Matsya Purana· Matsya Purāṇa
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अध्याय 125 / 176

Adhyaya 125

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अध्याय १२५

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १२५ एवं श्रुत्वा कथां दिव्याम् अब्रुवंल्लौमहर्षणिम् सूर्याचन्द्रमसोश् चारं ग्रहाणां चैव सर्वशः

matsya-purāṇa 125 evaṃ śrutvā kathāṃ divyām abruvaṃllaumaharṣaṇim sūryācandramasoś cāraṃ grahāṇāṃ caiva sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

देवो दुहितरं साक्षात्पिनाकी तव मार्गते। महादेव आपकी कन्याको प्राप्त करना चाहते हैं, अतः तच्छीघ्रं पावयात्मानमाहुत्येवानलार्पणात्॥ ४१० अग्निमें पड़ी हुई आहुतिकी तरह उसे शीघ्र ही उन्हें प्रदान

English

am now describing to you the ways of giving away the mountain of gold, which drives away all sins, and takes the devotee to the region of Brahni&. — 1.

अध्याय १२५

श्लोक 2

भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतींषि रविमण्डले अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा चासंकरेण वा

bhramanti kathametāni jyotīṃṣi ravimaṇḍale avyūhenaiva sarvāṇi tathā cāsaṃkareṇa vā

हिन्दी अर्थ

करके अपने आत्माको पवित्र कर लीजिये। देवताओंका कार्यमेतच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते। यह कार्य चिरकालसे चला आ रहा है, अत: जगतका जगदुद्धरणायेष क्रियतां वै समुद्यमः॥ ४११ उद्धार करनेके लिये आप इस उद्योगको शीघ्र सम्पन्न

English

The mount of 4, <'00 tolas (1,00(; palas) of gold i.s the first best, of 2,000 tolas <50O palas)is the second best, and of 1,000 tolas (250 palas) is the last. The poor may make, leaving pride aside, (me of less weight, but greater than one pala, according to his means. — 2.

अध्याय १२५

श्लोक 3

कश्च भ्रामयते तानि भ्रमन्ति यदि वा स्वयम् एतद्वेदितुम् इच्छामस् ततो निगद सत्तम

kaśca bhrāmayate tāni bhramanti yadi vā svayam etadveditum icchāmas tato nigada sattama

हिन्दी अर्थ

कोजिये। मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस समय इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टोऽवदन्मुनीन्। हिमाचल हर्षविभोर हो मुनियोंको उत्तर देनेके लिये उद्यत

English

The rituals prescribed for the mount of grain should bo observed. The four corner mounts (viskambha) should be given away to the sacrificing priests, as before, with the following words: ' 1 salute you, 0 mount of gold,

अध्याय १२५

श्लोक 4

भूतसंमोहनं ह्येतद् ब्रुवतो मे निबोधत प्रत्यक्षमपि दृश्यं तत् संमोहयति वै प्रजाः

bhūtasaṃmohanaṃ hyetad bruvato me nibodhata pratyakṣamapi dṛśyaṃ tat saṃmohayati vai prajāḥ

हिन्दी अर्थ

असमर्थोऽभवद् वक्तुमुत्तरं प्रार्थयच्छिवम्॥ ४१२ इए किंतु जब उत्तर देनेमें असमर्थ हो गये, तब मन-ही- मन शङ्करजीसे प्रार्थना करने लगे। तत्पश्चात् प्रयोजनको ततो मेना मुनीन् वन्द्य प्रोवाच स्नेहविक्लवा । समझनेवाली मेनाने मुनियोंको प्रणाम किया और पुत्रीके

English

you are the seed, the womb of Brahma, you are the giver of unbounded fruits. The gold is most sacred on account of its being bom of Fire; there- fore, 0 Hfigottama! protect me.' One who gives away the mount of gold, according to these rites, goes to the blissful realm of Brahmfi where he resides for a period of one kalpa, after which he attains emancipation. — 3-7.

अध्याय १२५

श्लोक 5

यो ऽसौ चतुर्दशर्क्षेषु शिशुमारो व्यवस्थितः उत्तानपादपुत्रो ऽसौ मेढीभूतो ध्रुवो दिवि

yo 'sau caturdaśarkṣeṣu śiśumāro vyavasthitaḥ uttānapādaputro 'sau meḍhībhūto dhruvo divi

हिन्दी अर्थ

दुहितुस्तान् मुनींश्चैव चरणाश्रयमर्थवित्॥ ४१३ स्नेहसे व्याकुल हुई वह उन मुनियोंके चरणोंके निकट स्थित हो इस प्रकार बोली मेनोवाच मेनाने कहा-मुनिवरो ! जिन कारणोंसे लोग महान्

English

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अध्याय १२५

श्लोक 6

सैष भ्रमन्भ्रामयते चन्द्रादित्यौ ग्रहैः सह भ्रमन्तमनुसर्पन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्

saiṣa bhramanbhrāmayate candrādityau grahaiḥ saha bhramantamanusarpanti nakṣatrāṇi ca cakravat

हिन्दी अर्थ

यदर्थ दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम्। 'फलदायक होनेपर भी कन्याके जन्मकी इच्छा नहीं करते, वही सब इस समय परम्परासे मेरे सामने आ तदेवोपस्थितं सर्वं प्रक्रमेणेव साम्प्रतम्॥ ४१४ उपस्थित हुआ है। (विवाहकी प्रथा तो यह है कि) जो सम्पत्तिसे भी युक्त हो, उसे अपने घर बुलाकर कन्या वरस्तस्यापि चाहूय सुता देया ह्ययाचतः॥ ४१५ प्रदान करनी चाहिए, किंतु कन्याकी याचना करनेवालेको

English

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अध्याय १२५

श्लोक 7

ध्रुवस्य मनसा यो वै भ्रमते ज्योतिषां गणः वातानीकमयैर् बन्धैर् ध्रुवे बद्धः प्रसर्पति

dhruvasya manasā yo vai bhramate jyotiṣāṃ gaṇaḥ vātānīkamayair bandhair dhruve baddhaḥ prasarpati

हिन्दी अर्थ

घोर कथं नहीं । भला बताइये, इस प्रकार समस्त घोर तपोंको करनेवाले तत्समस्ततपो घोरं कथं पुत्री प्रयास्यति। चरके साथ मेरी पुत्री कैसे जायगी। इसलिये इस विषयमें पुत्रीवाक्याद्यदत्रास्ति विधेयं तद्विधीयताम्॥ ४१६ मेरी पुत्रीक कथनानुसार जो उचित हो, वही आपलोग करें। ऐश्वर्यमवगच्छस्व्र शंकरस्य सुरासुरैः । आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात् सुनिर्वृतैः

English

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अध्याय १२५

श्लोक 8

तेषां भेदश्च योगश्च तथा कालस्य निश्चयः अस्तोदयास्तथोत्पाता अयने दक्षिणोत्तरे

teṣāṃ bhedaśca yogaśca tathā kālasya niścayaḥ astodayāstathotpātā ayane dakṣiṇottare

हिन्दी अर्थ

प्रातस्ते शंकरः पाणिमेष पुत्रि ग्रहीष्यति। वयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः उपासत गिरिं मूर्ता ऋतवः सार्वकात्मकाः हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना

English

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अध्याय १२५

श्लोक 9

विषुवद्ग्रहवर्णश्च सर्वमेतद्ध्रुवेरितम् जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्भवः

viṣuvadgrahavarṇaśca sarvametaddhruveritam jīmūtā nāma te meghā yadebhyo jīvasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्यमण्डनमङ्कानां कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्द्रश्राभवदाकुला।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 10

द्वितीय आवहन्वायुर् मेघास्ते त्वभिसंश्रिताः इतो योजनमात्राच्च अध्यर्धविकृता अपि

dvitīya āvahanvāyur meghāste tvabhisaṃśritāḥ ito yojanamātrācca adhyardhavikṛtā api

हिन्दी अर्थ

हिमाचलकी पत्नी मेनाद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे मुनिगण पुनः नारीके चित्तको प्रसन्न करनेवाले उदार अर्थसे युक्त वचन बोले मुनियोंने कहा--मेना! तुम शङ्करजीके ऐश्वर्यका ज्ञान उन देवताओं और असुरोंसे प्राप्त करो, जो उनके दोनों चरणकमलोंकी आराधना करके भलीभाँति संतुष्ट हो चुके हैं । जिसके लिये जो रूप उपयोगी होता है, वह उसीकी प्राप्तिक लिये प्रयत्न करता है। इस नियमके अनुसार वह कन्या शंकरजीकी प्रापतिके लिये चिरकालसे घोर तपस्या कर रही है। उसे उसी रूपसे पूर्ण संतोष है। जो पुरुष उसके दिव्य ब्रतोंका समापन करेगा, उसके प्रति

English

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अध्याय १२५

श्लोक 11

वृष्टिसर्गस्तथा तेषां धारासारः प्रकीर्तितः पुष्करावर्तका नाम ये मेघाः पक्षसम्भवाः

vṛṣṭisargastathā teṣāṃ dhārāsāraḥ prakīrtitaḥ puṣkarāvartakā nāma ye meghāḥ pakṣasambhavāḥ

हिन्दी अर्थ

वह अतिशय प्रसन्न एवं संतुष्ट होगी। ऐसा कहकर वे मुनिगण हिमाचलके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ सूर्य और अग्निकी ज्चालाको जीतनेवाली एवं तपस्याके तेजसे युक्त पार्वती उमा तपस्या कर रही थीं। वहाँ पहुँचकर मुनियोंने पार्वतीसे स्नेहपूर्ण वाणीमें कहा पुत्रि! अब तुम्हारे लिये सम्मान्यका पथ प्राप्त हो गया है, इसलिये अब तुम अपने इस रमणीय, प्रिय एवं मनको लुभानेवाले रूपको तपस्यासे दग्ध मत करो। प्रातःकाल वे शङ्कर तुम्हारा

English

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अध्याय १२५

श्लोक 12

शक्रेण पक्षाश्छिन्ना वै पर्वतानां महौजसा कामगानां समृद्धानां भूतानां नाशमिच्छताम्

śakreṇa pakṣāśchinnā vai parvatānāṃ mahaujasā kāmagānāṃ samṛddhānāṃ bhūtānāṃ nāśamicchatām

हिन्दी अर्थ

पाणिग्रहण करेंगे। हमलोग उनसे प्रार्थना करके पहले ही तुम्हारे पिताके पास आ गये हैं। अब तुम अपने पिताके साथ घर लौट जाओ और हमलोग अपने निवासस्थानको जा रहे हैं। इस प्रकार कही जानेपर पार्वती 'तपका फल निश्चय ही सत्य होता है'--ऐसा विचारकर दिव्य पदार्थोसे सुशोभित अपने पिताके घरकी ओर शी्रतापूर्वक प्रस्थित हुई। वहाँ पहुँचकर पार्वतीके मनमें शङ्करजीके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, जिससे सती पार्वतीको वह रात्रि दस हजार वर्षोके समान प्रतीत होने लगी ॥४१८--४२६ ॥

English

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अध्याय १२५

श्लोक 13

पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिणः पुष्करावर्तका नाम कारणेनेह शब्दिताः

puṣkarā nāma te pakṣā bṛhantastoyadhāriṇaḥ puṣkarāvartakā nāma kāraṇeneha śabditāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें देवाङ्गनाओंने पार्वतीके लिये क्रमशः नाना प्रकारके माङ्गलिक कार्योको यथार्थरूपसे सम्पन्न किया। फिर उस विविध प्रकारके मड़लोंसे युक्त भवनमें पार्वतीके अङ्गोंको दिव्य श्रृंगारसे सुशोभित किया गया। उस समय सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली छहों ऋतुएँ शरीर धारणकर हिमाचलकी सेवामें उपस्थित हुई, वायु और बादल पर्वतकी गुफाओंमें झाड़-बुहारके कार्यमें संलग्न थे। अट्टालिकाओंपर स्वयं

English

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अध्याय १२५

श्लोक 14

नानारूपधराश्चैव महाघोरस्वराश्च ते कल्पान्तवृष्टिकर्तारः कल्पान्ताग्नेर् नियामकाः

nānārūpadharāścaiva mahāghorasvarāśca te kalpāntavṛṣṭikartāraḥ kalpāntāgner niyāmakāḥ

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मीदेवी नाना प्रकारकी सामग्रियोंको सँजोये हुए विराजमान थीं । सभी पदार्थोंमें कान्ति फूटी पड़ती थी। ऋद्धि आकुल उपतस्थुर्नगाएचापि कल्पकाममहाद्वुमा: । ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः किङ्करास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिनः

English

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अध्याय १२५

श्लोक 15

वाय्वाधारा वहन्ते वै सामृताः कल्पसाधकाः यान्यस्याण्डस्य भिन्नस्य प्राकृतान्यभवंस्तदा

vāyvādhārā vahante vai sāmṛtāḥ kalpasādhakāḥ yānyasyāṇḍasya bhinnasya prākṛtānyabhavaṃstadā

हिन्दी अर्थ

शंकरस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्वते उवाच चापि वचनं पुत्रं जनय शंकर।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 16

यस्मिन् ब्रह्मा समुत्पन्नश् चतुर्वक्त्रः स्वयं प्रभुः तान्येवाण्डकपालानि सर्वे मेघाः प्रकीर्तिताः

yasmin brahmā samutpannaś caturvaktraḥ svayaṃ prabhuḥ tānyevāṇḍakapālāni sarve meghāḥ prakīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

यो हैत्येन्द्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः मनुजास्थिमयीं मालामाबबन्ध च पाणिना

English

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अध्याय १२५

श्लोक 17

तेषामाप्यायनं धूमः सर्वेषाम् अविशेषतः तेषां श्रेष्ठश्च पर्जन्यश् चत्वारश्चैव दिग्गजाः

teṣāmāpyāyanaṃ dhūmaḥ sarveṣām aviśeṣataḥ teṣāṃ śreṣṭhaśca parjanyaś catvāraścaiva diggajāḥ

हिन्दी अर्थ

नानाकारमहारत्रभूषणं धनदाहृतम् विहायोदय्रसर्पेन्द्रकटकेन स्वपाणिना। कर्णोत्तंसं चकारेशो वासुकिं तक्षकं स्वयम्

English

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अध्याय १२५

श्लोक 18

गजानां पर्वतानां च मेघानां भोगिभिः सह कुलमेकं द्विधा भूतं योनिरेका जलं स्मृतम्

gajānāṃ parvatānāṃ ca meghānāṃ bhogibhiḥ saha kulamekaṃ dvidhā bhūtaṃ yonirekā jalaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

बिखरे हुए थे। कल्पवृक्ष आदि महनीय वृक्षोंसे युक्त अन्यान्य पर्वत भी सेवामें उपस्थित थे। दिव्यौषधिसे युक्त मूर्तिमती ओषधियाँ तथा सभी प्रकारके रस और धातु हिमाचलके परिचारकरूपमें विद्यमान थे। हिमाचलके वे सभी किंकर आज्ञापालनके लिये उतावले हो रहे थे। इनके अतिरिक्त सभी समुद्र और नदियाँ तथा समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणी उस समय हिमाचलकी महिमाको उधर गन्धमादन पर्वतपर शङ्करजीके विवाहोत्सवमें सभी मुनि, नाग, यक्ष, गन्धर्व और किंनर आदि देवगण सम्मिलित हुए। वे सभी निर्मल मूर्ति धारणकर शृङ्गारसामग्रीके जुटानेमें तत्पर थे। उस समय प्रेम एवं

English

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अध्याय १२५

श्लोक 19

पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम् तुषारवर्षं वर्षन्ति वृद्धा ह्यन्नविवृद्धये

parjanyo diggajāścaiva hemante śītasambhavam tuṣāravarṣaṃ varṣanti vṛddhā hyannavivṛddhaye

हिन्दी अर्थ

उदार भावनासे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शंकरजीके जटाजूटमें चन्द्रखण्डको बाँधा । चामुण्डाने उनके मस्तकपर एक विशाल कपालमाला बाँधी और इस प्रकार कहा- “शंकर! ऐसा पुत्र उत्पन्न करो, जो हैत्यराज तारकके कुलका संहार कर मुझे रक्तसे तृप्त करे।' भगवान् विष्णु अग्निके समान उद्दीप्त एवं चमकीले अग्रभागवाले रलोंसे निर्मित मुकुट और सरपोके आभूषण आदि भृङ्गारसामग्री लेकर शंकरजीके आगे उपस्थित हुए। इन्द्रने वेगपूर्वक

English

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अध्याय १२५

श्लोक 20

षष्ठः परिवहो नाम वायुस्तेषां परायणः यौ ऽसौ बिभर्ति भगवान् गङ्गामाकाशगोचराम्

ṣaṣṭhaḥ parivaho nāma vāyusteṣāṃ parāyaṇaḥ yau 'sau bibharti bhagavān gaṅgāmākāśagocarām

हिन्दी अर्थ

गजचर्म लाकर शंकरजीको धारण कराया, जिसका अग्रभाग चर्बीसे लिप्त हुआ था। उस समय प्रसन्नतासे खिले हुए इन्द्रके मुखकमलपर पसीनेकी बुँदे झलक रही थीं। वायुने शंकरजीके वाहन उस वृषभराज नन्दीश्वरको विभूषित किया, जिसका शरीर विशाल था, जिसके सींग तीखे थे तथा जो हिमाचलके समान उज्वल कान्तिवाला एवं महान् ओजस्वी था। जगत्के कर्मोके साक्षी सूर्य, अग्नि और चन्द्र लोकनायक शम्भुके नेत्रोंके अन्तस्तलमें स्थित होकर अपनी-अपनी प्रभाका विस्तार करने लगे। प्रेतराज यमने शंकरजीके मस्तकपर चाँदीके समान चमकीला चिताभस्म लगाकर एक हाथसे मनुष्योंकी हड्डियोंसे बनी हुई मालाको बाँधा और फिर वे हाथमें गदा

English

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अध्याय १२५

श्लोक 21

दिव्यामृतजलां पुण्यां त्रिपथामिति विश्रुताम् तस्या विस्पन्दितं तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः

divyāmṛtajalāṃ puṇyāṃ tripathāmiti viśrutām tasyā vispanditaṃ toyaṃ diggajāḥ pṛthubhiḥ karaiḥ

हिन्दी अर्थ

लेकर द्वारपर खड़े हो गये। तत्पश्चात् शिवजीने कुबेरद्वार लाये गये नाना प्रकारके बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषणों पुष्पोसे गूँथी गयी मालाको पृथक् रखकर विषैले सरपोके कङ्कणसे सुशोभित अपने हाथसे स्वयं वासुकि और तक्षकको अपना कुण्डल बनाया

English

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अध्याय १२५

श्लोक 22

शीकरान् सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः दक्षिणेन गिरिर्यो ऽसौ हेमकूट इति स्मृतः

śīkarān sampramuñcanti nīhāra iti sa smṛtaḥ dakṣiṇena giriryo 'sau hemakūṭa iti smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

निष्पन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशं प्रसाधने: सप्त वारिधयस्तस्थुः कर्तु दर्पणविश्रमम्। ततो विलोकितात्मानं महाम्बुधिजलोदरे धरामालिङ्ग्य जानुभ्यां स्थाणुं प्रोवाच केशव: । शोभसे देव रूपेण जगदानन्ददायिना

English

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अध्याय १२५

श्लोक 23

उदग्धिमवतः शैलस्य्-ओत्तरे चैव दक्षिणे पुण्ड्रं नाम समाख्यातं सम्यग्वृष्टिविवृद्धये

udagdhimavataḥ śailasy-ottare caiva dakṣiṇe puṇḍraṃ nāma samākhyātaṃ samyagvṛṣṭivivṛddhaye

हिन्दी अर्थ

मातरः प्रेरयन् कामवधूं वैधव्यचिह्निताम्। कालोऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेङ्गितसंज्ञया ततस्ताश्चोदिता देवमूचुः प्रहसिताननाः । रतिः पुरस्तव प्राप्ता नाभाति मदनोञ्झिता

English

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अध्याय १२५

श्लोक 24

तस्मिन्प्रवर्तते वर्षं तत्तुषारसमुद्भवम् ततो हिमवतो वायुर् हिमं तत्र समुद्भवम्

tasminpravartate varṣaṃ tattuṣārasamudbhavam tato himavato vāyur himaṃ tatra samudbhavam

हिन्दी अर्थ

सरः श्रमाद् द्रुमनिकरेषु विश्रमन्। वियच्चरा वियति किमस्ति कान्तकं सुरद्विषागमनमहातिकर्दमम् ।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 25

आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चयानो महागिरिम् हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टिशेषं ततः परम्

ānayatyātmavegena siñcayāno mahāgirim himavantamatikramya vṛṣṭiśeṣaṃ tataḥ param

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् वहाँ आये हुए गणाधीशोंने विनयपूर्वक वीरकसे कहा--' भयंकर आकुतिवाले वीरक! तुम शंकरजीसे हमारे आगमनकी सूचना दे दो। हमलोग सजे-सजाये महादेवको भृङ्गार-सामग्रियोंद्वारा पुनः सुशोभित करेंगे।' इतनेमें वहाँ सातों समुद्र दर्पणकी स्थानपूर्ति करनेके लिये उपस्थित हुए। तब उस महासागरके जलके भीतर अपने रूपको देखकर भगवान् केशव घुरनोंद्वारा पृथ्वीका आलिङ्गन करके (अर्थात् पृथ्वीपर दोनों घुटने

English

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अध्याय १२५

श्लोक 26

इभास्ये च ततः पश्चाद् इदं भूतविवृद्धये वर्षद्वयं समाख्यातं सम्यग्वृष्टिविवृद्धये

ibhāsye ca tataḥ paścād idaṃ bhūtavivṛddhaye varṣadvayaṃ samākhyātaṃ samyagvṛṣṭivivṛddhaye

हिन्दी अर्थ

टेककर) शंकरजीसे बोले--' देव! इस समय आप अपने इस जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले रूपसे सुशोभित हो रहे हैं।' इसी बीच मातृकाओंने उपयुक्त समय जानकर वैधव्यके चिहोंसे युक्त काम-पत्नी रतिको इशारेसे शंकरजीके सम्मुख जानेके लिये प्रेरित किया। (तब वह शिवजीके समक्ष जाकर खड़ी हो गयी।) तब वे मातृकाएँ हँसती हुई शंकरजीसे बोलीं-' देव! आपके सम्मुख खड़ी हुई कामदेवसे रहित यह रति शोभा नहीं पा रही है।' तब शंकरजी अपने बायें हाथके अग्रभागके संकेतसे उसे सान्त्वना देते हुए सामनेसे हटाकर प्रस्थित हुए। उस समय उनका मन गिरिजाके मुखका अवलोकन करनेके लिये समुत्सुक हो रहा था ॥४४५--४५१॥

English

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अध्याय १२५

श्लोक 27

मेघाश्चाप्यायनं चैव सर्वमेतत्प्रकीर्तितम् सूर्य एव तु वृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते

meghāścāpyāyanaṃ caiva sarvametatprakīrtitam sūrya eva tu vṛṣṭīnāṃ sraṣṭā samupadiśyate

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त शंकरजीने विशालकाय महावृषभ नन्दीश्वर- पर, जिसको आकृति हिमाचलके गुफा-सदृश थी तथा जिसके नेत्र प्रमथगणोंको ओर लगे हुए थे, सवार होकर उसे धीमी चालसे आगे बढ़ाया। उस समय उनके प्रस्थानसे पृथ्वी उसी प्रकार काँप रही थी, मानो वञ्रके प्रहारसे पर्वत काँप रहे हों। तत्पश्चात् श्रीहरिने जिनके आभूषण पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गये थे, शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए आगे जाकर श्रमवश घने वृक्षोंके नीचे

English

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अध्याय १२५

श्लोक 28

वर्षं घर्मं हिमं रात्रिं संध्ये चैव दिनं तथा शुभाशुभफलानीह ध्रुवात्सर्वं प्रवर्तते

varṣaṃ gharmaṃ himaṃ rātriṃ saṃdhye caiva dinaṃ tathā śubhāśubhaphalānīha dhruvātsarvaṃ pravartate

हिन्दी अर्थ

विश्राम करते हुए लोगोंसे कहा--' अरे! चलो, आगे बढो, इस मार्गमें भीड़ मत करो।' पुनः शंकरजीका पुत्र वीरक भौहें टेढ़ी कर श्रीहरिकी प्रथम आज्ञाको उच्च स्वरसे फैलाता हुआ बोला--' अरे आकाशचारियो ! आकाशमें कौन-सी सुन्दर वस्तु रखी है, जिसे सब लोग देख रहे हो, आगे बढ़ो। पर्वतसमूहो ! तुमलोग एक-दूसरेसे अलग- अलग होकर चलो। महासागरो! तुमलोग राक्षसोंके आगमनसे उत्पन्न हुए महान् कीचड्से युक्त जलको शिलासदृश कर दो। गणेश्वरो! तुमलोग चञ्चलतापूर्वक मत चलो। सुरेश्वरॉंको स्थिरगतिसे चलना चाहिए।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 29

ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चापः सूर्यो वै गृह्य तिष्ठति सर्वभूतशरीरेषु त्व् आपो ह्यनुश्रिताश्च याः

dhruveṇādhiṣṭhitāścāpaḥ sūryo vai gṛhya tiṣṭhati sarvabhūtaśarīreṣu tv āpo hyanuśritāśca yāḥ

हिन्दी अर्थ

६३८ मत्स्यपुराण + वृथा यम प्रकटितदन्तकोटरं त्वमायुधं वहसि विहाय सम्भ्रमम्

English

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अध्याय १२५

श्लोक 30

दह्यमानेषु तेष्वेव जङ्गमस्थावरेषु च धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्क्रामन्तीह सर्वशः

dahyamāneṣu teṣveva jaṅgamasthāvareṣu ca dhūmabhūtāstu tā hyāpo niṣkrāmantīha sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वजातिकाः किमिति न षड्जमध्यम- पृथुस्वरं बहुतरमत्र वक्ष्यते प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडका: प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः

English

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अध्याय १२५

श्लोक 31

तेन चाभ्राणि जायन्ते स्थानमभ्रमयं स्मृतम् तेजोभिः सर्वलोकेभ्य आदत्ते रश्मिभिर्जलम्

tena cābhrāṇi jāyante sthānamabhramayaṃ smṛtam tejobhiḥ sarvalokebhya ādatte raśmibhirjalam

हिन्दी अर्थ

शङ्करजीके आगे-आगे विशाल पानपात्रको लेकर चलने- वाले भृङ्गी अपने शरीरकी रक्षा करते हुए नहीं चल रहे हैं । यम! तुम अपने इस निकले हुए दाँतोंबाले आयुधको व्यर्थ ही धारण किये हुए हो। भय छोड़कर चलो। शङ्करजीके रथके घोड़े अपने मार्गको बहुत-सी माताओंसे व्याप्त होनेपर भी नहीं छोड़ रहे हैं। ये शङ्करजीके प्रिय देवगण पृथक्-पृथक् अपने अनुयायियोंसे घिरे हुए पैदल ही दूना मार्ग तय कर रहे हें

English

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अध्याय १२५

श्लोक 32

समुद्राद्वायुसंयोगाद् वहन्त्यापो गभस्तयः ततस्त्वृतुवशात्काले परिवर्तन्दिवाकरः

samudrādvāyusaṃyogād vahantyāpo gabhastayaḥ tatastvṛtuvaśātkāle parivartandivākaraḥ

हिन्दी अर्थ

' देवगण! आपलोग आमोदके साधनोंसे सम्पन्न एवं वायुके आवेगसे हिलते हुए चामरोंसे युक्त अपने वाहनोंद्वारा, जिनपर ध्वजाएँ फहरा रही हैं, अलग-अलग होकर चलिये। आपलोग नियतरूपसे तीनों लयोंका अनुगमन करनेवाले अपने ऊर्जस्वी रागके विषयमें क्यों नहीं विचार कर रहे हैं ? किंनरगण (अपने वाद्योंद्वारा) आभूषणसमूहसे उत्पन्न हुई ध्वनिको परास्त नहीं कर सकते। अपनी जातिवाले गणेश्वरो! इस समय षड्ज, मध्यम और पृथु स्वरसे युक्त गीत अधिक मात्रामें क्यों नहीं गाये जा रहे हैं। ये गौड -रागके जानकार लोग कालभेदके अनुसार विभिन्नताको प्राप्त हुए एवं नतानत, नत और आनतके लयसे युक्त अत्यन्त भेदवाले रागको पृथक्रूपमें

English

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अध्याय १२५

श्लोक 33

नियच्छत्यापो मेघेभ्यः शुक्लाः शुक्लैस्तु रश्मिभिः अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः

niyacchatyāpo meghebhyaḥ śuklāḥ śuklaistu raśmibhiḥ abhrasthāḥ prapatantyāpo vāyunā samudīritāḥ

हिन्दी अर्थ

निःशङ्कभावसे अलापते हुए बड़ी शीघ्रतासे चले जा रहे हैं। षाडवं रागके ज्ञातालोग पृथक्-पृथक् अपने ललित पदोंके प्रयोजक गीतोंको अलापते हुए शंकरजीके आगे- आगे क्यों नहीं चल रहे हैं ? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शंकरजीकी हर्षपूर्ण यात्रामें विघ्न न पड़ जाय, इस भयसे वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। ये विभिन्न जातियोंके विलासोन्मत्त नाग शंकरजीके यशका विस्तार करनेवाले, अधिकांश गमकके स्वभावसे सम्पन्न तथा मनोहर ध्वनिसे युक्त

English

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अध्याय १२५

श्लोक 34

ततो वर्षति षण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये वायुभिः स्तनितं चैव विद्युतस्त्वग्निजाः स्मृताः

tato varṣati ṣaṇmāsān sarvabhūtavivṛddhaye vāyubhiḥ stanitaṃ caiva vidyutastvagnijāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

संगीतका पृथक्-पृथक् प्रयोग कर रहे हैं। उधर उस दिशामें ये वधुओंसहित अनेकों संगीतज्ञ प्रतिक्षण कैसा संगीत अलाप रहे हैं? पता नहीं क्यों, न तो उसमें मृदङ्गसे निकली हुई ध्वनिकी जातियाँ लक्षित हो रही हैं, न मूर्छना- न मूर्च्छिताः किमिति च मूर्च्छनात्मिकाः॥ ४६३ आरोह-अवरोहसे युक्त स्वरका ही भान हो रहा है। १. एक संकर राग। २. रागकी एक जाति, जिसमें केवल छः स्वर आते हैं। ३. सातों स्वरोंका क्रमसे आरोह-अवरोह । ४. गानेमें

English

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अध्याय १२५

श्लोक 35

मेहनाच्च मिहेर् धातोर् मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च न भ्रश्यन्ते ततो ह्यापस् तस्मादभ्रस्य वै स्थितिः स्रष्टासौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः

mehanācca miher dhātor meghatvaṃ vyañjayanti ca na bhraśyante tato hyāpas tasmādabhrasya vai sthitiḥ sraṣṭāsau vṛṣṭisargasya dhruveṇādhiṣṭhito raviḥ

हिन्दी अर्थ

एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिपर जानेकी एक रीति। प्रकीर्णबीणामुरजादि नाम यत्

English

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अध्याय १२५

श्लोक 36

ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर् वृष्टिं संहरते पुनः ग्रहन्निवृत्त्या सूर्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम्

dhruveṇādhiṣṭhito vāyur vṛṣṭiṃ saṃharate punaḥ grahannivṛttyā sūryāttu carate ṛkṣamaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया। सुरद्रुमस्तबकविकीर्णचत्वरम् । प्रबिशन्तमगात् प्रविलोकय

English

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अध्याय १२५

श्लोक 37

चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठितम् अतः सूर्यरथस्यापि संनिवेशं प्रचक्षते

cārasyānte viśatyarkaṃ dhruveṇa samadhiṣṭhitam ataḥ sūryarathasyāpi saṃniveśaṃ pracakṣate

हिन्दी अर्थ

काप्यखिलीकृतमण्डनभूषा काचिदुवाच कलं गतमाना कातरतां सखि मा कुरु मूढे

English

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अध्याय १२५

श्लोक 38

स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणाभिना हिरण्मयेनाणुना वै अष्टचक्रैकनेमिना चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा

sthitena tvekacakreṇa pañcāreṇa triṇābhinā hiraṇmayenāṇunā vai aṣṭacakraikaneminā cakreṇa bhāsvatā sūryaḥ syandanena prasarpiṇā

हिन्दी अर्थ

तुम्बुरुद्वारा बजाये जानेवाले कर्णप्रिय तथा क्रम एवं गतिके भेदसे युक्त तारवाले बाजे क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं? इधर वीणा, मृदंग आदि अनेकों प्रकारके वाद्यसमूह क्यों नहीं बजाये जा रहे हैं ?' ॥ ४५८--४६४॥ इस प्रकार कही गयी उस सुन्दर वाणीको सुनकर ही वीरककी आज्ञासे सम्पूर्ण चराचर जगत्को आच्छादित करते हुए नियमपूर्वक आगे बढ़ने लगे। इस प्रकार शंकरजीके शीपघ्रतापूर्वक गमनसे दिशाओंमें कोलाहल गूँज उठा, महासागरोंमें ज्वार उठने लगा, बादल गरजने

English

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अध्याय १२५

श्लोक 39

शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते द्विगुणा च रथोपस्थाद् ईषादण्डः प्रमाणतः

śatayojanasāhasro vistārāyāma ucyate dviguṇā ca rathopasthād īṣādaṇḍaḥ pramāṇataḥ

हिन्दी अर्थ

लगे, पर्वतकी कन्दराएँ तहस-नहस हो गयीं, जगत्में गये। इस प्रकार श्रेष्ठ सुरों एवं असुरोंद्वारा प्रशंसित होते हुए शिवजी क्षणमात्रमें ही पर्वतराज हिमाचलके उस नगरमें जा पहुँचे, जो तपाये गये सुवर्णके सहस्रं तोरणोंसे सुशोभित था। उसमें कहीं-कहीं मरकतमणिके

English

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अध्याय १२५

श्लोक 40

स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो ह्यर्थवशेन तु असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पवनगैर्हयैः

sa tasya brahmaṇā sṛṣṭo ratho hyarthavaśena tu asaṅgaḥ kāñcano divyo yuktaḥ pavanagairhayaiḥ

हिन्दी अर्थ

संयोगसे बने हुए घरोंमें वेदिकाएँ बनी हुई थीं। कहीं- कहीं निर्मल वैदूर्य मणिके फर्श बने थे। कहीं बादलके समान रमणीय झरने झर रहे थे। वह नगर हजारों फहराते हुए ऊँचे-ऊँचे ध्वजोंसे विभूषित था। वहाँ चबूतरोंपर कल्पवृक्षके पुष्पोंके गुच्छे बिखेरे गये थे। वह श्वेत, काले और लाल रंगकी धातुओंसे रँगा हुआ था। उसकी उज्वल छटा फैल रही थी। उसके मार्ग और फाटक अत्यन्त विस्तृत थे। वहाँ उमड़े हुए बादलोंका अनृपम शब्द हो रहा था। सुगन्धयुक्त वायुके चलनेसे वह पुर अत्यन्त मनोहर लग रहा था

English

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अध्याय १२५

श्लोक 41

छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर् यथाचक्रं समास्थितैः वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः

chandobhirvājirūpaistair yathācakraṃ samāsthitaiḥ vāruṇasya rathasyeha lakṣaṇaiḥ sadṛśaśca saḥ

हिन्दी अर्थ

शिवजीको उस नगरमें प्रवेश करते देखकर पर्वतराज हिमाचलका सारा नगर व्याकुल हो गया। पति-पुत्र आदिसे युक्त सम्मानित नारियाँ व्याकुल होकर वेगपूर्वक इधर-उधर भागने लगीं। मार्गो और गलियोंमें भागते हुए लोगोंकी भीड़ लग गयी। कोई देवाङ्गना अट्टालिकाके झरोखेमें बैठकर अपने नीलकमलके-से नेत्रोंसे उसकी शोभा बढ़ा रही थी। कोई नारी अपने आभूषणोंकी किरणोंसे छिपी होनेपर भी प्रत्यक्ष रूपमें दीख रही थी। कोई सुन्दरी

English

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अध्याय १२५

श्लोक 42

तेनासौ चरति व्योम्नि भास्वाननुदिनं दिवि अथाङ्गानि तु सूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य च संवत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम्

tenāsau carati vyomni bhāsvānanudinaṃ divi athāṅgāni tu sūryasya pratyaṅgāni rathasya ca saṃvatsarasyāvayavaiḥ kalpitāni yathākramam

हिन्दी अर्थ

अपनेको सम्पूर्ण शृङ्गारोंसे विभूषितकर सखीके प्रेमको छोड़कर शिवजीकी ओर निहार रही थी। कोई नारी अभिमानरहित हो मधुर वाणीमें बोली- अरी भोली- कामयते स्वयमेव विहर्तुम्। काचिदपि स्वयमेव पतन्ती शङ्करजं स्खलनेन वद त्वम्। कापि कृतव्यवधानमदुष्ट्रा

English

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अध्याय १२५

श्लोक 43

अहर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकचक्रस्य वै स्मृतः अराः संवत्सरास्तस्य नेम्यः षडृतवः स्मृताः

aharnābhistu sūryasya ekacakrasya vai smṛtaḥ arāḥ saṃvatsarāstasya nemyaḥ ṣaḍṛtavaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

नामभिरिन्दुजटं निजसेवा- मार्गममुं विवृतीकरणाय

English

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अध्याय १२५

श्लोक 44

रात्रिर्वरूथो धर्मश्च ध्वज ऊर्ध्वं व्यवस्थितः अक्षकोट्योर्युगान्यस्य आर्तवाहाः कलाः स्मृताः

rātrirvarūtho dharmaśca dhvaja ūrdhvaṃ vyavasthitaḥ akṣakoṭyoryugānyasya ārtavāhāḥ kalāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

सप्रणयं करघट्टितवक्त्र: किंचिदुवाच मितं श्रुतिमूले शंकरसंश्रयणाद्रिरिजाया ततो हिमगिरेर्वेशम विश्वकर्मनिवेदितम्। महानीलमयस्तम्भं ज्वलत्काञ्चनकुट्टिमम्

English

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अध्याय १२५

श्लोक 45

तस्य काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै निमेषश्चानुकर्षो ऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता

tasya kāṣṭhā smṛtā ghoṇā dantapaṅktiḥ kṣaṇāstu vai nimeṣaścānukarṣo 'sya īṣā cāsya kalā smṛtā

हिन्दी अर्थ

मुक्ताजालपरिष्कारं ज्चलितौषधिदीपितम्। क्रीडोद्यानसहस्त्राढ्यं काञ्जनाबद्धदीर्धिकम् विमर्दकीर्णकेयूरा हरिणा द्वारि रोधिताः। कथंचित् प्रमुखास्तत्र विविशुर्नाकवासिनः

English

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अध्याय १२५

श्लोक 46

युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थकामावुभौ स्मृतौ सप्ताश्वरूपाश्छन्दांसि वहन्ते वायुरंहसा

yugākṣakoṭī te tasya arthakāmāvubhau smṛtau saptāśvarūpāśchandāṃsi vahante vāyuraṃhasā

हिन्दी अर्थ

चकार विधिना सर्व विधिमन्त्रपुरःसरम् भाली सखि! तुम कातर मत होओ। यद्यपि शिवजीने कामदेवको जला दिया है, तथापि वे स्वयं ही विहार करनेको इच्छा करते हैं।' कोई सुन्दरी, जो स्वयं मनोभवके फंदेमें पड़ गयी थी, विरहसे स्खलित अङ्गोंवाली दूसरी नारीसे बोली-चपले! तुम भूलसे शङ्करजीके साथ कामदेवके संयोगकी चर्चा मत किया कर।' कोई कामिनी व्यवधान पड्नेके कारण शङ्करजीको न देखकर युक्तिपूर्वक 'शङ्कर यही हें '--ऐसा मानकर कह रही

English

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अध्याय १२५

श्लोक 47

गायत्री चैव त्रिष्टुप्च जगत्यनुष्टुप्तथैव च पङ्क्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव तु सप्तमम्

gāyatrī caiva triṣṭupca jagatyanuṣṭuptathaiva ca paṅktiśca bṛhatī caiva uṣṇigeva tu saptamam

हिन्दी अर्थ

थी--' वे शिव यही हैं, जिन चन्द्रशेखरको अपनी सेवाके फलको प्रा्िके निमित्त स्वर्गवासियोंके अधीश्वर इन्र आदि देवगण स्वयं अपना-अपना नाम लेकर नमस्कार कर रहे हैं।' कोई नारी कह रही थी--' अरे! शिवजी यह नहीं हैं, वे तो वह हैं, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा पा रहा है और जिनका शरीर चमड़ेसे ढँका हुआ है तथा जिनके आगे वज्रधारी देवराज इन्द्र इस मार्गको निर्बाध करनेके लिये दौड़ रहे हैं देखो, ये लम्बी जटाओं

English

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अध्याय १२५

श्लोक 48

चक्रमक्षे निबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः सहचक्रो भ्रमत्यक्षः सहाक्षो भ्रमति ध्रुवः

cakramakṣe nibaddhaṃ tu dhruve cākṣaḥ samarpitaḥ sahacakro bhramatyakṣaḥ sahākṣo bhramati dhruvaḥ

हिन्दी अर्थ

और मृगचर्मसे सुशोभित पद्मयोनि ब्रह्मा भी उनके निकट जाकर हाथसे मुख पकड़े हुए प्रेमपूर्वक उनके कानोंमें कुछ कह रहे हैं।' इस प्रकार अतिशय प्रेमके कारण देवाङ्गनाओंके चित्तमें परम संतोष हुआ। तब वे कहने लगीं कि शङ्करजीका आश्रय ग्रहण करनेसे पार्वतीको अपने जन्मका परम फल प्राप्त हो गया तदनन्तर भगवान् शङ्कर हिमाचलके उस भवनमें प्रविष्ट हुए, जिसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्माने किया था तथा जिसमें महानीलमणिके खम्भे लगे हुए थे, जिसका फर्श तपाये हुए स्वर्णका बना हुआ था, जो

English

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अध्याय १२५

श्लोक 49

अक्षः सहैव चक्रेण भ्रमते ऽसौ ध्रुवेरितः एवमर्थवशात्तस्य संनिवेशो रथस्य तु

akṣaḥ sahaiva cakreṇa bhramate 'sau dhruveritaḥ evamarthavaśāttasya saṃniveśo rathasya tu

हिन्दी अर्थ

मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित और जलती हुई औषधियोंके प्रकाशसे उद्दीप्त हो रहा था, जिसमें हजारों क्रीडोद्यान थे तथा जिसकी बावलियोंकी सीढ़ियाँ सोनेकी बनी हुई थीं । उस अद्भुत भवनको देखकर महेन्द्र आदि सभी देवताओंने अपने मनमें ऐसा समझा कि आज हमारे नेत्र सफल हो गये। उस भवनके द्वारपर श्रीहरिद्वारा रोके जानेपर भीड़के कारण जिनके केयूर परस्पर रगड़ खाकर चूर- चूर हो गये थे, ऐसे कुछ प्रमुख स्वर्गवासी किसी प्रकार

English

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अध्याय १२५

श्लोक 50

तथा संयोगभागेन सिद्धो वै भास्करो रथः तेनासौ तरणिर्देवो नभसः सर्पते दिवम्

tathā saṃyogabhāgena siddho vai bhāskaro rathaḥ tenāsau taraṇirdevo nabhasaḥ sarpate divam

हिन्दी अर्थ

उस भवनमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर वहाँ (मण्डपमें) पर्वतराज हिमाचलने विनम्रभावसे ब्रह्माकी पूजा की। तब दाता महीभृतां नाथो होता देवश्चतुर्मुखः व्यग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावमनोरमा। गृहीत्वा वरुणः सर्वरत्नान्याभरणानि च

English

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अध्याय १२५

श्लोक 51

युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य तु भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तौ चक्रयुगयोस्तु वै

yugākṣakoṭī te tasya dakṣiṇe syandanasya tu bhramato bhramato raśmī tau cakrayugayostu vai

हिन्दी अर्थ

तस्थौ साभरणो देवो हर्षदः सर्वदेहिनाम् धनदश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 52

मण्डलानि भ्रमन्ते ऽस्य खेचरस्य रथस्य तु कुलालचक्रभ्रमवन् मण्डलं सर्वतोदिशम्

maṇḍalāni bhramante 'sya khecarasya rathasya tu kulālacakrabhramavan maṇḍalaṃ sarvatodiśam

हिन्दी अर्थ

छत्रमिन्दुकरोद्गारं सुसितं च शतक्रतुः चकारौद्वाहिकं कृत्यं पत्या सह यथोचितम्। दत्तार्घो गिरिराजेन सुरवृन्हैर्विनोदितः स्तुतिभिर्देवहैत्यानां विबुद्धो विबुधाधिपः।

English

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अध्याय १२५

श्लोक 53

युगाक्षकोटी ते तस्य वातोर्मी स्यन्दनस्य तु संक्रमेते ध्रुवमहो मण्डले सर्वतोदिशम्

yugākṣakoṭī te tasya vātormī syandanasya tu saṃkramete dhruvamaho maṇḍale sarvatodiśam

हिन्दी अर्थ

उन्होंने विधानानुसार मन्त्रोचारणपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न किया। तदुपरान्त शिवजीने अग्निको साक्षी बनाकर गिरिजाका अटूट पाणिग्रहण किया। उस विवाहोत्सवमें पर्वतोंके राजा हिमाचल दाता, देवाधिदेव ब्रह्मा होता, साक्षात् शिव वर तथा विश्वकी अरणिभूता पार्वती कन्या थीं। उस समय प्रधान देवता एवं असुर तथा चराचर सभी प्राणी (कार्याधिक्यके कारण) नियमको छोड़कर व्यग्र हो उठे। सभी प्रकारके मनोरम भावोंसे

English

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अध्याय १२५

श्लोक 54

भ्रमतस्तस्य रश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे वर्धेते दक्षिणेष्वत्र भ्रमतो मण्डलानि तु

bhramatastasya raśmī te maṇḍale tūttarāyaṇe vardhete dakṣiṇeṣvatra bhramato maṇḍalāni tu

हिन्दी अर्थ

परिपूर्ण पृथ्वीदेवी आकुल होकर सभी प्रकारके नूतन अन्नों, रसों और औषधियोंको उड़ेलने लगीं। सभी प्राणियोंको हर्ष प्रदान करनेवाले वरुणदेव स्वयं आभूषणोंसे विभूषित हो सभी प्रकारके रत्नों तथा अनेकविध रत्नोंसे निर्मित पुण्यमय एवं पावन आभरणोंको लेकर वहाँ उपस्थित थे॥ ४७९--४८८ ॥ उस समय वहाँ कुबेर भी विनम्रभावसे विभिन्न प्रकारके स्वर्णमय दिव्य आभूषणोंको लिये हुए उपस्थित थे। स्पर्शसे सुख उत्पन्न करनेवाली परम सुगन्धित वायु चारों ओर बहने लगी। मालाधारी इन्द्र हर्षपूर्वक अनेकों

English

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अध्याय १२५

श्लोक 55

युगाक्षकोटीसम्बद्धौ द्वौ रश्मी स्यन्दनस्य तु ध्रुवेण प्रगृहीतौ तौ रथौ यौ वनतो रविम्

yugākṣakoṭīsambaddhau dvau raśmī syandanasya tu dhruveṇa pragṛhītau tau rathau yau vanato ravim

हिन्दी अर्थ

आभूषणोंसे विभूषित अपनी भुजाओंद्वारा चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिमान् अत्यन्त उज्वल छत्र लिये हुए थे। प्रधान-प्रधान गन्धर्व गीत गा रहे थे और बाजा बजाते हुए अत्यन्त मधुर स्वरसे राग अलाप रहे थे। वहाँ छहों ऋतुएँ भी शरीर धारणकर नाचती और गाती थीं। चञ्चल प्रकृतिवाले प्रमथगण हिमाचलको विचलित करते हुए उपस्थित थे। इसी समय विश्वके

English

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अध्याय १२५

श्लोक 56

आकृष्येते यदा ते तु ध्रुवेण समधिष्ठिते तदा सो ऽभ्यन्तरे सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु

ākṛṣyete yadā te tu dhruveṇa samadhiṣṭhite tadā so 'bhyantare sūryo bhramate maṇḍalāni tu

हिन्दी अर्थ

पालनकर्ता एवं भगदेवताके नेत्रोंके विनाशक भगवान् शिव उठे और अपनी पत्नी पार्वतीके साथ क्रमशः सारा वैवाहिक कार्य यथोचितरूपसे सम्पन्न किये। उस समय सुरसमूह विनोदकी बातें करने लगे। तत्पश्चात् त्रिपुरके विनाशक भगवान् शङ्करने उस रातमें पत्नीके साथ वहाँ निवास किया। प्रातःकाल गन्धर्वोके गीत, अप्सराओंके नृत्य तथा देवों एवं हैत्योंकी स्तुतियोंके माध्यमसे जगाये देवेश्वर शङ्कर पर्वतराज हिमाचलसे आज्ञा लेकर उमाके साथ वायुके समान वेगशाली नन्दीश्वरपर सवार

English

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अध्याय १२५

श्लोक 57

अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरुभयोश्चरन् ध्रुवेण मुच्यमानेन पुना रश्मियुगेन च

aśītimaṇḍalaśataṃ kāṣṭhayorubhayoścaran dhruveṇa mucyamānena punā raśmiyugena ca

हिन्दी अर्थ

जगाम मन्दरगिरिं वायुवेगेन श्रृद्धिणा॥ ४९६ हो मन्दराचलको चले गये॥४८९--४९६॥ विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः

English

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अध्याय १२५

श्लोक 58

तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु उद्वेष्टयन्वै वेगेन मण्डलानि तु गच्छति

tathaiva bāhyataḥ sūryo bhramate maṇḍalāni tu udveṣṭayanvai vegena maṇḍalāni tu gacchati

हिन्दी अर्थ

ज्चलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा विसर्जितामरनिवहोऽविशत् स्वकम् तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा। पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 125
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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