Matsya Purana· Matsya Purāṇa
109
अध्याय 109 / 176

Adhyaya 109

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अध्याय १०९

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०९ श्रुतं मे ब्रह्मणा प्रोक्तं पुराणे ब्रह्मसम्भवे तीर्थानां तु सहस्राणि शतानि नियुतानि च सर्वे पुण्याः पवित्राश्च गतिश्च परमा स्मृता

matsya-purāṇa 109 śrutaṃ me brahmaṇā proktaṃ purāṇe brahmasambhave tīrthānāṃ tu sahasrāṇi śatāni niyutāni ca sarve puṇyāḥ pavitrāśca gatiśca paramā smṛtā

हिन्दी अर्थ

संक्षेपादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेष्विह॥ १० नामोंसे विभक्त कर दिया जाता है। फिर द्वापरमें विभिन्न ऋषिपुत्रैः पुनर्वेदा भिद्यन्ते दृष्टिविश्रमै: अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित् तान् प्रत्यवस्थिताः । द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थैस्तैः स्वदर्शनेः

English

SuyasJas (Kunala) 8,,

अध्याय १०९

श्लोक 2

सोमतीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम् स्नानमात्रेण राजेन्द्र पुरुषांस्तारयेच्छतम् तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नानं समाचरेत्

somatīrthaṃ mahāpuṇyaṃ mahāpātakanāśanam snānamātreṇa rājendra puruṣāṃstārayecchatam tasmātsarvaprayatnena tatra snānaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

बाङ्मनःकर्मभिुंःखैरनिर्वेदो जायते ततः। निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा आदिमें) विभाजन कर दिया जाता है। वे महर्षिगण मन्त्र- ब्राह्मणों, स्वर और क्रमके विपर्ययसे ऋकू, यजुः और सामवेदकी संहिताओंका अलग-अलग संघटन करते हैं।

English

Daiaratlia (liandhupalita) 8 years.

अध्याय १०९

श्लोक 3

पृथिव्यां नैमिषं पुण्यम् अन्तरिक्षे च पुष्करम् त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते

pṛthivyāṃ naimiṣaṃ puṇyam antarikṣe ca puṣkaram trayāṇāmapi lokānāṃ kurukṣetraṃ viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

भाष्यविद्या आदिको भी कहीं-कहीं सामान्य रूपसे और कहीं-कहीं विपरीतक्रमसे परिवर्तित कर दिया है। कुछ लोगोंने तो उनका समर्थन और कुछ लोगोंने अवरोध किया हैं। इसके बाद प्रत्येक द्वापरयुगमें भिन्नार्थदर्शी ऋषिवृन्द अपने-अपने विचारानुसार वैदिक प्रथामें अर्थभेद उत्पन्न कर देते हैं। पूर्वकालमें यजुर्वेद एक ही था, परंतु ऋषियोंने उसे बादमें सामान्य और विशेष अर्थसे कृष्ण और यजुः-रूपमें दो भागोंमें विभक्त कर दिया, जिससे शास्त्रमें भेद हो गया। इस प्रकार इन लोगोंने यजुर्वेदको अनेकों उपाख्यानों तथा प्रस्थानों, खिलांशो-द्वारा विस्तृत कर दिया है। इसी प्रकार अथर्ववेद और सामवेदके मन्त्रोंका भी ह्यस एवं विकल्योंद्वारा अर्थ-परिवर्तन कर दिया है। इस

English

Sangala!lndrapalita; 10 „

अध्याय १०९

श्लोक 4

सर्वाणि तानि संत्यज्य कथमेकं प्रशंससि अप्रमाणं तु तत्रोक्तम् अश्रद्धेयमनुत्तमम्

sarvāṇi tāni saṃtyajya kathamekaṃ praśaṃsasi apramāṇaṃ tu tatroktam aśraddheyamanuttamam

हिन्दी अर्थ

तरह प्रत्येक द्वापरयुगमे (पूर्वपरम्परासे चले आते हुए) वेदार्थको भिन्नदशी ऋषिवृन्द परिवर्तित करते हैं। फिर द्वापरके बीत जानेपर कलियुगमें वे वेदार्थ शनैः-शनैः नष्ट हो जाते हैं। वेदार्थका विपर्यय हो जानेके कारण द्वापरके अन्तमें ही यथार्थ दृष्टिका लोप, असामयिक मृत्यु और व्याधियोंके उपद्रव प्रकट हो जाते हैं। तब मन-वचन- कर्मसे उत्पन्न हुए दुःखोंके कारण लोगोंके मनमें खेद उत्पन्न होता है । खेदाधिक्यके कारण दु: खसे मुक्ति पानेके

English

Palirfnka 13

अध्याय १०९

श्लोक 5

गतिं च परमां दिव्यां भोगांश्चैव यथेप्सितान् किमर्थमल्पयोगेन बहु धर्मं प्रशंससि एतन्मे संशयं ब्रूहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्

gatiṃ ca paramāṃ divyāṃ bhogāṃścaiva yathepsitān kimarthamalpayogena bahu dharmaṃ praśaṃsasi etanme saṃśayaṃ brūhi yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam

हिन्दी अर्थ

लिये उनके मनमें विचार जाग्रत् होता है। फिर विचार उत्पन्न होनेपर वैराग्य, वैराग्यसे दोष-दर्शन और दोषोंके प्रत्यक्ष होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है॥ १०--२०॥ इस प्रकार पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके द्वापरयुगमें उन मेधावी ऋषियोंके वंशमें इस भूतलपर शास्त्रोंके विरोधी लोग उत्पन्न होते हैं और उस युगमें आयुर्वेदमें विकल्प, ज्योतिषशारत्रके आङ्गोंमे विकल्प, अर्थशारत्रमें विकल्प, हेतुशास्त्रमें विकल्प, कल्पसूत्रोंकी प्रक्रियामें विकल्प, भाष्यविद्यामें विकल्प, स्मृतिशास्त्रोंमें नाना प्रकारके भेद, पृथक्-पृथक् मार्ग तथा मनुष्योंकी बुद्धियोंमें भेद प्रचलित हो जाते हैं। तब मन-वचन-कर्मसे लगे रहनेपर भी बड़ी

English

Soma.«larman (Dovavarinan) 7 „

अध्याय १०९

श्लोक 6

अश्रद्धेयं न वक्तव्यं प्रत्यक्षमपि यद्भवेत् नरस्याश्रद्दधानस्य पापोपहतचेतसः

aśraddheyaṃ na vaktavyaṃ pratyakṣamapi yadbhavet narasyāśraddadhānasya pāpopahatacetasaḥ

हिन्दी अर्थ

मनसा कर्मणा वाचा कृच्छाद् वार्ता प्रसिद्धयति॥ २४ कठिनाईसे लोगोंकी जीविका सिद्ध हो पाती है। द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशः पर: स्मृतः। लोभोऽधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः

English

atadhanvan (isatadhara) 8 „

अध्याय १०९

श्लोक 7

अश्रद्दधानो ह्यशुचिर् दुर्मतिस्त्यक्तमङ्गलः एते पातकिनः सर्वे तेनेदं भाषितं त्वया

aśraddadhāno hyaśucir durmatistyaktamaṅgalaḥ ete pātakinaḥ sarve tenedaṃ bhāṣitaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा। वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च प्रतिष्ठिते गुणैर्हीना धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु। तथैव संध्यापादेन अंशस्तस्यां प्रतिष्ठित: एष धर्मः स्मृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते। मनसा कर्मणा वाचा वार्ता सिद्ध्यति वा न वा

English

Brihadratha (or Brihadaiiva) 7 „

अध्याय १०९

श्लोक 8

शृणु प्रयागमाहात्म्यं यथादृष्टं यथाश्रुतम् प्रत्यक्षं च परोक्षं च यथान्यस्तं भविष्यति

śṛṇu prayāgamāhātmyaṃ yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam pratyakṣaṃ ca parokṣaṃ ca yathānyastaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

कलौ प्रमारको रोगः सततं चापि क्षुदभयम्। अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः अल्पतेजोबलाः पापा महाकोपा ह्यधार्मिकाः

English

The names within brackets and the regnal periods given above are taken from the Vftyu P. The Visnu PurAna ends by saying these tea

अध्याय १०९

श्लोक 9

यथैवान्यददृष्टं च यथादृष्टं यथाश्रुतम् शास्त्रं प्रमाणं कृत्वा च युज्यते योगमात्मनः

yathaivānyadadṛṣṭaṃ ca yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam śāstraṃ pramāṇaṃ kṛtvā ca yujyate yogamātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्। हिंसमानस्तथेर्ष्या च क्रोधोऽसूयाक्षमः कृतम् इस प्रकार द्वापरयुगमें सभी प्राणियोंका जीवन भी कष्टसे ही चल पाता है। उस समय जनतामें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य-व्यवसाय, युद्ध, तत्त्वोंकी अनिश्चितता, वेदों एवं शास्त्रोंकी मन:कल्पित रचना, धर्मसंकरता, वर्णाश्रम-धर्मका विनाश तथा काम और द्वेषकी भावना आदि दुर्गुणोंका प्राबल्य हो जाता है। उस समय लोगोंकी दो हजार वर्षोकी पूर्णायु होती है। द्वापपकी समाप्तिके समय उसके चतुर्थाशमें उसकी संध्याका काल आता है। उस समय लोग धर्मे

English

TABLE No. V.

अध्याय १०९

श्लोक 10

क्लिश्यते चापरस्तत्र नैव योगमवाप्नुयात् जन्मान्तरसहस्रेभ्यो योगो लभ्येत मानवैः

kliśyate cāparastatra naiva yogamavāpnuyāt janmāntarasahasrebhyo yogo labhyeta mānavaiḥ

हिन्दी अर्थ

गुणॉसे हीन हो जाते हैं। उसी प्रकार संध्याके चतुर्थ चरणमें संध्यांशका समय उपस्थित होता है अब द्वापरयुगके बाद आनेवाले कलियुगका वृत्तान्त सुनिये। द्वापरकी समासिके समय जब अंशमात्र शेष रह जाता है, तब कलियुगकी प्रवृत्ति होती है। जीव-हिंसा,

English

Manryas will reign for 137 years.** It is the only Parana that gives the correct ten names neither more nor less. The total of reigns (taken from Vayu), comes up to 136 years.

अध्याय १०९

श्लोक 11

यथा योगसहस्रेण योगो लभ्येत मानवैः यस्तु सर्वाणि रत्नानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति

yathā yogasahasreṇa yogo labhyeta mānavaiḥ yastu sarvāṇi ratnāni brāhmaṇebhyaḥ prayacchati

हिन्दी अर्थ

तपस्वियोंकी हत्या-ये कलियुगके स्वभाव (स्वाभाविक गुण) हैं। वह प्रजाओंको भलीभाँति चरितार्थ कर देता है। यही उसका अविकल धर्म है। यथार्थ धर्मका तो विनाश हो जाता है। उस समय मन-वचन-कर्मसे प्रयत्न करनेपर भी यह संदेह बना रहता है कि जीविकाकी सिद्धि होगी या नहीं। कलियुगमें विसूचिका, प्लेग आदि महामारक रोग होते हैं। इस घोर कलियुगमें भुखमरी और अकालका सदा भय बना रहता है। देशोंका उलट-फेर तो होता ही रहता है। किसी प्रमाणमें स्थिरता नहीं रहती। कोई गर्भमें ही मर जाता है तो कोई नौजवान होकर, कोई मध्य जवानीमें तो कोई बुढ़ापामें। इस प्रकार लोग कलियुगमें अकालमें ही कालके शिकार

English

Comparative Table of Maurya Kings.

अध्याय १०९

श्लोक 12

तेन दानेन दत्तेन योगं नाभ्येति मानवः प्रयागे तु मृतस्येदं सर्वं भवति नान्यथा

tena dānena dattena yogaṃ nābhyeti mānavaḥ prayāge tu mṛtasyedaṃ sarvaṃ bhavati nānyathā

हिन्दी अर्थ

बन जाते हैं। उस समय लोगोंका तेज और बल घट जाता है। उनमें पाप, क्रोध और धर्महीनता बढ़ जाती है। वे असत्यभाषी और लोभी हो जाते हैं। ब्राह्मणोंके हीनता-रूप कर्मदोषॉसे प्रजाओंको सदा भय बना रहता है। कलियुगमें जीवोंमें हिंसा, अभिमान, ईर्ष्या, क्रोध,

English

BrahmAnila

अध्याय १०९

श्लोक 13

प्रधानहेतुं वक्ष्यामि श्रद्दधत्स्व च भारत यथा सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र दृश्यते

pradhānahetuṃ vakṣyāmi śraddadhatsva ca bhārata yathā sarveṣu bhūteṣu brahma sarvatra dṛśyate

हिन्दी अर्थ

आदि दुर्गुण सर्वथा अधिक मात्रामें बढ़ जाते हैं। कलियुगके आनेपर ब्राह्मण न तो वेदोंका अध्ययन करते हैं और न यज्ञानुष्ठान ही करते हैं। क्षत्रिय भी वैश्योंके साथ (कर्मभ्रष्ट होकर) विनष्ट हो जाते हैं। कलियुगमें शूद्र एवं भोजनके समय ब्राह्मणोंके साथ सम्पर्क होता है। राजानः शूद्रभूयिष्ठा: पाखण्डानां प्रवर्तका: । काषायिणश्च निष्कच्छास्तथा कापालिनश्व ह

English

V&yu Mss, marked e.

अध्याय १०९

श्लोक 14

ब्राह्मणे वास्ति यत्किंचिद् अब्राह्मम् इति वोच्यते एवं सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र पूज्यते

brāhmaṇe vāsti yatkiṃcid abrāhmam iti vocyate evaṃ sarveṣu bhūteṣu brahma sarvatra pūjyate

हिन्दी अर्थ

ये चान्ये देवब्रतिनस्तथा ये धर्मदूषकाः। दिव्यवृत्ताश्च ये केचिद् वृत्त्यर्थ श्रुतिलिङ्गिनः एवंविधाश्च ये केचिद्भवन्तीह कलौ युगे। अधीयन्ते तदा वेदाञ्शूद्रान् धर्मार्थकोविदाः

English

Vayu generally Chaiidragupta...

अध्याय १०९

श्लोक 15

तथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद्बुधः पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर

tathā sarveṣu lokeṣu prayāgaṃ pūjayedbudhaḥ pūjyate tīrtharājastu satyameva yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

यजन्ति ह्याश्वमेधैस्तु राजानः शूद्रयोनय: । स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम् अधर्माभिनिवेशित्वं तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्। भ्रूणहत्या प्रजानां च तदा होवं प्रवर्तते उत्सीदन्ते तथा यज्ञाः केवलं धर्महेतवः

English

Ghandragupta

अध्याय १०९

श्लोक 16

ब्रह्मापि स्मरते नित्यं प्रयागं तीर्थमुत्तमम् तीर्थराजम् अनुप्राप्य न चान्यत्किंचिदर्हति

brahmāpi smarate nityaṃ prayāgaṃ tīrthamuttamam tīrtharājam anuprāpya na cānyatkiṃcidarhati

हिन्दी अर्थ

एवं संध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके। तेषामधर्मिणां शास्ता भृगूणां च कुले स्थितः अस्त्रकर्मा स वै सेनां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्

English

Ghandragupta 24 Ghandragupta

अध्याय १०९

श्लोक 17

को हि देवत्वमासाद्य मनुष्यत्वं चिकीर्षति अनेनैवोपमानेन त्वं ज्ञास्यसि युधिष्ठिर यथा पुण्यतमं चास्ति तथैव कथितं मया

ko hi devatvamāsādya manuṣyatvaṃ cikīrṣati anenaivopamānena tvaṃ jñāsyasi yudhiṣṭhira yathā puṇyatamaṃ cāsti tathaiva kathitaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

शूद्र ही अधिकतर राजा होते हैं। पाखण्डका प्रचार बढ़ जाता है। शूद्रलोग गेरुआ वस्त्र धारण कर हाथमें नारियलका कपाल लेकर काछ खोले हुए (संन्यासीके वेषमें) घूमते रहते हैं॥ २९--४०॥ कुछ लोग देवताओंकी पूजा करते हैं तो कुछ लोग धर्मको दूषित करते हैं। कुछ लोगोंके आचार- विचार दिव्य होते हैं तो कुछ लोग जीविकोपार्जनके लिये साधुका वेष बनाये रहते हैं। कलियुगमें अधिकतर इसी प्रकारके लोग होते हैं। उस समय शूद्रलोग धर्म और अर्थके ज्ञाता बनकर वेदोंका अध्ययन करते हैं। शूद्रयोनिमें उत्पन्न नृपतिगण अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उस समय लोग रत्री, बालक और गौओंकी

English

Bindasftra

अध्याय १०९

श्लोक 18

श्रुतं चेदं त्वया प्रोक्तं विस्मितो ऽहं पुनः पुनः कथं योगेन तत्प्राप्तिः स्वर्गवासस्तु कर्मणा

śrutaṃ cedaṃ tvayā proktaṃ vismito 'haṃ punaḥ punaḥ kathaṃ yogena tatprāptiḥ svargavāsastu karmaṇā

हिन्दी अर्थ

हत्या कर, परस्पर एक-दूसरेको मारकर तथा अपहरण कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। कलियुगमें कष्टका बाहुल्य हो जाता है। प्राणियोंकी आयु थोड़ी हो जाती है। देशोंमें उथल-पुथल होता रहता है। व्याधिका प्रकोप बढ़ जाता है। अधर्मकी ओर लोगोंकी विशेष रुचि हो जाती है। सभीके आचार-विचार तामसिक हो जाते हैं। प्रजाओंमें श्रूणहत्याकी प्रवृत्ति हो जाती है। इसी कारण कलियुगमें आयु, बल और रूपकी क्षीणता हो जाती है।

English

Bhadrasfiras NandasAra

अध्याय १०९

श्लोक 19

दाता वै लभते भोगान् गां च यत्कर्मणः फलम् तानि कर्माणि पृच्छामि पुनस्तैः प्राप्यते मही

dātā vai labhate bhogān gāṃ ca yatkarmaṇaḥ phalam tāni karmāṇi pṛcchāmi punastaiḥ prāpyate mahī

हिन्दी अर्थ

दुःखोंसे संतप्त हुए लोगोंकी परमायु सौ वर्षकी होती है। कलियुगमें सम्पूर्ण वेद विद्यमान रहते हुए भी नहींके बराबर हो जाते हैं तथा धर्मके एकमात्र कारण यज्ञोंका विनाश हो जाता है। यह तो कलियुगकी दशा बतलायी गयी, अब उसकी संध्या और संध्यांशका वर्णन सुनिये। प्रत्येक युगमें तीन-तीन चरण व्यतीत हो जानेके बाद सिद्धियाँ घट जाती हैं, अर्थात् धर्मका हास हो जाता है। उनकी संध्याओंमें युगका स्वभाव चतुर्थांश मात्र रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशोंमें संध्याका स्वभाव भी चतुर्थांश ही शेष रहता है

English

Bhadrasara

अध्याय १०९

श्लोक 20

शृणु राजन्महाबाहो यथोक्तकरणं महीम् गामग्निं ब्राह्मणं शास्त्रं काञ्चनं सलिलं स्त्रियः

śṛṇu rājanmahābāho yathoktakaraṇaṃ mahīm gāmagniṃ brāhmaṇaṃ śāstraṃ kāñcanaṃ salilaṃ striyaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें कलियुगके अन्तिम समयमे प्राप्त हुए संध्यांशकालमें उन अधर्मियोंका शासन करनेके लिये भृगुवंशमें चन्द्रगोत्रीय प्रमति नामक राजा उत्पन्न होता है। वह अस्त्रधारी नरेश हाथी, घोडे और रथोंसे भरी हुई सेनाको साथ लेकर तीस वर्षोतक पृथ्वीपर

English

ABokavardhana... Dasaratha

अध्याय १०९

श्लोक 21

मातरं पितरं चैव ये निन्दन्ति नराधमाः न तेषामूर्ध्वगमनम् इदमाह प्रजापतिः

mātaraṃ pitaraṃ caiva ye nindanti narādhamāḥ na teṣāmūrdhvagamanam idamāha prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीविष्णुधर्मोत्तर महापुराणमें भी इस राजाकी विस्तृत महिमा निरूपित है। वासुदेवशरण अग्रवाल आदि इतिहासके अनेक विद्वान् इसे राजा विक्रमादित्यका अपर नाम मानते हैं। स हत्वा सर्वशश्चैव राजानः शूद्रयोनय:। पाखण्डान् स तदा सर्वान्निःशेषानकरोत् प्रभुः

English

Batulliupftlitas of Klin ala

अध्याय १०९

श्लोक 22

एवं योगस्य सम्प्राप्तिस्थानं परमदुर्लभम् गच्छन्ति नरकं घोरं ये नराः पापकर्मिणः

evaṃ yogasya samprāptisthānaṃ paramadurlabham gacchanti narakaṃ ghoraṃ ye narāḥ pāpakarmiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

अधार्मिकाश्च ये केचित्तान् सर्वान् हन्ति सर्वशः । औदीच्यान्मध्यदेशांश्च पार्वतीयांस्तथैव च प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठापरान्तिकान्। तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडान्सिहलैः सह

English

Dasaratha Bandhupftlita

अध्याय १०९

श्लोक 23

हस्त्यश्वं गाम् अनड्वाहं मणिमुक्तादिकाञ्चनम् परोक्षं हरते यस्तु पश्चाद्दानं प्रयच्छति

hastyaśvaṃ gām anaḍvāhaṃ maṇimuktādikāñcanam parokṣaṃ harate yastu paścāddānaṃ prayacchati

हिन्दी अर्थ

गान्धारान्यारदांश्चैव पहृवान् यवनाञ्छकान्। तुषारान्बर्वराञ्छ्वेतान्हलिकान्दरदान्खसान् लम्पकानान्ध्रकांश्चापि चोरजातींस्तथैव च। प्रवृत्तवक्रो वलवाउ्शूद्राणामन्तकृद् बभौ मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येह जज्ञिवान्

English

SfilisOka

अध्याय १०९

श्लोक 24

न ते गच्छन्ति वै स्वर्गं दातारो यत्र भोगिनः अनेनकर्मणा युक्ताः पच्यन्ते नरके पुनः

na te gacchanti vai svargaṃ dātāro yatra bhoginaḥ anenakarmaṇā yuktāḥ pacyante narake punaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान्। द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रकान्ते विंशतिं समाः। निजघ्ने सर्वभूतानि मानुषाण्येव सर्वशः

English

Indrapalita Sampratip

अध्याय १०९

श्लोक 25

एवं योगं च धर्मं च दातारं च युधिष्ठिर यथा सत्यमसत्यं वा अस्ति नास्तीति यत्फलम् निरुक्तं तु प्रवक्ष्यामि यथाह स्वयमंशुमान्

evaṃ yogaṃ ca dharmaṃ ca dātāraṃ ca yudhiṣṭhira yathā satyamasatyaṃ vā asti nāstīti yatphalam niruktaṃ tu pravakṣyāmi yathāha svayamaṃśumān

हिन्दी अर्थ

कृत्वा बीजावशिष्टां तां पृथ्वीं क्रूरेण कर्मणा। परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च संस्थिता सहसा या तु सेना प्रमतिना सह। गङ्कायमुनयोर्मध्ये सिद्धि प्राता समाधिना ततस्तेषु प्रनष्टेषु संध्यांशे क्रूरकर्मसु। उत्साद्य पार्थिवान् सर्वास्तेष्वतीतेषु वै तदा

English

Sdlisiika

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 109
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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