अध्याय ४५
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ४५ गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्
matsya-purāṇa 45 gāndhārī caiva mādrī ca vṛṣṇibhārye babhūvatuḥ gāndhārī janayāmāsa sumitraṃ mitranandanam
हिन्दी अर्थ
आठ अग्नि कहे गये हैं। ये सभी शुचि नामक अग्निकी संतान हैं । इन सबकी संख्या चौदह है । इस प्रकार मैंने उन सभी अग्नियोंका वर्णन कर दिया, जिनका यज्ञ-कार्यमें प्रयोग किया जाता है। प्रलयकालमें ये सभी अग्निपुत्र याम नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सभी चेतन एवं अचेतन विहरणीय पदार्थोके अभिमानी देवता थे। इस पूर्व मन्वन्तरके समाप्त हो जानेपर पुनः प्रथम मन्वन्तरमें ये सभी अग्निगण शुक्र एवं याम नामक देवगणोंके
English
Suta. — GandhArl and Madri were ilje wives of Vrisni, and Sumitra, the rejoicer of his frieiu-s, was born from Grindhari. Msidri begot five sons, named YndliAjita, Dovainidhnsa, Anamitra, Sibi, Kritalakana. — 1-2.