Matsya Purana· Matsya Purāṇa
166
अध्याय 166 / 176

Adhyaya 166

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अध्याय १६६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १६६ भूत्वा नारायणो योगी सत्त्वमूर्तिर्विभावसुः गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान्

matsya-purāṇa 166 bhūtvā nārāyaṇo yogī sattvamūrtirvibhāvasuḥ gabhastibhiḥ pradīptābhiḥ saṃśoṣayati sāgarān

हिन्दी अर्थ

इस लोकमें सौ वर्षतक जीवित रहता है और स्वर्गमें एक कल्पपर्यन्त निवास करता है इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वास्तुदोषोपशमनं नामाष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुदोष-शमन नामक दो सौ अड्सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Matsya said: — Nfirfiyana, of Satva guna, in the form of the Su'n absorbs the ocean by His piercing rays. After drying up the ocean He also similarly dries up rivers, wells, tanks and the mountains by His ra 5 ''s. Then He penetrates the lower regions and dries up the moisture there and afterwards He dries up all the moisture produced by filth, secreta, saliva, etc., that exist in the bodies of all beings. Later on the liord in the form of the wind shivers everything and draws in all the airs such as Prnna, Apdna, Samana, etc. The Devas, and all the elements, are annihilated. — 1-6.

अध्याय १६६

श्लोक 2

ततः पीत्वार्णवान् सर्वान् नदीः कूपांश्च सर्वशः पर्वतानां च सलिलं सर्वमादाय रश्मिभिः

tataḥ pītvārṇavān sarvān nadīḥ kūpāṃśca sarvaśaḥ parvatānāṃ ca salilaṃ sarvamādāya raśmibhiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रासादोके भेद और उनके निर्माणकी विधि तस्य मध्ये चतुर्भिस्तु भागैर्गर्भ तु कारयेत्

English

The organ of smell, and the body become dissolved in earth. The organ of taste, and relish merge into water and the organ of vision, the power of seeing and forms dissolve into fire. The organ of touch, Frdna, and activities all mingle in air. Sound, the organ of hear- ing and sky dissolve in Akatfa. — 7-8.

अध्याय १६६

श्लोक 3

भित्त्वा गभस्तिभिश्चैव महीं गत्वा रसातलात् पातालजलमादाय पिबते रसमुत्तमम्

bhittvā gabhastibhiścaiva mahīṃ gatvā rasātalāt pātālajalamādāya pibate rasamuttamam

हिन्दी अर्थ

लिङ्कपूजाप्रमाणेन कर्तव्या पीठिका बुधैः। पिण्डिकार्धेन भागः स्यात् तन्मानेन तु भित्तयः बाह्यभित्तिप्रमाणेन उत्सेधस्तु भवेत् पुनः। भित्त्युच्छायात् तु द्विगुणः शिखरस्य समुच्छ्यः शिखरस्य चतुर्भागात् कर्तव्या च प्रदक्षिणा। प्रदक्षिणायास्तु समस्त्वग्रतो मण्डपो भवेत्

English

The Lord destroys the whole strncture of the universb in a mombnt when the minds, intellects and souls of all the beings get intp VinU. Afterwards by virtue of the blowing wind, the trees and branches rub against each other and a big fire crops up and coiisumes evsrythingt. This fire is named Baipvartaka fire. This fire reduces everything to' a'sfaes during that period of annihilation. It consumes all the mountains, ' trees, bowers, creepers, reeds, vimdnas, divine cities and all the resting pladbB. Visnu, after consuming all the universe, requencheS the fire with con- tinuous downpour, divine rain and ghee at thb end of the age. The land then becomes full of auspicious water sweet like milk. It spreads all over the landscape and no living creature exists. — 9-17.

अध्याय १६६

श्लोक 4

मूत्रासृक्क्लेदम् अन्यच्च यदस्ति प्राणिषु ध्रुवम् तत्सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः

mūtrāsṛkkledam anyacca yadasti prāṇiṣu dhruvam tatsarvamaravindākṣa ādatte puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य चार्धेन कर्तव्यस्त्वग्रतो मुखमण्डपः। प्रासादान्निर्गतौ कायौ कपोलौ गर्भमानतः सूतजी कहते हैं-ऋषिगणो ! इस प्रकार उपर्युक्त बलि प्रदान करनेके उपरान्त वास्तु (मन्दिर)-को सोलह भागोंमें विभक्त करे। फिर उसके मध्य भागके चार भागोंको केन्द्र मानकर मध्यभागकी ओर शेष बारह

English

Every being is destroyed, all the great essences merge in the body of Vi$ 9 tt'. Tha Suta, the Wind and the space becoming subtler disappear. The 'Whole universe exists in a very subtle state. At that time, Visnu drying up the oceans and the being therein by His lory reposes all by Himself. He sleeps ih that wide expanse of water for niUiiy thousands of yhgsS Whrtr nbae cttn corfryfAheiid the' Avyakta Viriit. — 18-21.

अध्याय १६६

श्लोक 5

वायुश्च बलवान्भूत्वा विधुन्वानो ऽखिलं जगत् प्राणापानसमानाद्यान् वायून् आकर्षते हरिः

vāyuśca balavānbhūtvā vidhunvāno 'khilaṃ jagat prāṇāpānasamānādyān vāyūn ākarṣate hariḥ

हिन्दी अर्थ

भागोंमें प्रासादकी कल्पना करे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चारों दिशाओंमें बाहर निकलनेका मार्ग भी जानना चाहिए। दीवालकी ऊँचाई वास्तुमानकी चौथाईके तुल्य होनी चाहिए और दीवालकी ऊँचाईके प्रमाणसे दूनी शिखरकी ऊँचाई होनी चाहिए। शिखरकी ऊँचाईके चौथाई मानसे प्रदक्षिणा बनानी चाहिए। मण्डपके अग्रभागका विस्तार गर्भके मानसे दूना होना चाहिए। इसकी लम्बाई तीन भागोंसे युक्त होगी, जो भद्रयुक्त और सुन्दर रहेगी। विद्वान् पुरुषको गर्भमानको पाँच भागोंमें विभक्तकर एक भागमें प्राग्ग्रीवकी कल्पना करनी चाहिए। गर्भसूत्रके समान आगे मुखमण्डपकी रचना करनी चाहिए। यह सामान्यतया सभी प्रासादोंका

English

TEE MATSTA PJJRAEAU.

अध्याय १६६

श्लोक 6

ततो देवगणाः सर्वे भूतान्येव च यानि तु गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिवीं संश्रिता गुणाः

tato devagaṇāḥ sarve bhūtānyeva ca yāni tu gandho ghrāṇaṃ śarīraṃ ca pṛthivīṃ saṃśritā guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

लक्षण बतलाया गया है। अब अन्य प्रासाद (शिवमन्दिर)- को रचनाकी विधि बतला रहा हूँ, जो लिङ्गमानके आधारपर निर्मित होता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको लिङ्ग- पूजाके लिये उपयोगी पीठिका तैयार करनी चाहिए। पिण्डिकाके अर्धभागको विभक्त कर उक्त अर्धांश- मानमें उसके दीवालकी रचना करनी चाहिए एवं बाहरी दीवालके प्रमाणके अनुसार उसकी ऊँचाई करनी चाहिए दीवालकी ऊँचाईसे दूनी शिखरकी ऊँचाई होनी

English

None can know at that time His manifested or unmanifested state; who is that Purnsottama? What yoga He resorts to? Why does He resort to yoga? What for and how long does He remain in that water and what shall He do in future? No one can fathom all these truths. He is not seer, nor goer, nor knower, nor remains with any body. He alone knows about His ownself or His desires. No one knows anything of Him. After thtis absorbing within His body, earth, water, fire, air, ether, the creator Brahmfi and the Great Munis, He goes to great sleep. — 22-24.

अध्याय १६६

श्लोक 7

जिह्वा रसश्च स्नेहश्च संश्रिताः सलिले गुणाः रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः

jihvā rasaśca snehaśca saṃśritāḥ salile guṇāḥ rūpaṃ cakṣurvipākaśca jyotirevāśritā guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए। शिखरके चतुर्थ भागसे प्रदक्षिणा बनानी चाहिए। प्रदक्षिणाके बराबर मानका ही आगेका मण्डप निर्मित करना चाहिए॥ १--१०॥ उसके आधे भागमें आगेकी ओर मुखमण्डप बनाना चाहिए। गर्भमानके अनुसार प्रासादसे बाहर निकले दो कपोलोंकी रचना करनी चाहिए। उसकी दीवालकी ऊँचाईके ऊपर मञ्जरीकी कल्पना मञ््याश्चार्धभागेन शुकनासां प्रकल्पयेत्॥ १२ करनी चाहिए। मंजरीके अर्धभागमें शुकनासाकी और

English

Here ends (he one hundred and sixty-sixth (diopter on the creation

अध्याय १६६

श्लोक 8

स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवने संश्रिता गुणाः शब्दः श्रोत्रं च खान्येव गगने संश्रिता गुणाः

sparśaḥ prāṇaśca ceṣṭā ca pavane saṃśritā guṇāḥ śabdaḥ śrotraṃ ca khānyeva gagane saṃśritā guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

ऊपरवाले आधे भागमें वेदीकी रचना करानी चाहिए । वेदीके ऊपर जो भाग शेष रह जाता है, वह कण्ठ और अमलसारक कहलाता है। इस प्रकार विभागकर बुद्धिमान्को मनोहर प्रासादकी रचना करनी चाहिए। द्विजवरो! अब अन्य प्रकारके प्रासादके लक्षणोंको बतला रहा हूँ, सुनिये। गर्भभानके अनुसार प्रासादको नौ भागोंमें विभक्तकर गर्भके मध्यमें लिङ्गपीठिका स्थापित करनी चाहिए और उसके अगल-बगलमें रुचिर पादाष्टककी

English

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अध्याय १६६

श्लोक 9

लोकमाया भगवता मुहूर्तेन विनाशिता मनो बुद्धिश्च सर्वेषां क्षेत्रज्ञश्चेति यः श्रुतः

lokamāyā bhagavatā muhūrtena vināśitā mano buddhiśca sarveṣāṃ kṣetrajñaśceti yaḥ śrutaḥ

हिन्दी अर्थ

रचना करनी चाहिए। उन्हींके मानके अनुसार दीवालका विस्तार करना चाहिए। उस पादको पाँचसे गुणा करनेपर जो गुणनफल हो, वही दीवालकी और उसकी दूनी शिखरकी ऊँचाई होती है। शिखरको चार भागोंमें विभक्तकर आधे दो भागोंमें शुकनासा बनानी चाहिए, तीसरे भागमें वेदिका मानी गयी है तथा चतुर्थभागमें कण्ठ और अमलसारकी रचना करनी चाहिए। इस प्रासादमें कपोलोंका मान दूना माना गया है। यह मनोहर पत्तियों, लताओं तथा अण्डकोंसे विभूषित तीसरे ढंगके प्रसादका वर्णन मैंने आपलोगोंको बतलाया है॥ ११--२०॥ द्विजश्रेष्ठो! अब अन्य साधारण प्रकारके प्रासाद (देवमन्दिरों)-का वर्णन सुनिये। जहाँ देवता स्थित होते

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अध्याय १६६

श्लोक 10

तं वरेण्यं परमेष्ठी हृषीकेशमुपाश्रितः ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारितः

taṃ vareṇyaṃ parameṣṭhī hṛṣīkeśamupāśritaḥ tato bhagavatastasya raśmibhiḥ parivāritaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं, उस क्षेत्रको तीन भागोंमें विभक्तकर उसी परिमाणमें बाहरको ओर निकला हुआ रथाङ्क बनाना चाहिए। चारों ओर चतुर्थ भागमें विस्तृत नेमी बनानी चाहिए। मध्य भागको उससे दूना करना चाहिए, वही उसका मान है और वही दीवालकी ऊँचाई है। शिखरकी ऊँचाई उससे दूनी मानी गयी है। उस प्रासादका प्राग्य्रीव पाँचवें भागमें होना चाहिए। यह उसका निष्कास कहा जाता है। उसे प्राकारके तीन भागमें

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अध्याय १६६

श्लोक 11

वायुनाक्रम्यमाणासु द्रुमशाखासु चाश्रितः तेषां संघर्षणोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन्

vāyunākramyamāṇāsu drumaśākhāsu cāśritaḥ teṣāṃ saṃgharṣaṇodbhūtaḥ pāvakaḥ śatadhā jvalan

हिन्दी अर्थ

छिद्रयुक्त बनाना चाहिए। प्राग्ग्रीवको पाँच भागोंमें विशेषतया निष्काससे बनाना चाहिए अथवा कर्णमूलसे पाँच भागोंमें प्राग्ग्रीवकी कल्पना करनी चाहिए! वहाँ द्वारमूलसे गर्भान्तमें कनककी स्थापना करनी चाहिए। इस प्रकार इसे ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ=इन तीन प्राकारोंवाला बनाना चाहिए । वे चाहे लिङ्गके परिः भेदसे हों या रूप-भेदसे हों। इन प्रासादोंके निर्माणक विधि मैंने संक्षेपमें बतला दीं, अब उनके नामे सुनियें। एवं विभज्य प्रासादं शोभनं कारयेद् बुधः। अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि प्रासादस्येह लक्षणम्

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अध्याय १६६

श्लोक 12

अदहच्च तदा सर्वं वृतः संवर्तको ऽनलः सपर्वतद्रुमान्गुल्मांल् लतावल्लीस्तृणानि च विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च यानि चाश्रयणीयानि तानि सर्वाणि सो ऽदहत्

adahacca tadā sarvaṃ vṛtaḥ saṃvartako 'nalaḥ saparvatadrumāngulmāṃl latāvallīstṛṇāni ca vimānāni ca divyāni purāṇi vividhāni ca yāni cāśrayaṇīyāni tāni sarvāṇi so 'dahat

हिन्दी अर्थ

विभज्य नवधा गर्भ मध्ये स्याल्लिङ्गपीठिका शुकनासं प्रकुर्वीत तृतीये वेदिका मता

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अध्याय १६६

श्लोक 13

भस्मीकृत्य ततः सर्वांल् लोकांल्लोकगुरुर्हरिः भूयो निर्वापयामास युगान्तेन च कर्मणा

bhasmīkṛtya tataḥ sarvāṃl lokāṃllokagururhariḥ bhūyo nirvāpayāmāsa yugāntena ca karmaṇā

हिन्दी अर्थ

त्रिभेदं कारयेत् क्षेत्रं यत्र तिष्ठन्ति देवताः स एव भित्तेरुत्सेधो द्विगुणः शिखरो मतः प्राग्ग्रीवः पञ्चभागेन निष्कासस्तस्य चोच्यते। कारयेत् सुषिरं तद्वत् प्राकारस्य त्रिभागतः

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अध्याय १६६

श्लोक 14

सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महाबलः दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम्

sahasravṛṣṭiḥ śatadhā bhūtvā kṛṣṇo mahābalaḥ divyatoyena haviṣā tarpayāmāsa medinīm

हिन्दी अर्थ

प्राग्ग्रीवं पञ्चभागेन निष्काषेण विशेषतः। कुर्याद् वा पञ्चभागेन प्राग्ग्रीवे कर्णमूलतः हंसो वृषः सुवर्णेशः पद्यको5थ समुद्गकः। प्रासादा नामतः प्रोक्ता विभागं शृणुत द्विजाः

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अध्याय १६६

श्लोक 15

ततः क्षीरनिकायेन स्वादुना परमाम्भसा शिवेन पुण्येन मही निर्वाणमगमत्परम्

tataḥ kṣīranikāyena svādunā paramāmbhasā śivena puṇyena mahī nirvāṇamagamatparam

हिन्दी अर्थ

और समुद्गक-ये प्रासादोंके नाम हैं। द्विजो! अब इनके विभागोंको सुनिये॥ २१--३०॥ सौ भृङ्ग तथा चार द्वारवाला, सोलह खण्डोंमें ऊँचा, अनेकों विचित्र शिखरोंसे युक्त प्रासाद 'मेरु' कहलाता है। इसी प्रकार “बारह खण्डोंवाला' मन्दर तथा नव खण्डोंवाला 'कैलास' कहा गया है। “विमान! और 'छन्दक' भी उन्हींकी भाँति अनेक शिखरों और मुखोंसे युक्त तथा आठ खण्डोंवाले होते हैं। सात खण्डोंबाला 'नन्दिवर्धन' होता है। जो विषाणकसे संयुक्त रहता है, उसे 'नन्दन' कहा जाता है। जो प्रासाद

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अध्याय १६६

श्लोक 16

तेन रोधेन संछन्ना पयसां वर्षतो धरा एकार्णवजलीभूता सर्वसत्त्वविवर्जिता

tena rodhena saṃchannā payasāṃ varṣato dharā ekārṇavajalībhūtā sarvasattvavivarjitā

हिन्दी अर्थ

सोलह पहलोंवाला, विविध रूपोंसे सुशोभित और अनेक शिखरोंसे संबलित होता है, उसे 'सर्वतोभत्र' कहते हैं । इसे चित्रशालासे संयुक्त तथा पाँच खण्डोंवाला जानना चाहिए। प्रासादके बलभी (बुर्ज) तथा छन्दकको भी उसी प्रकार अनेक शिखरों और मुखोंसे युक्त बनाना चाहिए। ऊँचाईमें वृषभके समान तथा मण्डलमें बिना पहलके सिंहप्रासादको सिंहकी आकृतिका तथा गजको गजके समान ही जानना चाहिए। कुम्भ आकृतिमें

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अध्याय १६६

श्लोक 17

महासत्त्वान्यपि विभुं प्रविष्टान्यमितौजसम् नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जगति संवृते

mahāsattvānyapi vibhuṃ praviṣṭānyamitaujasam naṣṭārkapavanākāśe sūkṣme jagati saṃvṛte

हिन्दी अर्थ

कुम्भकी भाँति और ऊँचाईमें नौ खण्डका हो। जिसकी स्थिति अंगुलीपुटकी भाँति हो, जो पाँच अण्डोंसे विभूषित और चारों ओरसे सोलह पहलवाला हो, उसे 'समुद्गक' जानना चाहिए। इसके दोनों पार्श्वॉमे चन्द्रशालाएँ हों और ऊँचाई दो खण्डोंसे युक्त हो। उसी प्रकारकी बनावट “पद्मक' की भी होनी चाहिए, केवल ऊँचाईमें यह तीन खण्डोंवाला हो। इसे विचित्र शिखरोंसे युक्त, शुभदायक और सोलह पहलोंवाला जानना चाहिए। 'मृगराज' प्रासाद वह है, जो चन्द्रशालासे विभूषित, प्राग्ग्रीवसे युक्त और छः खण्डों (मंजिलों)- तक ऊँचा हो। अनेक चन्द्रशालाओंसे युक्त प्रासाद “गज' कहलाता है

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अध्याय १६६

श्लोक 18

संशोषमात्मना कृत्वा समुद्रानपि देहिनः दग्ध्वा संप्लाव्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः

saṃśoṣamātmanā kṛtvā samudrānapi dehinaḥ dagdhvā saṃplāvya ca tathā svapityekaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

पञ्चाण्डको द्विभूमिश्च गर्भ हस्तचतुष्टयम् वृषो भवति नाम्नायं प्रासादः सार्वकामिकः । सप्तकाः पञ्जकाश्चैव प्रासादा वै मयोदिताः

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अध्याय १६६

श्लोक 19

पौराणं रूपमास्थाय स्वपित्यमितविक्रमः एकार्णवजलव्यापी योगी योगमुपाश्रितः

paurāṇaṃ rūpamāsthāya svapityamitavikramaḥ ekārṇavajalavyāpī yogī yogamupāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

सिंहास्येन समा ज्ञेया ये चान्ये तत्प्रमाणकाः। ऐष्टका दारवाश्चैव शैला वा स्युः सतोरणाः एते षोडशहस्ताः स्युश्चत्वारो देववल्लभाः। कैलासो मृगराजश्च विमानच्छन्दको मतः

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अध्याय १६६

श्लोक 20

अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवाम्भसि न चैनं कश्चिदव्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति

anekāni sahasrāṇi yugānyekārṇavāmbhasi na cainaṃ kaścidavyaktaṃ vyaktaṃ veditumarhati

हिन्दी अर्थ

गरुडोऽष्टकरो ज्ञेयो हंसो दश उदाहतः एवमेते प्रमाणेन कर्तव्याः शुभलक्षणाः। यक्षराक्षसनागानां मातृहस्तात् प्रशस्यते

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अध्याय १६६

श्लोक 21

कश्चैव पुरुषो नाम किंयोगः कश्च योगवान् असौ कियन्तं कालं च एकार्णवविधिं प्रभुः

kaścaiva puruṣo nāma kiṃyogaḥ kaśca yogavān asau kiyantaṃ kālaṃ ca ekārṇavavidhiṃ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

तथा मेर्वादयः सप्त ज्येष्ठलिङ्गे शुभावहाः। श्रीवृक्षकादयश्जाष्टरौ मध्यमस्य प्रकीर्तिताः वलभ्यच्छन्दके गौरी जटामुकुटधारिणी “गरुड़' नामक प्रासाद पीछेकी ओर बहुत फैला हुआ, तीन चन्द्रशालाओंसे विभूषित और सात खण्ड ऊँचा होता है। उसके बाहर चारों ओर छियासी खण्ड होते हैं। एक अन्य प्रकारका भी गरुड़ प्रासाद होता है,

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अध्याय १६६

श्लोक 22

करिष्यतीति भगवान् इति कश्चिन् न बुध्यते

kariṣyatīti bhagavān iti kaścin na budhyate

हिन्दी अर्थ

जो ऊँचाईमें दस खण्ड ऊँचा होता है। “पद्मक' सोलह पहलोंवाला तथा पूर्वकथित प्रासाद गरुड़से दो खण्ड अधिक ऊँचा होना चाहिए। पद्मके समान ही ' श्रीवृक्षक' प्रासादका परिमाण कहा जाता है । (प्रकोष्ठ) जिसमें पाँच अण्डक, दो खण्ड तथा मध्यभागमें चार हाथका विस्तार होता है, वह “वृष” नामक प्रासाद सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है। मैंने पाँच-सात प्रकारके प्रासादोंका वर्णन किया है। अतः अन्य प्रासादोंको, जिनका वर्णन

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अध्याय १६६

श्लोक 23

न द्रष्टा नैव गमिता न ज्ञाता नैव पार्श्वगः तस्य न ज्ञायते किंचित् तमृते देवसत्तमम्

na draṣṭā naiva gamitā na jñātā naiva pārśvagaḥ tasya na jñāyate kiṃcit tamṛte devasattamam

हिन्दी अर्थ

नहीं किया गया, सिंहास्यके प्रमाणानुसार ही जान लेना चाहिए। वे सभी चन्द्रशालाओंसे संयुक्त तथा प्राग्ग्रीवसे संवलित रहेंगे। इन्हें ईट, लकड़ी या पत्थरके तोरणसहित बनवाना चाहिए। 'मेरु' प्रासाद पचास हाथ, 'मन्द्र” उससे पाँच हाथ न्यून अर्थात् पैंतालीस हाथ, “कैलास' चालीस हाथ और विमान चाँतीस हाथका होता है। उसी प्रकार 'नन्दिवर्धन' बत्तीस हाथ तथा 'नन्दन' और 'सर्वतोभद्र' तीस हाथोंके कहे गये हैं। 'वर्तुल' और 'पद्मक' का परिमाण बीस हाथका कहा गया है। गज, सिंह, कुम्भ, वलभी तथा छन्दक--ये सोलह हाथके होते हैं। 'कैलास', “मृगराज', “विमान” और ' छन्दक'--ये बारह हाथके माने गये हैं। ये चारों देवताओंको अत्यन्त

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अध्याय १६६

श्लोक 24

नभः क्षितिं पवनम् अपः प्रकाशकं प्रजापतिं भुवनधरं सुरेश्वरम् पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं प्रशाम्य भूयः शयनं ह्यरोचयत्

nabhaḥ kṣitiṃ pavanam apaḥ prakāśakaṃ prajāpatiṃ bhuvanadharaṃ sureśvaram pitāmahaṃ śrutinilayaṃ mahāmuniṃ praśāmya bhūyaḥ śayanaṃ hyarocayat

हिन्दी अर्थ

“प्रासाद “गरुड? आठ हाथोंका तथा 'हंस” दस हाथोंका कहा गया है। इस प्रकार उपर्युक्त प्रमाणके अनुसार इन शुभ लक्षणसम्पन्न प्रासादोंकी रचना करनी चाहिए। यक्ष, राक्षस और नागोंके प्रासाद मातृहस्तके प्रमाणसे प्रशस्त माने गये हँ । मेरु आदिं सात प्रासाद ज्येष्ठ लिङ्गके लिये शुभदायक हैं। ' श्रीवृक्षक' आदि आठ मध्यम लिङ्गके लिये शुभदायक कहे गये हैं। इसी प्रकार हंस आदि पाँच कनिष्ठ लिङ्गके लिये शुभदायक माने

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 166
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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