāḥ teṣāṃ ceṣṭāṃ na jānanti viśvarūpaṃ vinā mune

हिन्दी अर्थ

दोनों तटोंपर एक हजार छ: सौ तीर्थ हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले और सब प्रकारकी सम्पत्ति बढ़ानेवाले हैं ।

English

"Take water and darbha and sprinkle all around those who revile the holy sacrifice, the cup and the soma;

अध्याय १६८

श्लोक 19

विश्वरूपो ऽपि पितरं प्राह दैत्या इमे इति तत् पुत्रवचनं श्रुत्वा त्वष्टा प्राह सुरान् इदम्

viśvarūpo 'pi pitaraṃ prāha daityā ime iti tat putravacanaṃ śrutvā tvaṣṭā prāha surān idam

हिन्दी अर्थ

वहाँ विदर्भा-संगम और रेवती-संगमतीर्थ भी हैं। अब उनका वृत्तान्त बतलाऊँगा। पुराणवेत्ता पुरुष उसे जानते हैं। महर्षि भरद्वाज एक बड़े तपस्वी महात्मा थे। उनको बहिनका नाम रेवती

English

say 'All are struck down by me' and sprinkle them."

अध्याय १६८

श्लोक 20

गृहीत्वा वारिदर्भांश् च प्रोक्षयध्वं समन्ततः ये निन्दन्ति मखं पुण्यं चमसं सोमम् एव च

gṛhītvā vāridarbhāṃś ca prokṣayadhvaṃ samantataḥ ye nindanti makhaṃ puṇyaṃ camasaṃ somam eva ca

हिन्दी अर्थ

था। वह कुरूपा थी। उसका स्वर बड़ा विकृत था। प्रतापी भरद्वाज गङ्गाजीके दक्षिण-तटपर बैठकर बड़ी चिन्ता करने लगे कि 'इस भयंकर आकारवाली अपनी बहिनका विवाह किसके

English

The hosts of gods did so, and Tvashta too did likewise; then all were reduced to ashes, and became fugitives.

अध्याय १६८

श्लोक 21

मया त्व् अपहताः सर्व इत्य् उक्त्वा परिषिञ्चत

mayā tv apahatāḥ sarva ity uktvā pariṣiñcata

हिन्दी अर्थ

साथ करूं ? कोई भी तो इसे ग्रहण नहीं करता। अहो, किसीके कन्या न हो। कन्या केवल दुःख देनेवाली होती है। जिसके कन्या हो, उस प्राणीकी जीते-जी पग-पगपर मृत्यु होती रहती

English

Saying "The great sinners are slain by me," he threw the water; then the Daityas, their lives exhausted, departed in anger.

अध्याय १६८

श्लोक 22

तथा चक्रुः सुरगणास् त्वष्टा चापि तथाकरोत् भस्मीभूतास् ततः सर्वे कांदिशीकास् ततो ऽभवन्

tathā cakruḥ suragaṇās tvaṣṭā cāpi tathākarot bhasmībhūtās tataḥ sarve kāṃdiśīkās tato 'bhavan

हिन्दी अर्थ

है।' इस प्रकार वे अपने सुन्दर आश्रमपर तरह- तरहके विचार कर रहे थे। इतनेमें ही कठनामके एक मुनि वहाँ भरद्वाज मुनिका दर्शन करनेके लिये आये। उनको अवस्था सोलह वर्षको थी।

English

The place where Tvashta, Prajapati of the world, cast that water is called Tvashtra-tirtha, destroyer of all sin.

अध्याय १६८

श्लोक 23

हता मया महापापा इत्य् उक्त्वा वार्य् अवाक्षिपत् ततः क्षीणायुषो दैत्याः प्रातिष्ठन् कुपितास् ततः

hatā mayā mahāpāpā ity uktvā vāry avākṣipat tataḥ kṣīṇāyuṣo daityāḥ prātiṣṭhan kupitās tataḥ

हिन्दी अर्थ

सदुणोंको खान थे। कठने आते ही भरद्वाजको प्रणाम किया। भरद्वाजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और आश्रमपर पधारनेका कारण पूछा।

English

Yama then killed the Daityas who had fallen from Tvashta's word, with the staff of death, the discus, the noose of death and with wrath.

अध्याय १६८

श्लोक 24

यत्रैतत् प्राक्षिपद् वारि त्वष्टा लोकप्रजापतिः त्वाष्ट्रं तीर्थं तद् आख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्

yatraitat prākṣipad vāri tvaṣṭā lokaprajāpatiḥ tvāṣṭraṃ tīrthaṃ tad ākhyātaṃ sarvapāpapraṇāśanam

हिन्दी अर्थ

आपका दर्शन करने आया हूँ। जो उचित हो, वह कोजिये।' भरद्वाजने कठसे कहा--' महामते! तुम्हारी जो इच्छा हो, पढ़ो। मैं पुराण, स्मृति, वेद तथा अनेक प्रकारके धर्मशास्त्र-सब जानता हूँ। तुम

English

Where those Daityas were slain, that holy place is called Yamya; where the sacrifice was completed, with much nectar offered in the fire,

अध्याय १६८

श्लोक 25

त्वष्टुर् वाक्याच् च्युतान् दैत्यान् निजघान यमस् तदा कालदण्डेन चक्रेण कालपाशेन मन्युना

tvaṣṭur vākyāc cyutān daityān nijaghāna yamas tadā kāladaṇḍena cakreṇa kālapāśena manyunā

हिन्दी अर्थ

शीघ्र अपनी रुचि बतलाओ। कुलीन, धर्मपरायण, गुरु-सेवक तथा सुनी हुई विद्याको तत्काल धारण करनेवाला शिष्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।'

English

with unbroken streams in the great sacrifice, where the oblation-bearer (Agni) was satisfied and praised —

अध्याय १६८

श्लोक 26

यत्र ते निहता दैत्यास् तत् तीर्थं याम्यम् उच्यते यत्राभवत् क्रतुः पूर्णो हुत्वाग्नौ चामृतं बहु

yatra te nihatā daityās tat tīrthaṃ yāmyam ucyate yatrābhavat kratuḥ pūrṇo hutvāgnau cāmṛtaṃ bahu

हिन्दी अर्थ

कठने कहा--ब्रह्मन् ! में निष्पाप, सेवापरायण,

English

that is called Agni-tirtha, granting the fruit of a horse-sacrifice. Indra with the Maruts said these auspicious words to the king:

अध्याय १६८

श्लोक 27

धाराभिः शरमानाभिर् अखण्डाभिर् महाध्वरे यत्राभवद् धव्यवाहस् तृप्तस् तस्य ह्य् अभिष्टुतः

dhārābhiḥ śaramānābhir akhaṇḍābhir mahādhvare yatrābhavad dhavyavāhas tṛptas tasya hy abhiṣṭutaḥ

हिन्दी अर्थ

' एवमस्तु’ कहकर भरद्वाजने कठको सम्पूर्ण विद्या पढ़ायी। विद्या पाकर कठ बडे प्रसन्न हुए। उन्होंने भरद्वाजसे कहा--' गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके मनके अनुकूल दक्षिणा देना चाहता

English

"You will be an emperor, king, in both worlds; and you will be my dear friend always, no doubt.

अध्याय १६८

श्लोक 28

अग्नितीर्थं तद् आख्यातम् अश्वमेधफलप्रदम् इन्द्रो मरुद्भिर् नृपतिं प्राहेदं वचनं शुभम्

agnitīrthaṃ tad ākhyātam aśvamedhaphalapradam indro marudbhir nṛpatiṃ prāhedaṃ vacanaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

हुँ। आप कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग सकते हैं। बताइये, क्या दूँ? जो शिष्य अपने गुरुसे विद्या प्रात करके भी उन्हें मोहवश दक्षिणा नहीं देते,

English

Fulfilled in the human world, one should make libation at Indra-tirtha for the satisfaction of ancestors, especially at Yama-tirtha."

अध्याय १६८

श्लोक 29

त्वं संराड् भविता राजन्न् उभयोर् अपि लोकयोः सखा मम प्रियो नित्यं भविता नात्र संशयः

tvaṃ saṃrāḍ bhavitā rājann ubhayor api lokayoḥ sakhā mama priyo nityaṃ bhavitā nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोकी महिमा २०५

English

That holy place is Maheshvara's, where Shiva was worshipped and praised by Brahmins skilled in all rites, filled with devotion,

अध्याय १६८

श्लोक 30

स कृतार्थो मर्त्यलोक इन्द्रतीर्थे च तर्पणम् कुर्यात् पितॄणां प्रीत्यर्थं यमतीर्थे विशेषतः

sa kṛtārtho martyaloka indratīrthe ca tarpaṇam kuryāt pitṝṇāṃ prītyarthaṃ yamatīrthe viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

वे जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहती है रूपकी कहीं समता नहीं थी । वहाँ रेवतीके स्नान तबतक नरकमें पडे रहते हैं।' करनेसे जो जलकी धारा प्रकट हुई, वह 'रेवती'

English

with Vedic and worldly mantras, with dance, songs, instruments, nectars and the five products,

अध्याय १६८

श्लोक 31

माहेश्वरं तु तत् तीर्थं पूजितो ऽभिष्टुतः शिवः भक्तियुक्तेन विप्रैश् च सर्वकर्मविशारदैः

māheśvaraṃ tu tat tīrthaṃ pūjito 'bhiṣṭutaḥ śivaḥ bhaktiyuktena vipraiś ca sarvakarmaviśāradaiḥ

हिन्दी अर्थ

भरद्वाजने कहा--यह मेरी बहिन अभी कुमारी नामकी नदी हुई, जो रूप और सौभाग्य प्रदान है; इसको विधिपूर्वक ग्रहण करो और पत्नी करनेवाली है। फिर कठने उसकी पुण्यरूपताकी बनाओ। इसके प्रति प्रेमपूर्ण बर्ताव करना, यही सिद्धिके लिये नाना प्रकारके दर्भा (कुशों)-से मैं दक्षिणा माँगता हूं । अभिषेक किया। इससे 'विदर्भा' नामकी नदी

English

with many services, prostrations and circumambulations, with incense, lamps, offerings, flowers and fragrances.

अध्याय १६८

श्लोक 32

वैदिकैर् लौकिकैश् चैव मन्त्रैः पूज्यं महेश्वरम् नृत्यैर् गीतैस् तथा वाद्यैर् अमृतैः पञ्चसंभवैः

vaidikair laukikaiś caiva mantraiḥ pūjyaṃ maheśvaram nṛtyair gītais tathā vādyair amṛtaiḥ pañcasaṃbhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

कठने “बहुत अच्छा' कहकर गुरुके आदेशसे प्रकट हुई । जो मनुष्य रेवती और गङ्गामें श्रद्धापूर्वक विधिपूर्वक दी हुई रेवतीका पाणिग्रहण किया स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो और उसके सुन्दर रूपको प्राप्तिके लिये वहीं विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार जो रहकर देवेश्वर शङ्करकी आराधना की । रेवतीने विदर्भा और गौतमीके संगममें स्नान करता है,

English

He worshipped the lord of gods, Vishnu and Shambhu, with one mind. Then the two Lords, pleased, gave boons with power;

अध्याय १६८

श्लोक 33

उपचारैश् च बहुभिर् दण्डपातप्रदक्षिणैः धूपैर् दीपैश् च नैवेद्यैः पुष्पैर् गन्धैः सुगन्धिभिः

upacāraiś ca bahubhir daṇḍapātapradakṣiṇaiḥ dhūpair dīpaiś ca naivedyaiḥ puṣpair gandhaiḥ sugandhibhiḥ

हिन्दी अर्थ

भी शिवको प्रसन्नताके लिये उनका पूजन किया । उसे तत्काल भोग और मोक्षको प्राप्ति होती है। इससे वह सुन्दर रूपवती हो गयी । उसका प्रत्येक वहाँ दोनों तटोंपर सौ उत्तम तीर्थ हैं, जो सब अङ्ग मनोहर दिखायी देने लगा। अब उसके पापोंके नाशक तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता हैं।

English

to the praised king they gave both enjoyment and liberation, and likewise the supreme greatness of this holy place.

अध्याय १६८

श्लोक 34

पूजयाम् आस देवेशं विष्णुं शंभुं धियैकया ततः प्रसन्नौ देवेशौ वरान् ददतुर् ओजसा

pūjayām āsa deveśaṃ viṣṇuṃ śaṃbhuṃ dhiyaikayā tataḥ prasannau deveśau varān dadatur ojasā

हिन्दी अर्थ

पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवानूकी कृपा

English

From then on that holy place is called Shaiva and Vaishnava; bathing and giving there, they know, grant all desires.

अध्याय १६८

श्लोक 35

अभिष्टुते नरेन्द्राय भुक्तिमुक्ती उभे अपि माहात्म्यम् अस्य तीर्थस्य तथा ददतुर् उत्तमम्

abhiṣṭute narendrāya bhuktimuktī ubhe api māhātmyam asya tīrthasya tathā dadatur uttamam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी कहते हैं-गौतमी गङ्गाके उत्तर- एक बार राजा धन्वन्तरिने राज्य करते समय तटपर पूर्णतीर्थ है। वहाँ यदि मनुष्य अनजानमें एक महान् असुरको रणभूमिसे मार भगाया था। नहा ले तो भी कल्याणका भागी होता है।उसका नाम था तम। वह एक हजार वर्षोतक

English

One who remembers or recites all these holy places is freed from all sins and goes to the city of Shiva and Vishnu.

अध्याय १६८

श्लोक 36

ततःप्रभृति तत् तीर्थं शैवं वैष्णवम् उच्यते तत्र स्नानं च दानं च सर्वकामप्रदं विदुः

tataḥprabhṛti tat tīrthaṃ śaivaṃ vaiṣṇavam ucyate tatra snānaṃ ca dānaṃ ca sarvakāmapradaṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्णतीर्थके माहात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं चक्रधारी भगवान् विष्णु और पिनाकधारी भगवान् शंकर निवास करते हें। पूर्वकालमें आयुके पुत्र धन्वन्तरि राजा थे। उन्होंने अश्वमेध

English

At Bhanu-tirtha especially, bathing grants success in all aims; in that holy place of great merit there are a hundred holy places.

अध्याय १६८

श्लोक 37

इमानि सर्वतीर्थानि स्मरेद् अपि पठेत वा विमुक्तः सर्वपापेभ्यः शिवविष्णुपुरं व्रजेत्

imāni sarvatīrthāni smared api paṭheta vā vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ śivaviṣṇupuraṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, भाँति-भाँतिके दान दिये तथा प्रचुर भोग भोगे। फिर भोगोंकी विषमताका अनुभव करके उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। धन्वन्तरि यह जानते थे कि

English

One who remembers or recites all these holy places is freed from all sins and goes to the city of Shiva and Vishnu.

अध्याय १६८

श्लोक 38

भानुतीर्थे विशेषेण स्नानं सर्वार्थसिद्धिदम् तत्र तीर्थे महापुण्यं तीर्थानां शतम् अत्र हि

bhānutīrthe viśeṣeṇa snānaṃ sarvārthasiddhidam tatra tīrthe mahāpuṇyaṃ tīrthānāṃ śatam atra hi

हिन्दी अर्थ

पर्वतके शिखरपर, गङ्गा नदीके किनारे, समुद्रके तटपर, शिव और विष्णुके मन्दिरमें अथवा विशेषतः किसी पवित्र संगमपर किया हुआ जप,

English

At Bhanu-tirtha especially, bathing grants success in all aims; in that holy place of great merit there are a hundred holy places.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_brahmapurANa-1-246.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brahma Purana — Chapter 168
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.