Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
38
अध्याय 38 / 45

Adhyāya 38

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ३८

श्लोक 1

॥ त्रयोदशं ब्राह्मणम् मन्त्र १ [V.xIi.1] उक्थम् प्राणो वा उक्थम् प्राणो हीदँ सर्वमुत्थापयत्य् उद्धास्मा धस्मादुक्थविद्वीरस्तिष्ठत्य् उक्थस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद

|| trayodashaM brAhmaNam mantra 1 ##[V.xIi.1]## uktham prANo vA uktham prANo hIda{\m+} sarvamutthApayaty uddhAsmA dhasmAdukthavidvIrastiShThaty ukthasya sAyujya{\m+} salokatAM jayati ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

१२१२ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ श्रष्याय ग्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है--यह निश्चय ही परम तप है, जो एेसा जानता ह, वह परम लोकको ही जोत लेता ह । मृत पुरुषको जो ग्रन्न-प्राणरूप ब्रहमकी उपासना ओ्रौर तद्विषयक अ्रख्यान , श्नन्नं ब्रहमेति-तयथेतदुषास- अन्तं ब्रह्म--इस प्रकार इस । अन्य उपासनाका विधान करनेकौ न्न ब्रह्मान्नमद्यते यत्‌ तद्‌ अन्न ब्रह्महै। अन्नञो कि १. व खाया जाता हे, वह ब्रह्म है-एेसा मतय भावार्या 1 किन्हीं आचार्योका कथन है; कितु

English

Next follows the Uktha . Verily, breath (prâna) is Uktha, for breath raises up (utthâpayati) all this. From him who knows this, there is raised a wise son, knowing the Uktha; he obtains union and oneness with the Uktha.

अध्याय ३८

श्लोक 2

मन्त्र २ [V.xIi.2] यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते ।युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद

mantra 2 ##[V.xIi.2]## yajuH prANo vai yajuH prANe hImAni sarvANi bhUtAni yujyante | yujyante hAsmai sarvANi bhUtAni shraiShThyAya yajuShaH sAyujya{\m+} salokatAM jayati ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

इसके सिवा रम्‌" यहु कहा- पिताने शरमूणएेसा भी कहा, सो वह्‌ रम्‌क्याहे? प्राणही “रम्‌ (उक्थ इस एकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही उक्यहै, क्योंकि प्राण ही इन सबको उत्थापित करता है । इस उपासकसे उक्थ- वेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है। जो एसी उपासना करता हे, वह्‌ प्राणके

English

Next follows the Yagus. Verily, breath is Yagus, for all these beings are joined in breath . For him who knows this, all beings are joined to procure his excellence; he obtains union and oneness with the Yagus.

अध्याय ३८

श्लोक 3

मन्त्र ३ [V.xIi.3] साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि ।सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद

mantra 3 ##[V.xIi.3]## sAma prANo vai sAma prANe hImAni sarvANi bhUtAni samya~nchi | samya~nchi hAsmai sarvANi bhUtAni shraiShThyAya kalpante sAmnaH sAyujya{\m+} salokatAM jayati ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार उक्थ एकं अन्य उपासना है । उक्थ शच्च है, वही महाव्रत क्रतुमे प्रधान होता है । यजुद्‌ ष्टिसे प्राणोपासना "यजुः" इस प्रकार प्राणको उपाक्तना करे । प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमे ही इन सव भूतोका योग होता है । सम्पूरणं भूत इसकी श्रेष्ठताके यजुरिति चोपासीत प्राणम्‌ ध्यजुः' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु हैः प्राणो बै यजुः; कथं यजुः प्राणः प्राण यजु किस प्रकार है ? क्योंकि

English

Next follows the Sâman. Verily, breath is the Sâman, for all these beings meet in breath. For him who knows this, all beings meet to procure his excellence; he obtains union and oneness with the Sâman.

अध्याय ३८

श्लोक 4

मन्त्र ४ [V.xIi.4] क्षत्रम् प्राणो वै क्षत्रम् प्राणो हि वै क्षत्रम् त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः ।प्र क्षत्रमत्रमप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद

mantra 4 ##[V.xIi.4]## kShatram prANo vai kShatram prANo hi vai kShatram trAyate hainaM prANaH kShaNitoH | pra kShatramatramapnoti kShatrasya sAyujya{\m+} salokatAM jayati ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

सामः इस प्रकार प्राणको उपासना करे । प्राण ही साम दहे, क्योंकि भ्राणमे ही ये सब भूत सुसंगत होते हँ । समस्त भ्रुत उसके लिये सुसंगत होते ह तथा उसकी श्रे्ठताके लिये समथं होते है । जो इस प्रकार उपासना सामेति चोपासीत प्राणम्‌ । साम" इस प्रकार भी प्राणको प्राणो वे साम । कथं प्राणः साम १ उपासना करे । प्राण हौ साम है । प्राणे हि यस्मात्‌ सर्वाणि भूतानि भ्रण साम किस प्रकार है? क्यो

English

Next follows the Kshatra. Verily, breath is the Kshatra, for breath is Kshatra, i.e. breath protects (trâyate) him from being hurt (kshanitoh). He who knows this, obtains Kshatra (power), which requires no protection; he obtains union and oneness with Kshatra .

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 38
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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