Matsya Purana· Matsya Purāṇa
123
अध्याय 123 / 176

Adhyaya 123

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अध्याय १२३

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १२३ गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः

matsya-purāṇa 123 gomedakaṃ pravakṣyāmi ṣaṣṭhaṃ dvīpaṃ tapodhanāḥ surodakasamudrastu gomedena samāvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

भूषणस्वरूप उनके भवनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ अनृपम कान्तिवाले मुनिवर नारद स्वयं हिमाचलद्वारा निवेदित हुए। तब शैलराजने उन्हें यथायोग्य पाद्य और अर्घ्य निवेदित किया मुनिने विधिपूर्वक उस अर्घ्यको स्वीकार किया। उस समय शैलराजका मुख खिले हुए कमलके समान हर्षसे खिल उठा। तब उन्होंने अर्घ्य ग्रहण करनेके पश्चात् मुनिवरसे मधुर वाणीमें धीरेसे उनकी तपस्याके

English

Gomeda Dvlpa.

अध्याय १२३

श्लोक 2

शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः तस्मिन्द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ

śālmalasya tu vistārād dviguṇastasya vistaraḥ tasmindvīpe tu vijñeyau parvatau dvau samāhitau

हिन्दी अर्थ

नारदजी बोले-महाचल'! तुम्हारे इस भवनको देखकर आश्चर्य होता है। तुमने इस भवनमें सभी पदार्थोको संगृहीत कर रखा है। पर्वतराज! तुम्हारी कन्दराओंकी पृथुता तो मनके समान गम्भीर है। तुम्हारे अन्यान्य गुणसमूहोंकी गुरुता अन्य स्थावरोंसे कहीं बढ़-चढ़कर है। तुम्हारे जलकी निर्मलता मनसे भी अधिक है। शैलराज! मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं देख रहा हूँ, जो तुम्हारी कन्दराओंके भीतर वर्तमान न हो। स्वर्गमें कहीं

English

Sflta said; — Risis! Now hear about the sixth dvipa, known as die Qomeda. It surrounds the Surodaka Ocean. Its size is double that of the jlmaladvtpa. It has two beautiful mountains. — 1-2.

अध्याय १२३

श्लोक 3

प्रथमः सुमना नाम जात्यञ्जनमयो गिरिः द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः

prathamaḥ sumanā nāma jātyañjanamayo giriḥ dvitīyaḥ kumudo nāma sarvauṣadhisamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

भी तुमसे बढ़कर लक्ष्मी नहीं है। तुम अपनी गुफाओंमें निवास करनेवाले, नाना प्रकारकी तपस्याओंमें निरत, अग्नि एवं सूर्यको-सी कान्तिवाले पावन मुनियोंद्वारा नित्य पवित्र होते रहते हो। देवता, गन्धर्व और किन्नरवृन्द स्वर्गवाससे विरक्त हो विमानोंकी अवहेलना कर पिताके गृहकी तरह तुम्हारे यहाँ निवास कर रहे हैं। अहो! शैलेन्द्र! तुम धन्य हो; क्योंकि तुम्हारी कन्दरामें लोकपति शंकर भी समाधिमें लीन होकर निवास कर रहे हैं। देवर्षि नारद इस प्रकार आदरपूर्ण वाणी बोल ही रहे थे कि उसी समय पर्वतराज हिमाचलकी पटरानी मेना अपनी कन्याके साथ मुनिका दर्शन करनेके लिये वहाँ आयीं। उनके साथ कुछ सखियाँ और सेविकाएँ भी थीं । उन्होंने

English

The fii'st one is SamanA, full of antimony (Aujana), and the second one is the Eamada, full of all kinds of herbs. Tt is very lofty and full of gold. The Gomedadvipa is surrounded by the sixth ocean, lk§urasoda, which is double the size of the Suroda Ocean. The Moun- tains DhAtakt (or SumanA) and Kumuda are the sons of Havya. They are of vast dimensions. The first sub-division is Saumana, also known as.Dh&takt Khapdn, after Dhataki, the first mountain. Gomeda Khapda is also called Sarvasukha. The Khanda of the Kumuda Mountain is called under the same name — Kumuda. — 3-7.

अध्याय १२३

श्लोक 4

शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः

śātakaumbhamayaḥ śrīmān vijñeyaḥ sumahācitaḥ samudrekṣurasodena vṛto gomedakaśca saḥ

हिन्दी अर्थ

लज्जा और प्रेमसे विनम्र हो उस भवनमें प्रवेश किया, ६९२ मत्स्यपुराण

English

Both the mountains are round in shape, spreading from one end to the other, and are very lofty. To the east of the dvtpa, stands the Mount SumanA, while Mount Kumuda is on the west; both extending to the sea by means of offshoots, stretching from the east to the west. -~8-9.

अध्याय १२३

श्लोक 5

षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद्द्विगुणेन च धातकीकुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ

ṣaṣṭhena tu samudreṇa surodāddviguṇena ca dhātakīkumudaścaiva havyaputrau suvistṛtau

हिन्दी अर्थ

यत्र स्थितो मुनिवरः शैलेन सहितो वशी । दृष्ट्रा तु तेजसो राशिं मुनिं शैलप्रिया तदा तां विलोक्य महाभागो महर्षिरमितद्युतिः ततो विस्मितचित्ता तु हिमवद्विरिपुत्रिका

English

mAVTEn cxxni.

अध्याय १२३

श्लोक 6

सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते धातकिनः स्मृतं तद्वै प्रथमं प्रथमस्य तु

saumanaṃ prathamaṃ varṣaṃ dhātakīkhaṇḍamucyate dhātakinaḥ smṛtaṃ tadvai prathamaṃ prathamasya tu

हिन्दी अर्थ

उहैक्षन्नारदं॑ देवी मुनिमद्भुतरूपिणम्। एहि वत्सेति चाप्युक्ता ऋषिणा स्निग्धया गिरा उवाच माता तां देवीमभिवन्दय पुत्रिके

English

That region is divided into two parta by the feet of these mountains. Half of the southern portion is known as the Dhfttakl Khada* while the northern half is called the Kumada Khanda. Both these countries (janapadas) belong to the Gomedadvipa, and they are of gigantic dimen- sions.— 10-11.

अध्याय १२३

श्लोक 7

गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः

gomedaṃ yatsmṛtaṃ varṣaṃ nāmnā sarvasukhaṃ tu tat kumudasya dvitīyasya dvitīyaṃ kumudaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

वत्से वन्दय देवर्षिं ततो दास्यामि ते शुभम्। रत्लक्रीडनकं रम्यं स्थापितं यच्चिरं मया ववन्दे मूर्ध्नि संधाय करपङ्कजकुडमलम् शरीर लक्षणानां तु विज्ञानाय तु कौतुकात्। स्त्रीस्वभावाद्यददुहितुश्चिन्तां हृदि समुद्वहन्

English

Puykara Dvipa.

अध्याय १२३

श्लोक 8

एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः

etau dvau parvatau vṛttau śeṣau sarvasamucchritau pūrveṇa tasya dvīpasya sumanāḥ parvataḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

चोदितः शैलमहिषीसख्या मुनिवरस्तदा। स्मिताननो महाभागो वाक्यं प्रोवाच नारदः जहाँ जितेन्द्रिय मुनिवर नारद हिमाचलके साथ बैठे हुए थे। तब हिमाचल-पत्नी मेनाने तेजके पुञ्जभूत मुनिको देखकर लञज्जावश मुखको छिपाये हुए करकमलोंकी अञ्जलि बाँधकर मुनिकी वन्दना की॥१२५-१३३ ३॥

English

I shall now speak of the seventh dvipa, the Great Puekara, which surrounds the Ikurasoda Sea, which is double of Gomeda. It is itself surrounded by the Pukaras (lakes or lotuses?). Chitras&nu is the chief mountain, and it is full of lotuses and adorned with the rocks of won- derful gems. The Mount Chitraafinu stands on the eastern half. Its circumference is 27,0 X) ydjanas, and height is 24,000 ydjanas. The western half is covered by the M&nasa Mountain, which looks like a full moon rising near the sea coast. Its height is 5,500 yojanas. The Mount Mali4vita is its son which guards the western portion of this region. The half of the region lying east of this mountain is divided into two parts. The Puskaradvtpa is surrounded by the sea, the water of which is tasteful. Its dimensions are double of the Gomedadvipa. The people of this dvipa live up to 30,000 years. There are no exceptional changes there to this natural rule and the people are healthy, happy and have attained perfection in all the qualities of the mind. The people of the three superior dvipas are all equal in happiness, life, beauty and bravery. There is no air of superiority or inferiority in them. Besides this, there is none to kill or be killed there, and there is a total absence of hatred, envy, fear, greed, pride, hypocrisy, enmity, &xt. They are free from the differoutiation of troth and untruth, virtue and vice. The order of Varna and Arama, the practice of rearing up domestic animals, trade, husbandry are also not in existence there. — 12-23

अध्याय १२३

श्लोक 9

प्राक्पश्चिमायतैः पादैर् आसमुद्रादिति स्थितः पश्चार्धे कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै

prākpaścimāyataiḥ pādair āsamudrāditi sthitaḥ paścārdhe kumudastasya evameva sthitastu vai

हिन्दी अर्थ

अमित कान्तिसम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली महर्षि नारदने तब मेनाको देखकर अमृतके उद्वारस्वरूप आशीर्वचनोंद्वारा उनकी शुभकामना की। हिमाचलको पुत्री पार्वतीदेवी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं। वे अद्भुत रूपवाले नारदमुनिकी ओर एकटक देख रही थीं। उस समय देवर्षि नारदने 'बेटी! आओ? ऐसी स्नेहपूर्ण वाणीसे पुकारा भी, किंतु वे पिताके गलेको पकड्कर उनको गोदमें छिपकर बैठ गयीं। यह देखकर माता मेनाने पार्वती देवीसे कहा--' बेटी! भगवान् नारदको प्रणाम करो, इससे तुम अपने मनके अनुकूल योग्य पति प्राप्त करोगी।' माताद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतीने वसत्रके छोरसे अपने मुखको ढक लिया और मस्तकको थोड़ा

English

The three kinds of knowledge, criminal laws and punishments are also not known there. It does not rain there, neither there are rivers in that region. The climate is also not influenced by beat or cold. The water supply and plant life of the country depends on the hill waterfalls. The seasons are the same as in Uttara Kum. Happiness pervades all round. The troubles, of old age are also unknown there. Such is the life in the Dhfttaki and Mah&vlta Khanas. — 24-26.

अध्याय १२३

श्लोक 10

एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधाकृतः दक्षिणार्धं तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते

etaiḥ parvatapādaistu sa deśo vai dvidhākṛtaḥ dakṣiṇārdhaṃ tu dvīpasya dhātakīkhaṇḍamucyate

हिन्दी अर्थ

झुका दिया, परंतु मुखसे कुछ नहीं कहा। तत्पश्चात् माताने पुनः अपनी कन्यासे इस प्रकार कहा--'बेटी! यदि तुम देवर्षि नारदको प्रणाम कर लो तो मैं तुम्हें बड़ी सुन्दर वस्तु दूँगी । मैं तुम्हें वह सुन्दर रत्ननिर्मित खिलौना दूँगी, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे छिपाकर रखा है।' इस प्रकार

English

Thus the seven dvipas are surrounded by the seven oceans. The dimensions of a dvipa tally with the dimensions of the sea preceding it surrounded by it). Both the dvipas and the oceans have thus gradually grown in magnitude, a vast store of waters being called the ocean.-— 27-28.

अध्याय १२३

श्लोक 11

कुमुदं तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम् एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ

kumudaṃ tūttare tasya dvitīyaṃ varṣamuttamam etau janapadau dvau tu gomedasya tu vistṛtau

हिन्दी अर्थ

सदृश दोनों हाथोंसे मुनिके दोनों चरणोंको उठाकर मस्तकपर रख कर प्रणाम किया॥ १३४--१४१॥ पार्वतीके प्रणाम कर लेनेके पश्चात् माता मेनाने कुतूहलवश कन्याके सौभाग्यसूचक शरीर-लक्षणोंकी जानकारी प्राप्त करनेके लिये धीरेसे सखीद्वारा मुनिसे अनुरोध किया; क्योंकि रत्री-स्वभाववश उनके हृदयमें अपनी पत्नीके उस संकेतको जानकर मनमें परम प्रसन्न हुए कि यह तो बड़ा सुन्दर विषय उपस्थित हुआ। इसमें उन्हें कोई हानि नहीं दीख पड़ी, अतः वे स्वयं कुछ न बोले। तब हिमाचल-पल्रीकी सखीद्वारा अनुरोध

English

TBEMATB7A PUB AN AM.

अध्याय १२३

श्लोक 12

अतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम् समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद्द्विगुणं हि सः

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi saptamaṃ dvīpamuttamam samudrekṣurasaṃ caiva gomedāddviguṇaṃ hi saḥ

हिन्दी अर्थ

किये जानेपर महाभाग मुनिवर नारद मुसकराते हुए इस प्रकार बोले--' भद्रे! इसका पति तो अभी जगत्में पैदा ही नहीं हुआ है। यह सभी शुभ लक्षणोंसे रहित है। इसकी हथेली सदा उत्तान ही रहती है तथा चरण भी कुलक्षणोंसे युक्त हैं। यह अपनी छायाके साथ अर्थात् अकेली ही रहेगी। इसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय।'

English

The root ' Ripi ' means to wander about in happiness; hence in these Varsas all the four classes of people live happily.— 29.

अध्याय १२३

श्लोक 13

आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः पुष्करेण वृतः श्रीमांश् चित्रसानुमहागिरिः

āvṛtya tiṣṭhati dvīpaḥ puṣkaraḥ puṣkarairvṛtaḥ puṣkareṇa vṛtaḥ śrīmāṃś citrasānumahāgiriḥ

हिन्दी अर्थ

सृष्ट्यां चावश्यभाविन्यां केनाप्यतिशयात्मना कर्त्रा प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम्। यो जायते हि यद्बीजाज्जनेतुः स ह्यसार्थक: स्वकर्मणैव जायन्ते विविधा भूतजातयः

English

The Tides.

अध्याय १२३

श्लोक 14

कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः द्वीपस्यैव तु पूर्वार्धे चित्रसानुः स्थितो महान्

kūṭaiścitrairmaṇimayaiḥ śilājālasamudbhavaiḥ dvīpasyaiva tu pūrvārdhe citrasānuḥ sthito mahān

हिन्दी अर्थ

मानुषाच्च सरीसृप्यां मनुष्यत्वेन जायते तत्रापि जातौ श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेन तु।

English

When the moon vises in the East, the sea begins to swell. The sea becomes less when the moon wanes. When the sea swells it does so with its own waters (and not with additional water), and when it subsides, its swelling is lost iu its own water laud does not actually lose any water)* On the rising of the moon, the sea increases as if its waters have really increased. During the bright and dark fortnights, the sea heaves at the waxing of the moon and becomes placid at the wane of it, but the store of the water remains the same. The sea rises and falls, according to the phases of the moon, and loOangulis fthree-forths of inches, or 112J inches) is the measure of its rise and fall, on the two parva days (i.e., full moon and new moon days respectively). The place between two seas is called a dvipa. The sea is called Udadhi, on account of its containing water. -30-34.

अध्याय १२३

श्लोक 15

परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः सप्तविंशतिः ऊर्ध्वं स वै चतुर्विंशद्योजनानां महाबलः

parimaṇḍalasahasrāṇi vistīrṇaḥ saptaviṃśatiḥ ūrdhvaṃ sa vai caturviṃśadyojanānāṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

मनुजास्तत्र जायन्ते यतो न गृहधर्मिणः। क्रमेणाऽऽश्रमसम्प्रासिर्ब्रह्मचारिब्रतादनु तस्य कर्तुर्नियोगेन संसारो येन वर्धित: । संसारस्य कुतो वृद्धिः सर्वे स्युर्यदतिग्रहाः अतः कर्त्रा तु शास्त्रेषु सुतलाभः प्रशंसितः । प्राणिनां मोहनार्थाय नरकत्राणसंश्रयात्

English

The mountains are called (tiri because they swallow («.e., hide every- thing Nigima); and because they fill up (space), therefore they are called Parvata. — 35.

अध्याय १२३

श्लोक 16

द्वीपार्धस्य परिक्षिप्तः पश्चिमे मानसो गिरिः स्थितो वेलासमीपे तु पूर्वचन्द्र इवोदितः

dvīpārdhasya parikṣiptaḥ paścime mānaso giriḥ sthito velāsamīpe tu pūrvacandra ivoditaḥ

हिन्दी अर्थ

स्त्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा हैन्यभाषिणी। शास्त्रालोचनसामर्थ्यमुज्झितं तासु वेधसा वाक्यमेतत् फलश्चष्टं पुंसि ग्लानिकरं परम्। कन्या हि कृपणा शोच्या पितुर्दु:खविवर्थिनी

English

The Mount aka is in Sakadvjpa, and is named as such. — 36.

अध्याय १२३

श्लोक 17

योजनानां सहस्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्धस्य रक्षिता

yojanānāṃ sahasrāṇi sārdhaṃ pañcāśaducchritaḥ tasya putro mahāvītaḥ paścimārdhasya rakṣitā

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर पर्वतराज हिमाचल व्याकुल हो गये। उनका सारा धैर्य जाता रहा। तब वे अश्रुगद्गद कण्ठसे नारदजीसे बोले॥१४२--१४७॥ हिमवानने कहा-देवंर्षे! इस अत्यन्त दोषपूर्ण संसारकी गति दुर्विज्ञेय है। इस अवश्यम्भाविनी सृष्टिमें किसी कर्ता महापुरुषद्वारा जो मर्यादा स्थापित की गयी है, वह संसारी जीवोंके लिये स्थिर है। जो जिसके बीजसे उत्पन्न होता है, वह उस पैदा करनेवालेके लिये निरर्थक होता है, उसी प्रकार पैदा करनेवाला भी पैदा हुएका कोई नहीं है--यह तो स्पष्ट है; क्योंकि प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ अपने-अपने कर्मोके अनुसार ही उत्पन्न होती हैं।

English

Thus is Kurfastaraba in the mi<lrit of the janapada in Knrfadvipa. The Mount Krauilcha stands in Krauijcliadvipa, and is named after it. -37.

अध्याय १२३

श्लोक 18

पूर्वार्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः

pūrvārdhe parvatasyāpi dvidhā deśastu sa smṛtaḥ svādūdakenodadhinā puṣkaraḥ parivāritaḥ

हिन्दी अर्थ

एक ही जीव अण्डजके सम्पर्कसे अण्डजयोनिमें पैदा होता है और वही पुन: मनुष्यके संयोगसे मानव-योनिमें उत्पन्न होता है। फिर मानव-योनिसे भी उलटकर सर्प आदि रेंगनेवाली योनियोंमें जन्म लेता है। वहाँ भी धर्मकी उत्कृष्टतासे उत्तम जातिमें जन्म होता है। शेष जो अधार्मिक प्राणी होते हैं, वे पुत्रहीन होते हैं। उनमें गृहस्थधर्मका सुचारुरूपसे पालन न करनेवाले मानवोंको पुत्रकी प्रासि नहीं होती। इन आश्रमोंकी प्राप्ति उसी कर्ताकी व्यवस्थासे,

English

A gigantic SAlmali tree stands in lalmalidvlpa and there is the Mount Gomoda in the dvipa of that name — 38.

अध्याय १२३

श्लोक 19

विस्तारान्मण्डलाच्चैव गोमेदाद्द्विगुणेन तु त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः

vistārānmaṇḍalāccaiva gomedāddviguṇena tu triṃśadvarṣasahasrāṇi teṣu jīvanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

जिसने संसारकी वृद्धि की है, क्रमशः ब्रह्मचर्य व्रतके बाद होती है। यदि सभी प्राणी आश्रमधर्मका त्याग कर दें तो संसारकी वृद्धि कैसे हो सकती है। इसीलिये सृष्टिकर्ताने शास्त्रोंमें नरकसे त्राण करनेका लोभ दिखाकर प्राणियोंको मोहित करनेके लिये पुत्रप्राप्तिकी प्रशंसा की है; परंतु प्राणियोंकी सृष्टि स्त्रीक बिना हो नहीं सकती और वह स्त्री-जाति स्वभावसे ही दयनीय और दीनतापूर्वक बोलनेवाली होती है। इसीलिये ब्रह्माने उन स्त्रियोंको शास्त्रालोचनकी शक्ति नहीं दी है

English

There is a banyan tree in the shape of a lotus in Puskaradvipa. The banyan tree has sprung up from the potency of Urahmri, and is adored by all the Devas; but really its origin is hidden in mystery. PrajApati Brahin i resides in Puskaradvipa in company of the SfUlhyas. He is adored by the 33 Devas, along with tlio Brahmar§is.— 39-40.

अध्याय १२३

श्लोक 20

विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत्स्वाभाविकं स्मृतम् आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः

viparyayo na teṣvasti etatsvābhāvikaṃ smṛtam ārogyaṃ sukhabāhulyaṃ mānasīṃ siddhimāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार शास्त्रॉंमें अनेकों बार निश्चितरूपसे इस महान् फलका वर्णन किया गया है कि जो कन्या शील- सदाचारसे रहित न हो, वह दस पुत्रोंके समान मानी गयी है; किंतु यह वाक्य निष्फल है और पुरुषके लिये अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न करनेवाला है; क्योंकि जो कन्या पति, पुत्र, धन आदि सभी सुख-साधनोंसे पूर्ण सम्पन्न होनेपर भी जब कृपण, शोचनीय और पिताके दुःखको बढानेवाली होती है, तब जो पति, पुत्र, धन आदिसे हीन अभागिनी

English

Thus all the great Rihis and the Deva.s worship Brahrnd there. Various kinds of jewels are produced in Jainbflclvipa, and circulated therefrom •to other clvipas. The people of these dvJpas, in order of their precedence, excel one another twofold in simplicity, cliastity, truthfulness, self- control, health, and long life. In all the sub-divisions of those dvipaa the inhabitants are protected by their own natural learning. They all get their food without any care to obtain it. — 41-44.

अध्याय १२३

श्लोक 21

सुखमायुश्च रूपं च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्यरूपतः

sukhamāyuśca rūpaṃ ca triṣu dvīpeṣu sarvaśaḥ adhamottamau na teṣvāstāṃ tulyāste vīryarūpataḥ

हिन्दी अर्थ

हो तो उसके विषयमें क्या कहना है। नारदजी! आपने मेरी कन्याके शरीरमें तो दोष-समूहका ही वर्णन किया है, इसी कारण मैं मोहमें पड़ा हूँ, मेरा शरीर सूखा जा रहा यतो निःसाधनो धर्मः परिमाणोञ्झिता रति: । धनं जीवितपर्याप्तं पत्यौ नार्याः प्रतिष्ठितम् हैवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सहैव हि

English

They eat the wholosonie food, of the six flavoum. Beyond Pukara- dvipa is the sea of sweet water surrounding it, behind which is the

अध्याय १२३

श्लोक 22

न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा न लोभो न च दम्भो वा न च द्वेषः परिग्रहः

na tatra vadhyavadhakau nerṣyāsūyā bhayaṃ tathā na lobho na ca dambho vā na ca dveṣaḥ parigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

त्वया चोक्तं हि देवर्षे न जातोऽस्याः पतिः किल। एतद्दौर्भाग्यमतुलमसंख्यं गुरु दुःसहम् मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम्। लक्षणं हस्तपादादौ विहितेर्लक्षणैः किल

English

Mount Lok«11oka, both dark and bright, and at some part it is lighted up, while the other part beyond it is full of darkness. It takes up the outr half of the populated land and is surrounded on all sides by the sea. —45-48.

अध्याय १२३

श्लोक 23

सत्यानृते न तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च वर्णाश्रमाणां वार्त्ता च पाशुपाल्यं वणिक्कृषिः

satyānṛte na teṣvāstāṃ dharmādharmau tathaiva ca varṇāśramāṇāṃ vārttā ca pāśupālyaṃ vaṇikkṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुङ्गव। उत्तानहस्तता प्रोक्ता याचतामेव नित्यदा तैश्च सर्वैर्विहीनेयं त्वमात्थ मुनिपुङ्गव मुह्यामि मुनिशार्दूल हृदयं दीर्यतीव मे

English

The water is ten times land and it protects the earth from all direc- tions. The fire is ten times water which is upheld by the former every whore.— 49.

अध्याय १२३

श्लोक 24

त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च न तत्र वर्षं नद्यो वा शीतोष्णं च न विद्यते

trayīvidyā daṇḍanītiḥ śuśrūṣā daṇḍa eva ca na tatra varṣaṃ nadyo vā śītoṣṇaṃ ca na vidyate

हिन्दी अर्थ

है, मनमें ग्लानि हो रही है और कष्ट पा रहा हूँ। मुने! इस समय मुझपर अनुग्रह करके (कन्याके कष्ट-निवारक और मेरे कन्याविषयक दुःखको दूर कीजिये; क्योंकि निःसंदेहरूपसे कार्य-सिद्धिकी सम्भावना होनेपर भी फलके लोभमें आसक्त एवं कार्य-साधनमें निपुण अशुभ तृष्णा मेरे परिभवयुक्त मनको ठग रही हैं। सित्रयोंके लिये उत्तम

English

The air is ten times fire which it holds. It spreads itself at an angle in the space where it encircles and holds the beings. — 50.

अध्याय १२३

श्लोक 25

उद्भिदान्युदकानि स्युर् गिरिप्रस्रवणानि च तुल्योत्तरकुरूणां तु कालस्तत्र तु सर्वदा

udbhidānyudakāni syur giriprasravaṇāni ca tulyottarakurūṇāṃ tu kālastatra tu sarvadā

हिन्दी अर्थ

पतिकी प्राप्ति ही उनके सौभाग्यशाली जन्मकी सूचक है तथा वह पितूकुल एवं पतिकुल-दोनों कुलोंके लिये इहलोक और परलोकमें सुखका साधन बतलायी गयी है। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिका मिलना तो दुर्लभ है ही, परंतु गुणहीन पति भी नारीको पुण्यके बिना कभी नहीं प्राप्त होता; क्योंकि नारीको साधनरहित धर्म, प्रचुर मात्रामें कामवासनाकी प्राप्ति और जीवन-निर्वाहके लिये धन पतिके द्वारा ही प्राप्त होते हैं॥ १५७--१६५॥ पति निर्धन, अभागा, मूर्ख और सभी शुभ लक्षणोंसे रहित क्यों न हो, किंतु वह नारीके लिये सहैव परम देवता कहा गया है। देवर्षे! आपने कहा है कि मेरी पुत्रीका पति पैदा ही नहीं हुआ हे, यह तो इसका अतुलनीय एवं बहुत

English

The Akasa which is ten times tlie air, holds all beings; and ten times greater is Bhut/ldi ("AliafikAra) which surrounds the Akfiifa, and ten times the Bhutadi is MahakMa which stands holding them in turn, while it is itself held by the Unmanifested eternal. The mahatativa, &c., are called vikara and vikari 'producer of change and that in which the change is produced) in turn in relation to the support each gives and takes from the other. — 51-53.

अध्याय १२३

श्लोक 26

सर्वतः सुखकालो ऽसौ जराक्लेशविवर्जितः सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च

sarvataḥ sukhakālo 'sau jarākleśavivarjitaḥ sargastu dhātakīkhaṇḍe mahāvīte tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

बड़ा दुःसह दुर्भाग्य हे। मुने! आप जो ऐसा कह रहे हैं कि चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें बह अभीतक उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इससे मेरा मन व्याकुल हो गया है। मनुष्यों एवं देवजातियोंके शुभाशुभसूचक लक्षण हाथों एवं पैरोंमें चिहित लक्षणोंद्वारा जाने जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस विषयमें भी आपने इसे उत्तानहस्ता बतलाया है। यह उत्तानहस्ता सदा याचकोंकी ही कही गयी है, किंतु जो सौभाग्यशाली, धन्यवादके पात्र और दानी होते हैं, उनके हाथ कभी उत्तान नहीं रहते। मुने!

English

The Vikaras, such as earth, &c., are circumscribed and limited, and each is greater than one preceding it which it permeates: each is produced from tlie other and is upheld by it. They are held together by their mutual attraction. They are really separate (molecules), but by mutual contact look welded into one homogenous whole. — 54-55.

अध्याय १२३

श्लोक 27

एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्त सप्तभिरावृताः द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत्समस्तु वै

evaṃ dvīpāḥ samudraistu sapta saptabhirāvṛtāḥ dvīpasyānantaro yastu samudrastatsamastu vai

हिन्दी अर्थ

आपने यह भी कहा है कि इसके चरण अपनी छायासे युक्त होनेके कारण दोषी हैं, अत: इस विषयमें भी हमें कल्याणकारिणी आशा नहीं प्रतीत हो रही है। शरीरके अन्यान्य लक्षण पृथक्-पृथक् फल सूचित करते हैं। उनमें जो सौभाग्य, धन, पुत्र, आयु और पति-प्राप्तिके सूचक होते हैं, उन सभी लक्षणॉसे मेरी यह कन्या हीन है--ऐसा आप कह रहे हैं। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी सारी मनोगत अभिलाषाओंको जानते हैं। मुनिशार्दूल ! आप सत्यवादी हैं, इसी कारण (आपकी बात सुनकर) में मोहित हो रहा हुँ और मेरा हृदय

English

Of these, the elements, earth, water, fire and air, are well defined and limited. The higher elements are only seen as lights. — 56

अध्याय १२३

श्लोक 28

एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम् अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः

evaṃ dvīpasamudrāṇāṃ vṛddhirjñeyā parasparam apāṃ caiva samudrekāt samudra iti saṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवपूजितः न जातोऽस्याः पतिदेव्या यन्मयोक्तं हिमाचल। न स जातो महादेवो भूतभव्यभवोद्भवः । शरण्यः शाश्वतः शास्ता शंकरः परमेश्वरः

English

Tliese liglits, I'.e., Akasa and other elements, too, are well defined. But, like smaller leaves which, though separate are not separately seen, being concealed in a larger vessel, these higher light-like elements, though separate and each supporting the other, are not visualized as such. They too excel each other, in the order of their precedence. The creation of the universe depends on their existence. T.ie origin of life is in these Tattvas; hence without them there cau bo no life and action. — 57-GO.

अध्याय १२३

श्लोक 29

ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः ऋषिरत्येव रमणे वर्षन्त्वेतेन तेषु वै

ṛṣadvasantyo varṣeṣu prajā yatra caturvidhāḥ ṛṣiratyeva ramaṇe varṣantvetena teṣu vai

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मविष्ण्वन्द्रमुनयो जन्ममृत्युजरार्दिताः। तस्यैते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे आस्ते ब्रह्मा तदिच्छातः सम्भूतो भुवनप्रभुः । विष्णुर्युगे युगे जातो नानाजातिर्महातनुः मन्यसे मायया जातं विष्णुं चापि युगे युगे। आत्मनो न विनाशोऽस्ति स्थावरान्तेऽपि भूधर

English

Thus we understand that theseelements, Mabat, &c., partake of two- fold characters, viz,, cause and effect.— 61.

अध्याय १२३

श्लोक 30

उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा प्रक्षीयमाने बहुले क्षीयते ऽस्तमिते च वै

udayatīndau pūrve tu samudraḥ pūryate sadā prakṣīyamāne bahule kṣīyate 'stamite ca vai

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं संसारो यः प्रकीर्तितः। स जन्ममृत्युदुःखार्तो ह्यवशः परिवर्तते महादेवोऽचलः स्थाणुर्न जातो जनकोऽजरः। भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथो निरामयः

English

The position of the Earth and its circumference, with seven Dvipas and their extent, circumference and other measurements have thus been described. Such is the situation of only oue part of the universal Pradhana Tattva, 0 King! this much is to bo heard of the position, &c., of the Earth. I shall next tell you about the movemouts of the Sun and the Moon. — 62-65.

अध्याय १२३

श्लोक 31

आपूर्यमाणो ह्युदधिर् आत्मनैवाभिपूर्यते ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्य् अपां क्षयः

āpūryamāṇo hyudadhir ātmanaivābhipūryate tato vai kṣīyamāṇe tu svātmanyeva hy apāṃ kṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदुक्तं च मया देवी लक्षणैर्वर्जिता तव। शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्त्वेन विचारणम् लक्षणं हैविको ह्याङ्कः शरीरावयवाश्रयः। सर्वायुर्धनसौभाग्यपरिमाणप्रकाशकः 'फटा-सा जा रहा है । ऐसा कहकर हिमाचल उस महान् दुःखको कल्पनासे विरत हो गये। उस शैलराजके मुखकमलसे निकली हुई ये सारी बातें सुनकर देवपूजित नारदजी मुसकराते हुए इस प्रकार बोले॥ १६६--१७५ ॥

English

Here ends the one hundred and twenty third ehaptcr dcaUny with the jMsiiionof the seven Dcipas in Bhuvanakofit,

अध्याय १२३

श्लोक 32

उदयात्पयसां योगात् पुष्पन्त्य् आपो यथा स्वयम् तथा स तु समुद्रो ऽपि वर्धते शशिनोदये

udayātpayasāṃ yogāt puṣpanty āpo yathā svayam tathā sa tu samudro 'pi vardhate śaśinodaye

हिन्दी अर्थ

नारदजीने कहा--गिरिराज ! आप तो महान् हर्षका अवसर उपस्थित होनेपर भी दुःखकी गाथा गा रहे हैं और मेरे अस्पष्ट वाक्यके अर्थको समझे बिना मोहको पराप्त हो रहे हैं। शैलराज! इस रहस्यपूर्ण वाणीका तात्पर्य मुझसे सुनिये और मेरे द्वारा कही हुई बातपर सावधानीपूर्वक विचार कीजिये। हिमाचल! मैंने जो यह कहा है कि इस देवीका पति उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इसका अभिप्राय यह है कि जो भूत, भविष्य, वर्तमान-तीनों

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 33

अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च उदये ऽस्तमये चेन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः

anyūnānatiriktātmā vardhantyāpo hrasanti ca udaye 'stamaye cendoḥ pakṣayoḥ śuklakṛṣṇayoḥ

हिन्दी अर्थ

कालोंमें वर्तमान रहनेवाले, जीवोंके शरणदाता, अविनाशी, नियामक, कल्याणकर्ता और परमेश्वर हैं, वे महादेव उत्पन्न नहीं हुए हैं अर्थात् वे अनादि हैं, उनका जन्म नहीं होता। पर्वतराज! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, मुनि आदि जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थासे ग्रस्त हैं। ये सभी उस परमेश्वरके खिलौनेमात्र हैं। उन्हींकी इच्छासे त्रिभुवनके स्वामी ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और विष्णु प्रत्येक युगमें विशाल शरीर धारण करके नाना प्रकारकी जातियोंमें उत्पन्न होते हैं । पर्वतराज! प्रत्येक युगमें मायाका आश्रय लेकर उत्पन्न हुए विष्णुको तो तुम भी मानते ही हो। स्थावर योनिमें जन्म लेनेपर भी शरीरान्त होनेपर आत्माका विनाश नहीं होता। संसारमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 34

क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा दशोत्तराणि पञ्चाहुर् अङ्गुलानां शतानि च

kṣayavṛddhī samudrasya śaśivṛddhikṣaye tathā daśottarāṇi pañcāhur aṅgulānāṃ śatāni ca

हिन्दी अर्थ

हुए प्राणीका शरीरमात्र नष्ट होता है, आत्माका नाश नहीं कहा जाता। ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त जो यह संसार कहा जाता है, उसमें उत्पन्न हुए प्राणी जन्म-मृत्युके दुःखसे पीड़ित होकर पराधीन रहते हैं, किंतु महादेव स्थाणुकी भाँति अचल हैं। वे वृद्धावस्थासे रहित तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, किंतु स्वयं किसीसे उत्पन्न नहीं होते। वे ही निर्दोष जगदीश्वर शङ्कर इस कन्याके

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 35

अपां वृद्धिः क्षयो दृष्टः समुद्राणां तु पर्वसु द्विरापत्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः

apāṃ vṛddhiḥ kṣayo dṛṣṭaḥ samudrāṇāṃ tu parvasu dvirāpatvāt smṛto dvīpo dadhanāccodadhiḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

साथ ही मैंने तुमसे जो यह कहा था कि यह देवी लक्षणोंसे रहित है, उस वाक्यका अभिप्राय भी सम्यक्- रूपसे सुनो। पर्वतराज! शरीरके अवयवोंमें अङ्कित लक्षण हैविक चिह्न होता है। वह सभीके आयु, धन और सौभाग्यके परिणामको प्रकट करनेवाला होता है, नैवाङ्को लक्षणाकारः शरीरे संविधीयते

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 36

निगीर्णत्वाच्च गिरयः पर्वबन्धाच्च पर्वताः शाकद्वीपे तु वै शाकः पर्वतस्तेन चोच्यते

nigīrṇatvācca girayaḥ parvabandhācca parvatāḥ śākadvīpe tu vai śākaḥ parvatastena cocyate

हिन्दी अर्थ

यथाहमुक्तवान् तस्या ह्युत्तानकरतां सदा उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सहैव तु। सुरासुरमुनिब्रातवरदेयं भविष्यति

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 37

कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस् तस्य नाम्ना निगद्यते

kuśadvīpe kuśastambo madhye janapadasya tu krauñcadvīpe giriḥ krauñcas tasya nāmnā nigadyate

हिन्दी अर्थ

चरणौ पद्मसंकाशावस्याः स्वच्छनखोज्चलौ। सुरासुराणां नमतां किरीटमणिकान्तिभिः जननी लोकधर्मस्य सम्भूता भूतभाविनी। शिवेयं पावनायैव त्वव्क्षेत्रे पावकद्युतिः अत्यन्तं हि महत् कार्य देवानां हिमभूधर

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 38

शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते

śālmaliḥ śālmaladvīpe pūjyate sa mahādrumaḥ gomedake tu gomedaḥ parvatastena cocyate

हिन्दी अर्थ

नमस्कृत्य वृषाङ्काय तदा देवाय धीमते। उवाच सोऽपि संहृष्टो नारदं तु हिमाचलः दुस्तरान्नरकाद् घोरादुद्धूतोऽस्मि त्वया मुने। पातालादहमुद्धूत्य सप्तलोकाधिपः कृतः

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 39

न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत्तेन स स्मृतः पूज्यते स महादेवैर् ब्रह्मांशो ऽव्यक्तसम्भवः

nyagrodhaḥ puṣkaradvīpe padmavattena sa smṛtaḥ pūjyate sa mahādevair brahmāṃśo 'vyaktasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

हिमाचलोऽस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना। हिमाचलेऽचलगुणां प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम् किंतु इसके शरीरमें इस अनन्त एवं अप्रमेय सौभाग्यके किसी लक्षणाकार चिहूका संविधान नहीं किया गया है इसीलिये मैंने कहा है कि इसके शरीरमें लक्षण नहीं है। महाबुद्धिमान् हिमाचल! जो मैंने इसकी सदा उत्तानकरताका कथन किया था, उसका तात्पर्य यह है कि इस देवीका यह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा, जिससे यह सुर, असुर और मुनिसमूहके लिये

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 40

तस्मिन्स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्धं प्रजापतिः तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः

tasminsa vasati brahmā sādhyaiḥ sārdhaṃ prajāpatiḥ tatra devā upāsante trayastriṃśanmaharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

कहा था कि इसके चरण अपनी छायामें रहनेके कारण दोषी हैं, इस विषयमें भी तुम मेरे वचनोंकी युक्ति सुनो। इसके कमल-सदूश चरण स्वच्छ उज्ज्वल नखोंसे सुशोभित हैं। जब वे नमस्कार करनेवाले सुरों एवं असुरोंके किरीटोंमें जड़ी हुई मणियोंकी विचित्र वर्णकी कान्तिसे उद्भासित होंगे, तब अपनी छायासे प्रतिबिम्बित कहलायेंगे। महीधर! आपको यह कन्या जगदुरु वृषभध्वज शङ्करकी भार्या, लोकधर्मकी जननी, प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली,

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 41

स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः जम्बूद्वीपात्प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च

sa tatra pūjyate devo devairmaharṣisattamaiḥ jambūdvīpātpravartante ratnāni vividhāni ca

हिन्दी अर्थ

कल्याणस्वरूपा और अग्निके समान कान्तिमती है। यह तुम्हारे क्षेत्रमें तुम्हें पावन करनेके लिये प्रकट हुई है। इसलिये श्रेष्ठ पर्वतराज! जिस प्रकार यह शीघ्र-से-शी्र पिनाकधारी शङ्करजीके साथ संयुक्त हो जाय, तुम्हें विधिपूर्वक वैसा ही विधान करना चाहिए। हिमाचल! इससे देवताओंका अत्यन्त महान् कार्य सिद्ध हो जायगा सूतजी कहते हैं-ऋषियो! नारदजीके मुखसे ये सारी बातें सुनकर उस समय मेनाके प्राणपति शैलराज अपनेको पुनः उत्पन्न हुआ-सा अनुभव करने लगे। तत्पश्चात् हर्षसे फूले हुए हिमाचल भी उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 42

द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशस्तु वै आर्जवाद्ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च

dvīpeṣu teṣu sarveṣu prajānāṃ kramaśastu vai ārjavādbrahmacaryeṇa satyena ca damena ca

हिन्दी अर्थ

वृषभध्वजको नमस्कार करके नारदजीसे बोले हिमवानूने कहा-मुने! आपने तो मुझे घोर दुस्तर नरकसे उबार लिया है और पाताललोकसे निकालकर सातों लोकोंका अधिपति बना दिया है। मुनिवर! इस

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 43

आरोग्यायुःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च

ārogyāyuḥpramāṇābhyāṃ dviguṇaṃ dviguṇaṃ tataḥ dvīpeṣu teṣu sarveṣu yathoktaṃ varṣakeṣu ca

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न कर दी है, इससे मैं सचमुच हिमाचल नामसे विख्यात कर दिया गया हूँ। मुने! इस समय मेरा हृदय आनन्दमय दिनका अनुभव कर रहा है, जिससे यह आपके कृत्योंका विभागपूर्वक विचार करनेमें सक्षम नहीं हो रहा है। यदि मैं वाणीके अधीश्वर बृहस्पति हो जाऊँ तो यदि वाचामधीशः स्यां त्वदगुणानां विचारणे॥ २०० भी आपके गुणोंका विचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता।

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 44

गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः भोजनं चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्

gopāyante prajāstatra sarvaiḥ sahajapaṇḍitaiḥ bhojanaṃ cāprayatnena sadā svayamupasthitam

हिन्दी अर्थ

मुनीनां देवतानां च स्वयं कर्तापि कल्मषम् सुरकार्ये य एदवार्थस्तवापि सुमहत्तरः

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 45

षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः परेण पुष्करस्याथ आवृत्यावस्थितो महान्

ṣaḍrasaṃ tanmahāvīryaṃ tatra te bhuñjate janāḥ pareṇa puṣkarasyātha āvṛtyāvasthito mahān

हिन्दी अर्थ

ततोऽभिरूपे स मुनिरुपविष्टो महासने। पृष्ठः शक्रेण प्रोवाच हिमजासंश्रयां कथाम् समूह्य यत्तु कर्तव्यं तन्मया कृतमेव हि। किंतु पञ्चशरस्यैव समयोऽयमुपस्थितः इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना। चूताङ्कुरास्त्रं सस्मार भगवान् पाकशासनः

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 46

स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्ताद् अवेष्टयत् स्वादूदकस्य परितः शैलस्तु परिमण्डलः

svādūdakasamudrastu sa samantād aveṣṭayat svādūdakasya paritaḥ śailastu parimaṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरिपुत्र्या मनोभव। मुने! आप-जैसे महर्षियोंका दर्शन निश्चय ही अमोघ

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 47

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते आलोकस्तत्र चार्वाक्च निरालोकस्ततः परम्

prakāśaścāprakāśaśca lokālokaḥ sa ucyate ālokastatra cārvākca nirālokastataḥ param

हिन्दी अर्थ

होता है। महामुने! हमलोगोंके प्रति आपकी अस्थिरता तो मुझे स्पष्टरूपसे ज्ञात है। आप लोगोंद्वारा ही मैं आत्मस्वरूप मुनियों एवं देवताओंके निवास-योग्य बनाया गया हूँ। यद्यपि मैं स्वयं भी पाप करनेवाला हूँ, तथापि किसी एक वस्तुके लिये मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये । उस समय हर्षसे भरे हुए शैलराजके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने कहा--'प्रभो! तुमने सब कुछ कर लिया। (अब मुझे यही कहना है कि) देवताओंके कार्यका जो प्रयोजन है, वह तुम्हारे लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा।' ऐसा कहकर नारदजी शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ इन्द्रके भवनमें जाकर वे देवराज इन्द्रसे

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 48

लोकविस्तारमात्रं तु पृथिव्यर्धं तु बाह्यतः प्रतिच्छिन्नं समन्तात्तु उदकेनावृतं महत्

lokavistāramātraṃ tu pṛthivyardhaṃ tu bāhyataḥ praticchinnaṃ samantāttu udakenāvṛtaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

इन्द्रने उनसे जिज्ञासा प्रकट की। फिर तो वे पार्वती-सम्बन्धी कथाका वर्णन करने लगे नारदजी बोले-देवराज! संगठित होकर सबके द्वारा जो काम किया जाना चाहिए, उसे तो मैंने अकेले ही कर दिया; किंतु इस अवसरपर अब कामदेवकी आवश्यकता आ पड़ी है। कार्यदर्शी नारद मुनिद्वारा इस

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 49

भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात्पालयन्ति गाम् अद्भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्य् अपः

bhūmerdaśaguṇāścāpaḥ samantātpālayanti gām adbhyo daśaguṇaścāgniḥ sarvato dhārayaty apaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार कहे जानेपर देवराज भगवान् इन्द्रने आमके बौरके अङ्कुरको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाले कामदेवका किये जानेपर झषकेतु कामदेव अपनी पत्नी रतिके साथ विलासपूर्वक शीघ्र ही उपस्थित हुआ। उसे उपस्थित देखकर इन्द्रने आदरपूर्वक उससे कहा मनसे ही उत्पन्न होते हो, अतः सभी प्राणियोंके मनोगत भावोंको भलीभाँति जानते हो। ऐसी दशामें तुम्हारे प्रति अधिक उपदेश करनेसे क्या लाभ? मैं तुमसे एक प्रिय बात कह रहा हूँ। तुम स्वर्गवासियोंके उस प्रिय

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 50

अग्नेर्दशगुणो वायुर् धारयञ्ज्योतिरास्थितः तिर्यक्च मण्डलो वायुर् भूतान्यावेष्ट्य धारयन्

agnerdaśaguṇo vāyur dhārayañjyotirāsthitaḥ tiryakca maṇḍalo vāyur bhūtānyāveṣṭya dhārayan

हिन्दी अर्थ

कार्यको अवश्य पूर्ण करो। (वह यह है कि) तुम चैत्रमास और ऋतुराज वसन्तको साथ लेकर शङ्करजीका गिरिराजकुमारी पार्वतीके साथ शीघ्र ही संयोग स्थापित करा दो। अपनी स्वार्थसिद्धिके निमित्त इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पञ्चबाण कामदेव भयभीत होकर इन्द्रसे इस प्रकार बोला

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 51

दशाधिकं तथाकाशं वायोर्भूतान्यधारयत् भूतादिर्धारयन्व्योम तस्माद्दशगुणस्तु वै

daśādhikaṃ tathākāśaṃ vāyorbhūtānyadhārayat bhūtādirdhārayanvyoma tasmāddaśaguṇastu vai

हिन्दी अर्थ

६९८ मत्स्यपुराण अनया देवसामग्र्या मुनिदानवभीमया। दुःसाध्यः शङ्करो देव: किं न वेत्सि जगत्प्रभो तस्य देवस्य वेत्थ त्वं करणं तु यदव्ययम्। प्रायः प्रसादः कोपोऽपि सर्वो हि महतां महान्

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 52

भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत् महत्तत्त्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्यते

bhūtādito daśaguṇaṃ mahadbhūtānyadhārayat mahattattvaṃ hyanantena avyaktena tu dhāryate

हिन्दी अर्थ

प्रागेव चेह दृश्यन्ते भूतानां कार्यसम्भवाः विशेषं काङ्क्षतां शक्र सामान्याद् भ्रंशनं फलम्।

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 53

आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम् पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्

ādhārādheyabhāvena vikārāste vikāriṇām pṛthvyādayo vikārāste paricchinnāḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

वयं प्रमाणास्ते ह्यत्र रतिकान्त न संशय: । संदर्शन विना शक्तिरयस्कारस्य नेष्यते। कस्यचिच्च क्कचिद् दृष्टं सामर्थ्य न तु सर्वत: इत्युक्तः प्रययौ कामः सखायं मधुमाश्रित: । रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तु हिमभूभृतः

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 54

परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम् एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्

parasparādhikāścaiva praviṣṭāśca parasparam evaṃ parasparotpannā dhāryante ca parasparam

हिन्दी अर्थ

स तु तत्राकरोच्चिन्तां कार्यस्योपायपूर्विकाम्। महार्था ये हि निष्कम्पा मनस्तेषां सुदुर्जयम् कामदेवने कहा--जगन्नाथ ! क्या आप यह नहीं जानते कि मुनियों और दानवोंको भयभीत करनेवाली इस देवसामग्रीसे देवाधिदेव शङ्करको वशमें कर लेना सहज नहीं है। उन महादेवकी इन्द्रियाँ विकाररहित हैं, इसका भी

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 55

यस्मात्प्रविष्टास्ते ऽन्योन्यं तस्मात्ते स्थिरतां गताः आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात्

yasmātpraviṣṭāste 'nyonyaṃ tasmātte sthiratāṃ gatāḥ āsaṃste hyaviśeṣāśca viśeṣā anyaveśanāt

हिन्दी अर्थ

ज्ञान तो आपको है ही। साथ ही महापुरुषोंकी प्रसन्नता और क्रोध भी महान् होता है। इस समय आप जो सम्पूर्ण उपभोगोंकी सारभूता स्वर्गमें उत्पन्न होनेवाली सुन्दरी अप्सराओं पदार्थोंका उपभोग कर रहे हैं, वह शङ्करजीके प्रति प्रमाद करनेसे नष्ट हो जायगा। थोड़ा इसपर भी विचार कर लीजिये; क्योंकि सामान्य प्राणियोंको भी कार्यफलकी सम्भावना पहलेसे ही दीखने लगती है। इन्द्रदेव! जो लोग सामान्यको छोड़कर विशेषकी आकाङ्क्षा करते हैं, उनका सामान्यसे पतन हो जाना ही फल है । (विशेष तो अप्राप्त है ही।) कामदेवके इस कथनको सुनकर देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उससे कहा-

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 56

पृथ्व्यादयस्तु वाय्वन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते भूतेभ्यः परतस् तेभ्यो ह्य् अलोकः सर्वतः स्मृतः

pṛthvyādayastu vāyvantāḥ paricchinnāstu tatra te bhūtebhyaḥ paratas tebhyo hy alokaḥ sarvataḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र बोले-रतिवल्लभ! तुम्हारे इस कथनके लिये हमलोग प्रमाण हैं। तुम्हारे कथनमें कोई संदेह नहीं है, किंतु (निर्मित वस्तुके) आकार-प्रकारके बिना लोहार अथवा कारीगरकी शक्तिका पता नहीं चलता तथा किसीको भी शक्ति किसी विशेष विषयमें ही सफलरूपसे देखी जाती है, सर्वत्र नहीं । इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर रतिसहित कामदेव सहायकरूपमें अपने मित्र मधुमास (अथवा वसन्त)-को साथ लेकर प्रस्थित हुआ और शीघ्र ही हिमाचलके शिखरपर

English

TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 57

तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः पात्रे महति पात्राणि यथा ह्यन्तर्गतानि च

tathā hyāloka ākāśe paricchinnāni sarvaśaḥ pātre mahati pātrāṇi yathā hyantargatāni ca

हिन्दी अर्थ

जा पहुँचा । वहाँ जाकर वह कार्यकी सिद्धिके लिये उपायपूर्वक चिन्ता करने लगा। उसने सोचा कि जो लोग महान् लक्ष्यसे युक्त और अटल निश्चयवाले हैं, उनके मनको जीतना अत्यन्त कठिन है। अतः सर्वप्रथम उसीको ही संक्षुब्ध कर निश्चयरूपसे विजय प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि पूर्वकालमें मनको शुद्ध करके ही लोगोंने उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। (किंतु कठिनाई तो यह है कि) क्रूरतर प्राणियोंके सङ्गसे अनेकों प्रकारके भावोंद्वारा द्वेषका अनुगमन किये बिना क्रोध कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसके लिये मैं भयंकर ईर्ष्या नामको महासखीको चपलताके मस्तकपर स्थापित करूँगा, तत्पश्चात् धैर्यके प्रवाहको विध्वस्त करनेवाली, महान् बलवती मनको

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 58

भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात् तथा ह्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गतागताः

bhavantyanyonyahīnāni parasparasamāśrayāt tathā hyāloka ākāśe bhedāstvantargatāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

तामस्य विनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिं पराम्॥ २२३ उस उत्कृष्ट विकृतिको शङ्करजीपर विनियुक्त करूँगा। शान्तसत्त्वसमाकीर्णमचलप्राणिसंकुलम् । नानापुष्पलताजालं गगनस्थगणेश्वरम्

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 59

कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि च यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते

kṛtānyetāni tattvāni anyonyasyādhikāni ca yāvadetāni tattvāni tāvadutpattirucyate

हिन्दी अर्थ

वीरकं लोकवीरेशमीशानसदूशद्युतिम्। यक्षकुङ्कमकिञ्जल्कपुञ्पिङ्गजटासटम् प्रे्षमाणमृजुस्थानं नासिकाग्रं सुलोचनैः। श्रवणाहिफलन्मुक्तं निःश्वासानलपिङ्गलम्। ्रङ्कत्कपालपर्यन्ततुम्बिलम्बिजटाचयम्

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 60

जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर् न विद्यते

jantūnāmiha saṃskāro bhūteṣvantargateṣu vai pratyākhyāyeha bhūtāni kāryotpattir na vidyate

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माञ्जलिस्थपुच्छाग्रनिबद्धोरगभूषणम् ददर्श शङ्करं कामः क्रमप्राप्तान्तिकं शनैः। ततो भ्रमरझङ्कारमालम्बिद्रुमसानुकम्

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 61

तस्मात्परिमिता भेदाः स्मृताः कार्यात्मकास्तु वै ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः

tasmātparimitā bhedāḥ smṛtāḥ kāryātmakāstu vai te kāraṇātmakāścaiva syurbhedā mahadādayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण भवस्य मदनो मनः। वहाँ धैर्यके द्वारोंको बंद कर तथा संतोषको दूर हटाकर कोई भी ऐसा उत्कृष्ट विद्वान् नहीं है, जो मुझे जाननेमें समर्थ हो सके किसी भी कार्यके आरम्भमें विकल्पमात्रका विचार करनेसे मनकी विरूपता उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर मूल कार्यके आरम्भ होनेपर गम्भीर आपत्तियोंकी लहरें उठने लगती हैं और कार्य दुस्तर हो जाता है। अत: अब मैं रमणीय साधनोंके संविधानसे उन स्थिरात्मा शङ्करजीके इन्द्रियसमूहको ढककर उनकी

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 62

इत्येवं संनिवेशो ऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया

ityevaṃ saṃniveśo 'yaṃ pṛthvyākrāntastu bhāgaśaḥ saptadvīpasamudrāṇāṃ yāthātathyena vai mayā

हिन्दी अर्थ

तपस्याको भङ्ग करूँगा॥ २१८--२२६॥ इस प्रकार सोच-विचारकर कामदेव प्राणियोंके पालक शङ्करजीके उस आश्रमपर गया, जो पृथ्वीका सारभूत था। वहाँ आमके वृक्ष उगे हुए थे, जिनकी छायामें वेदिकाएँ बनी थीं। वह शान्त स्वभाववाले जीवोंसे व्याप्त

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 63

विस्तारान्मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः

vistārānmaṇḍalāccaiva prasaṃkhyānena caiva hi viśvarūpaṃ pradhānasya parimāṇaikadeśinaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा पर्वतीय जीवोंसे भरा हुआ था। वहाँ नाना प्रकारके पुष्पोंकी लताएँ फैली हुई थीं। ऊपर आकाशमण्डलमें गणेश्वर विराजमान थे। वहीं एक ओर नीली घासके ऊपर वृषभराज नन्दीश्वर निश्चिन्तभावसे बैठे हुए थे। वहाँ कामदेवने त्रिनेत्रधारी शङ्करजीके निकट किसी दूसरे सुन्दर पुरुषको देखा। उसका नाम वीरक था। वह जगत्के वीरोंमें प्रधान था। उसकी शरीर-कान्ति शङ्करजीके समान थी। उसको जटाएँ यक्षकुङ्कुमऔर पद्मकेसरके पुञ्जके समान पीली थीं। उसके हाथमें बेंत शोभा पा रहा था। वह विषैले सर्पोके आभूषणोंसे विभूषित हो निश्चिन्त भावसे बैठा हुआ था। तदनन्तर कामदेवकी दृष्टि क्रमशः धीरे-धीरे निकट प्राप्त हुए शङ्करजीपर पड़ी, जिनके कमल-दलके सदूश नेत्र

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TEE UATSTA PURANAIi.

अध्याय १२३

श्लोक 64

एतावत्संनिवेशस्तु मया सम्यक्प्रकाशितः एतावदेव श्रोतव्यं संनिवेशस्य पार्थिव

etāvatsaṃniveśastu mayā samyakprakāśitaḥ etāvadeva śrotavyaṃ saṃniveśasya pārthiva

हिन्दी अर्थ

अधखुले थे। जो अपने सुन्दर नेत्रोंद्वारा सीधे नासिकाके अग्रभागको देख रहे थे। उनके कंधेपर सिंहके चमड़ेका ऐसा लम्बा उत्तरीय लटक रहा था, जिससे रक्त टपक रहा था। कानोंमें कुण्डलरूपमें पहने हुए सर्पोके मुखसे निकलती हुई निःश्वासाग्निसे उनका शरीर पीला दीख रहा था। उनकी

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TEE UATSTA PURANAIi.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 123
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.