अध्याय ३६
श्लोक 11
॥ एकादशं ब्राह्मणम् ।[V.xi.1] एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते परमँ हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यँ हरन्ति प्रेतम् अरण्यम् हरन्ति परमँ हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति प्रेतम् अग्नौ अभ्यादधति परमँ हैव लोकं जयति य एवं वेद
|| ekAdashaM brAhmaNam . ##[V.xi.1]## etadvai paramaM tapo yadvyAhitastapyate parama{\m+} haiva lokaM jayati ya evaM vedaitadvai paramaM tapo yaM pretamaraNya{\m+} haranti pretam araNyam haranti parama{\m+} haiva lokaM jayati ya evaM vedaitadvai paramaM tapo yaM pretamagnAvabhyAdadhati pretam agnau abhyAdadhati parama{\m+} haiva lokaM jayati ya evaM veda
हिन्दी अर्थ
प्रकरणान्तगंत उपासनाग्रोमे प्रप्र होनेवाली गति सर्वेषामस्मिन् प्रकरण उपास्- इस प्रकरणम बतलायी गयी 15 वी समस्त उपासनाओंका यहु गतिरूप जिस समय यह् पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वह वागुको प्राप्त होता है । वहां वह् वागु उ्षके लिये च््रगुक्त हौ जाता मागंदे देता ह, जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता ह । उसके द्वारा कात् प्रेति शरीरं परित्यजति स परिमणं चिद्रम् ? इस्युच्यते-- ब्रह्मलोकं जिगमिषोर्मागनिरोधं
English
This is indeed the highest penance, if a man, laid up with sickness, suffers pain . He who knows this, conquers the highest world.