Matsya Purana· Matsya Purāṇa
34
अध्याय 34 / 176

Adhyaya 34

31 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ३४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ३४ एवमुक्तः स राजर्षिः काव्यं स्मृत्वा महाव्रतम् संक्रामयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि

matsya-purāṇa 34 evamuktaḥ sa rājarṣiḥ kāvyaṃ smṛtvā mahāvratam saṃkrāmayāmāsa jarāṃ tadā putre mahātmani

हिन्दी अर्थ

हैं। पूर्वकालमें हैत्यराज हिरण्यकशिपुके त्रिलोकोका शासन करते समय देवासुर-संग्रामके अवसरपर भगवान् श्रीहरि अवतीर्ण हुए थे। इसी प्रकार क्रमशः जब बलि तीनों लोकोंपर अधिष्ठित था, उस समय असुरोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त व्याकुल हो उठा था। देवता और असुर-दोनों समानरूपसे उसकी आज्ञाके अधीन थे। अन्तमें (बलि-बन्धनके समय) बलिका विमर्दन करनेके लिये देवताओं और असुरोंके बीच अत्यन्त भयंकर एवं महान् विनाशकारी घोर संग्राम प्रारम्भ हो गया। तब भगवान् विष्णु धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये तथा देवताओं और असुरॉके प्रति दिये गये भृगुके शापके कारण पृथ्वीपर मानव-योनिमें उत्पन्न हुए

English

annaka said: — On hearing those words of the prince Purn, king Vay&ti, after juentally reciting the nauu' of Mukra, transferreil his old age to his son; and tlien king Yayati, the. son of Nuhn-n, cheorfully indulged iiirnself in tliC enjov'iient of pleasures. Jfe, lio\ve\er, did not do that at the sacrifice of his royal duti('.s; for, ace udiu to tite times, witli earnest- ness, and in conjiniction uiih the [)rcscrilj('d rules, lie performed the libations to the Deities, an<i the manes of tlie ancestors, was regular in the performance of fraddha and sacrifices, was merciful to the poor and satisfied ilie wishes of the Bralunanas, enimtained his guests by minis- tering to their comforts and supported the Vai»*yas by protecting them; was not cruel to the Sudras and kept thieves down by inflicting proper punishment on them. In that way, the king was alert in his duties and was thus supplied all tlie wants of his subj(!Cts, like the God ludra. That king, valiant like tlie lion, never deviating from the* path of virtue and continuing his pursuits of enjoyment, led a life of sublime comfort and happiness.— 1-7.

अध्याय ३४

श्लोक 2

पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः प्रीतियुक्तो नरश्रेष्ठश् चचार विषयान्प्रियान्

pauraveṇātha vayasā yayātirnahuṣātmajaḥ prītiyukto naraśreṣṭhaś cacāra viṣayānpriyān

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! उस समय भगवान् विष्णु कार्यमें कैसे प्रवृत्त हुए थे? तथा वह देवासुरसंग्राम जिस प्रकार हुआ था? वह सब हमलोगोंको बतलाइये

English

On getting satisfied, after enjoying himself for a thousand years, he recalled to his mind the bygone days; and, finding that his cherished days were complete, he spoke to his son, the prince Iuru: —

अध्याय ३४

श्लोक 3

यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् धर्माविरुद्धान्राजेन्द्रो यथार्हति स एव हि

yathākāmaṃ yathotsāhaṃ yathākālaṃ yathāsukham dharmāviruddhānrājendro yathārhati sa eva hi

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पूर्वकालमें वराह आदि बारह अत्यन्त भयंकर देवासुर-संग्राम भागप्रापिके निमित्त हुए थे। वायुपुराण ९७। ३ आदिमें मणिकर और मणिरथ पाठ है, सबका भाव 'मणिभद्र' से ही है। नामतस्तु समासेन शृणु तेषां विवक्षतः। प्रथमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामनः

English

**Sou! a man never feels satisfied with pleasures, the lust foi

अध्याय ३४

श्लोक 4

देवान् अतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैरपि पितामहान् दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान्

devān atarpayad yajñaiḥ śrāddhairapi pitāmahān dīnānanugrahairiṣṭaiḥ kāmaiśca dvijasattamān

हिन्दी अर्थ

देवासुरक्षयकराः प्रजानां तु हिताय वै। संग्रामः पञ्चमश्चैव संजातस्तारकामयः

English

CBAPTBB XXXIV.

अध्याय ३४

श्लोक 5

अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च प्रतिपालनैः आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्निग्रहणेन च

atithīnannapānaiśca viśaśca pratipālanaiḥ ānṛśaṃsyena śūdrāṃśca dasyūnnigrahaṇena ca

हिन्दी अर्थ

षष्ठो ह्याडीवकाख्यस्तु सप्तमस्त्रैपुरस्तथा । अन्धकाख्योऽष्टमस्तेषां नवमो वृत्रघातकः प्रथितो द्वादशस्तेषां घोरः कोलाहलस्तथा वामनेन बलिर्बद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा

English

pleasures waxes by daily indulgence, as the fire flames all the more by ghee being poured into it. 1 have become sober, on the consideration that the mundane boons in the form of grain, gold, domestic animals, (horses, cattle, etc.) women, are not meant for any single individual. Son! I have liad enough of pleasures according to my potency by acquiring your vigour of youth; I am consequently very much pleased with you, now you take back your bloom of youth from me and also receive charge of this vast realm. You are my dearest son.*' — 8-13.

अध्याय ३४

श्लोक 6

धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावद् अनुरञ्जयन् ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः

dharmeṇa ca prajāḥ sarvā yathāvad anurañjayan yayātiḥ pālayāmāsa sākṣādindra ivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

हिरण्याक्षो हतो द्वन्द्दे प्रतिघाते तु हैवतैः। दंष्ट्रया तु वराहेण समुद्रस्तु द्विधा कृतः इन्द्रेणैव तु विक्रम्य निहतस्तारकामये। अशक्नुवन् स देवानां सर्व सोढुं सहैवतम्

English

Saunaka: — After that, king Yayati turned old, and Puru became young again. — 14.

अध्याय ३४

श्लोक 7

स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम्

sa rājā siṃhavikrānto yuvā viṣayagocaraḥ avirodhena dharmasya cacāra sukhamuttamam

हिन्दी अर्थ

निहता दानवाः सर्वे त्रैलोक्ये त्र्यम्बकेण तु। असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चान्धकाहवे हता देवमनुष्ये स्वे पितृभिश्चैव सर्वशः। सम्पृक्तो दानवैर्वृत्रो घोरो हालाहले हतः तदा विष्णुसहायेन महेन्द्रेण निवर्तितः।

English

Then the king appointe<l a day for Puru being anointed and proclaimed king, when the Brahmanas and ofliers assembled, said; —

अध्याय ३४

श्लोक 8

स सम्प्राप्य शुभान्कामांस् तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः

sa samprāpya śubhānkāmāṃs tṛptaḥ khinnaśca pārthivaḥ kālaṃ varṣasahasrāntaṃ sasmāra manujādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

ये सभी युद्ध शण्डामर्कके पौरोहित्यकालमें घटित हुए बतलाये जाते हैं । मैं संक्षेपमें नामनिर्देशानुसार उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। प्रथम युद्ध नरसिंह ( नृसिंहावतार) में, दूसरा वामन, तीसरा वाराह (वराहावतार)-में और चौथा अमृत-मन्थनके अवसरपर हुआ था। पाँचवाँ तारकामय संग्राम घटित हुआ था। इसी प्रकार छठा युद्ध आडीवक,

English

" King! how do you confer this vast kingdom on Puru, overlook- ing prince Yadu, who is the grandson of tJiikia arnl the eldest son from the queen DevayAid! Yadu is your eldest son, next to him is I'urvaKii, your third" son is Uruliya from the Queen Sarinistha, younger to him is Anil, whilst Puru is tlie youngest of all. How then are you making Puru a king, overlooking the claims of his elder brothers? 0 king! you should not forsake justice." — lo-l8.

अध्याय ३४

श्लोक 9

परिचिन्त्य स कालज्ञः कलाकाष्ठाश्च वीर्यवान् पूर्णम् मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह

paricintya sa kālajñaḥ kalākāṣṭhāśca vīryavān pūrṇam matvā tataḥ kālaṃ pūruṃ putramuvāca ha

हिन्दी अर्थ

बारहवाँ भयंकर संग्राम कोलाहलके नामसे विख्यात है। (इन संग्रामोंमें) भगवान् विष्णुने हैत्यराज हिरण्यकशिपुको नृसिंह-रूप धारण करके मार डाला था। पूर्वकालमें त्रिलोकीको नापते समय भगवानूने वामन-रूपसे बलिको बाँध लिया था। देवताओंके साथ भगवानूने वराहका रूप धारण करके द्वन्द्-युद्धमें अपनी दाढ़ोंसे हिरण्याक्षको विदीर्ण कर मार डाला था और समुद्रको दो भागोंमें विभक्त कर दिया था। अमृत-मन्थनके अवसरपर घटित हुए युद्धमें इन््रने प्रह्मादको पराजित किया था । उससे अपमानित होकर प्रह्णाद-पुत्र विरोचन नित्य इन्द्रका वध करनेकी ताकमें लगा रहता था । वह पृथक्-पृथक् देवोंको तथा पूरे देवसमाजको सहन नहीं कर पाता था, किंतु इन्द्रने तारकामय युद्धमें

English

Yayati: — Brnhmanas and otJiers! Hearken. My eldest son did not obey my commands. I therefore do not give him the empire; for a disobedient son ought not to be recognised. This is what the great men have said; and Turvasu, Driihya and Anu also disobeyed me. Puru stood firm and obeyed my behests; therefore, he alone is entitled to my monarchy. It is he who exchanged his full flourish of youth with my infirmity, and it is through him that 1 have fulfilkd all luy desires. 'I'he sage Sukra ha<l also blessed that one who would cairy out my orders would be the Emperor. For these reasons, you should all consider Puru to be fit for the Empire." — VJ-25.

अध्याय ३४

श्लोक 10

न जातु कामः कामानाम् उपभोगेन शाम्यति हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते

na jātu kāmaḥ kāmānām upabhogena śāmyati haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

हिन्दी अर्थ

पराक्रम प्रकट करके उसे यमलोकका पथिक बना दिया। त्रिलोकीमें जितने दानव, असुर और पिशाच थे, वे सभी शंकरजीद्वारा अन्धक नामक युद्धमें मौतके घाट उतारे गये। उस युद्धमें देवता, मनुष्य और पितृगण भी सब ओरसे सहायक-रूपमें उपस्थित थे। दानवॉंसे घिरा हुआ भयंकर वृत्रासुर हालाहल-युद्धमें मारा गया था। तत्पश्चात् इन्द्रने विष्णुकी सहायतासे विप्रचित्तिको युद्धसे विमुख कर दिया, परंतु योगका ज्ञाता विप्रचित्ति अपनेको मायासे छिपाकर

English

Then the Commons (Prakfiti) all assembled there cried out in a chorus: ** Indeed, the son, endowed with all the good qualities and who obeys the mandates of his parents, deserves being proclaimed a sovereign, in spite of his iieing the youngest. 0 king! Puru, who has done you a good turn, appropriately deserves the kingdom and the sage isukra has also said so: ihorefore nothing need now be said about this." — 26-27.

अध्याय ३४

श्लोक 11

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः नालमेकस्य तत्सर्वम् इति मत्वा शमं व्रजेत्

yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ nālamekasya tatsarvam iti matvā śamaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

ध्वजरूपमें परिणत कर दिया, फिर भी इन्द्रने ध्वजमें छिपे होनेपर भी अनुज-समेत उसका सफाया कर दिया। इस प्रकार देवोंकी सहायतासे इन्द्रने कोलाहल नामक युद्धमें संगठित होकर आये हुए सभी पराक्रमी दानवों और हैत्योंको पराजित किया था। (ऐसा प्रतीत होता है कि युद्धके उपरान्त देवताओंने किसी यज्ञका अनुष्ठान किया ध्वजलक्षणमाविश्य विप्रचित्तिः सहानुजः॥ ५२ था, उस) यज्ञकी समाप्तिके अवसरपर अवभृथ-स्रानके

English

Saunaka- — Wlien the assemblage pronounced that verdict, the king seated the prince Puru on the throne, after which he quitted the metro- polis and went to the forest in company of many Brahmanas and ascetics. —

अध्याय ३४

श्लोक 12

यथासुखं यथोत्साहं यथाकाममरिंदम सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव

yathāsukhaṃ yathotsāhaṃ yathākāmamariṃdama sevitā viṣayāḥ putra yauvanena mayā tava

हिन्दी अर्थ

इसके ९ से ११ वीं संख्यातकके निर्दिष्ट संग्राम वृत्र-इन्द्र-विष्णु-युद्धसे ही सम्बद्ध दीखते हैं। हैत्यांश्च दानवांश्चैव संयतान् किल संयुतान्। जयन् कोलाहले सर्वान् देवैः परिवृतो वृषा

English

THE MAT87A PVnANAii.

अध्याय ३४

श्लोक 13

पूरो प्रीतो ऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम् राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रियकृत्सुतः

pūro prīto 'smi bhadraṃ te gṛhāṇedaṃ svayauvanam rājyaṃ caiva gṛhāṇedaṃ tvaṃ hi me priyakṛtsutaḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञस्यावभृथे दृश्यौ शण्डामकौ तु हैवतैः। एते देवासुरे वृत्ताः संग्रामा द्वादशैव तु हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ द्विसप्तति तथान्यानि नियुतान्यधिकानि च। अशीतिं च सहस्त्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यतां गत:

English

Yadu begot Y&davas, Turvaau begot Yavanas, Drabya begot Bhojaa and Au became the father of the MIechchhas. — 30.

अध्याय ३४

श्लोक 14

प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा यौवनं प्रतिपेदे स पूरुः स्वं पुनरात्मनः

pratipede jarāṃ rājā yayātirnāhuṣastadā yauvanaṃ pratipede sa pūruḥ svaṃ punarātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

पर्यायेण तु राजाभूद् बलिर्वर्घायुतं पुनः। षष्टिवर्षसहस्त्राणि नियुतानि च विंशतिः बले राज्याधिकारस्तु यावत्कालं बभूव ह। तावत्कालं तु प्रह्लादो निवृत्तो ह्यसुरैः सह

English

Para became the founder of the Paarara dynasty in wiiich you are born a king, which afterwards came to be known as the Kuru clan and in which the kingdom is to last for one-thousand years. — 31.

अध्याय ३४

श्लोक 15

अभिषेक्तुकामं च नृपं पूरुं पुत्रं कनीयसम् ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन्

abhiṣektukāmaṃ ca nṛpaṃ pūruṃ putraṃ kanīyasam brāhmaṇapramukhā varṇā idaṃ vacanamabruvan

हिन्दी अर्थ

हैत्यसंस्थमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेन्द्रेणानृपाल्यते। असपल्रमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः प्रह्मादस्य हते तस्िस्त्रैलोक्ये कालपर्ययात्। पर्यायेण तु सम्प्रा्े त्रैलोक्यं पाकशासने। ततोऽसुरान् परित्यज्य शुक्रो देवानगच्छत

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 16

कथं शुक्रस्य दौहित्रं देवयान्याः सुतं प्रभो ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रदास्यसि

kathaṃ śukrasya dauhitraṃ devayānyāḥ sutaṃ prabho jyeṣṭhaṃ yadumatikramya rājyaṃ pūroḥ pradāsyasi

हिन्दी अर्थ

यज्ञे देवानथ गतान् दितिजाः काव्यमाह्नयन्। किं त्वं नो मिषतां राज्यं त्यक्त्वा यज्ञं पुनर्गतः एवमुक्तोऽब्रवीद् हैत्यान् विषण्णान् सान्त्वयन् गिरा

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 17

ज्येष्ठो यदुस्तव सुतस् तुर्वसुस्तदनन्तरम् शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस् तथानुः पूरुरेव च

jyeṣṭho yadustava sutas turvasustadanantaram śarmiṣṭhāyāḥ suto druhyus tathānuḥ pūrureva ca

हिन्दी अर्थ

समय शण्ड और अमर्क नामक दोनों हैत्यपुरोहित देवताओंके दृष्टिगोचर हुए थे। इस प्रकार ये बारह युद्ध देवताओं और असुरोंके बीच घटित हुए थे, जो देवताओं और असुरोंके विनाशक और प्रजाओंके लिये हितकारी थे॥ ४१--५४॥ पूर्वकालमें राजा हिरण्यकशिपु एक अरब सात करोड़ बीस लाख अस्सी हजार वर्षोतक त्रिलोकीके ऐश्वर्यका उपभोग करता हुआ (सिंहासनपर) विराजमान था। तदनन्तर पर्यायक्रमसे बलि राजा हुए। इनका शासनकाल दो करोड़ सत्तर हजार वर्षोतक था। जितने समयतक बलिका शासनकाल था, उतने कालतक प्रहाद अपने अनुयायी असुरोंके साथ निवृत्तिमार्गपर अवलम्बित रहे। इन महान् ओजस्वी तीनों हैत्योंको

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 18

कथं ज्येष्ठमतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति एतत्संबोधयामस्त्वां स्वधर्ममनुपालय

kathaṃ jyeṣṭhamatikramya kanīyān rājyamarhati etatsaṃbodhayāmastvāṃ svadharmamanupālaya

हिन्दी अर्थ

असुरोंका इन्द्र (अध्यक्ष) जानना चाहिए। इस प्रकार दस युगपर्यन्त यह सारा विश्व हैत्योंके अधीन था। पुनः कालक्रमानुसार गत युद्धमें प्रह्लादके मारे जानेपर पर्याय- क्रमसे त्रिलोकीका राज्य इन्द्रके हाथोंमें आ गया। उस समय दस युगतक यह बिश्व शत्रुहीन था, तब इन्द्र निश्चिन्ततापूर्वक त्रिलोकीका पालन कर रहे थे। उसी समय शुक्राचार्य असुरोंका परित्याग कर एक देवयज्ञमें चले आये। इस प्रकार यज्ञके अवसरपर शुक्राचार्यको

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 19

ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः ज्येष्ठं प्रति यतो राज्यं न देयं मे कथंचन

brāhmaṇapramukhā varṇāḥ sarve śṛṇvantu me vacaḥ jyeṣṭhaṃ prati yato rājyaṃ na deyaṃ me kathaṃcana

हिन्दी अर्थ

उपालम्भ देते हुए कहा--' गुरुदेव! आप हमलोगोंके देखते-देखते हमारे राज्यको छोड़कर देवताओंके यञ्ञमें क्यों चले गये? अब हमलोग यहाँ किसी प्रकार ठहर नहीं सकते, अतः रसातलमें प्रवेश कर जायंगे।' हैत्योंके इस प्रकार गिड्गिड़ानेपर शुक्राचार्य उन दु:खी हैत्योंको मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बोले- ' असुरो! तुमलोग डरो मत, में अपने तेजोबलसे पुनः तुमलोगोंको धारण करूँगा अर्थात् अपनाऊँगा; क्योंकि त्रिलोकीमें जितने मन्त्र, ओषधि, रस और धन- सम्पत्ति हैं, वे सब-के-सब मेरे पास हैं। इनका चतुर्थांश ही देवोंके अधिकारमें है। मैं वह सारा-का- सारा तुमलोगोंको प्रदान कर दूँगा; क्योंकि तुम्हीं लोगोंके

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 20

मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः

mama jyeṣṭhena yadunā niyogo nānupālitaḥ pratikūlaḥ pituryaśca na sa putraḥ satāṃ mataḥ

हिन्दी अर्थ

लिये ही मैंने उन्हें धारण कर रखा है' महाभारत उद्योगपर्व तथा भीष्मपर्व ६। २२-२३ में भी शुक्रको ही धन-रत्रोंका अधिकारी कहा गया है।

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 21

मातापित्रोर्वचनकृद् धितः पथ्यश्च यः सुतः स पुत्रः पुत्रवद्यश्च वर्तते पितृमातृषु

mātāpitrorvacanakṛd dhitaḥ pathyaśca yaḥ sutaḥ sa putraḥ putravadyaśca vartate pitṛmātṛṣu

हिन्दी अर्थ

ततो देवास्तु तान् दृष्टा वृतान् काव्येन धीमता। सम्मन्त्रयन्ति देवा वै संविज्ञास्तु जिघृक्षया काव्यो होष इदं सर्व व्यावर्तयति नो बलात्। साधु गच्छामहे तूर्ण यावन्नाध्यापयिष्यति ततो देवास्तु संरब्धा दानवानृपसृत्य ह

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 22

यदुनाहमवज्ञातस् तथा तुर्वसुनापि वा द्रुह्युणा चानुना चैवम् अप्यवज्ञा कृता भृशम्

yadunāhamavajñātas tathā turvasunāpi vā druhyuṇā cānunā caivam apyavajñā kṛtā bhṛśam

हिन्दी अर्थ

ततस्ते वध्यमानास्तु काव्यमेवाभिदुद्रुवुः । ततः काव्यस्तु तान् दृष्टा तूर्णं देवैरभिद्रुतान् रक्षां काव्येन संहत्य देवास्तेऽप्यसुरार्दिताः। काव्यं दृष्टा स्थितं देवा निःशङ्कमसुरा जहुः

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 23

पूरुणा मे कृतं वाक्यं मानितं च विशेषतः कनीयान्मम दायादो जरा येन धृता मम

pūruṇā me kṛtaṃ vākyaṃ mānitaṃ ca viśeṣataḥ kanīyānmama dāyādo jarā yena dhṛtā mama

हिन्दी अर्थ

ततः काव्योऽनुचिन्त्याथ ब्राह्मणो वचनं हितम्। तानुवाच ततः काव्यः पूर्वं वृत्तमनुस्मरन् त्रैलोक्यं वो हृतं सर्वं वामनेन त्रिभिः क्रमैः। बलिर्वद्धो हतो जम्भो निहतश्च विरोचनः नीतयो वोऽभिधास्यामि तिष्ठध्वं कालपर्ययात्

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 24

मम कामः स च कृतः पूरुणा पुत्ररूपिणा शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम्

mama kāmaḥ sa ca kṛtaḥ pūruṇā putrarūpiṇā śukreṇa ca varo dattaḥ kāvyenośanasā svayam

हिन्दी अर्थ

यास्याम्यहं महादेवं मन्त्रार्थं विजयावहम्। अप्रतीपांस्ततो मन्त्रान् देवात् प्राप्य महेश्वरात्। युध्यामहे पुनर्देवांस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम् ततस्ते कृतसंवादा देवानूचुस्तदासुराः। न्यस्तशस्त्रा बयं सर्वे निःसंनाहा रथैर्विना

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 25

पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः भवन्तः प्रतिजानन्तु पूरू राज्ये ऽभिषिच्यताम्

putro yastvānuvarteta sa rājā pṛthivīpatiḥ bhavantaḥ pratijānantu pūrū rājye 'bhiṣicyatām

हिन्दी अर्थ

ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते। न्यस्तशस्त्रेषु हैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः तदनन्तर जब देवताओंने देखा कि बुद्धिमान् शुक्राचार्यने पुनः असुरोंका पक्ष ग्रहण कर लिया है, तब विचारशील देवगण समग्र राज्य ग्रहण करनेके विषयमें मन्त्रणा करते हुए कहने लगे--' भाइयो ! ये शुक्राचार्य हमलोगोंके सभी कार्योंको बलपूर्वक उलट-पलर देंगे, अत: ठीक तो यही होगा कि जबतक ये उन असुरोंको सिखा-पढ़ाकर बली नहीं बना देते, उसके पूर्व ही हमलोग यहाँसे शीघ्र चलें और उन्हें बलपूर्वक मार डालें तथा बचे हुए लोगोंको

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 26

यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा सर्वं सो ऽर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः

yaḥ putro guṇasampanno mātāpitrorhitaḥ sadā sarvaṃ so 'rhati kalyāṇaṃ kanīyānapi sa prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

पातालमें भाग जानेके लिये विवश कर दें।' ऐसा परामर्श करके देवगण दानवोंके निकट जाकर उनपर टूट पड़े। इस प्रकार अपना संहार होते देखकर असुरगण शुक्राचार्यकी शरणमें भाग चले । तब शुक्राचार्यने असुरोंको देवताओंद्वारा खदेड़ा गया देखकर तुरंत ही उनकी रक्षाका विधान किया। इससे उलटे देवता ही असुरोंद्वारा पीड़ित किये जाने लगे। तब देवगण वहाँ शुक्राचार्यको निःशङ्क भावसे स्थित देखकर असुरोंके सामनेसे हट गये । तदनन्तर ब्राह्मण

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 27

अर्हं पूरोरिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत् तव वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्

arhaṃ pūroridaṃ rājyaṃ yaḥ priyaḥ priyakṛt tava varadānena śukrasya na śakyaṃ vaktumuttaram

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्य पूर्वमें घटित हुए वृत्तान्तका स्मरण करते हुए बहुत सोच-विचारकर असुरोंसे हितकारक वचन बोले ' असुरो ! वामनद्वारा अपने तीन पगोंसे (बलिद्वारा शासित) सम्पूर्ण त्रिलोकीका राज्य छीन लिया गया, बलि बाँध लिया गया, जम्भासुरका वध हुआ और विरोचनका भी निधन हुआ। इस प्रकार बारहों युद्धोंमें तुमलोगोंमें जो प्रधान- प्रधान महाबली असुर थे, वे सभी देवताओंद्वारा तरह- तरहके उपायोंका आश्रय लेकर मार डाले गये। अब थोड़ा- बहुत तुमलोग शेष रह गये हो, अत: मेरा विचार है कि अभी तुमलोग युद्ध बंद कर दो और कालके विपर्ययको देखते हुए चुपचाप शान्त हो जाओ। पीछे मैं तुमलोगोंको नीति बतलाउँगा । मैं आज ही विजय प्रदान करनेवाले मन्त्रको

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 28

पौरजानपदैस् तुष्टैर् इत्युक्तो नाहुषस्तदा अभिषिच्य ततः पूरुं राज्ये स्वसुतमात्मजम्

paurajānapadais tuṣṭair ityukto nāhuṣastadā abhiṣicya tataḥ pūruṃ rājye svasutamātmajam

हिन्दी अर्थ

प्राप्तिक लिये महादेवजीके पास जा रहा हूँ । जब मैं देवाधिदेव महेश्वरसे उन अमोघ मन्त्रोंको प्राप्त करके लौटूँ, तब पुनः मेरे सहयोगसे तुमलोग देवताओंके साथ युद्ध करना, उस समय तुम्हें विजय प्राप्त होगी '-- इस प्रकार परस्पर युद्धविषयक परामर्श करके उन असुरोंने देवताओंके पास जाकर कहा--'देवगण! इस समय हम सभी लोगोंने अपने श्त्रास्त्रोंको रख दिया है, कवचोंको उतार दिया है और रथोंको छोड़ दिया है।

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 29

दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः पुरात्स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह

dattvā ca pūrave rājyaṃ vanavāsāya dīkṣitaḥ purātsa niryayau rājā brāhmaṇaistāpasaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

अब हमलोग वल्कल-वस्त्र धारण करके वनमें छिपकर तपस्या करेंगे।' सत्यवादी प्रह्लादके उस सत्य वचनको सुनकर तथा हैत्योंके शस्त्रास्त्र रख देनेपर देवतालोग प्रसन्न हो गये। उनकी चिन्ता नष्ट हो गयी और वे युद्धसे विरत 'ततस्तानब्रवीत् काव्यः कञ्चित्कालमुपास्यथ। निरुत्सिक्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम् तत्संदिश्यासुरान् काव्यो महादेवं प्रपद्यत

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 30

यदोस्तु यादवा जातास् तुर्वसोर्यवनाः सुताः द्रुह्योश्चैव सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः

yadostu yādavā jātās turvasoryavanāḥ sutāḥ druhyoścaiva sutā bhojā anostu mlecchajātayaḥ

हिन्दी अर्थ

पराभवाय देवानामसुराणां जयाय च एवमुक्तोऽब्रवीद् देवो व्रतं त्वं चर भार्गव।

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

अध्याय ३४

श्लोक 31

पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातो ऽसि पार्थिव इदं वर्षसहस्रात्तु राज्यं कुरुकुलागतम्

pūrostu pauravo vaṃśo yatra jāto 'si pārthiva idaṃ varṣasahasrāttu rājyaṃ kurukulāgatam

हिन्दी अर्थ

तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनन्दनः। पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीद् वचः। व्रतं चराम्यहं देव त्वयाऽऽदिष्टोऽद्य वै प्रभो ततोऽनुसृष्टो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकृत्। अस्मिश्छिद्रे तदामर्षाद् देवास्तान् समुपाद्रवन्

English

Here ends the thirty-four chapter of the Pur&na dealing with iJie coronation of Puru.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 34
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.