Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
34
अध्याय 34 / 45

Adhyāya 34

2 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय ३४

श्लोक 1

॥ अष्टमं ब्राह्मणम् ।[V.vIi.1] वाचं धेनुमुपासीत ।तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस् तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरः ।तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः

|| aShTamaM brAhmaNam . ##[V.vIi.1]## vAchaM dhenumupAsIta | tasyAshchatvAraH stanAH svAhAkAro vaShaTkAro hantakAraH svadhAkAras tasyai dvau stanau devA upajIvanti svAhAkAraM cha vaShaTkAraM cha hantakAraM manuShyAH svadhAkAraM pitaraH | tasyAH prANa R^iShabho mano vatsaH

हिन्दी अर्थ

विच्‌ त्‌ब्रह्यहै-एसा कहते हूं । विदान (खण्डन या विनाश) करनेके कारण विद्युत्‌ है । जो "विचत्‌ ब्रह्म है" ठेसा जानता है, वह्‌ इस आत्मके प्रतिकरुलभूत पापोका नाश कर देता हे, क्योंकि विद्युत्‌ ही ब्रह्म है ब्रह्मक निरुक्ति (बयुत्पत्ति) बतलाती --अन्धकारके विदान-खण्डनके । कारण, क्योंकि यह्‌ मेघके अन्धकार-

English

Let him meditate on speech as a cow. Her four udders are the words Svâhâ, Vashat, Hanta, and Svadhâ . The gods live on two of her udders, the Svâhâ and the Vashat, men on the Hanta, the fathers on the Svadhâ. The bull of that cow is breath (prâna), the calf the mind.

अध्याय ३४

श्लोक 1-2

इत्यष्टमं ब्राह्मणम् ॥ नवमं ब्राह्मणम् ।[V.ix.1] अयमाग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते ।तस्यैष घोषो भवति यमेतत्कर्णावपिधाय शृणोति ।स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषँ शृणोति

ityaShTamaM brAhmaNam || navamaM brAhmaNam . ##[V.ix.1]## ayamAgnirvaishvAnaro yo.ayamantaH puruShe yenedamannaM pachyate yadidamadyate | tasyaiSha ghoSho bhavati yametatkarNAvapidhAya shR^iNoti | sa yadotkramiShyanbhavati nainaM ghoSha{\m+} shR^iNoti

हिन्दी अर्थ

घेनुरूपसे वाक्को उपासना ब्रह्म' एेसी अस्प उपासना आरम्भ ब्रह्मणो वाम्‌ वै ब्रहति- की जाती है वाकरूप धेनुको उवासना करे । उसके चार स्तन ह-स्वाहाकार, वषटकार हन्तकार ओर स्वधाकार। उसके दो स्तन स्वाहाकार ओर वषट्‌- १२०६ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अ्याय ५ पुरषान्तगंत वैदवान साग्नि, उसका घोष श्नौर मरणकालका यमग्निर्वेश्चानसे योऽयमन्तः पुरुषे यनंदमन्न्‌

English

This is indeed the highest penance, if they carry a dead person into the forest . He who knows this, conquers the highest world. This is indeed the highest penance, if they place a dead person on the fire . He who knows this, conquers the highest world.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 34
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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