Matsya Purana· Matsya Purāṇa
165
अध्याय 165 / 176

Adhyaya 165

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अध्याय १६५

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १६५ चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा रविनन्दन

matsya-purāṇa 165 catvāryāhuḥ sahasrāṇi varṣāṇāṃ tu kṛtaṃ yugam tasya tāvacchatī saṃdhyā dviguṇā ravinandana

हिन्दी अर्थ

अपूज्यतां यात्यचिरेण लोकैः । चन्द्रमाकी ज्योति, बिजली, अग्नि और सभी प्रकारकी ज्योति हैं, आप इस दीपको ग्रहण करें।' फिर “देव! यह वनस्पतियोंका अति उत्तम रस, दिव्य गन्धयुक्त और उत्तम गन्ध है, मैंने इसे भक्तिपूर्वक अर्पित किया है। आप इस धूपको ग्रहण करें।' इस मन्त्रका उच्चारणकर विचक्षण पुरुष धूपदान करे। तत्पश्चात् “बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित देव! आपको नमस्कार है।' इस भावके मन्त्रद्वारा आभूषण अर्पित करना चाहिए। इस

English

Matsya said: — O Manu! The age of Satyayuga is foui thousand divine years. Its twilight is of eight hundred divine years. During that age the four feet of Dharma are complete and there is one part of adharma; the people devoted to their own dhannas are born in that Yuga. All the Brahmanas are engaged in the pursuit of high class dharma. The Katryas rule the Empire and are ready to please their subjects; the Vairfyas take to agriculture, and the Sddras render menial service to the three castes. In that age, truth, cleanliness, and dharma increased and eveiy one followed and propagated the dharma practised by the high castes.* King! The people in that age lead such a virtuous life and the low also keep themselves on the track of their dharma. — 1-5.

अध्याय १६५

श्लोक 2

यत्र धर्मश्चतुष्पादस् त्व् अधर्मः पादविग्रहः स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानवाः

yatra dharmaścatuṣpādas tv adharmaḥ pādavigrahaḥ svadharmaniratāḥ santo jāyante yatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार सात राततक महोत्सव कर श्वेत वस्त्रधारी यजमान पञ्चरत्नयुक्त तथा श्वेत चस्त्रसे परिवेष्टित चार, आठ, दो अथवा एक देवकुम्भके जलसे-' देवस्य त्वा०-' (वाजस० सं० १।१०) इस मन्त्रसे या आथर्वण तथा साममन्त्रोंसे या नवग्रहयज्ञोंमें अभिषेकके समय प्रयुक्त होनेवाले मन्त्रोंसे अभिषेक करे। फिर स्नानकर देवताओंकी पूजा करनेके बाद स्थापना करानेवालेकी वस्त्र, अलंकार एवं आभूषणोंद्वारा पूजा

English

The Tretfi, age lasts for a period of three thousand divine years and its twilight is of six hundred years duration. Two ptldas of adharma exist during that age and there are only three pAdas of dharma. There is truth and Satvagua in that dharma. The castes become vitiated with regard to their functions in that age and the disturbance weakens the Varnas. This is the cycle of TretA age, now I shall describe Dv&para and hear about it. — 6-9.

अध्याय १६५

श्लोक 3

विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवः स्थिताः

viprāḥ sthitā dharmaparā rājavṛttau sthitā nṛpāḥ kṛṣyāmabhiratā vaiśyāḥ śūdrāḥ śuśrūṣavaḥ sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

करे। तत्पश्चात् सभी यज्ञपात्रों, मण्डपकी सामग्रियों तथा मण्डपमें अन्य जो कुछ भी दातव्य वस्तुएँ हों, उन्हे आचार्यको देना चाहिए; क्योंकि गुरुके प्रसन्न होनेपर सभी देवगण प्रसन्न हो जाते हैं। इस देवप्रतिमाके स्थापन- कार्यको शीलरहित, दम्भी और पाखंडीसे नहीं कराना चाहिए, प्रत्युत सदा श्रुतियोंके पारगामी एवं गृहस्थाश्रमे रहनेवाले ब्राह्मणद्वारा ही कराना उचित है। जो व्यक्ति केवल भक्तिके कारण वैदिक धर्मोमें परायण विद्वान् पण्डितोंको छोड़कर अपने पाखण्डी गुरुको इस कार्यमें नियुक्त करता है, उसका कुल शीघ्र ही अपूज्य और नष्ट हो जाता है, उस स्थानपर पिशाचोंका आधिपत्य हो जाता है तथा लोग प्रतिमाको थोड़े ही दिनों बाद अपूज्य

English

O Manu! the age of Dv&para is two thousand divine years and its evening is of four hundred years. In that age, all the beings are stupefied by Rajoguna and are jealous and mean. Dharma exists only twofold and adharma is, threefold. In Kaliyuga, the twofold dharma becomes extinct by and by. The BrA-hmanas lose their spirit and become lukewarm in their duties at the close of Dv&para and the fasts and vows become abandoned. — 10-13.

अध्याय १६५

श्लोक 4

तदा सत्यं च शौचं च धर्मश्चैव विवर्धते सद्भिराचरितं कर्म क्रियते ख्यायते च वै

tadā satyaṃ ca śaucaṃ ca dharmaścaiva vivardhate sadbhirācaritaṃ karma kriyate khyāyate ca vai

हिन्दी अर्थ

समझने लगते हैं । वैदिक ब्राह्मणोंद्वारा करायी गयी स्थापनासे देव-प्रतिमा कुलमें कल्याणकारिणी होती है और प्रपूज्यतां याति चिरं च कालम्॥ ३५ चिरकालतक लोग उसकी पूजा करते हैं

English

Kaliyuga remains for a thousand divine years and its evening lasts for a couple of centuries. There are four feet of adharma during that age and dharma consists of only one. Men are overpowered by Tamoguna; and they become sensuous during that age. The people of Kaliyuga are full of vanity and egoism and do not feel any love towards Jivaa None of them is predominent with iSatvaguna. None is truthful. The Br&hm an as become athiests, conceited, void of attachment and follow the duties of the Sfidras. During Kaliyuga the &rframas are upset and at the end of the age, the Vardas also become mixed.— '14:-18.

अध्याय १६५

श्लोक 5

एतत्कार्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव प्राणिनां धर्मसङ्गानाम् अपि वै नीचजन्मनाम्

etatkārtayugaṃ vṛttaṃ sarveṣāmapi pārthiva prāṇināṃ dharmasaṅgānām api vai nīcajanmanām

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतास्नानं नाम सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवप्रतिमा-स्नान नामक दो सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वास्तु-शान्तिकी विधि

English

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अध्याय १६५

श्लोक 6

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्त्यते

trīṇi varṣasahasrāṇi tretāyugamihocyate tasya tāvacchatī saṃdhyā dviguṇā parikīrtyate

हिन्दी अर्थ

प्रासादाः कीदृशाः सूत कर्तव्या भूतिमिच्छता। वास्तूपशमनं कुर्यात् समिद्भिर्बलिकर्मणा। जीर्णोद्धारे तथोद्याने तथा गृहनिवेशने

English

The pbribd of the aforementioned four yugas is 12,000 years, '<yhe" that pbriod elapses it makes one day of Brahm&. On the lapsbdf Brahinft's one day, lilvara feels inclined to annihilate the creation on finding it apathetic. He destroys all the Devas including Brahmfl,, the demons, the Yakshas, the birds, the Gandharvas, the nymphs, the serpents, the mountains, the rivers, the creatures like scorpions, etc., and various kinds of insects. He also destroys the five elements. — 19-23.

अध्याय १६५

श्लोक 7

द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः यत्र सत्यं च सत्त्वं च त्रेताधर्मो विधीयते

dvābhyāmadharmaḥ pādābhyāṃ tribhirdharmo vyavasthitaḥ yatra satyaṃ ca sattvaṃ ca tretādharmo vidhīyate

हिन्दी अर्थ

एकाशीतिपदं लिख्य वास्तुमध्ये च पृष्ठतः होमस्त्रिमेखले कार्यः कुण्डे हस्तप्रमाणके । कायस्तु पञ्चभिर्विल्वैर्बिल्वबीजैरथापि वा। होमान्ते भक्ष्यभोज्यैस्तु वास्तुदेशे बलिं हरेत्

English

The destruction of the universe starts like that when Vipiju in the shape of the Sun absorbs thb eyes of all the beings, dries up everything in the form of wind, consumes every thing in the form of fire and sends forth heavy rain in the form of clouds.— 24.

अध्याय १६५

श्लोक 8

त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णास्त्वेते न संशयः चातुर्वर्ण्यस्य वैकृत्याद् यान्ति दौर्बल्यमाश्रमाः

tretāyāṃ vikṛtiṃ yānti varṇāstvete na saṃśayaḥ cāturvarṇyasya vaikṛtyād yānti daurbalyamāśramāḥ

हिन्दी अर्थ

ईशकोणे घृताक्तं तु शिखिने विनिवेदयेत् जयाय च ध्वजान् पीतान् पैष्टं कूर्म च संन्यसेत्

English

Here ends the one hundred and sixty-fifth chapter on the creation

अध्याय १६५

श्लोक 9

एषा त्रेतायुगगतिर् विचित्रा देवनिर्मिता द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि

eṣā tretāyugagatir vicitrā devanirmitā dvāparasya tu yā ceṣṭā tāmapi śrotumarhasi

हिन्दी अर्थ

सत्याय घृतगोधूमं मत्स्यं दद्याद् भृशाय च। शष्कुलीश्चान्तरिक्षाय दद्यात् सक्तूंश्च वायवे ऋषियोंने पूछा-सूतजी! समृद्धिकी इच्छा करनेवालोंको प्रासादों (राजगृह, देवमन्दिर आदि)-की रचना किस प्रकार करानी चाहिए? अब उनके प्रमाण और लक्षणोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये सूतजी कहते हैं-ऋषिवृन्द अब मैं प्रासादविधिका निर्णय बतला रहा हूँ। वास्तुके शरीरको जाननेवाला पुरुष वास्तुकी भलीभाँति परीक्षा कर लेनेके बाद (दोष दीखनेपर) बलिकर्म तथा समिधाओंद्वारा वास्तुकी शान्ति

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अध्याय १६५

श्लोक 10

द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां रविनन्दन तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा युगमुच्यते

dvāparaṃ dve sahasre tu varṣāṇāṃ ravinandana tasya tāvacchatī saṃdhyā dviguṇā yugamucyate

हिन्दी अर्थ

करे। जीर्ण प्रासादके उद्धार, वाटिकाके आरोपण, नूतन गृहमें प्रवेश, नवीन प्रासाद अथवा भवनके निर्माण, प्रासादपरिवर्तन, प्रासाद तथा गृहोंमें द्वारकी रचना--इन सभी अवसरोंपर विद्वान् पुरुषको पहले ही वास्तुकी शान्ति-पूजा करानी चाहिए। इसके लिये वास्तुके मध्यभागमें पृष्ठप्रदेशपर इक्यासी पदोंवाला चक्र बनाना चाहिए। फिर एक हाथ गहरे तथा चौड़े कुण्डमें, जो तीन मेखलाओंसे युक्त हो, जौ, काले तिल तथा दुग्धवाले

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अध्याय १६५

श्लोक 11

तत्र चार्थपराः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः सर्वे नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन

tatra cārthaparāḥ sarve prāṇino rajasā hatāḥ sarve naiṣkṛtikāḥ kṣudrā jāyante ravinandana

हिन्दी अर्थ

(वट, पाकड़, पीपल, गूलर आदि) वृक्षोंकी समिधाओंद्वारा हवन करना चाहिए। हवनमें मधु और घृतसे संयुक्त पलाश या खदिरकी समिधाओंका या मधु-घृत-संयुक्त कुश और दूर्वाका अथवा पाँच बिल्व-फल या उसके बीजोंका उपयोग करना चाहिए। हवनके अन्तमें विविध भक्ष्य सामग्रियोंद्वारा वास्तुप्रदेशमें क्रमसे बलि तथा विशेष नैवेद्य भी देना चाहिए। ईशानकोणमें घृतसे संयुक्त नैवेद्य अग्निके लिये समर्पित करे। पर्जन्यके लिये फल- घृतसंयुक्त ओदन तथा जयके लिये पीली ध्वजा और आटेका बना हुआ कूर्म देना चाहिए। इन्द्रके लिये पञ्चरत्न तथा आटेका बना हुआ वज्र तथा सूर्यके लिये धूम्रवर्णका वितान और सत्तू देना चाहिए

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अध्याय १६५

श्लोक 12

द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्याम् अधर्मस्त्रिभिरुत्थितः विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे

dvābhyāṃ dharmaḥ sthitaḥ padbhyām adharmastribhirutthitaḥ viparyayācchanairdharmaḥ kṣayameti kalau yuge

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार सत्यके लिये घी और गेहूँ, भृशको अन्न, अन्तरिक्षको पूड़ी, वायुको सत्तू और पूषाको लावा देना चाहिए। वितथको चना और ओदन, बुहत्क्षत्रको

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अध्याय १६५

श्लोक 13

ब्राह्मण्यभावस्य ततस् तथौत्सुक्यं विशीर्यते व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये

brāhmaṇyabhāvasya tatas tathautsukyaṃ viśīryate vratopavāsāstyajyante dvāpare yugaparyaye

हिन्दी अर्थ

बृहत्क्षत्राय मध्वन्नं यमाय पिशितौदनम्॥ १३ मधु और अन्न, यमको फलका गूदा और ओदन, गन्धौदनं च गन्धर्वे भृङ्गराजस्य भूद्धिकाम्। दौवारिके दन्तकाष्ठं पैष्टं कृष्णाबलिं तथा।

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अध्याय १६५

श्लोक 14

तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते अपि संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम्

tathā varṣasahasraṃ tu varṣāṇāṃ dve śate api saṃdhyayā saha saṃkhyātaṃ krūraṃ kaliyugaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

घृतौदनं न शेषाय यवान्नं पापयक्ष्मणे। घृतलङ्डुकांस्तु रोगाय नागे पुष्पफलानि च

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अध्याय १६५

श्लोक 15

यत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद्धर्मः पादविग्रहः कामिनस्तपसा हीना जायन्ते तत्र मानवाः

yatrādharmaścatuṣpādaḥ syāddharmaḥ pādavigrahaḥ kāminastapasā hīnā jāyante tatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

भल्लाटस्थानके दद्यात् सोमाय घृतपायसम् भगाय शालिकं पिष्टमदित्यै पोलिकास्तथा। दित्यै तु पूरिका दद्यादित्येवं बाह्यतो बलिः सावित्रे लडुकान् दद्यात् समरीचं कुशौदनम्

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अध्याय १६५

श्लोक 16

नैवातिसात्त्विकः कश्चिन् न साधुर्न च सत्यवाक् नास्तिका ब्रह्मभक्ता वा जायन्ते तत्र मानवाः

naivātisāttvikaḥ kaścin na sādhurna ca satyavāk nāstikā brahmabhaktā vā jāyante tatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

शर्करापायसं दद्यादर्यम्णे पुनरेव हि। पञ्चगव्यं यवाश्चैव तिलाक्षतमयं चरुम् भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्रह्मणे विनिवेदयेत्। एवं सम्पूजिता देवाः शान्तिं कुर्वन्ति ते सदा

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अध्याय १६५

श्लोक 17

अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ति सर्वे कलौ युगे

ahaṃkāragṛhītāśca prakṣīṇasnehabandhanāḥ viprāḥ śūdrasamācārāḥ santi sarve kalau yuge

हिन्दी अर्थ

सर्वेभ्यः काञ्चनं दद्याद् ब्रह्मणे गां पयस्विनीम्। राक्षसीनां बलिर्देयो अपि यादृग् यथा शृणु मांसौदनं घृतं पद्मकेसरं रुधिरान्वितम्। ईशानभागमाश्रित्य चरक्यै विनिवेदयेत् गन्धर्वको सुगन्ध और ओदन, भृङ्गराजको भृङ्गिका, मृगको जौका सत्तू और पितरोंको खिचड़ी देना चाहिए। दौवारिकको दन्तकाष्ठ तथा आरेकी कृष्ण बलि, सुग्रीवको पूआ तथा पुष्पदन्तको खीर प्रदान करे। वरुणको कुश-

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अध्याय १६५

श्लोक 18

आश्रमाणां विपर्यासः कलौ सम्परिवर्तते वर्णानां चैव संदेहो युगान्ते रविनन्दन

āśramāṇāṃ viparyāsaḥ kalau samparivartate varṇānāṃ caiva saṃdeho yugānte ravinandana

हिन्दी अर्थ

समूहसे संयुक्त पद्म और सुवर्णमय पिष्टक देना चाहिए। असुरके लिये मदिरा मानी गयी है। शेषको घृत-संयुक्त ओदन, पापयक्ष्माको जौका अन्न, रोगको घीका बना हुआ लडू, नागको पुष्प और फल, मुख्य (वासुकि)- को घी तथा भल्लाटके स्थानपर मूँग और ओदन तथा सोमके लिये घृत और खीर देना चाहिए। भगके लिये साठीके चावलका पिष्टक, अदितिके लिये पोलिक और दितिके लिये पूरीकी बलि देनी चाहिए। यह वास्तुके

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अध्याय १६५

श्लोक 19

विद्याद्द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां पूर्वनिर्मिताम् एवं सहस्रपर्यन्तं तदहर्ब्राह्ममुच्यते

vidyāddvādaśasāhasrīṃ yugākhyāṃ pūrvanirmitām evaṃ sahasraparyantaṃ tadaharbrāhmamucyate

हिन्दी अर्थ

बाहरी भागकी बलि है। यमको दूध और आपवत्सको दही देनेका विधान है। सावित्रीको लड्डू तथा मरीचके साथ कुशमिश्रित ओदन प्रदान करे। सविताको गुड- मिश्रित पूआ, जयको घृत और चन्दन तथा विवस्वान्को लाल-चन्दन और खीर दे। इन्द्रको घृतसमेत हरितालयुक्त ओदन, मित्रको घृतमिश्रित ओदन तथा रुद्रको घृत और खीर दे राजयक्ष्माको पके हुए तथा कच्चे फलका गूदा देना चाहिए। पृथ्वीधरको मांसखण्ड और कुम्हड़े दे। अर्यमाके लिये शक्कर और खीर, पञ्चगव्य, जौ, तिल, अक्षत तथा चरु दे। ब्रह्माके लिये विविध प्रकारके भक्ष्य

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अध्याय १६५

श्लोक 20

ततो ऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव जीविनाम् शरीरनिर्वृतिं दृष्ट्वा लोकसंहारबुद्धितः

tato 'hani gate tasmin sarveṣāmeva jīvinām śarīranirvṛtiṃ dṛṣṭvā lokasaṃhārabuddhitaḥ

हिन्दी अर्थ

और भोज्य पदार्थ देने चाहिए। इस प्रकार पूजित देवगण सर्वदा शान्ति प्रदान करते हैं । अन्य उपस्थित ब्राह्मणोंके लिये सुवर्णका तथा ब्रह्मास्थानीय ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करना चाहिए। अब राक्षसियोंके लिये जिस प्रकारकी बलि दी जानी चाहिए, उसे सुनिये। फलका गूदायुक्त ओदन, घृत, पद्मकेसर-इन्हें ईशानकोणकी ओर चरकी नामकी राक्षसीको निवेदित करना चाहिए। फलका गूदा-मिश्रित ओदन तथा हरिद्रायुक्त ओदन-

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अध्याय १६५

श्लोक 21

देवतानां च सर्वासां ब्रह्मादीनां महीपते दैत्यानां दानवानां च यक्षराक्षसपक्षिणाम्

devatānāṃ ca sarvāsāṃ brahmādīnāṃ mahīpate daityānāṃ dānavānāṃ ca yakṣarākṣasapakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

इन्हें अग्निकोणकी ओर विदारी नाम्नी राक्षसीके लिये निवेदित करना चाहिए। दही, ओदन, हड्डियोंके टुकड़े तथा पीले और लाल रंगकी बलि राक्षससहित पीतरक्तं बलिं दद्यात् पूतनायै सरक्षसे॥ २९ पूतना नामकी राक्षसीको नैऋहत्यकोणमें देनी चाहिएं। वायव्यां पापराक्षस्यै मत्स्यमांसं सुरासवम्। पायसं चापि दातव्यं स्वनाम्ना सर्वतः क्रमात्

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अध्याय १६५

श्लोक 22

गन्धर्वाणामप्सरसां भुजंगानां च पार्थिव पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव सत्तम तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां कृमिणां तथा

gandharvāṇāmapsarasāṃ bhujaṃgānāṃ ca pārthiva parvatānāṃ nadīnāṃ ca paśūnāṃ caiva sattama tiryagyonigatānāṃ ca sattvānāṃ kṛmiṇāṃ tathā

हिन्दी अर्थ

नमस्कारान्तयुक्तेन प्रणवाद्येन संयुतः। ततः सर्वौषधीस्नानं यजमानस्य कारयेत् एतद्वास्तूपशमनं कृत्वा कर्म समारभेत्

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अध्याय १६५

श्लोक 23

महाभूतपतिः पञ्च हृत्वा भूतानि भूतकृत् जगत्संहरणार्थाय कुरुते वैशसं महत्

mahābhūtapatiḥ pañca hṛtvā bhūtāni bhūtakṛt jagatsaṃharaṇārthāya kurute vaiśasaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

वायव्यकोणमें. पापा नामकीं राक्षसीके लिये खीर देना चाहिए। बलि देते समय क्रमशः सभी जगह आंदिमें प्रणव और अन्तमें नमस्कारसहित अपने नामका उच्चारण कर लेना चाहिए। तदनन्तर यजमानको सर्वौषधिसे युक्त जलसे स्नान कराना चाहिए यजमानको भक्तिपूर्वक अपने गृहपर आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार वास्तुकी शान्ति करनेके बाद गृहनिर्माण कार्य प्रारम्भ करना चाहिए। प्रासाद, भवन, उद्यानके प्रारम्भ करते समय

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अध्याय १६५

श्लोक 24

भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो भूत्वा वायुः प्राणिनां प्राणजालम् भूत्वा वह्निर्निर्दहन्सर्वलोकान् भूत्वा मेघो भूय उग्रो ऽप्यवर्षत्

bhūtvā sūryaścakṣuṣī cādadāno bhūtvā vāyuḥ prāṇināṃ prāṇajālam bhūtvā vahnirnirdahansarvalokān bhūtvā megho bhūya ugro 'pyavarṣat

हिन्दी अर्थ

अथवा उनके उद्यापनके समय तथा :पुर या गृहमें प्रवेश करते समय सभी दोषोंके विनाशार्थ रक्षोघ्न. और पावमान सूक्तोंके पाठ करानेके बाद नृत्य, माङ्गलिक गीत और वाद्योंके साथ ब्राह्मणोंद्वारा वेदपाठ कराना चाहिए। जो बुद्धिमान् पुरुष प्रतिवर्ष गृह अथवा मन्दिरके कार्यमें उपर्युक्त विधिका पालन करता है, वह दुःखका भागी नहीं होता। उसे न तो व्याधिका भय होता है, न उसके बन्धुजनो तथा सम्पत्तिका विनाश ही होता है, प्रत्युत वह

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 165
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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