Matsya Purana· Matsya Purāṇa
164
अध्याय 164 / 176

Adhyaya 164

28 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय १६४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १६४ कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च पुनस्तस्यैव माहात्म्यम् अन्यद्विस्तरतो वद

matsya-purāṇa 164 kathitaṃ narasiṃhasya māhātmyaṃ vistareṇa ca punastasyaiva māhātmyam anyadvistarato vada

हिन्दी अर्थ

मूर्तिको दधि, क्षीर, घृत, मधु और शकक्‍्करसे स्नान कराकर पुनः पुष्प एवं सुगन्धमिश्रित जलसे स्नान कराये। उस समय एकाग्रचित्तसे भगवान् शिवका ध्यान करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-'यज्जाग्रतो दूरमुदेति०'-, “ततो सं० ३१) प्रतिष्ठासम्बन्धी कार्योमें इन उपर्युक्त सभी

English

The Rifis said: — " 0 Sflta! You have.described in detail the gloiy ol Narasiihha; now tell us something more in detail about His other glorious works. How did this universe become the golden lotus? What was the nature of Viu's creation inside the lotus? " — 1*2.

अध्याय १६४

श्लोक 2

पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत् कथं च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्ये ऽभवत्पुरा

padmarūpamabhūdetat kathaṃ hemamayaṃ jagat kathaṃ ca vaiṣṇavī sṛṣṭiḥ padmamadhye 'bhavatpurā

हिन्दी अर्थ

मूलभाग, मध्यभाग तथा शिरोभागमें स्पर्श करे। स्थापिते तु ततो देवे यजमानोऽथ मूत्तिपम्। आचार्य पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः

English

Shta said: — Vaivasvata Manu was astonished to bear the glory of Narasiihha; his eyes expressed great joy and he again asked the Lord. — 3.

अध्याय १६४

श्लोक 3

श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः पप्रच्छ केशवम्

śrutvā ca narasiṃhasya māhātmyaṃ ravinandanaḥ vismayotphullanayanaḥ punaḥ papraccha keśavam

हिन्दी अर्थ

ततस्तु मधुना देवं प्रथमेऽहनि लेपयेत् परं प्रीतिकरं नृणामेतद् वेदविदो विदुः। कृष्णाञ्जनं तिलं तद्वत् पञ्चमेऽपि निवेदयेत् षष्ठे तु सघृतं दद्याच्चन्दनं पद्मकेसरम्। रोचनागुरुपुष्यं तु सप्तमेऽहनि दापयेत्

English

Manu said: — " 0 JanSrdana! During the P&dma Mah& Ealpa how was the universe first created in the lotus springing from Thy navel when Thou wert reposing in the ocean? Thou art named Padmandbha; how were the Devas and the Seers born first in the lotus springing up in the navel of Visnu? Yogavidimpate! pray explain the whole of this yoga for I am not sufficiently satisfied by listening to an account of His glory. When did Visnu repose? How long did He remain asleep? What was the length of that period? When did He awake fropa His sleep? How did He create the universe after awakening? Who were the Prajfipatis at the time of creation? How was created this wonderful eternal creation? On the annihilation of the moving and non-moving worlds, only a wide expanse of water remains. The Devas, the demons and the men were all destroyed. Fire, air, earth and Akaa did not exist; all were extinct. The whole universe seemed a big cave; void as it were. How did then Jamlrdana rest? What mode did He adopt? That Lord of the great Bhhtas, that great form highly energetic, that knower of yoga, that Bhagavfin, the best of all the Devas. O knower of Dharma! 0 Brahman! I wish to hear all this with great devotion. Kindly describe in detail all this to me. Lord! I am veiy eager to hear about these things." — 4-14.

अध्याय १६४

श्लोक 4

कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत् जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन

kathaṃ pādme mahākalpe tava padmamayaṃ jagat jalārṇavagatasyeha nābhau jātaṃ janārdana

हिन्दी अर्थ

स्थितं न चालयेद् देवमन्यथा दोषभाग् भवेत् लोकपालस्य दिग्भागे यस्य संचलते विभुः

English

Hearing such words of Manu the Lord Matsyasaid: — "0 Manu, the flower of the solar race! It is very satisfactory indeed that you feel inclined to hear about the glory of Narayana. Hear about it as stated in the Pur&nas and the Vedas and as heard from the BrShmanas. I shall tell you what VedavySsa, the son of ParSifara, illustrious like Bfihaspati saw, by virtue of his great asceticism, in his vision." — 15-17.

अध्याय १६४

श्लोक 5

प्रभावात्पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा

prabhāvātpadmanābhasya svapataḥ sāgarāmbhasi puṣkare ca kathaṃ bhūtā devāḥ sarṣigaṇāḥ purā

हिन्दी अर्थ

तस्य लोकपतेः शान्तिर्देयाश्चेमाश्च दक्षिणाः । इन्द्राय वारणं दद्यात् काञ्चनं चाल्पवित्तवान् अजं च काञ्जनं दद्यान्नै्ऋतं राक्षसं प्रति अचलं कारयेत् तस्मात् सिकताभिः सुरेश्वरम्

English

(Veda Vyfisa said: — ) 0 Rigis! There is no one other than me and the chief Risis, who can comprehend and adequately realize the Highest Nar&yana and 1 shall tell you as I have been able to form some idea about Him by the help of ray limited intellect and from what I have heard about Him. Even Brahmft, the Creator of the Universe, is not able to know His essence; N4rayana is the mystery of all the Vedas; He is what is proved there. He is the mystery of the Maharis, that for which all sacrifices are made; the Tattva of all the seers, the Aim of the Thinkers, and the H e ll of the Wicked; the Adhidaiva, the Daiva, the Adhibhfita, and the highest wisdom of the ideal Ri§is He is the Yajua as described in the Vedas Tapas as described by the poets. He is the Doer; He is the Agent, He is the Buddhi, He is mind. He is Kettrajua. He is OfikSra, He is the Pui'ua, the Great Instructor, the Great Governor, and He is the only One, He is the five Pr&as, He is the Eternal undecaying One. He is K&la, Pfika (friction), PaktS (awarder of fruits), the seer, and the study of the Vedas, He is this N&r&yapa Deva and there is absolutely nothing beyond m.

अध्याय १६४

श्लोक 6

एतदाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरुपजायते

etadākhyāhi nikhilaṃ yogaṃ yogavidāṃ pate śṛṇvatastasya me kīrtiṃ na tṛptirupajāyate

हिन्दी अर्थ

चतुर्थेऽह्नि महास्नानं चतुर्थीकर्म कारयेत्। दक्षिणा च पुनस्तद्वद् देया तत्रातिभक्तितः इस प्रकार देवके स्थापित हो जानेपर यजमान मूर्तिकी प्रतिष्ठा करानेवाले आचार्यकी वस्त्र, अलंकार एवं आभूषणोंसे भक्तिपूर्वक पूजा करे। इसी प्रकार दीन, अन्धे, कृपण तथा अन्य जो कोई वहाँ उपस्थित हों, उन

English

THE MATSYA VDRAIAM.

अध्याय १६४

श्लोक 7

कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः कियन्तं वा स्वपिति च को ऽस्य कालस्य संभवः

kiyatā caiva kālena śete vai puruṣottamaḥ kiyantaṃ vā svapiti ca ko 'sya kālasya saṃbhavaḥ

हिन्दी अर्थ

सबको भी संतुष्ट करना चाहिए। तदनन्तर प्रथम दिन मधुसे प्रतिमाका लेपन करना चाहिए। इसी तरह दूसरे दिन हल्दी तथा सरसोंसे, तीसरे दिन चन्दन और जौसे, चौथे दिन मैनसिल तथा प्रियङ्गु (मेंहदी)-से लेप करना चाहिए; क्योंकि यह लेप सौभाग्य और मङ्गलदायक, व्याधिनाशक तथा मनुष्योंके लिये परम प्रीतिकारक है ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा है ॥ ४४--५७१॥ इसी प्रकार पाँचवें दिन काला अंजन और तिल, छठे दिन घृतसहित चन्दन एवं पद्मकेसर, सातवें दिन रोचना, अगुरु तथा पुष्प देना चाहिए। जिस मूर्तिको स्थापनामें तुरंत ही अधिवासन हो जाय, वहाँ इन

English

He is the Doer of eveiything. He is the Annihilator of all. He is the Creator of us all. He makes all work. He remains above all things. We are all in quest of Him and we all adore and worship Him. — 25-26.

अध्याय १६४

श्लोक 8

कियता वाथ कालेन ह्य् उत्तिष्ठति महायशाः कथं चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत्

kiyatā vātha kālena hy uttiṣṭhati mahāyaśāḥ kathaṃ cotthāya bhagavān sṛjate nikhilaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

सबको एक साथ ही निवेदित कर देना चाहिए। अवस्थित हो जानेपर प्रतिमाको अपने स्थानसे विचलित नहीं करना चाहिए; अन्यथा दोषभागी होना पड़ता है। छिद्रोंको बालूसे भरकर सब ओर छिद्ररहित कर देना चाहिए। स्थापनाके बाद जिस लोकपालको दिशाकी ओर प्रतिमा अपने-आप झुकती है, उस लोकपालके लिये शान्ति कराकर क्रमशः ये दक्षिणाएँ देनी चाहिए। इन्द्रके लिये हाथी देना चाहिए। यदि थोड़ी सम्पत्तिवाला

English

All the narrations, lrutis, etc., tend towards Him. He is the Universe. He is the Lord of the Universe, Who is also known as Nftr&yana. He is Truth and Immortality; He is Eternal, Past, Future and the Present, the Pur&na-Purua and Brahma." — 27-28.

अध्याय १६४

श्लोक 9

के प्रजापतयस्तावद् आसन्पूर्वं महामुने कथं निर्मितवांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम्

ke prajāpatayastāvad āsanpūrvaṃ mahāmune kathaṃ nirmitavāṃścaiva citraṃ lokaṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

हो तो सुवर्ण दे। अग्निके लिये सुवर्णकी, यमराजके लिये महिषकी, राक्षसराज निर्क्रतिके लिये बकरा तथा सुवर्णकी, वरुणके लिये सुतुहियोंसहित मोतियोंको, वायुके लिये दो वस्त्रोंसहित पीतलकी, चन्द्रमाके लिये और शिवके लिये चाँदी-निर्मित वृषभकी दक्षिणा देनी चाहिए। जिस-जिस दिशामें संचलन हो, उस- उस दिशाकी शान्ति करानी चाहिए, अन्यथा कुलविनाशक भयंकर भय उत्पन्न होता है। अतः प्रतिमाको बालूसे भरकर अचल कर देना चाहिए। उक्त पुण्य दिनमें अन्न तथा चस्त्रका दान करना चाहिए। साथ ही पुण्याहवाचन, जय-जयकार एवं माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करवाना चाहिए। यह महोत्सव तीन, पाँच,

English

Noes.— T he Supreme Lord. uf=The highest saerifloe. «f=The highest element. «its=])oer. %ii=Plaoe of orijn. as «sn=:An epthet of Vifpu,

अध्याय १६४

श्लोक 10

कथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे दग्धे देवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे

kathamekārṇave śūnye naṣṭasthāvarajaṅgame dagdhe devāsuranare pranaṣṭoragarākṣase

हिन्दी अर्थ

सात या दस दिनोंतक होना चाहिए। प्रतिष्ठाके चौथे दिन महास्नान तथा चतुर्थीकर्म कराना चाहिए। उस अवसरपर भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक पर्याप्त दक्षिणा देनी चाहिए। देवप्रतिष्ठाविधिरेष तुभ्यं

English

Here ends the one hundred and ai«ty-fourlh chapter on the creation from

अध्याय १६४

श्लोक 11

नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये

naṣṭānilānale loke naṣṭākāśamahītale kevalaṃ gahvarībhūte mahābhūtaviparyaye

हिन्दी अर्थ

निवेदितः पापक्रिनाशहेतोः । मनेकविद्याधरदेवपूज्यम् ऋषिवृन्द! मैंने पापोंके विनाशार्थ आपलोगोंसे देव-प्रतिमाकी प्रतिष्ठाकी यह विधि वर्णन की है; क्योंकि पण्डितोंने इस विषयको पूर्वकालमें अनेक विद्याधर तथा देवताओंद्वारा

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 12

विभुर्महाभूतपतिर् महातेजा महाकृतिः आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित्

vibhurmahābhūtapatir mahātejā mahākṛtiḥ āste suravaraśreṣṭho vidhimāsthāya yogavit

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रतिष्ठानुकीर्तनं नाम षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मूर्तिप्रतिष्ठा नामक दो सौ छाछठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 13

शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्

śṛṇuyāṃ parayā bhaktyā brahmannetadaśeṣataḥ vaktumarhasi dharmiṣṭha yaśo nārāyaṇātmakam

हिन्दी अर्थ

देव ( प्रतिमा )-प्रतिष्ठाके अङ्गभूत अभिषेक-स्नानका निरूपण अथातः सम्प्रवक्ष्यामि देवस्नपनमुत्तमम्। अघस्यापि समासेन शृणु त्वं विधिमुत्तमम्॥ यवाः सिद्धार्थकास्तद्वदष्टाङ्गोऽर्घः फलैः सह ॥

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 14

श्रद्धया चोपविष्टानां भगवन्वक्तुमर्हसि

śraddhayā copaviṣṭānāṃ bhagavanvaktumarhasi

हिन्दी अर्थ

कुम्भे तु मृत्तिकां दद्यादुद्धूतासीति मन्त्रवित्। शं नो देवीत्यपां मन्त्रमापो हिष्ठेति वै तथा॥ तेजोऽसीति घृतं तद्द् देवस्य त्वेति चोदकम्।

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 15

नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ

nārāyaṇasya yaśasaḥ śravaṇe yā tava spṛhā tadvaṃśyānvayabhūtasya nyāyyaṃ ravikularṣabha

हिन्दी अर्थ

दधिक्राव्णेति मन्त्रेण कर्तव्यमभिमन्त्रणम्॥ मधुवातेति मधुना ततः पुष्पोदकेन च॥ सरस्वत्यै भैषज्येन कार्य तस्याभिमन्त्रणम्।

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 16

शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा श्रुतम् ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्

śṛṇuṣvādipurāṇeṣu vedebhyaśca yathā śrutam brāhmaṇānāṃ ca vadatāṃ śrutvā vai sumahātmanām

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं ऋषियो ! अब मैं देवप्रतिमाके अभिषेक तथा अर्घ्यकी उत्तम विधि संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये। दधि, अक्षत, कुशका अग्रभाग, दुग्ध, दूर्वा, मधु, यव और सरसों-इन आठ वस्तुओं तथा फलोंके मिलानेसे अर्घ बनता है। हाथीशाला, अश्वशाला, चौराहा, विमौट, शूकरद्वारा खोदे गये गड्डे, अग्निकुण्ड, तीर्थस्थान एवं गोशालाको मिट्टीको मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण “उद्धृतासि वराहेण' (तै० आर०) आदि मन्त्रको उच्चारण करते

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 17

यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः पराशरसुतः श्रीमान् गुरुर्द्वैपायनो ऽब्रवीत्

yathā ca tapasā dṛṣṭvā bṛhaspatisamadyutiḥ parāśarasutaḥ śrīmān gururdvaipāyano 'bravīt

हिन्दी अर्थ

हुए कलशमें डाले । तत्पश्चात् 'शं नो देवी०', (वाजस० सं० ३६।१०) 'आपो हि ष्ठा०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारण कर जल छोड़े। तत्पश्चात् गायत्रीमन्त्रका उच्चारण करते हुए उस घड़ेमें गोमूत्र, फिर ' गन्धद्ठारां०' (ऋक्परि० श्रीसू० ८) इस मन्त्रसे गोबर, ' आप्यायस्व०' (वाजस० सं० १२। १४४) मन्त्रसे दुग्ध, "दधिक्राव्णः०' (वाजस० २३।३२) मन्त्रसे दही और तेजोऽसि०' (वाजस० २२। १) मन्त्रसे घृत, ' देवस्य त्वा सवितुः०' (वाजस० सं०१।१९)-से जलको छोड़कर सबको मिश्रितकर कुशद्वारा चलावे तो वह पञ्चगव्य होता है। इस पञ्चगव्यद्वारा प्रतिमाको स्नान करानेके उपरान्त शुद्ध दहीद्वारा ' दधिक्राव्णः० ' (वाजस० सं०२३।३२) इस

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 18

तत्ते ऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति यद्विज्ञातुं मया शक्यम् ऋषिमात्रेण सत्तमाः

tatte 'haṃ kathayiṣyāmi yathāśakti yathāśruti yadvijñātuṃ mayā śakyam ṛṣimātreṇa sattamāḥ

हिन्दी अर्थ

' आप्यायस्व० ' (वाजस० सं० १२। ११४) इस मन्त्रका उच्चारण कर दुग्धसे, 'तेजोऽसि शुक्र०' (वाजस० सं०२२। १) इस मन्त्रद्वारा घृतसे, 'मधुवाता० ' (वाजस० सं०) इस मन्त्रद्वारा मधुसे तथा पुष्पमिश्रित जलसे और 'सरस्वत्यै०' (वाजस० सं०) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए ओषधियोंसे प्रतिमाका संस्कार करना

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 19

कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः

kaḥ samutsahate jñātuṃ paraṃ nārāyaṇātmakam viśvāyanaśca yadbrahmā na vedayati tattvataḥ

हिन्दी अर्थ

हिरण्याक्षेति मन्त्रेण स्तापयेद् रत्नवारिणा॥ ९ चाहिए। फिर "हिरण्याक्ष०' इस मन्त्रसे रत्लमिश्रित कुशाम्भसा ततः स्नानं देवस्यत्वेति कारयेत्। फलोदकेन च स्नानमग्न आयाहि कारयेत्

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 20

तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षीणाम् तमीशं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम् तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं च विकर्मिणाम्

tatkarma viśvavedānāṃ tadrahasyaṃ maharṣīṇām tamīśaṃ sarvayajñānāṃ tattattvaṃ sarvadarśinām tadadhyātmavidāṃ cintyaṃ narakaṃ ca vikarmiṇām

हिन्दी अर्थ

सौवर्णै राजतैर्वापि ताम्रैर्वा रीतिकोद्भवैः कांस्यैर्वा पार्थिवैर्वापि स्नपनं शक्तितो भवेत्। सहदेवी वचा व्याघ्री बला चातिबला तथा

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 21

अधिदैवं च यद्दैवम् अधियज्ञं सुसंज्ञितम् तद्भूतमधिभूतं च तत्परं परमर्षीणाम्

adhidaivaṃ ca yaddaivam adhiyajñaṃ susaṃjñitam tadbhūtamadhibhūtaṃ ca tatparaṃ paramarṣīṇām

हिन्दी अर्थ

मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापापहं शुभम्। ततो वस्त्रयुगं दद्यान्मन्त्रेणानेन यत्नतः देवसूत्रसमायुक्ते यज्ञदानसमन्विते। सर्ववर्णे शुभे देव वाससी ते विनिर्मिते ततस्तु चन्दनं दद्यात् समं कर्पूरकुङ्कुमैः। इममुच्चारयेन्मन्त्रं दीर्घपाणिः प्रयत्नतः

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 22

स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस् तत्तपः कवयो विदुः यः कर्ता कारको बुद्धिर् मनः क्षेत्रज्ञ एव च

sa yajño vedanirdiṣṭas tattapaḥ kavayo viduḥ yaḥ kartā kārako buddhir manaḥ kṣetrajña eva ca

हिन्दी अर्थ

जलसे, “देवस्य त्वा०' (वाजस० सं १।१०) इस (साम० सं० १। १) इस मन्त्रका उच्चारण कर प्रतिमाको स्नान करावे

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 23

प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च

praṇavaḥ puruṣaḥ śāstā ekaśceti vibhāvyate prāṇaḥ pañcavidhaścaiva dhruva akṣara eva ca

हिन्दी अर्थ

इसके बाद गायत्री-मन्त्रद्वारा सुगन्धित जलसे अभिमन्त्रित करे। फिर एक हजार या पाँच सौ या उसके या उसके आधे बत्तीस या उसके आधे सोलह या आठ या अल्प वित्तवाला पुरुष चार कलशोंसे स्नान-क्रिया सम्पन्न करे। ये कलश यथाशक्ति सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, पीतल, कांसा या मिट्टीके बने होने चाहिए। सहदेई, वच, सुवर्चला-ये महौषधियाँ हैं, इनका महास्नानके समय प्रयोग करना चाहिए । जौ, गेहूँ, तिन्नी, तिल, साँवा, धान, प्रियङ्गु तथा चावल-ये अन्न भी स्नानकार्यमें उपयोगी कहे गये हैं। स्वस्तिक, पद्म, शङ्क, उत्पल, कमल,

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 24

कालः पाकश्च पक्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च उच्यते विविधैर्देवैः स एवायं न तत्परम्

kālaḥ pākaśca paktā ca draṣṭā svādhyāya eva ca ucyate vividhairdevaiḥ sa evāyaṃ na tatparam

हिन्दी अर्थ

श्रीवत्स, दर्पण और नन्द्यावर्त-इन आठ चित्रोंकी गोबर और शुद्ध मिट्टीसे कलापूर्ण रचना करें, फिर उन्हें पाँच प्रकारके रंग, पाँच प्रकारके चूर्ण, दूर्वा और काला तिलसे भर दे। तत्पश्चात् नीराजन-आरतीकी विधिसे नीराजन कर बुद्धिमान् पुरुष ' गङ्गाका जल सभी पापोंका विनाशक और शुभदायक होता है' इस भावके मन्त्रसे आचमन करावे । तदनन्तर-' देव! आपके लिये बने हुए ये युगल वस्त्र देवनिर्मित सूत्रद्वारा बने हुए, यज्ञ तथा दानसे समन्वित,

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 25

स एव भगवान्सर्वं करोति विकरोति च सो ऽस्मान्कारयते सर्वान् सो ऽत्येति व्याकुलीकृतान्

sa eva bhagavānsarvaṃ karoti vikaroti ca so 'smānkārayate sarvān so 'tyeti vyākulīkṛtān

हिन्दी अर्थ

विविध वर्णोवाले एवं परम रमणीय हैं, इन्हें आप ग्रहण करें,' इस भावके मन्त्रका उच्चारण करते हुए यलपूर्वक दो वस्त्र समर्पित करे। इसके बाद हाथमें कुश लेकर प्रयत्नपूर्वक निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करते हुए कपूर और केसरमिश्रित चन्दन लगाना चाहिए। मन्त्र इस प्रकार है—' देव! मैं आपके शरीर और चेष्टाको किसी प्रकार भी नहीं जानता, अतः मेरे द्वारा समर्पित किये गये गन्धोंको ग्रहणकर आप स्वयं ही अनुलेपन कर लें' इसके बाद चालीस दीप प्रदान करना चाहिए और प्रदक्षिणा भी करनी चाहिए। उस समय निम्नाङ्कित

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 26

यजामहे तमेवाद्यं तमेवेच्छाम निर्वृताः यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद्ब्रवीमि वः

yajāmahe tamevādyaṃ tamevecchāma nirvṛtāḥ yo vaktā yacca vaktavyaṃ yaccāhaṃ tadbravīmi vaḥ

हिन्दी अर्थ

देवकुम्भैस्ततः कुर्याद् यजमानोऽभिषेचनम्। चतुर्भिरष्टभिर्वापि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः देवस्य त्वेति मन्त्रेण साम्ना चाथर्वणेन च

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 27

श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत्परिजल्प्यते याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः

śrūyate yacca vai śrāvyaṃ yaccānyatparijalpyate yāḥ kathāścaiva vartante śrutayo vātha tatparāḥ viśvaṃ viśvapatiryaśca sa tu nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिषेके च ये मन्त्रा नवग्रहमखे स्मृताः। सिताम्बरधरः स्नात्वा देवान् सम्पूज्य यत्नतः स्थापकं पूजयेद् भक्त्या सस्त्रालङ्कारभूषणैः । यज्ञभाण्डानि सर्वाणि मण्डपोपस्करादिकम् सुप्रसन्ने गुरौ यस्मात् तृप्यन्ति सर्वदेवताः

English

the Lotus.

अध्याय १६४

श्लोक 28

यत्सत्यं यदमृतमक्षरं परं यद् यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत् यत्किंचिच् चरमचरं यदस्ति चान्यत् तत्सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः

yatsatyaṃ yadamṛtamakṣaraṃ paraṃ yad yadbhūtaṃ paramamidaṃ ca yadbhaviṣyat yatkiṃcic caramacaraṃ yadasti cānyat tatsarvaṃ puruṣavaraḥ prabhuḥ purāṇaḥ

हिन्दी अर्थ

नैतद्विशीलेन च दाम्भिकेन न लिङ्किना स्थापनमत्र कार्यम्। विप्रेण कायं ©श्रुतिपारगेण गृहस्थधर्माभिरतेन नित्यम् पाषण्डिनं यस्तु करोति भक्त्या विहाय विप्राञ्भ्रुतिधर्मयुक्तान्।

English

the Lotus.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 164
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.