अध्याय १३०
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण १३० इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम् चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्
matsya-purāṇa 130 iti cintāyuto daityo divyopāyaprabhāvajam cakāra tripuraṃ durgaṃ manaḥsaṃcāracāritam
हिन्दी अर्थ
उधर वर प्राप्त होते ही उस वरदानसे गर्वित हुआ हैत्यराज हिरण्यकशिपु सभी प्रजाओंको कष्ट देना प्रारम्भ किया। उस दानवने आश्रमोंमें जाकर उन महान् भाग्यशाली मुनियोंको, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यधर्म- परायण और जितेन्द्रिय थे, धर्षित कर दिया। उस महान् असुरने त्रिभुवनमें स्थित सभी देवताओंको पराजित कर दिया। तब वह दानव त्रिलोकीको अपने अधीन करके स्वर्गमें निवास करने लगा। इस प्रकार कालधर्मकी प्रेरणासे जब उसने वरदानके मदसे उन्मत्त हो हैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बनाया और देवताओंको उनके समुचित यज्ञभागोंसे वञ्चित कर दिया, तब आदित्यगण, साध्यगण, विश्वेदेव, वसुगण, इन्द्रसहित देवगण, यक्ष,
English
(7) Hiva-V raid hoob.'orved dnringllje four montlis of Asadluy.