अध्याय १४०
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण १४० उदिते तु सहस्रांशौ मेरौ भासाकरे रवौ नदद्देवबलं कृत्स्नं युगान्त इव सागरः
matsya-purāṇa 140 udite tu sahasrāṃśau merau bhāsākare ravau nadaddevabalaṃ kṛtsnaṃ yugānta iva sāgaraḥ
हिन्दी अर्थ
क्रोधसे भरा हुआ दानवेश्वर कालनेमि वैष्णवपदको प्रापिकी अभिलाषासे नारायणके निकट गया। वहाँ जाकर उसने शङ्कु-चक्र-गदाधारी भगवानूको गरुडकी पीठपर बैठे तथा हैत्यांका विनाश करनेके लिये कल्याणमयी गदा घुमाते देखा। उनके शरीरको कान्ति सजल मेघके समान थी। उनका पीताम्बर बिजलीके समान चमक रहा था। वे स्वर्णमय पंखसे युक्त शिखाधारी कश्यपनन्दन गरुडपर समासीन थे। इस प्रकार रणभूमिमें हैत्योंका विनाश करनेके लिये स्वस्थचित्तसे स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णुको देखकर दानवराज कालनेमिका मन क्षुब्ध हो उठा, तब वह कहने लगा- “यही हमलोगोंके पूर्वजोंका प्राणनाशक शत्रु है तथा यही
English
Sfita said: — The Deva armies collected and thundered as does the ocean at the end of the Yuga, when they saw the Sun dawning on tlje