Matsya Purana· Matsya Purāṇa
44
अध्याय 44 / 176

Adhyaya 44

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अध्याय ४४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ४४ किमर्थं तद्वनं दग्धम् आपवस्य महात्मनः कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत प्रब्रूहि तत्त्वतः

matsya-purāṇa 44 kimarthaṃ tadvanaṃ dagdham āpavasya mahātmanaḥ kārtavīryeṇa vikramya sūta prabrūhi tattvataḥ

हिन्दी अर्थ

अमित तेजस्वी पुत्रोंकी संख्या एक सौ थी। वे सभी राजा थे और नीप नामसे ही विख्यात थे। काव्यसे समर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो उन नीपवंशियोंका वंशप्रवर्तक, लक्ष्मीसे युक्त और कीर्तिवर्धक था। वह समरके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था। समरके पार, सम्पार और सदश्च-ये तीन पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न तथा भूतलपर विख्यात थे। पारका पुत्र पृथु हुआ और पृथुसे सुकृतकी उत्पत्ति हुई। विशेष द्रष्टव्य-ऋवेदसंहिता- ८।५५। ४, ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, भागवत १२। १। ४९ तथा पुनः मत्स्यपुराण १९१

English

The Risis said Sflta! Why did the thousand-armed King ESrta- vlrya, burn the forest of the Sage Apara? Please tell us fully the reason of his having done so. We have been given to understand that that royal sage was the protector of his subjects; how then did he bum the forest of that ascetic. — 1-2.

अध्याय ४४

श्लोक 2

रक्षिता स तु राजर्षिः प्रजानामिति नः श्रुतम् स कथं रक्षिता भूत्वा अदहत्तत्तपोवनम्

rakṣitā sa tu rājarṣiḥ prajānāmiti naḥ śrutam sa kathaṃ rakṣitā bhūtvā adahattattapovanam

हिन्दी अर्थ

अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपति: युगदत्त: सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशा: । विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा

English

Sdta answered. — Once upon a time, the Sun went to the king in the form of a Brkhmaiia, and said, ' 0 Lord of men, I am Aditya, grant me one satisfaction.' — 3.

अध्याय ४४

श्लोक 3

आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः तृप्तिमेकां प्रयच्छस्व आदित्यो ऽहं नरेश्वर

ādityo dvijarūpeṇa kārtavīryamupasthitaḥ tṛptimekāṃ prayacchasva ādityo 'haṃ nareśvara

हिन्दी अर्थ

विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह। शरणागतरक्षार्थ॑ तस्मादेवं शपामि वः अरे पापा दुराचारा भवितारोऽस्य किंकराः। तथेत्युक्तस्ततो राजा यमेन युयुधे चिरम्

English

The King said:—0 Lord, the Day-maker, what will satisfy you? What shall 1 offer you for your repast? Hearing which I shall make the arrangement for the same.— 4.

अध्याय ४४

श्लोक 4

भगवन्केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर कीदृशं भोजनं दद्मि हुत्वा तु विदधाम्यहम्

bhagavankena tṛptiste bhavatyeva divākara kīdṛśaṃ bhojanaṃ dadmi hutvā tu vidadhāmyaham

हिन्दी अर्थ

उससे सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न विभ्राज नामक पुत्र पैदा हुआ। बिभ्राजका पुत्र महायशस्वी एवं पराक्रमी अणुह हुआ, जो शुकदेवजीका जामाता एवं कृत्वीका पति था। अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त हुआ। उसका पुत्र युगदत्त और युगदत्तका पुत्र महायशस्वी विष्वकूसेन हुआ। अपने पुण्यकर्मोके फलस्वरूप राजा विभ्राजने ही पुनः विष्वक्सेनरूपसे जन्म धारण किया था विष्वक्सेनका पुत्र उदक्सेन हुआ। उसका पुत्र भल्लाट और उसका पुत्र जनमेजय (द्वितीय)

English

The Sun. — ' 0 the best giver amongst all persons! give me all stationary objects (trees, &c.) to feast upon, and that would satisfy me.' — 5.

अध्याय ४४

श्लोक 5

स्थावरं देहि मे सर्वम् आहारं ददतां वर तेन तृप्तो भवेयं वै सा मे तृप्तिर्हि पार्थिव

sthāvaraṃ dehi me sarvam āhāraṃ dadatāṃ vara tena tṛpto bhaveyaṃ vai sā me tṛptirhi pārthiva

हिन्दी अर्थ

हुआ। इसी जनमेजयको रक्षाके लिये उग्रायुधने सभी नीपवंशी नरेशोंको मौतके घाट उतारा था॥ ४६--५९ ॥ ऋषियोंने पूछा--सूतजी! उग्रायुध किसका पुत्र था ? वह किसके वंशमें उत्पन्न हुआ बतलाया जाता है? तथा किस कारण उसने समस्त नीपवंशी राजाओंका संहार किया था? (यह हमें बतलाइये) सूतजी कहते हैं-ऋषियो! उग्रायुध सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रममें जाकर स्थाणुकी

English

The King. — 0 God! I have not the power with all my energy or strength to cook the entire stable objects of the world as thy food, so I bow down to thee. — 6.

अध्याय ४४

श्लोक 6

न शक्याः स्थावराः सर्वे तेजसा च बलेन च निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ तेन त्वां प्रणमाम्यहम्

na śakyāḥ sthāvarāḥ sarve tejasā ca balena ca nirdagdhuṃ tapatāṃ śreṣṭha tena tvāṃ praṇamāmyaham

हिन्दी अर्थ

उसी समय (युद्धमें पराजित हुए) राजा जनमेजय उनके पास पहुँचे। (जनमेजयकी प्रार्थनापर) उन्हें राज्य दिलानेकी प्रतिज्ञा करके सामर्थ्यशाली उग्रायुधने नीपवंशियोंका संहार किया था। प्रथमतस्तु उग्रायुधने उन्हें अनेक प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेकी चेष्टा की, किंतु जब वे (इनकी बात न मानकर) इन्हीं दोनोंको मार डालनेके लिये उतारू हो गये, तब मारनेके लिये उद्यत हुए उनसे उग्रायुधने कहा--'जिस कारण तुमलोग मेरी बातको

English

The Sun. — " King! I am pleased with you, and I present you with the ezhaustlesB quiver of arrows that would have their effect in all directions. These arrows will be endowed with my potency, and the moment you discharge them on the trees they would be consumed. These arrows endowed with my potency will dry up the trees and reduce them to sshes afterwards, and thus I shall get satisfaction, 0 Lord of men." — 7-8,

अध्याय ४४

श्लोक 7

तुष्टस्ते ऽहं शरान्दद्मि अक्षयान्सर्वतोमुखान् ये प्रक्षिप्ता ज्वलिष्यन्ति मम तेजःसमन्विताः

tuṣṭaste 'haṃ śarāndadmi akṣayānsarvatomukhān ye prakṣiptā jvaliṣyanti mama tejaḥsamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

अनसुनी कर रहे हो, इसीलिये शरणागतकी रक्षाके हेतु मैं तुमलोगोंको इस प्रकारका शाप दे रहा हूँ कि यदि मैंने तपका अनुष्ठान किया है तो यमराज तुम सबको अपने यमराजद्वारा घसीटा जाता हुआ देखकर उग्रायुधके हृदयमें अतिशय दया उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने जनमेजयसे कहा-—' जनमेजय! तुम मेरे कहनेसे इन ले जाये गये हुए तथा ले जाये जाते हुए वीरोंकी रक्षा करो' जनमेजय बोले--अरे पापी एवं दुराचारी यमदूतो ! तुमलोग दण्डके भागी होओगे, अन्यथा उन्हें छोड़ दो। यमदूतोंद्वारा भी उसी प्रकारका उत्तर दिये जानेपर राजा जनमेजयने यमके साथ चिरकालतक युद्ध किया।

English

lil ¥hb haita pumau:

अध्याय ४४

श्लोक 8

आविष्टा मम तेजोभिः शोषयिष्यन्ति स्थावरान् शुष्कान् भस्मीकरिष्यन्ति तेन तृप्तिर्नराधिप

āviṣṭā mama tejobhiḥ śoṣayiṣyanti sthāvarān śuṣkān bhasmīkariṣyanti tena tṛptirnarādhipa

हिन्दी अर्थ

इसने भल्लाटनगर (सुलेमानपर्वतके पासका एक शहर) बसाया, जहाँका राजा शशिध्वज (कल्किपुराण, अ० २१-२२) प्रसिद्ध था। व्याधिभिर्नारकेर्घोरेयमेन सह तान् बलात्। विजित्य मुनये प्रादात् तदद्धुतमिवाभवत्

English

Sflta.— -Afterwards, the Sun presented him with the arrows, and the kltAr burnt all the trees with them. He burnt up the villages, hermitages, the population of lierdsinen, big cities, forests of ascetics and orchards In that way, when he consumed the eastern direction it became treeless, grassless, and the land was destroyed along with the south, by that ten'i- ble heat.— 9-11.

अध्याय ४४

श्लोक 9

ततः शरांस्तदादित्यस् त्व् अर्जुनाय प्रयच्छत ततो ददाह सम्प्राप्तान् स्थावरान् सर्वमेव च

tataḥ śarāṃstadādityas tv arjunāya prayacchata tato dadāha samprāptān sthāvarān sarvameva ca

हिन्दी अर्थ

इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्रुते दूढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिव: । आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान् सार्वभौमेति विख्यातः पृथिव्यामेकराड् बभौ। तस्यान्ववाये महति महापौरवनन्दनः

English

The Sage Apara, who was practising penances standing in watei for ten thousand years, found on his return that his forest had been burni down by the king — at which hebceatnc enragfui and cursed him, as stated before. Now listen to the history of the glorious dynasty of King Krostu. -12-14.

अध्याय ४४

श्लोक 10

ग्रामांस्तथाश्रमांश्चैव घोषाणि नगराणि च तपोवनानि रम्याणि वनान्युपवनानि च

grāmāṃstathāśramāṃścaiva ghoṣāṇi nagarāṇi ca tapovanāni ramyāṇi vanānyupavanāni ca

हिन्दी अर्थ

महापौरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः। अथ रुक्मरथस्यासीत् सुपाश्रों नाम पार्थिव: सुमतेरपि धर्मात्मा राजा संनतिमानपि

English

It was in the family of tliis very King Krohtu lhal the God Vi§nu incarnated Himself as Krisna, wlio afterwards pronic-ied the Vriijin' clan, which 1 am going to relate to you in due order. Krostu begot Vrijinivana, and the latter became tlie fatlier of tlie powerful Svfdjr:, and Riisafigu was the son of Svali. — 15-1(3.

अध्याय ४४

श्लोक 11

एवं प्राचीमन्वदहत् ततः सर्वां स दक्षिणाम् निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर् हता घोरेण तेजसा

evaṃ prācīmanvadahat tataḥ sarvāṃ sa dakṣiṇām nirvṛkṣā nistṛṇā bhūmir hatā ghoreṇa tejasā

हिन्दी अर्थ

स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्ता नामेह सामगाः कार्तिरुग्रायुधोऽसौ वै महापौरववर्धनः। बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः अन्ततोगत्वा उन्होंने भयंकर नारकीय व्याधियोंके साथ उन सबको बलपूर्वक जीतकर यमराजसहित उन्हें उग्रायुध मुनिको समर्पित कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। इससे प्रसन्न हुए यमराजने राजा जनमेजयको मुक्तिका उत्तम

English

Sanimya was the son of Husangu and the father of C'liitra and Chitraratha."-17.

अध्याय ४४

श्लोक 12

एतस्मिन्नेव काले तु आपवो जलमास्थितः दश वर्षसहस्राणि तत्रास्ते स महानृषिः

etasminneva kāle tu āpavo jalamāsthitaḥ daśa varṣasahasrāṇi tatrāste sa mahānṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

ज्ञान प्रदान किया। तत्पश्चात् वे सभी यथोचित धर्मकार्य कर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गये। इन नरेशोंके जीवन-चरितको जान लेनेपर मनुष्य अपमृत्यु आदिका शिकार नहीं होता। उसे इस लोक और परलोकमें अक्षय सुखको प्राप्ति होती है॥ ६६--६९॥

English

SaiJavindu was the son of Chitraratha, who was vonownod for Ids charity, and became World Emperor 18.

अध्याय ४४

श्लोक 13

पूर्णे व्रते महातेजा उदतिष्ठंस्तपोधनः सो ऽपश्यदाश्रमं दग्धम् अर्जुनेन महामुनिः

pūrṇe vrate mahātejā udatiṣṭhaṃstapodhanaḥ so 'paśyadāśramaṃ dagdham arjunena mahāmuniḥ

हिन्दी अर्थ

धूमिनीके गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें विद्वान् यवीनरका जन्म हुआ। उसका पुत्र धृतिमान् हुआ और उसका पुत्र सत्यधृति कहा जाता है। सत्यधृतिका पुत्र प्रतापी दृढ़नेमि हुआ दृढ़नेमिका पुत्र सुधर्मा नामक भूपाल हुआ। सुधर्माका पुत्र प्रतापी सार्वभौम था, जो भूतलपर एकच्छत्र चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें सुशोभित हुआ उसके उस विशाल वंशमें एक महापौरव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा रुक्मरथ महापौरवके पुत्र कहे गये हें । रुक्मरथका पुत्र सुपार्थ नामका राजा हुआ। सुपार्श्वका पुत्र धर्मात्मा सुमति हुआ । सुमतिका पुत्र धर्मात्मा राजा संनतिमान् था । उस संनतिमानूका कृत नामक महान् प्रतापी पुत्र था, जो महात्मा हिरण्यनाभ कौसल्य (कौथुम )-का शिष्य हुआ।

English

Afterwards, the family of Sasiavindu became of worldwide fame. He begot one liundred sons who also 1)egot the same number of sons. - -19.

अध्याय ४४

श्लोक 14

क्रोधाच्छशाप राजर्षिं कीर्तितं वो यथा मया क्रोष्टोः शृणुत राजर्षेर् वंशमुत्तमपौरुषम्

krodhācchaśāpa rājarṣiṃ kīrtitaṃ vo yathā mayā kroṣṭoḥ śṛṇuta rājarṣer vaṃśamuttamapauruṣam

हिन्दी अर्थ

इसी राजाने सामवेदकी संहिताओंको चौबीस भागोंमें विभक्त किया, जो प्राच्यसामके नामसे प्रसिद्ध हुई तथा उन साम-संहिता ओंका गान करनेवाले कार्त नामसे कहे जाने लगे। ये उग्रायुध इसी कृतके पुत्र थे, जो पौरववंशकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाले थे। इन्होंने ही पराक्रम प्रकट करके पृथुकके पिता पाञ्चाल-नरेश जितेन्द्रिय महाराज नीलका वध किया था। उग्रायुधका पुत्र महायशस्वी क्षेम हुआ। क्षेमसे सुनीथका और सुनीथसे

English

Out of the hundred grandsons of rfaavindii, the following six were the most illustrious, clover, handsome, wealthy, powerful, and all having the title of Prithn, viz,,:--Priihn?rava. E|*ilhnya» j, IVithndbarma, Pp- thufijaya, Pfitliukirti and Prithumam'i Ont of them, the learned in PurSnas speak very Inghly of J'litliurfrava, who performed many sacrifices. He was the fatlier of Suyajna.— 20-22.

अध्याय ४४

श्लोक 15

यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः क्रोष्टोरेवाभवत्पुत्रो वृजिनीवान्महारथः

yasyānvavāye sambhūto viṣṇurvṛṣṇikulodvahaḥ kroṣṭorevābhavatputro vṛjinīvānmahārathaḥ

हिन्दी अर्थ

नृपञ्जयका जन्म हुआ। नृपञ्जयसे विरथकी उत्पत्ति हुई। ये सभी नरेश पौरवनामसे विख्यात हुए॥ ७०--७९ ॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे पौरववंशकीर्तनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पौरव-वंश-कीर्तन नामक उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Suyajna became the father of UrfaiiA, who was the protector of the world and the performer of one hundred asivamedha sacrifices. —-23.

अध्याय ४४

श्लोक 16

वृजिनीवतश्च पुत्रो ऽभूत् स्वाहो नाम महाबलः स्वाहपुत्रो ऽभवद् राजन् रुषङ्गुर् वदतां वरः

vṛjinīvataśca putro 'bhūt svāho nāma mahābalaḥ svāhaputro 'bhavad rājan ruṣaṅgur vadatāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

१. वायुपुराण ९९। १०० में यहाँ ' कौथुम ' पाठ है। सामवेदियोंकी कौथुमी संहिता प्रसिद्ध है। २. यहाँ सामवेद-संहिताके इतिहासकी एकसे चौबीस (तथा पुनः एक हजार शाखा होनेकी) बड़ी रहस्यात्मक बात कही गयी है। कार्त शाखाका उल्लेख सभी चरणव्यूहोंमें भी है । इसी प्रकार वायु ५९-६१ तथा ब्रह्माण्ड २। ३८-४१ में भी वेदोंका सच्चा एवं विस्तृत इतिहास है । २४ सामशाखाएँ चरणव्यूह आदिमे यों निर्दिष्ट हैं-१-वार्ततान्तरेय, २-राणायनीय, ३-शाट्यायनीय, ४-आसुरायणीय, ५-वासुरायणीय, ६-प्राचीनयोग, ७-प्राज्ल ऋग्, ८-साक्ष्यमुद्रल, ९-खल्वल, १०-महाखल्वल, ११-माङ्गल, १२-कोथुम, १३-गौतम, १४-जेमिनीय, १५-सुपर्ण, १६-बालखिल्य, १७-सांत्यमुग्र, १८-कालेय, १९-महाकालेय, २०-लाङ्गलायन, २१-शार्दूल, २२-तातायन,

English

Titiksu, the destroyer of enemies, was the son of Urfana and the father of Marutta, best of all royal sages. — 24

अध्याय ४४

श्लोक 17

स तु प्रसूतिमिच्छन् वै रुषङ्गुः सौम्यमात्मजम् चित्रश्चित्ररथश्चास्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः

sa tu prasūtimicchan vai ruṣaṅguḥ saumyamātmajam citraścitrarathaścāsya putraḥ karmabhiranvitaḥ

हिन्दी अर्थ

पूरुबंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास मुद्रलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा। जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः पञ्चालरक्षिणो होते देशानामिति नः श्रुतम्

English

Marutta begot Kainbalbarhisa, tlie father of the learned Rukma- kavacha, who also conquered his enemies and performed arfvamedha sacri- fices and gave many presents to the Brahmanas, when out of the sacrificial fire emerged five valiant sons, armed with bows and arrows. They were: — Rukmesu, Pfithuriikma, JyAmagha, Parigha, Hari.— 2.5-28.

अध्याय ४४

श्लोक 18

अथ चैत्ररथिवीरो जज्ञे विपुलदक्षिणः शशबिन्दुरिति ख्यातश् चक्रवर्ती बभूव ह

atha caitrarathivīro jajñe vipuladakṣiṇaḥ śaśabinduriti khyātaś cakravartī babhūva ha

हिन्दी अर्थ

एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्रलाः मुद्रलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहायशाः । इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः

English

BikP1:BR XLlf.

अध्याय ४४

श्लोक 19

अत्रानुवंशश्लोको ऽयं गीतस् तस्मिन्पुराभवत् शशबिन्दोस्तु पुत्राणां शतानाम् अभवच्छतम्

atrānuvaṃśaśloko 'yaṃ gītas tasminpurābhavat śaśabindostu putrāṇāṃ śatānām abhavacchatam

हिन्दी अर्थ

विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः । दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अजमीढकी नीलिनी नामको पल्लीके गर्भसे राजा जन्म हुआ। नीलकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप सुशान्तिको उत्पत्ति हुई। सुशान्तिसे पुरुजानुका और पुरुजानुसे पृथुका जन्म हुआ। पृथुका पुत्र भद्राश्च हुआ। अब भद्राश्चके पुत्रोंके विषयमें सुनिये-मुद्रल, जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी जवीनर और पाँचवाँ कपिल-ये पाँचों भद्राश्चके पुत्र थे। इन पाँचोंके द्वारा शासित जनपद पञ्चाल नामसे प्रसिद्ध हुए।

English

Parigha and Hari were given to rule the Videha country by their father, while Rukmeftu aucceeded to the throne [of his father] and was a ruler of a protectorate under him. — 20.

अध्याय ४४

श्लोक 20

धीमतां चाभिरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम् तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्वा महाबलाः

dhīmatāṃ cābhirūpāṇāṃ bhūridraviṇatejasām teṣāṃ śatapradhānānāṃ pṛthusāhvā mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

ये सभी पञ्चाल देशोंके रक्षक थे-एऐसा हमलोगोंने सुना है। मुद्रलके पुत्रगण, जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विजाति थे, मौदल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। ये कण्व और मुद्रलके गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले द्विजाति अङ्गिराके पक्षमें सम्मिलित हो गये। महायशस्वी ब्रह्यष्ठने मुद्रलके पुत्ररूपमें जन्म लिया। उसका पुत्र इन्द्रसेन और उसका पुत्र विन्ध्याश्व हुआ। विन्ध्याश्वके संयोगसे मेनकाके गर्भसे जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी--ऐसा सुना जाता है। उनमें एक

English

Jy&magha was tii ned out by his other brothers, and in disgust he took to SannyAsa, and was taught by a BrAhmana, and so became of serene mind and again entered the order of house-holders. — 30.

अध्याय ४४

श्लोक 21

पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुंजयः पृथुकीर्तिः पृथुमना राजानः शशबिन्दवः

pṛthuśravāḥ pṛthuyaśāḥ pṛthudharmā pṛthuṃjayaḥ pṛthukīrtiḥ pṛthumanā rājānaḥ śaśabindavaḥ

हिन्दी अर्थ

थी । अहल्याने शरद्वान् गौतमके पुत्र ऋषिश्रेष्ठ शतानन्दको उत्पन्न किया था। शतानन्दका पुत्र महातपस्वी एवं धनुर्वेदका पारंगत विद्वान् सत्यधृति हुआ। धर्मात्मा सत्यधृतिका वीर्यं अमोघ था। एक बार एक अप्सराको देखकर सत्यधृतिका वीर्य (सरोवरमें स्नान करते समय) जलमें स्खलित हो गया। उस वीर्यसे उस सरोवरमें जुड़वीं संतान उत्पन्न हो गयी। वे उसी सरोवरमें पल रहे थे। एक बार महाराज शंतनु शिकारके लिये निकले हुए थे। वे उस सरोवरमें घूमते हुए उन बच्चोंको देखकर कृपा- परवश हो उन्हें उठा लाये। इस प्रकार मैंने शरद्वान्के उन पुत्रोंका जो गौतम (गोत्र) नामसे विख्यात हैं, वर्णन कर दिया। अब इसके आगे दिवोदासकी संततिका

English

After that, he armed himself with bow and arrows and seating liimself in a chariot with a streaming banner over it, started all by himself to seek his fortune in other lands. He went to some place on the banks of the Narraad/*, whence lie went to the Riksavanta hills and settled there along with others. There he married a noble lady, named ChaitrA. He did net marry any otlier lady, in spite of his not getting any children from his wife ClmitrA. Sometime after, the King Jyamagha brought a beautiful (amsel as a booty of his victory in a war; and said to the queen, through fear of her, that she was a dangliter-in Jaw; whereupon the queen, amaz- ingly enquired whose son's wife she was.— 31-34.

अध्याय ४४

श्लोक 22

शंसन्ति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम् अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयो ऽभवत्

śaṃsanti ca purāṇajñāḥ pṛthuśravasamuttamam antarasya suyajñasya suyajñastanayo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः॥ १२ वर्णन कर रहा हुँ, उसे सुनिये १. यह नील राजाकी चर्चा गत अध्यायके अन्तमें ७८ वें श्लोकमें भी है। ये उनसे भिन्न हैं ।

English

The king replied, " She shall be the wife of the son born to thee in tlie future." Hearing which, through the virtue of great austerities of that girl, Ohaitra begot a son, named Vidarblia.

अध्याय ४४

श्लोक 23

उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षन्पृथिवीमिमाम् आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः

uśanā tu suyajñasya yo rakṣanpṛthivīmimām ājahārāśvamedhānāṃ śatamuttamadhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

२. यह रुहेलखण्ड है, जो दिल्लीसे पूर्व गङ्गाके उत्तर तथा दक्षिणमें चम्बल नदीके तटतक फैला है। ये दक्षिण और उत्तर पञ्चालके नामसे प्रसिद्ध हैं । उत्तर पञ्चालकी राजधानी अहिच्छत्र (रामनगर) तथा दक्षिण पञ्चालकी राजधानी कम्पिल और माकंद थी। (द्रष्टव्य- महाभारत आदि० १४०, उद्योग० १९३, गर्गसंहिता १३९ आदि) गौतमबुद्धके समय उत्तर पञ्चालकी राजधानी कन्नौज भी दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृप: । दिवोदासका ज्येष्ठ पुत्र धर्मिष्ठ राजा मित्रयु हुआ।

English

He, Vidarblia, begot out of that princess Kratlia, Kai!(ika and Loma- pada, who were heroes and well-versed in the art of war.— 35-36.

अध्याय ४४

श्लोक 24

तितिक्षुरभवत्पुत्र औशनः शत्रुतापनः मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षीणामनुत्तमः

titikṣurabhavatputra auśanaḥ śatrutāpanaḥ maruttastasya tanayo rājarṣīṇāmanuttamaḥ

हिन्दी अर्थ

मैत्रायणावरः सोऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः॥ १३ तत्पश्चात् उससे छोटे मैत्रायण और उसके बाद मैत्रेयकी राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः

English

Lompfida's son was Manu, whose son was Jfiati. — 37.

अध्याय ४४

श्लोक 25

आसीन्मरुत्ततनयौ वीरः कम्बलबर्हिषः पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान्कम्बलबर्हिषः

āsīnmaruttatanayau vīraḥ kambalabarhiṣaḥ putrastu rukmakavaco vidvānkambalabarhiṣaḥ

हिन्दी अर्थ

च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित् चैद्योपरिचराजज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान् उत्पत्ति हुई। ये सभी पुत्र (ययातिके भाई) यतिके पक्षके थे और क्षत्रियांशसे युक्त भार्गव ( भृगुवंशी) कहलाते थे। राजा चैद्यवर मैत्रेयके पुत्र कहे जाते हैं। चैद्यवरसे विद्वान् सुदासका जन्म हुआ। वंशके नष्ट हो जानेपर पुनः

English

Kaitiika was the father of Ohidi, wlio was the founder of Chaidya dynasty of kings; Kratha, the third son of Vidarblia, was the father of Kunti and thelattarof |)hfistra, \Yho was renowned as most valiant and righteous. Dlifistra became the father of Nirvriti, the valiant and virtuous — 38-39.

अध्याय ४४

श्लोक 26

निहत्य रुक्मकवचः परान्कवचधारिणः धन्विनो विविधैर्बाणैर् अवाप्य पृथिवीमिमाम्

nihatya rukmakavacaḥ parānkavacadhāriṇaḥ dhanvino vividhairbāṇair avāpya pṛthivīmimām

हिन्दी अर्थ

अजमीढ सुदासके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए। इन्हींका दूसरा नाम सोमक भी है। सोमकका पुत्र जन्तु हुआ। उसके मारे जानेपर महात्मा अजमीढ सोमकके सौ पुत्र हुए। अजमीढकी धूमिनी नामकी पल्ली थी, जो पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाली थी। जन्तुके मारे जानेसे पुत्रका अभाव हो जानेपर वह सौ वर्षोतक दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गयी। एक समय भलीभाँति पवित्र किये हुए पदार्थोको ही भोजन करनेवाली महान् व्रतपरायणा धूमिनी अग्निहोत्रके

English

Nirvriti was the father of Viduratha, and the latter of DaifAha, the father of Vyoma The son of Vyoma was Jimuta. — 40.

अध्याय ४४

श्लोक 27

अश्वमेधे ददौ राजा ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम् यज्ञे तु रुक्मकवचः कदाचित्परवीरहा

aśvamedhe dadau rājā brāhmaṇebhyastu dakṣiṇām yajñe tu rukmakavacaḥ kadācitparavīrahā

हिन्दी अर्थ

क्रमसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके नींदके वशीभूत हो गयी। निरन्तर अग्निहोत्र करनेके कारण उसके शरीरका रंग धूमिल पड़ गया था। उसी समय अजमीढने उसमें गर्भाधान किया। उस गर्भसे धूमिनीने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था तथा जिसके शरीरका रंग धूम-वर्णका था। ऋक्षसे संवरणकी और संवरणसे कुरुकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने प्रयागका अतिक्रमण कर कुरुक्षेत्रको तीर्थरूपमें कल्पना की थी। महाराज कुरु अनेकों वर्षोतक इस कुरुक्षेत्रको अपने हाथों जोतते रहे। उन्हें इस प्रकार जोतते देखकर इन्द्रने भयभीत हो उन्हें वर प्रदान किया। इसी कारण कुरुक्षेत्र पुण्यप्रद और रमणीय क्षेत्र कहा जाता है। उन

English

Vimala was the son of JimAta and the father of Bhtmaratha, who begot Navaratha.— 41.

अध्याय ४४

श्लोक 28

जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्या धनुर्भृतः रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः

jajñire pañca putrāstu mahāvīryā dhanurbhṛtaḥ rukmeṣuḥ pṛthurukmaśca jyāmaghaḥ parigho hariḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज कुरुका वंश अत्यन्त विशाल था, जो उन्हींके नामसे (आगे चलकर) कौरव कहलाया कुरुके सुधन्वा, जह्लु, महातेजस्वी परीक्षित् और शत्रुविनाशक प्रजन--ये चार परम प्रिय पुत्र हुए। सुधन्वाका पुत्र राजा च्यवन हुआ, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ एवं धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता था। च्यवनका पुत्र कृमि हुआ, जो

English

Navaratha begot Dridbaratha, the father of lakuni, who begot Karainbha, the father of DevarAta. DevarAta \VSis the father of the very famous Devakatra, the father of Madhu, the rejoicer of Devanakshatra and born as if a Deva. He was father of Puravasas, who begot PnrudvAn, of Vidarbha clan; the father of Jantu from bis wife Bhadrasenl, daughter of Vidharva clan. Jantu bore from his wife, the lady of the IksvAkii clan, SAtvata who difiused the name and fame of the SAtvatas; YAdavas) through his sattvaguna. One who hears the narration of the lunar race of JyAmagba is blessed with childk'eU.— 42-46.

अध्याय ४४

श्लोक 29

परिघं च हरिं चैव विदेहे ऽस्थापयत्पिता रुक्मेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयः

parighaṃ ca hariṃ caiva videhe 'sthāpayatpitā rukmeṣurabhavadrājā pṛthurukmastadāśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

ऋक्षसे उत्पन्न हुआ था। (इन्हीं) कृमिके पुत्र महापराक्रमी चैद्योपरिचर वसु हुए। वे प्रभावशाली, शूरवीर, इन्द्रके समान विख्यात और (सदा विमानद्वारा) आकाशमें गमन करनेवाले थे। चैद्योपरिचरके संयोगसे गिरिकाने सात पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमी। बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः पुण्यः पुण्यवतश्चैव राजा सत्यधृतिस्ततः। दायादस्तस्य धनुषस्तस्मात् सर्वश्च जज्ञिवान्

English

tHS MATSyA POBAiiAU.

अध्याय ४४

श्लोक 30

तेभ्यः प्रव्राजितो राज्याज् ज्यामघस्तु तदाश्रमे प्रशान्तश्चाश्रमस्थश्च ब्राह्मणेनावबोधितः

tebhyaḥ pravrājito rājyāj jyāmaghastu tadāśrame praśāntaścāśramasthaśca brāhmaṇenāvabodhitaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वस्य सम्भवः पुत्रस्तस्माद् राजा बृहद्रथः । द्वे तस्य शकले जाते जरया संधितश्च सः जरासंधस्य पुत्रस्तु सहदेवः प्रतापवान्। सहदेवात्मजः श्रीमान् सोमवित् स महातपाः

English

The lady, named Kauiiilya, begot the progeny known by the epithet ' 0f S4tvata, the righteous. The Siltvata kings were Bhaj in, BhajamUna,..l)ev&Tfidha, Andhaka, Mah&bhoja, Vrii and Yadunandana, under four different sub-divisions, which is going to be narrated in detail.— 47-48.

अध्याय ४४

श्लोक 31

जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी नर्मदां नृप एकाकी केवलं वृत्तिकामतः

jagāma dhanurādāya deśamanyaṃ dhvajī rathī narmadāṃ nṛpa ekākī kevalaṃ vṛttikāmataḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुतश्रवास्तु सोमाद् वै मागधाः परिकीर्तिताः । जहुस्त्वजनयत् पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम् सुरथस्य तु दायादो वीरो राजा विदूरथः । विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इति स्मृतः सार्वभौमाज्जयत्सेनो रुचिरस्तस्य चात्मजः। रुचिरस्य सुतो भौमस्त्वरितायुस्ततोऽभवत्

English

King Srinjayi bad two daughters, both of whom became the wives of Bhajainftna. They Avere Srinjayi and VAhyakft. Their progeny is known under the epithet of VAhyakfis. These two sisters, bis wives, begot many sons, viz., Nimi, Krimila, and Vri§nl, the conqueror of enemy's town.— 49-50.

अध्याय ४४

श्लोक 32

ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा भुक्तमन्यैरुपाविशत् ज्यामघस्याभवद्भार्या चैत्रा परिणता सती

ṛkṣavantaṃ giriṃ gatvā bhuktamanyairupāviśat jyāmaghasyābhavadbhāryā caitrā pariṇatā satī

हिन्दी अर्थ

अक्रोधनस्त्वायुसुतस्तस्माद् देवातिथिः स्मृतः। देवातिथेस्तु दायादो दक्ष एव बभूव ह भीमसेनस्ततो दक्षाद् दिलीपस्तस्य चात्मजः । दिलीपस्य प्रतीपस्तु तस्य पुत्रास्त्रयः स्मृताः

English

DevAvfidha improved the relations with hit kinsmen, bu' was issueless, and with the intention of having a son e practised r ovout austerities. With that view, lie tonclied tlie holy waters of the Parn 4A at which that river brooded over tlie desires of Devavfidlia. She decided in " her miad that Deruvfidha should beget n handsome child like herself, but could not hit upon any lady who would bear him suclw an offspring. Therefore, she determined in her mind that she herself, having the power of manifesting herself in thousands of ways, wotild give birth to a child like that, for him. With that resolution, she appeared before the king in the form of a young beaiUy and attracted the ascetic king towards her; after which they became enamoured of each other and enjoyed themselves. Nine months after, she gave birtli to Vabhru. — 51-5t5.

अध्याय ४४

श्लोक 33

अपुत्रो न्यवसद्राजा भार्यामन्यां न विन्दत तस्यासीद्विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः

aputro nyavasadrājā bhāryāmanyāṃ na vindata tasyāsīdvijayo yuddhe tatra kanyāmavāpya saḥ

हिन्दी अर्थ

देवापिः शंतनुश्चैव बाह्लीकश्चैव ते त्रयः। देवापिस्तु ह्यपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः को दोषो राजपुत्रस्य प्रजाभिः समुदाहृतः

English

The learned in the Puianas sing tlie praises of that virtuous king, DevAvridha, as follows: — " As wc heard las praises from.a distance, so we find them true when seeing him from near. Vabhru is best amongst men and equal to IJevas and bis father, Dovavridha. By the glory of Vabhru, the sou of Devav'ridha, JO.OdO of las ancestors wore liberated and attained final bliss. That King Vabhru was the performer of great sacri- fices, the giver of alms, valiant, steady observer of religions rites, hand- some, most illustrious, ambitious and fond of listening to the Astras." — 57-60.

अध्याय ४४

श्लोक 34

भार्यामुवाच संत्रासात् स्नुषेयं ते शुचिस्मिते एवमुक्ताब्रवीदेनं कस्य चेयं स्नुषेति च

bhāryāmuvāca saṃtrāsāt snuṣeyaṃ te śucismite evamuktābravīdenaṃ kasya ceyaṃ snuṣeti ca

हिन्दी अर्थ

भविष्यं कीर्तयिष्यामि शंतनोस्तु निबोधत संतानोंको जन्म दिया । इनमें पहला महारथी मगधराज था, जो बृहद्रथ नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद दूसरा प्रत्यश्रवा, तीसरा कुश, चौथा हरिवाहन, पाँचवाँ यजुष् और छठा मत्स्य नामसे प्रसिद्ध हुआ। सातवीं संतान काली नामको कन्या

English

His queen, the daughter of (he King Kanka gave birth to four sons, viz., Kukura, BhajmAna, Sadi, Kambal Varhia.~61.

अध्याय ४४

श्लोक 35

यस्ते जनिष्यते पुत्रस् तस्य भार्या भविष्यति तस्मात्सा तपसोग्रेण कन्यायाः सम्प्रसूयत

yaste janiṣyate putras tasya bhāryā bhaviṣyati tasmātsā tapasogreṇa kanyāyāḥ samprasūyata

हिन्दी अर्थ

थी। बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ कुशाग्रका पुत्र पराक्रमी वृषभ हुआ। वृषभका पुत्र राजा पुण्यवान् था। पुण्यवान्से पुण्य और उससे राजा सत्यधृतिका जन्म हुआ। उसका पुत्र धनुष हुआ और उससे सर्वकी उत्पत्ति हुई। सर्वका पुत्र सम्भव हुआ और उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बुहद्रथका पुत्र दो टुकड़ेके रूपमें उत्पन्न हुआ, जिन्हें जरानामकी राक्षसीने जोड़ दिया था। जराद्वारा जोड़ दिये जानेके कारण वह जरासंध नामसे विख्यात हुआ। महाबली जरासंध अपने समयके समस्त क्षत्रियोंका विजेता था। जरासंधका पुत्र प्रतापी सहदेव हुआ। सहदेवका पुत्र लक्ष्मीवान् एवं महातपस्वी सोमवित् हुआ। सोमवित्से श्रुतश्रवाकी उत्पत्ति हुई। (मगधपर शासन करनेके कारण) ये सभी नरेश मागध

English

Vrifni was the son of Kukura and the father of Dhriti, who begot KapotromA, the father of Taittiri. Taittiri was the father of the learned Nala, and is known as Nandanodaradundubhi of worldwide fame. — 62-63.

अध्याय ४४

श्लोक 36

पुत्रं विदर्भं सुभगा चैत्रा परिणता सती राजपुत्र्यां च विद्वान्स स्नुषायां क्रथकैशिकौ लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम्

putraṃ vidarbhaṃ subhagā caitrā pariṇatā satī rājaputryāṃ ca vidvānsa snuṣāyāṃ krathakaiśikau lomapādaṃ tṛtīyaṃ tu putraṃ paramadhārmikam

हिन्दी अर्थ

नामसे विख्यात हुए जहुने सुरथ नामक भूपालको पुत्ररूपमें जन्म दिया। सुरथका पुत्र वीरवर राजा विदूरथ हुआ। विदूरथका पुत्र सार्वभौम कहा गया है। सार्वभौमसे जयत्सेन उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र रुचिर हुआ। रुचिरसे भौमका

English

He performed advamedha sacrifice with the desire of getting a son. At the end of AtirAttra ceremony, his son, named Panarrasu, arose in the

अध्याय ४४

श्लोक 37

तस्यां विदर्भो ऽजनयच् छरान्रणविशारदान् लोमपादान्मनुः पुत्रा ज्ञातिस्तस्य तु चात्मजः

tasyāṃ vidarbho 'janayac charānraṇaviśāradān lomapādānmanuḥ putrā jñātistasya tu cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

और उससे त्वरितायुका जन्म हुआ। त्वरितायुका पुत्र अक्रोधन और उससे देवातिथिकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। देवातिथिका एकमात्र पुत्र दक्ष ही था। दक्षसे भीमसेनका जन्म हुआ और उसका पुत्र (पुरुवंशी) दिलीप तथा दिलीपका पुत्र प्रतीप हुआ। प्रतीपके तीन पुत्र कहे जाते हैं, ये तीनों देवापि, शंतनु और बाह्लीक हैं । बाह्णीकके सात पुत्र थे, जो सभी राजा थे और बाह्लीक (बल्ख) देशके अधीश्वर थे। देवापिको प्रजाओंने दोषी ठहरा दिया था; इसलिये वह राजपाट छोड़कर मुनि हो गया ॥३४--३९ ॥

English

OH AFTER XLIV.

अध्याय ४४

श्लोक 38

कैशिकस्य चिदिः पुत्रस् तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः क्रथो विदर्भपुत्रस्तु कुन्तिस् तस्यात्मजो ऽभवत्

kaiśikasya cidiḥ putras tasmāccaidyā nṛpāḥ smṛtāḥ kratho vidarbhaputrastu kuntis tasyātmajo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! प्रजाओंने राजा देवापिको किस कारण दोषी ठहराया था? तथा प्रजाओंने उस राजकुमारका कौन-सा दोष प्रकट किया था? सूतजी कहते हैं-ऋषियो! राजकुमार देवापि कुष्ठ- रोगी था, इसीलिये प्रजाओंने उसका आदर-सत्कार नहीं किया। अब मैं शंतनुके भविष्यका वर्णन कर रहा हुँ, उसे सुनिये।

English

midst of the assembly from the sacrificial pool. Therefore, be was leaned, renowned for his love of sacrifices, charities, &c. — 64-65.

अध्याय ४४

श्लोक 39

कुन्तेर्धृष्टः सुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् धृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निर्वृतिः परवीरहा

kunterdhṛṣṭaḥ suto jajñe raṇadhṛṣṭaḥ pratāpavān dhṛṣṭasya putro dharmātmā nirvṛtiḥ paravīrahā

हिन्दी अर्थ

शंतनुस्त्वभवद् राजा विद्वान् स वै महाभिषक् । इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषम् यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्ण रोगिणमेव च। पुनर्युवा स भवति तस्मात् तं शंतनुं विदुः तत् तस्य शंतनुत्वं हि प्रजाभिरिह कीर्त्यते। ततोऽवृणुत भार्यार्थं शंतनुर्जाह्वीं नृपः

English

Punarvasu begot a twin, named Ahuka and Ahukt. The following llokas are recited about Ahuka. 66.

अध्याय ४४

श्लोक 40

तदेको निर्वृतेः पुत्रो नाम्ना स तु विदूरथः दशार्हस्तस्य वै पुत्रो व्योमस्तस्य च वै स्मृतः दाशार्हाच्चैव व्योमात्तु पुत्रो जीमूत उच्यते

tadeko nirvṛteḥ putro nāmnā sa tu vidūrathaḥ daśārhastasya vai putro vyomastasya ca vai smṛtaḥ dāśārhāccaiva vyomāttu putro jīmūta ucyate

हिन्दी अर्थ

तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद् विभुः। काली विचित्रवीर्य तु दाशेयी जनयत् सुतम् कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके

English

"He always Tived equipped with an army of armoured chariots, with banners dying over them. His army consisted of ten thousand chariots thundering like the clouds. He was never untruthful, never lustreless, never remained without performing sacrifices and never gave less than a thousand in charity. He was never impure, never ignorant of learning. Snch was Ahuka, born in tlie Bhoja family, and after him Ahuka and other clans came to be known." — 67-69.

अध्याय ४४

श्लोक 41

जीमूतपुत्रो विमलस् तस्य भीमरथः सुतः सुतो भीमरथस्यासीत् स्मृतो नवरथः किल

jīmūtaputro vimalas tasya bhīmarathaḥ sutaḥ suto bhīmarathasyāsīt smṛto navarathaḥ kila

हिन्दी अर्थ

देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थेऽभिजञ्ञिरे। धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः नकुलं सहदेवं च माद्र्यश्चिभ्यामजीजनत् श्रुतसेनं भीमसेनाच्छुतकीर्ति धनञ्जयात्। चतुर्थं श्रुतकर्माणं सहदेवादजायत

English

He married his sister, Aliuki, to Avanti, and begot from his queen, the daughter of Kaifya, the two sons, viz., Devaka and Ugrasena, who were born like the Devas. Devaka also begot four sons and seven daughters, viz., Devavit-.a, Hpadeva, Stideva and Devaraksifa. Their seven sisters were Devakl, Srutadevl, • Mitradevi, Yarfodhara, Sridevl, Satyadevt, and SutApl, the seventh, who were married to Vasudeva. — 70-73.

अध्याय ४४

श्लोक 42

तस्य चासीद् दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः तस्मात्करम्भः कारम्भिर् देवरातो बभूव ह

tasya cāsīd dṛḍharathaḥ śakunistasya cātmajaḥ tasmātkarambhaḥ kārambhir devarāto babhūva ha

हिन्दी अर्थ

नकुलाच्च शतानीकं द्रौपदेयाः प्रकीर्तिताः। तेभ्योऽपरे पाण्डवेयाः षडेवान्ये महारथाः हैडम्बो भीमसेनात् तु पुत्रो जज्ञे घटोत्कचः। काशी बलधराद् भीमाजज्ञे वै सर्वगं सुतम्

English

Ugrasena was father of nine sons,.\mongst them, Kamea was the eldest. The others were N3'agrudha, Sundmu, Kahka, SaAku, Ajabhfi, Ratraplila, Yudhamusti, Sumusti. Their sisters were five, viz., KaipsS, Kamsavati, Sutautfi, IlastrapAli and KaAka. Ugrasena and his descendants all belonged to the Kukura clan. — 74-76."

अध्याय ४४

श्लोक 43

देवक्षत्रो ऽभवद्राजा दैवरातिर्महायशाः देवगर्भसमो जज्ञे देवनक्षत्रनन्दनः

devakṣatro 'bhavadrājā daivarātirmahāyaśāḥ devagarbhasamo jajñe devanakṣatranandanaḥ

हिन्दी अर्थ

सुहोत्रं तनयं माद्री सहदेवादसूयत। (देवापिके वन चले जानेपर) शंतनु राजा हुए। ये विद्वान् तो थे ही, साथ ही महान् वैद्य भी थे। इनकी महावैद्यताके प्रति लोग एक श्लोक कहा करते हैं, जिसका आशय यह है कि “महाराज शंतनु जिस-जिस रोगी अथवा वृद्धको अपने हाथोंसे स्पर्श कर लेते थे, वह पुनः

English

Bhoja was tlie father of the famous Viduratha, who begot the valiant RAjSdhideva. — 77.

अध्याय ४४

श्लोक 44

मधुर्नाम महातेजा मधोः पुरवसस् तथा आसीत् पुरवसात् पुत्रः पुरुद्वान्पुरुषोत्तमः

madhurnāma mahātejā madhoḥ puravasas tathā āsīt puravasāt putraḥ purudvānpuruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

नौजवान हो जाता था। इसी कारण लोग उन्हें शंतनु कहते थे।' उस समय प्रजागण उनके इस शंतनुत्व (रोगी और वृद्धको युवा बना देनेवाले) गुणका ही वर्णन करते थे। तदनन्तर प्रभावशाली राजा शंतनुने जह्कु-नन्दिनी गङ्गाको अपनी पल्लीके रूपमें वरण किया और उनके गर्भसे देवव्रत (भीष्म) नामक कुमारको पैदा किया। दाश-कन्या काली सत्यवतीने शंतनुके संयोगसे विचित्रवीर्य नामक पुत्रको जन्म दिया, जो पिताके लिये परम प्रिय, शान्तात्मा और

English

RftjAdhideva begot two deva-like, virtuous sons, named SopAifva and Svetav&hana. — 78.

अध्याय ४४

श्लोक 45

जन्तुर्जज्ञे ऽथ वैदर्भ्यां भद्रसेन्यां पुरुद्वतः ऐक्ष्वाकी चाभवद्भार्या जन्तोस्तस्यामजायत

janturjajñe 'tha vaidarbhyāṃ bhadrasenyāṃ purudvataḥ aikṣvākī cābhavadbhāryā jantostasyāmajāyata

हिन्दी अर्थ

निष्पाप था। महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यासने विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें धृतराष्ट्र और पाण्डुको तथा (दासीसे) विदुरको उत्पन्न किया था। धृतराषट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया, उनमें दुर्योधन सबसे श्रेष्ठ था और वह सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशका स्वामी था। इसी प्रकार पाण्डुकी कुन्ती और माद्री नामकी दो पत्नियाँ हुई। इन्हीं दोनोंके गर्भसे महाराज पाण्डुकी वंश-वृद्धिके लिये देवताओंद्वारा प्रदान किये गये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुन्तीने धर्मके संयोगसे युधिष्ठिरको, वायुके संयोगसे वृकोदर (भीमसेन)-को और इन्द्रके संयोगसे इन्द्रसरीखे पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-को जन्म दिया। इसी प्रकार माद्रीने अश्विनीकुमारोंके संयोगसे नकुल और सहदेवको पैदा किया॥४१--५०॥

English

Son&efva had five sons, all heroic and well-versed in war. They were Samt, VedadarmA, Nikunta, Siikra and Satrujita. — 79.

अध्याय ४४

श्लोक 46

सात्वतः सत्त्वसंयुक्तः सात्वतां कीर्तिवर्धनः इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः प्रजावान् एति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः

sātvataḥ sattvasaṃyuktaḥ sātvatāṃ kīrtivardhanaḥ imāṃ visṛṣṭiṃ vijñāya jyāmaghasya mahātmanaḥ prajāvān eti sāyujyaṃ rājñaḥ somasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

इन पाँचों पाण्डवोंके संयोगसे द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें द्रौपदीने युधिष्ठिरके संयोगसे ज्येष्ठ पुत्र प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनके संयोगसे श्रुतसेनको और अर्जुनके संयोगसे श्रुतकीर्तिको जन्म दिया था। चौथा पुत्र श्रुतकर्मा सहदेवसे और शतानीक नकुलसे उत्पन्न किया था। ये पाँचों द्रौपदेय अर्थात् द्रौपदीके पुत्र कहलाये। इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके छः: अन्य महारथी पुत्र भी थे। (उनका विवरण इस प्रकार है--) भीमसेनके संयोगसे

English

Sami was the fatlier of Pratiksatrg, who begot Pratiksetra, the father of Bhoja, who became the father of Hfidika. — 80.

अध्याय ४४

श्लोक 47

सात्वतान् सत्त्वसम्पन्नान् कौशल्या सुषुवे सुतान् भजिनं भजमानं तु दिव्यं देवावृधं नृप

sātvatān sattvasampannān kauśalyā suṣuve sutān bhajinaṃ bhajamānaṃ tu divyaṃ devāvṛdhaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

हिडिम्बा नामको राक्षसीके गर्भसे घटोत्कच नामक पुत्रका जन्म हुआ था। उनकी दूसरी पत्नी काशीने बलवान् भीमसेनके संयोगसे सर्वग नामक पुत्रको जन्म दिया था। मद्रराज-कुमारी सहदेव-पल्नीने सहदेवके संयोगसे सुहोत्र नामक पुत्रको पैदा किया था। नकुल-पुत्र निरमित्र करेणुमत्यां चैद्यायां निरमित्रस्तु नाकुलिः॥ ५५ चेदिराज-कुमारी करेणुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था।

English

Hfidika had ten valiant sons: — KritavarmA, was the eldest amongst them. SatadhanvA was the second. The (Uhers were DevArha, NAbba, Bhlsapa, MahAbala, AjAta, VanajAta, Kaniyaka, and Karambhaka. DevArha was the father of the learned Kambalavarliisa, who begot AsAmanjA, the father of Ta-MojA.- 81-83.

अध्याय ४४

श्लोक 48

अन्धकं च महाभोजं वृष्णिं च यदुनन्दनम् तेषां तु सर्गाश् चत्वारो विस्तरेणैव तच्छृणु

andhakaṃ ca mahābhojaṃ vṛṣṇiṃ ca yadunandanam teṣāṃ tu sargāś catvāro vistareṇaiva tacchṛṇu

हिन्दी अर्थ

सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत। पृथा-पुत्र अर्जुनके संयोगसे सुभद्राके गर्भसे महारथी यौधेयं देवकी चैव पुत्रं जज्ञे युधिष्ठिरात्॥ ५६ अभिमन्यु पैदा हुआ था। युधिष्टिर-पत्नी देवकीने युधिष्ठिरके संयोगसे यौधेय नामक पुत्रको जन्म दिया था। अभिमन्युके अभिमन्योः परीक्षित् तु पुत्रः परपुरञ्जयः । पुत्र शत्रुओंकी नगरीको जीतनेवाले परीक्षित् हुए। परीक्षित्के जनमेजयः परीक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः ॥ ५७ पुत्र परम धर्मात्मा जनमेजय (तृतीय) हुए॥ ५१--५७॥ ब्रह्माणं कल्पयामास स वै वाजसनेयकम्। जनमेजयने अपने यज्ञमें वाजसनेय (शुक्लयजुर्वेदके येगेग्यावर वेल शतः किलं बहावा (५७ आचार्य) ऋषिको ब्रह्माके पदपर नियुक्त किया। यह

English

AjAta begot the following three illustrious sous, who were known pqdor the namo of Andhakas: — Sudansra, SunAbha, Krifpa.— 84.

अध्याय ४४

श्लोक 49

भजमानस्य सृञ्जय्यां बाह्यकायां च बाह्यकाः सृञ्जयस्य सुते द्वे तु बाह्यकास्तु तदाभवन्

bhajamānasya sṛñjayyāṃ bāhyakāyāṃ ca bāhyakāḥ sṛñjayasya sute dve tu bāhyakāstu tadābhavan

हिन्दी अर्थ

0७७७७ फल ह ५८ देखकर वैशम्पायन (कृष्णयजुर्वेदके आचार्य)-ने उन्हें न स्थास्यतीह दुर्बुद्धे तवैतद् वचनं भुवि। ह का दुर्बुद्धे ! तुम्हारा गाय त) वत : अर्थात् ( -ग्रन्थ) भूतलपर स्थायी नहीं हो सकेगा। यावत व्याजात लेती कि ताल पाकयात॥ ५४ जबतक तुम लोकमें जीवित रहोगे, तभीतक यह भी क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः। ठहर सकेगा।' तभीसे क्षत्रियजातिकी विजय जानकर अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्॥ ६० बहुत-से लोग चारों ओरसे (शुक्लयजुर्वेदके प्रवर्धक) राजा जनमेजयके पास आकर रहने लगे। परंतु महात्मा ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः। बैशम्पायनके शापके कारण उस यज्ञमें बहुत-से यज्ञानुष्ठान उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततः प्रभृति सर्वशः॥ ६९ करनेवाले क्षत्रिय तथा कुछ याजक भी नष्ट हो गये। तब उस यज्ञमें जब जनमेजय पौर्णमास हविद्वारा ब्रह्माका

English

THE MATBYA PDRAUAM.

अध्याय ४४

श्लोक 50

तस्य भार्ये भगिन्यौ द्वे सुषुवाते बहून्सुतान् निमिं च कृमिलं चैव वृष्णिं परपुरंजयम् ते बाह्यकायां सृञ्जय्यां भजमानाद् विजज्ञिरे

tasya bhārye bhaginyau dve suṣuvāte bahūnsutān nimiṃ ca kṛmilaṃ caiva vṛṣṇiṃ parapuraṃjayam te bāhyakāyāṃ sṛñjayyāṃ bhajamānād vijajñire

हिन्दी अर्थ

क्षत्रस्य याजिनः केचिच्छापात् तस्य महात्मनः! जन कर यज्ञशालामें प्रवेश करनेके लिये प्रयत्नशील पौर्णमासेन हविषा इष्ट्वा तस्मिन् प्रजापतिम्। हुए, उसी समय महर्षि वैशम्पायनने उन्हें भीतर जानेसे परीक्षितः सुतोऽसौ वै पौरवो जनमेजयः। द्वारा प्रवर्तित महावाजसनेय (शौक्लयाजुष) विधिका ही द्विरश्चमेधमाहत्य महावाजसनेयकः॥ ६३ प्रयोग किया। वह सारा कार्य वाजसनेय ऋषिकी अध्यक्षतामें । सर्वमृषिं ही सम्पन्न हो रहा था। उसी समय ब्राह्मणोंके साथ

English

* One who daily recites tlie family of the Andhakas obtains a large family.— 85.

अध्याय ४४

श्लोक 51

यज्ञे देवावृधो राजा बन्धूनां मित्रवर्धनः अपुत्रस्त्वभवद्राजा चचार परमं तपः पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन्

yajñe devāvṛdho rājā bandhūnāṃ mitravardhanaḥ aputrastvabhavadrājā cacāra paramaṃ tapaḥ putraḥ sarvaguṇopeto mama bhūyāditi spṛhan

हिन्दी अर्थ

्रवर्तयित्वा तं सर्वमृषिं वाजसनेयकम्। विवाद हो जानेपर ब्राहमणोने उन्हें शाप दे दिया, जिससे विवादे ब्राह्मणैः सार्धमभिशप्तो वनं ययौ॥ ६४ वे वनमें चले गये। उन जनमेजयसे पराक्रमी शतानीकका जन्म हुआ। जनमेजयने (वन-गमन करते समय) जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माजज्ञे स वीर्यवान्। अपने पुत्र शतानीकको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्येऽभिषिक्तवान्॥ ६५ था। शतानीकद्वारा अश्वमेध-यञ्ञका अनुष्ठान किये जानेपर अथाश्चमेधेन ततः शतानीकस्य वीर्यवान्। उसके फलस्वरूप शतानीकके एक महायशस्वी एवं

English

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अध्याय ४४

श्लोक 52

संयोज्य मन्त्रमेवाथ पर्णाशाजलमस्पृशत् तदोपस्पर्शनात्तस्य चकार प्रियमापगा

saṃyojya mantramevātha parṇāśājalamaspṛśat tadopasparśanāttasya cakāra priyamāpagā

हिन्दी अर्थ

है पराक्रमी अधिसीमकृष्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो जज्ञेशधिसीमकृष्णाख्यः साम्प्रतं यो महायशाः ॥ ६६ इस ( पुराणप्रवचनके) समय सिंहासनासीन है । द्विजवरो ! तस्मिञ्शासति राष्ट्रं तु युष्माभिरिदमाहृतम्। उसीके राज्यशासन करते समय आपलोगोंने अभी- । दीर्घसत्रं अभी पुष्करक्षेत्रमें तीन वर्षोतक तथा कुरुक्षेत्रमें दृषद्दतीके दुराप लकी वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे। तटपर दो वर्षोतक इस दुर्लभ दीर्घ सत्रका अनुष्ठान वर्षद्दयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमा:॥ ६७ सम्पन्न किया है ॥५८--६७॥ ऋषय ऊचु; वेदा मो पूछा--लोमहर्षणके पुत्र सूतजी! विच पूर्वकालमें बातें बीत चुकी हैं, उनका

English

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अध्याय ४४

श्लोक 53

कल्याणत्वान्नरपतेस् तस्मै सा निम्नगोत्तमा चिन्तयाथ परीतात्मा जगामाथ विनिश्चयम्

kalyāṇatvānnarapates tasmai sā nimnagottamā cintayātha parītātmā jagāmātha viniścayam

हिन्दी अर्थ

भविष्यं श्रोतुमिच्छाम: प्रजानां लोमहर्षणे। वर्ण तो आपने कर दिया। अब हमलोग पुरा किल यदेतद् वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया ॥ ६८ प्रजाऑके भविष्यके विषयमें सुनना चाहते हैं। यथा मे कीर्तितं पूर्व व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा। भाव्यं कलियुगं चैव तथा मन्वन्तराणि च

English

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अध्याय ४४

श्लोक 54

नाधिगच्छाम्यहं नारीं यस्यामेवंविधः सुतः जायेत तस्मादद्याहं भवाम्यथ सहस्रशः

nādhigacchāmyahaṃ nārīṃ yasyāmevaṃvidhaḥ sutaḥ jāyeta tasmādadyāhaṃ bhavāmyatha sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

ऐडेक्ष्वाक्कान्वये चैव पौरवे चान्वये तथा। तान् सर्वान् कीर्तयिष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्

English

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अध्याय ४४

श्लोक 55

अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः ज्ञापयामास राजानं तामियेष महाव्रतः

atha bhūtvā kumārī sā bibhratī paramaṃ vapuḥ jñāpayāmāsa rājānaṃ tāmiyeṣa mahāvrataḥ

हिन्दी अर्थ

अन्धाः शकाः पुलिन्दाश्च चूलिका यवनास्तथा। सुखीबलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः परिष्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृप: यह क्षत्रिय-जाति जिन-जिन वंशोंमें स्थित रहेगी और उनमें जो-जो नरेश उत्पन्न होंगे, उनके क्या नाम होंगे तथा उनकी आयुका प्रमाण कितना होगा ? कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग-इन चारों युगोंकी कितनी-कितनी अवधि

English

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अध्याय ४४

श्लोक 56

अथ सा नवमे मासि सुषुवे सरितां वरा पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधान्नृपात्

atha sā navame māsi suṣuve saritāṃ varā putraṃ sarvaguṇopetaṃ babhruṃ devāvṛdhānnṛpāt

हिन्दी अर्थ

होगी ? प्रत्येक युगमें क्या-क्या दोष होंगे? तथा उन युगोंका विनाश कैसे होगा? सुख और दुःखका प्रमाण कया होगा ? तथा प्रत्येक युगकी प्रजाओंमें क्या-क्या दोष उत्पन्न होंगे ? प्रभो! यह सब क्रमशः हमें बतलाइये; क्योंकि हमलोग इसे जानना चाहते हैं

English

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अध्याय ४४

श्लोक 57

अनुवंशे पुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् गुणान्देवावृधस्यापि कीर्तयन्तो महात्मनः

anuvaṃśe purāṇajñā gāyantīti pariśrutam guṇāndevāvṛdhasyāpi kīrtayanto mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! पूर्वकालमें अक्लिष्टकर्मा व्यासजीने मुझसे भावी कलियुग तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें जैसा वर्णन किया था, वही मैं आपलोगोंको बतला रहा हूँ; सुनिये। इसके बाद अब मैं उन्हीं राजाओंका वर्णन करने जा रहा हुँ, जो भविष्यमें ऐड (ऐल) और इक्ष्वाकुके वंशमें तथा पौरववंशमें उत्पन्न होनेवाले हैं। जिन राजाओंमें ये मङ्गलमय ऐड और इक्ष्वाकुवंश स्थित रहेंगे, भविष्यमें होनेवाले उन सभी तथाकथित नरेशोंका मैं वर्णन करूँगा। इनके अतिरिक्त भी जो अन्य नृपतिगण

English

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अध्याय ४४

श्लोक 58

यथैव शृणुमो दूराद् अपश्यामस् तथान्तिकात् बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः

yathaiva śṛṇumo dūrād apaśyāmas tathāntikāt babhruḥ śreṣṭho manuṣyāṇāṃ devairdevāvṛdhaḥ samaḥ

हिन्दी अर्थ

यवन, कैवर्त, आभीर और शबर जातियोंमें उत्पन्न होंगे तथा दूसरे जो म्लेच्छ-जातियोंमें पैदा होंगे, उन सभी नरेशोंका पर्याय क्रमसे नामनिर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इन सबमें सर्वप्रथम राजा अधिसोमकृष्ण हैं, जो सम्प्रति वर्तमान हैं। इनके वंशमें भविष्यमें उत्पन्न होनेवाले राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। अधिसीमकृष्णका पुत्र राजा विवक्षु होगा। गङ्गाद्वारा हस्तिनापुर नगरके डुबो (बहा) दिये जानेपर विवक्षु उस नगरका परित्याग कर कौशाम्बी नगरीमें निवास

English

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अध्याय ४४

श्लोक 59

षष्टिश्च पूर्वपुरुषाः सहस्राणि च सप्ततिः एते ऽमृतत्वं सम्प्राप्ता बभ्रोर् देवावृधान्नृप

ṣaṣṭiśca pūrvapuruṣāḥ sahasrāṇi ca saptatiḥ ete 'mṛtatvaṃ samprāptā babhror devāvṛdhānnṛpa

हिन्दी अर्थ

करेगा। उसके महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न आठ पुत्र होंगे। उसका ज्येष्ठ पुत्र भूरि होगा और उसका पुत्र चित्ररथ नामसे विख्यात होगा। चित्ररथसे शुचिद्रव, शुचिद्रवसे वृष्णिमान् और वृष्णिमान्से परम पवित्र राजा सुषेण उत्पन्न होगा। उस सुषेणसे सुनीथ नामका राजा होगा। राजा सुनीथसे महायशस्वी नृचक्षुकी उत्पत्ति होगी। नृचक्षुका पुत्र सुखीबल होगा। सुखीबलका पुत्र भावी राजा परिष्णव और परिष्णवका पुत्र राजा सुतपा होगा। उसका पुत्र निस्संदेह मेधावी होगा। मेधावीका पुत्र पुरञ्जय होगा।

English

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अध्याय ४४

श्लोक 60

यज्वा दानपतिर् वीरो ब्रह्मण्यश्च दृढव्रतः रूपवान्सुमहातेजाः श्रुतवीर्यधरस्तथा

yajvā dānapatir vīro brahmaṇyaśca dṛḍhavrataḥ rūpavānsumahātejāḥ śrutavīryadharastathā

हिन्दी अर्थ

उर्वो भाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मज: । उसका भावी पुत्र उर्व और उसका पुत्र तिम्मात्मा होगा । तिग्मात्मासे तिग्माद् बृहद्रथो भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात्॥ ८५ बृहद्रथ और बृहद्रथसे वसुदामाका जन्म होगा। वसुदामासे वसुदाम्नः शतानीको भविष्योदयनस्ततः। शतानीक और उससे उदयनकी उत्पत्ति होगी। उदयनसे वीरवर राजा वहीनर उत्पन्न होगा। वहीनरका पुत्र दण्डपाणि a घर gino nd होगा। दण्डपाणिसे निरमित्र और निरमित्रसे क्षेमकका जन्म

English

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अध्याय ४४

श्लोक 61

अथ कङ्कस्य दुहिता सुषुवे चतुरः सुतान् कुकुरं भजमानं च शशिं कम्बलबर्हिषम्

atha kaṅkasya duhitā suṣuve caturaḥ sutān kukuraṃ bhajamānaṃ ca śaśiṃ kambalabarhiṣam

हिन्दी अर्थ

दण्डपाणेर्निरमित्रो निरमित्रात्तु क्षेमकः ॥ ८७ होगा। इस वंशपरम्पराके विषयमें प्राचीनकालिक विदप्रोंद्वारा अत्रानुबंशश्लोकोऽयं एक श्लोक गाया गया है, जिसका आशय यह है कि ऽयं गीतो विप्रैः पुरातनैः। ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी योनिस्वरूप यह वंश, जो ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृतः । देवर्षियांद्वारा सत्कृत है, कलियुगमें राजा क्षेमकको प्राप्त क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे॥ ८८ कर समाप्त हो जायगा।' इस प्रकार पुरु-वंशका तथा इत्येष पौरवो वंशो यथावदिह कीर्तितः। पाण्डुपुत्र परम बुद्धिमान् महात्मा अर्जुनके वंशका वर्णन धीमतः पाण्डुपुत्रस्य चार्जुनस्य महात्मनः॥ ८९ मैंने यथार्थरूपसे कर दिया

English

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अध्याय ४४

श्लोक 62

कुकुरस्य सुतो वृष्णिर् वृष्णेस्तु तनयो धृतिः कपोतरोमा तस्याथ तैत्तिरिस्तस्य चात्मजः

kukurasya suto vṛṣṇir vṛṣṇestu tanayo dhṛtiḥ kapotaromā tasyātha taittiristasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे पुरुवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पूरुवंशानुकीर्तन नामक पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय ४४

श्लोक 63

तस्यासीत्तनुजः सर्पो विद्वान्पुत्रो नलः किल ख्यायते तस्य नाम्ना स नन्दनो दरदुन्दुभिः

tasyāsīttanujaḥ sarpo vidvānputro nalaḥ kila khyāyate tasya nāmnā sa nandano daradundubhiḥ

हिन्दी अर्थ

अग्नि-बंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन ऋषय ऊचुः ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! जो अग्नि द्विजातियोंके ये पूज्याः स्युर्द्णिजातीनामग्नयः सूत सर्वदा। लिये सदा परम पूज्य माने गये हैं, अब उनका तथा तानिदानीं hn उनके वंशका आनृपूर्वी वर्णन कोजिये

English

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अध्याय ४४

श्लोक 64

तस्मिन्प्रवितते यज्ञे अभिजातः पुनर्वसुः अश्वमेधं च पुत्रार्थम् आजहार नरोत्तमः

tasminpravitate yajñe abhijātaḥ punarvasuḥ aśvamedhaṃ ca putrārtham ājahāra narottamaḥ

हिन्दी अर्थ

तानिदानीं समाचक्ष्व तद्वंशं चानृपूर्वशः ॥ ९ सूतजी कहते हैं--ऋषियो! स्वायम्भुव-मनवन्तरमे सूत उवाच जो ये अग्निके अभिमानी देवता कहे गये हैं, वे ब्रह्माके योऽसावग्निरभिमानी स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे। मानस पुत्र हैं। स्वाहाने उनके संयोगसे पावक (दक्षिणाग्नि), ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्तस्मात् स्वाहा व्यजायती॥ २ पवमान (गार्हपत्य) और शुचि (आहवनीय) नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया,जो अग्नि भी कहलाते हैं। उनमेंसे

English

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अध्याय ४४

श्लोक 65

तस्य मध्ये ऽतिरात्रस्य सभामध्यात्समुत्थितः अतस्तु विद्वान्कर्मज्ञो यज्वा दाता पुनर्वसुः

tasya madhye 'tirātrasya sabhāmadhyātsamutthitaḥ atastu vidvānkarmajño yajvā dātā punarvasuḥ

हिन्दी अर्थ

पावकं पवमानं च शुचिरग्निश्च यः स्मृतः ४ पावकको वैद्युत (जलबिजलीसे उत्पन्न), पवमानको निर्मथ्य निर्मथ्यः पवमानोऽग्नि्वैद्युतः पावकात्मजः॥ ३ (निर्मन्थन करनेपर उत्पन्न) और शुचिको सौर (सूर्यके शुचिरग्निः स्मृतः सौरः स्थावराश्चैव ते स्मृताः। सम्बन्धसे उत्पन्न) अग्नि कहा जाता है। ये सभी अग्नि पवमानात्मजो ह्याग्निः तत्व र. (स्थिर स्वभाववाले) माने गये हैं। पवमानके पुत्र पाया अप. प! जो अग्नि हुए, उन्हें कव्यवाहन कहा जाता है। पावकके पावकिः सहरक्षस्तु हव्यवाहः शुचेः सुतः। पुत्र सहरक्ष और शुचिके पुत्र हव्यवाहन हुए। देवताओंके देवानां हव्यवाहोऽग्निः पितृणां कव्यवाहन: ॥ ५ बल हैं, जो ब्रह्माके प्रथम पुत्र हैं। सहरक्ष Fe 7 कि अग्नि हैं तथा पितरोंके अग्नि कव्यवाहन हैं। इस सहरक्षोसुराणां तु त्रयाणां ते :। प्रकार ये तीनों देव-असुरः पितर तातन

English

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अध्याय ४४

श्लोक 66

तस्यासीत् पुत्रमिथुनं बभूवाविजितं किल आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातं मातेमतां वर

tasyāsīt putramithunaṃ babhūvāvijitaṃ kila āhukaścāhukī caiva khyātaṃ mātematāṃ vara

हिन्दी अर्थ

एतेषां पुत्रपौत्राश्च चत्वारिंशन्नवैव च॥ ६ पृथक् अग्नि हैं। इनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या उनचास हैं। पावनो लौकिको ह्यग्निः प्रथमो ब्रह्मणश्च यः

English

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अध्याय ४४

श्लोक 67

इमांश्चोदाहरन्त्यत्र श्लोकान्प्रति तमाहुकम् सोपासङ्गानुकर्षाणां सध्वजानां वरूथिनाम्

imāṃścodāharantyatra ślokānprati tamāhukam sopāsaṅgānukarṣāṇāṃ sadhvajānāṃ varūthinām

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मौदनाग्निस्तत्पुत्रो भरतो नाम विश्रुतः। वैश्वानरः सुतस्तस्य वहन् हव्यं समाः शतम् सम्भृतोऽथर्वणः पुत्रो मथितः पुष्करादधि। सोऽथर्वा लौकिको ह्यग्निर्दध्यङ्ङाथर्वणःसुतः तस्य ह्ालौकिको ह्यग्निर्दक्षिणाग्निः स वै स्मृतः

English

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अध्याय ४४

श्लोक 68

रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु नासत्यवादी नातेजा नायज्वा नासहस्रदः

rathānāṃ meghaghoṣāṇāṃ sahasrāṇi daśaiva tu nāsatyavādī nātejā nāyajvā nāsahasradaḥ

हिन्दी अर्थ

स च वै गार्हपत्योऽग्निः प्रथमो ब्रह्मणः स्मृतः कावेरीं कृष्णवेणां च नर्मदां यमुनां तथा। गोदावरीं वितस्तां च चन्द्रभागामिरावतीम्

English

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अध्याय ४४

श्लोक 69

नाशुचिर्नाप्यविद्वान् हि यो भोजेष्वभ्यजायत आहुकस्य भृतिं प्राप्ता इत्येतद्वै तदुच्यते

nāśucirnāpyavidvān hi yo bhojeṣvabhyajāyata āhukasya bhṛtiṃ prāptā ityetadvai taducyate

हिन्दी अर्थ

विपाशां कौशिकों चैव शतद्रुं सरयूं तथा। सीतां मनस्विनीं चैव ह्रादिनीं पावनां तथा उनको मैं विभागपूर्वक पृथक्-पृथक् नामनिर्देशानुसार बतला रहा हूँ । सर्वप्रथम पावन नामक लौकिक अग्निदेव हुए, जो ब्रह्माके पुत्र हैं। उनके पुत्र ब्रह्मौदनाग्नि हुए, जो भरत नामसे भी विख्यात हैं। वैश्वानर नामक अग्नि सौ वर्षोतक हव्यको वहन करते रहे। पुष्कर (या आकाश)-का मन्थन करनेपर अथर्वाके पुत्ररूपमें जो अग्नि उत्पन्न हुए, वे दध्यङ्झथर्वणके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्हींको दक्षिणाग्नि भी कहा जाता है। भृगुसे

English

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अध्याय ४४

श्लोक 70

आहुकश्चाप्यवन्तीषु स्वसारं चाहुकीं ददौ आहुकात्काश्यदुहिता द्वौ पुत्रौ समसूयत

āhukaścāpyavantīṣu svasāraṃ cāhukīṃ dadau āhukātkāśyaduhitā dvau putrau samasūyata

हिन्दी अर्थ

अथर्वाको और अथर्वासे अङ्गिराकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। उनसे अलौकिक अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिसे दक्षिणाग्नि भी कहते हैं हम पहले कह चुके हैं कि जो पवमान अग्नि हैं वे ही निर्मथ्य नामसे भी कहे जाते हैं। वे ही ब्रह्माके प्रथम पुत्र गार्हपत्य अग्नि हैं । फिर संशतिसे सभ्य और आवसथ्य-इन दो पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई तदनन्तर आहवनीय

English

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अध्याय ४४

श्लोक 71

देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमाव् उभौ देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः

devakaścograsenaśca devagarbhasamāv ubhau devakasya sutā vīrā jajñire tridaśopamāḥ

हिन्दी अर्थ

नामक अग्निने जिन्हें ब्राह्मणोंने अग्निके अभिमानी देवता नामसे अभिहित किया है, अपनेको सोलह भागोंमें विभक्त कर कावेरी, कृष्णवेणा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा, इरावती, विपाशा, कोशिकी (कोसी), पावना-इन सोलह नदियोंके साथ पृथक्-पृथक् विहार किया। उनके साथ विहार करते समय अग्निको स्थान- प्राप्तिको इच्छा उत्पन्न हो गयी थी, इसलिये उन नदियोंके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र उस इच्छाके अनुसार धिष्णु (या धिष्ण्य) कहलाये। चूँकि वे यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थानपर पैदा हुए थे, इसलिये धिष्णु नामसे कहे जाने लगे। इस प्रकार ये सभी नदीपुत्र धिष्ण्य (यज्ञिय अग्निके स्थापनयोग्य स्थान)-में उत्पन्न हुए थे। अब इनके विहार

English

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अध्याय ४४

श्लोक 72

देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ

devavānupadevaśca sudevo devarakṣitaḥ teṣāṃ svasāraḥ saptāsan vasudevāya tā dadau

हिन्दी अर्थ

एवं उपासनायोग्य स्थानका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। यज्ञादि पुण्य अवसरके उपस्थित होनेपर विभु, प्रवाहण, अग्नीध्र आदि अन्यान्य धिष्णु वहाँ उपस्थित होकर यथास्थान विचरते रहते हैं । अब अनिर्देश्य और अनिवार्य अग्नियोंके क्रमको सुनिये। वासव नामक अग्नि, जिसे कृशानु भी कहते हैं, यज्ञकी दूसरी वेदीके उत्तर भागमें स्थित होते हैं। उन्हीं अग्निका एक नाम सम्राट् भी है। इन अग्निके आठ पुत्र हैं, जिनकी विप्रगण उपासना करते हैं।

English

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अध्याय ४४

श्लोक 73

देवकी श्रुतदेवी च मित्रदेवी यशोधरा श्रीदेवी सत्यदेवी च सुतापी चेति सप्तमी

devakī śrutadevī ca mitradevī yaśodharā śrīdevī satyadevī ca sutāpī ceti saptamī

हिन्दी अर्थ

इन अग्रियोंकी वैदिक २१ यज्ञसंस्थाओंमें बड़ी प्रतिष्ठा है। इनका विस्तृत विवरण आश्वलायनादि (२। १-२) श्रौत्रसूत्रो, कौशिकसूत्र, महाभारत, ब्रह्माण्डपुराणादिमें है । वासुदेवशरण अग्रवालने ॥/३।७/2 ७३१ 9६७०५ में, अनेक कर्मोमें अग्निनाम संग्रहमें विधानपारिजातकारने तथा 'यज्ञमीमांसा' ग्रन्थमें वेणीराम शर्माने बहुत श्रम किया है। पावकोष्णः समूह्मस्तु वोत्तरे सोऽग्निरुच्यते ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा ब्रह्मस्थानीय उच्यते। अजैकपादुपस्थेयः स वै शालामुखो यतः

English

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अध्याय ४४

श्लोक 74

नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषां तु पूर्वजः न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कः शङ्कुश्च भूयसः

navograsenasya sutāḥ kaṃsasteṣāṃ tu pūrvajaḥ nyagrodhaśca sunāmā ca kaṅkaḥ śaṅkuśca bhūyasaḥ

हिन्दी अर्थ

अपां योनिः स्मृतः स्वाम्भः सेतुर्नाम विभाव्यते। धिष्ण्य आहरणा होते सोमेनेज्यन्त वै द्विजैः ततो यः पावको नाम्ना यः सद्धिर्योग उच्यते। अग्निः सोऽवभृथो ज्ञेयो वरुणेन सहेज्यते

English

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अध्याय ४४

श्लोक 75

अजभू राष्ट्रपालश्च युद्धमुष्टिः सुमुष्टिदः तेषां स्वसारः पञ्चासन् कंसा कंसवती तथा

ajabhū rāṣṭrapālaśca yuddhamuṣṭiḥ sumuṣṭidaḥ teṣāṃ svasāraḥ pañcāsan kaṃsā kaṃsavatī tathā

हिन्दी अर्थ

सहरक्षस्तु वै कामान् गृहे स वसते नृणाम्। क्रव्यादग्निः सुतस्तस्य पुरुषान् योऽत्ति वै मृतान् इत्येते पावकस्याग्रेद्विजैः पुत्राः प्रकीर्तिताः । ततः सुतास्तु सौवीर्याद् गन्धर्वैरसुरैहृताः आयुर्नाप्ना तु भगवान् पशौ यस्तु प्रणीयते

English

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अध्याय ४४

श्लोक 76

सुतन्तू राष्ट्रपाली च कङ्का चेति वराङ्गनाः उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः

sutantū rāṣṭrapālī ca kaṅkā ceti varāṅganāḥ ugrasenaḥ sahāpatyo vyākhyātaḥ kukurodbhavaḥ

हिन्दी अर्थ

पवमान नामक जो द्वितीय अग्नि हैं, वे पर्जन्यके रूपमें देखे जाते हैं और उत्तर दिशामें स्थित पावक नामक अग्निको समूह्य अग्नि कहा जाता है। असम्मृज्य हव्यसूद अग्निको शामित्र कहा जाता है। शतधामा अग्नि सुधाज्योति हैं, इन्हें ौद्रैश्चर्य नामसे अभिहित किया जाता है। ब्रह्मज्योति अग्निको वसुधाम और ब्रह्मस्थानीय भी कहते हैं। अजैकपाद् उपासनीय अग्नि हैं, इन्हें शालामुख भी कहा जाता है। अहिर्बुध्न्य अनिर्देश्य अग्नि हैं, ये वेदीकी दक्षिण दिशामें परिधिके

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Here ende the forty-fourth chapter describing the Soma dynasty.

अध्याय ४४

श्लोक 77

भजमानस्य पुत्रो ऽथ रथिमुख्यो विदूरथः राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतो ऽभवत्

bhajamānasya putro 'tha rathimukhyo vidūrathaḥ rājādhidevaḥ śūraśca vidūrathasuto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

अन्तमें स्थित होते हैं। वासव नामक अग्निके ये आठों पुत्र ब्राह्मणाँद्वारा उपासनीय बतलाये गये हैं॥ ११--२३॥ अब मैं उन आठ विहरणीय अग्निपुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ । बर्हिष् नामक होत्रिय अग्निके पुत्र हव्यवाहन अग्नि हैं । इसके पश्चात् प्रचेता नामक प्रशंसनीय अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिनका दूसरा नाम संसहायक है। पुनः आग्निपुत्र विश्ववेदा हुए, जिन्हें ब्राह्मणाच्छंसिः भी कहा जाता है। जलसे उत्पन्न होनेवाले प्रसिद्ध स्वाम्भ अग्नि सेतु नामसे भी अभिहित होते हैं। इन धिष्ण्यसंज्ञक अग्नियोंका यज्ञमें यथास्थान आवाहन होता है और ब्राह्मणलोग सोम-रसद्दारा

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अध्याय ४४

श्लोक 78

राजाधिदेवस्य सुतौ जज्ञाते देवसंमितौ नियमव्रतप्रधानौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः

rājādhidevasya sutau jajñāte devasaṃmitau niyamavratapradhānau śoṇāśvaḥ śvetavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

इनकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् जो पावक नामक अग्नि हैं, जिन्हें सत्पुरुषगण योग नामसे पुकारते हैं, उन्हींको अवभृथ अग्निः समझना चाहिए। उनकी वरुणके साथ पूजा होती है। हृदय नामक अग्निके पुत्र मन्युमान् हैं, जिन्हें जठराग्नि भी कहते हैं। ये मनुष्योंके उदरमें स्थित रहकर भक्षित पदार्थोंको पचाते हैं । परस्परके संघर्षसे उत्पन्न हुए प्रभावशाली अग्निको, जो जगत्में निरन्तर प्राणियोंको जलाते रहते हैं, विद्धाग्रि कहते हैं । मन्युमान् अग्निके पुत्र संवर्तक हैं जो

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अध्याय ४४

श्लोक 79

शोणाश्वस्य सुताः पञ्च शूरा रणविशारदाः शमी च देवशर्मा च निकुन्तः शक्रशत्रुजित्

śoṇāśvasya sutāḥ pañca śūrā raṇaviśāradāḥ śamī ca devaśarmā ca nikuntaḥ śakraśatrujit

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त भयंकर बताये जाते हैं। वे समुद्रमें बडवामुखद्वारा निरन्तर जलपान करते हुए निवास करते हैं । समुद्रवासी संवर्तक अग्निके पुत्र सहरक्ष बतलाये जाते हैं । सहरक्ष मनुष्योंके घरोंमें निवास करते हैं और उनकी सभी कामनाओंको सम्पन्न करते रहते हैं । सहरक्षके पुत्र क्रव्यादग्नि हैं, जो मरे हुए पुरुषोंका भक्षण करते हैं । इस प्रकार ये सभी ब्राह्मणोंद्वारा पावक नामक अग्निके पुत्र बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य पुत्र हैं, उन्हें सौवीर्यसे गन्धर्वो और असुरोंने हरण कर लिया था। अरणीमें मन्थन करनेसे जो अग्नि उत्पन्न होता है, वह तो इन्धनके आश्रित रहता है। पृथु-योनिके लिये जिन अग्निकी नियुक्ति हुई है, उन ऐश्वर्यशाली अग्निका नाम आयु है। आयुके पुत्र महिमान्

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अध्याय ४४

श्लोक 80

शमिपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः प्रतिक्षेत्रः सुतो भोजो हृदीकस्तस्य चात्मजः

śamiputraḥ pratikṣatraḥ pratikṣatrasya cātmajaḥ pratikṣetraḥ suto bhojo hṛdīkastasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

और उनके पुत्र दहन हैं, जो पाकयज्ञोंके अभिमानी देवता पाकसज्ञेष्वभीमानी हुतं हव्यं भुनक्ति यः॥ ३४ हैं। वे ही उन यज्ञोंमें हवन किये गये हविको खाते हैं।

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अध्याय ४४

श्लोक 81

हृदीकस्याभवन्पुत्रा दश भीमपराक्रमाः कृतवर्माग्रजस् तेषां शतधन्वा च मध्यमः

hṛdīkasyābhavanputrā daśa bhīmaparākramāḥ kṛtavarmāgrajas teṣāṃ śatadhanvā ca madhyamaḥ

हिन्दी अर्थ

१. यह अग्निष्टोमके १६ ऋत्विजॉमेंसे भी एक होता है, जिसका इस अग्निपरिचर्यासे विशेष सम्बन्ध होता है। २. यज्ञान्तहवन एबं अवभृथ स्नानके समय इसका उपयोग होता है। सर्वस्माद् देवलोकाच्च हव्यं कव्यं भुनक्ति य: । पुत्रोऽस्य स हितो ह्यग्निरद्भुतः स महायशाः अद्भुतस्य सुतो वीरो देवांशस्तु महान् स्मृतः

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अध्याय ४४

श्लोक 82

देवार्हश्चैव नाभश्च भीषणश्च महाबलः अजातो वनजातश्च कनीयककरम्भकौ

devārhaścaiva nābhaśca bhīṣaṇaśca mahābalaḥ ajāto vanajātaśca kanīyakakarambhakau

हिन्दी अर्थ

विविधाग्निसुतादर्कादग्रयोऽष्टौ सुताः स्मृताः काम्यास्विष्टिष्वभीमानी रक्षोहा यतिकृच्च यः। सुरभिर्वसुमान् नादो ह्यार्यश्चश्चैव रुक्मवान्

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अध्याय ४४

श्लोक 83

देवार्हस्य सुतो विद्वाञ् जज्ञे कम्बलबर्हिषः असामञ्जाः सुतस्तस्य तमोजातस्य चात्मजः

devārhasya suto vidvāñ jajñe kambalabarhiṣaḥ asāmañjāḥ sutastasya tamojātasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रवर्ग्यः क्षेमवांश्चैव इत्यष्टौ च प्रकीर्तिताः। शुच्यग्नेस्तु प्रजा होषा अग्नयश्च चतुर्दश काम्यनैमित्तिकाद्यास्ते ये ते कर्मस्ववस्थिताः एते देवगणैः सार्धं प्रथमस्यान्तरे मनोः

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अध्याय ४४

श्लोक 84

अजातपुत्रा विक्रान्तास् त्रयः परमकीर्तयः सुदंष्ट्रश्च सुनाभश्च कृष्ण इत्यन्धका मताः

ajātaputrā vikrāntās trayaḥ paramakīrtayaḥ sudaṃṣṭraśca sunābhaśca kṛṣṇa ityandhakā matāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्तन्ते वर्तमानेश्च॒ यामैर्देवैः सहाग्रय: दहनके पुत्र अद्भुत नामक अग्नि हैं, जो समस्त देवलोकोंमें दिये गये हव्य एवं कव्यका भक्षण करते हैं। वे महान् यशस्वी और जनताके हितकारी हैं। ये प्रायक्षित्तनिमित्तक यज्ञोंके अभिमानी देवता हैं, इसी कारण उन यज्ञोंमें हवन

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अध्याय ४४

श्लोक 85

अन्धकानामिमं वंशं यः कीर्तयति नित्यशः आत्मनो विपुलं वंशं प्रजावानाप्नुते नरः

andhakānāmimaṃ vaṃśaṃ yaḥ kīrtayati nityaśaḥ ātmano vipulaṃ vaṃśaṃ prajāvānāpnute naraḥ

हिन्दी अर्थ

किये गये हव्यको खाते हैं। अद्धुतके पुत्र वीर नामक अग्नि हैं, जो देवांशसे उद्भूत और महान् कहे जाते हैं । उनके पुत्र विविधाग्नि हैं और विविधाग्निके पुत्र महाकवि हैं। विविधाग्रिके दूसरे पुत्र अर्कसे आठ अग्नि-पुत्रोंकी उत्पत्ति बतलायी जाती है॥ २४--३७॥ कामना-पूर्तिके निमित्त किये जानेवाले यज्ञोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका नाम रक्षोहा अग्नि है। उनका दूसरा नाम यतिकृत भी है। इनके अतिरिक्त सुरभि,

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 44
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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