Matsya Purana· Matsya Purāṇa
45
अध्याय 45 / 176

Adhyaya 45

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पूर्ण अध्याय पाठ34 श्लोक

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अध्याय ४५

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ४५ गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्

matsya-purāṇa 45 gāndhārī caiva mādrī ca vṛṣṇibhārye babhūvatuḥ gāndhārī janayāmāsa sumitraṃ mitranandanam

हिन्दी अर्थ

आठ अग्नि कहे गये हैं। ये सभी शुचि नामक अग्निकी संतान हैं । इन सबकी संख्या चौदह है । इस प्रकार मैंने उन सभी अग्नियोंका वर्णन कर दिया, जिनका यज्ञ-कार्यमें प्रयोग किया जाता है। प्रलयकालमें ये सभी अग्निपुत्र याम नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सभी चेतन एवं अचेतन विहरणीय पदार्थोके अभिमानी देवता थे। इस पूर्व मन्वन्तरके समाप्त हो जानेपर पुनः प्रथम मन्वन्तरमें ये सभी अग्निगण शुक्र एवं याम नामक देवगणोंके

English

Suta. — GandhArl and Madri were ilje wives of Vrisni, and Sumitra, the rejoicer of his frieiu-s, was born from Grindhari. Msidri begot five sons, named YndliAjita, Dovainidhnsa, Anamitra, Sibi, Kritalakana. — 1-2.

अध्याय ४५

श्लोक 2

माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम् अनमित्रं शिबिं चैव पञ्चमं कृतलक्षणम्

mādrī yudhājitaṃ putraṃ tato vai devamīḍhuṣam anamitraṃ śibiṃ caiva pañcamaṃ kṛtalakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

साथ स्थानाभिमानी देवता बनकर अग्नीध्र नामक अग्निके साथ हव्य-वहनका कार्य करते थे और काम्य एवं नैमित्तिक आदि जो यज्ञ किये जाते थे, उन कर्मोमें अवस्थित रहते थे। इस प्रकार मैंने अग्नियोंकी स्थाननाम्नी योनियोंका वर्णन कर दिया। उन्हें स्वारोचिष् मन्वन्तरसे लेकर सावर्णि मन्वन्तरतकके सातों लोकोंमें वर्तमान जानना चाहिए । ऋषियोंने वर्तमान एवं भविष्यमें आनेवाली सभी मन्वन्तरोंमें इसी प्रकार अग्नियोंके लक्षणका वर्णन किया है। ये सभी अग्नि समस्त मन्वन्तरोंमें नाना प्रकारके रूप और प्रयोजनोंसे समन्वित हो वर्तमानकालीन याम नामक देवताओंके साथ वर्तमान थे और इस समय भी हैं तथा भविष्यमें भी उत्पन्न होकर

English

Ananiitra became the father of Nighva. who begot two sons, viz. the most powerful Prasena and J>aklisena, e.lso known as Satrajita. — X

अध्याय ४५

श्लोक 3

अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि तु द्वौ सुतौ प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च ताव् उभौ

anamitrasuto nighno nighnasyāpi tu dvau sutau prasenaśca mahāvīryaḥ śaktisenaśca tāv ubhau

हिन्दी अर्थ

इन नये उत्पन्न होनेवाले देवगणोंके साथ निवास करेंगे। इस प्रकार मैं अग्नियोंके वंश-समूहका क्रमशः विस्तारपूर्वक आनृपूर्वी वर्णन कर चुका। अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ३८--४७॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽग्रिवंशो नामैकपञ्चाशोऽध्यायः

English

Prasena possessed Syamantaka, which UcMs the best of all gems on the earth, and was known as the king of all gems. Prasena u*-ed always to wear his beautiful Svaniantaka jewel on his breast, ami Kri>na more than once expressed a desire to ha\(' it, but was refused by Prasena; and even though Kri>na was powerful to take it by fordtf., he did fiot like to do that. — 4-5.

अध्याय ४५

श्लोक 4

स्यमन्तकः प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमम् पृथिव्यां सर्वरत्नानां राजा वै सो ऽभवन्मणिः

syamantakaḥ prasenasya maṇiratnamanuttamam pṛthivyāṃ sarvaratnānāṃ rājā vai so 'bhavanmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अग्निवंश-वर्णन नामक इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कर्मयोगकी महत्ता इदानीं प्राह यद् विष्णु: पृष्टः परममुत्तमम्।

English

Once upon a time, Prasena wearing his Syamantaka gem went out for a hunt, when Itearing the voic(?s of some wild beasts in a cave he entered it and found a bear inside, and ihej looked at each other. He fonglit with the anifual, but was killed by the iaitm'. After that, tl.e boar t< ok the matchless jewel fnjtn the pers'>n of iIh* dead King and retired into tlie deeper cavities of the cave. In the. mcantiine the iicws of Prasena's death became public. — fi-8.

अध्याय ४५

श्लोक 5

हृदि कृत्वा तु बहुशो मणिं तमभियाचितः गोविन्दो ऽपि न तं लेभे शक्तो ऽपि न जहार सः

hṛdi kṛtvā tu bahuśo maṇiṃ tamabhiyācitaḥ govindo 'pi na taṃ lebhe śakto 'pi na jahāra saḥ

हिन्दी अर्थ

तमिदानीं समाचक्ष्व धर्माधर्मस्य विस्तरम् एवमेकार्णवे तस्मिन् मत्स्यरूपी जनार्दनः ।

English

Knowing him to be dead, Sriki'isna was dismayed. Someone gave currency to the rumour that lrasena was murdered by K| isna for the sake of the Syamantaka gem. It was insinuated that Prasena went out wearing his priceless vSyamantaka gem and was decidedly killed by Kri.sna, who usurped the jewel from him. Satrajita, the brother of the deceased, also thought the same.— 'IMl.

अध्याय ४५

श्लोक 6

कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः यथाशब्दं स शुश्राव बिले सत्त्वेन पूरिते

kadācinmṛgayāṃ yātaḥ prasenastena bhūṣitaḥ yathāśabdaṃ sa śuśrāva bile sattvena pūrite

हिन्दी अर्थ

कर्मयोगं च सांख्यं च यथावद् विस्तरान्वितम्॥ श्रोतुमिच्छामहे सूत कर्मयोगस्य लक्षणम्। यस्मादविदितं लोके न किंचित् तव सुव्रत॥ कर्मयोगं च वक्ष्यामि यथा विष्णुविभाषितम्। ज्ञानयोगसहस्त्राद्धि कर्मयोगः प्रशस्यते॥ कर्मयोगोद्भवं ज्ञानं तस्मात् तत्परमं पदम्। कर्मज्ञानोद्भवं ब्रह्म न च ज्ञानमकर्मणः॥

English

Sometime after Srikrihtia, also went out to hunt in the forest and approached the very cave of the bear, wlien tbe beast seeing him began to groan and growl, at which he entered the cave with sword in hand. He found the bear to be Jambavanta, the King of all bears. He then hastily, with great valour, made tTambavanfa a captive and then turned his eyes full of wrath towards him. The King of the bears then pleased JiOrd Srtkrisvia, the manifestation of Visnu, witli his devotion. — 12-15.

अध्याय ४५

श्लोक 7

ततः प्रविश्य स बिलं प्रसेनो ह्य् ऋक्षमैक्षत ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चैव प्रसेनजित्

tataḥ praviśya sa bilaṃ praseno hy ṛkṣamaikṣata ṛkṣaḥ prasenaṃ ca tathā ṛkṣaṃ caiva prasenajit

हिन्दी अर्थ

तस्मात् कर्मणि युक्तात्मा तत्त्वमाप्रोति शाश्चतम्। वेदोऽखिलो धर्ममूलमाचारश्चैव तद्विदाम्॥ अनसूया तथा लोके शौचमन्तर्बहिद्विजाः।

English

Kripa becoming pleased wanted to grant him some boon. Jambav&nta aid I wish that 1 may be killed by Thee, 0 Lord, through the striking

अध्याय ४५

श्लोक 8

हत्वा ऋक्षः प्रसेनं तु ततस्तं मणिमाददात् अदृष्टस्तु हतस्तेन अन्तर्बिलगतस्तदा

hatvā ṛkṣaḥ prasenaṃ tu tatastaṃ maṇimādadāt adṛṣṭastu hatastena antarbilagatastadā

हिन्दी अर्थ

अनायासेषु कार्येषु माङ्कल्याचारसेवनम् न च द्रव्येषु कार्पण्यमार्तेषूपार्जितेषु च। ऋषियोंने पूछा-सूतजी! सूर्यपुत्र मनुद्वारा पूछे जानेपर भगवान् विष्णुने उनसे धर्म और अधर्मके जिस परम उत्तम प्रसङ्गको विस्तारपूर्वक कहा था, वह इस समय आप हमलोगोंको बतलाइये

English

dBAPfBB XLV.

अध्याय ४५

श्लोक 9

प्रसेनं तु हतं ज्ञात्वा गोविन्दः परिशङ्कितः गोविन्देन हतो व्यक्तं प्रसेनो मणिकारणात्

prasenaṃ tu hataṃ jñātvā govindaḥ pariśaṅkitaḥ govindena hato vyaktaṃ praseno maṇikāraṇāt

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! प्रलयकालके उस एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपधारी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने सूर्यपुत्र मनुके प्रति सर्गके विस्तारका पूर्णरूपसे वर्णन किया था। साथ ही कर्मयोग और सांख्ययोगको भी उन्हें विस्तारपूर्वक यथार्थरूपसे बतलाया था (उसे ही मैं आपलोगोंको सुनाना चाहता हूँ)

English

of Sudartfana Chakra, and this auspicious daughter of mine be accepted by Thee as Thy wife. This gem which 1 had obtained, 0 Lord, by killing Prasena, be accepted by Thee. — 16-17.

अध्याय ४५

श्लोक 10

प्रसेनस्तु गतो ऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः तं दृष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह हन्मि चैनं दुराचारं शत्रुभूतं हि वृष्णिषु

prasenastu gato 'raṇyaṃ maṇiratnena bhūṣitaḥ taṃ dṛṣṭvā sa hatastena govindaḥ pratyuvāca ha hanmi cainaṃ durācāraṃ śatrubhūtaṃ hi vṛṣṇiṣu

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले सूतजी! आपके लिये लोकमें कोई वस्तु आज्ञात तो है नहीं, अतः हमलोग आपसे कर्मयोगका लक्षण सुनना चाहते हैं सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! विष्णुभगवानूने जिस प्रकार कर्मयोगकी व्याख्या की थी, उसे मैं बतला रहा हूँ । कर्मयोग ज्ञानयोगसे हजारोंगुना अधिक प्रशस्त है; क्योंकि ज्ञान कर्मयोगसे ही प्रादुर्भूत होता है; अत: वह परमपद है। ब्रह्म भी कर्मज्ञानसे उद्भूत होता है । कर्मके बिना तो ज्ञानकी सत्ता ही नहीं है। इसीलिये कर्मयोगके अभ्यासमें संलग्न मनुष्य अविनाशी तत्त्वको प्राप्त कर लेता है । सम्पूर्ण वेद और वेदज्ञोंके आचार-विचार धर्मके मूल हैं । उनमें आठ प्रकारके

English

After that, Kria killed Jsimbavanta by his Sudanjana Chakra and then returned with the Syamantaka and the daughter of the King of bears, named JSrabayatl. — 18.

अध्याय ४५

श्लोक 11

अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः यदृच्छया च गोविन्दो बिलस्याभ्याशमागमत्

atha dīrgheṇa kālena mṛgayāṃ nirgataḥ punaḥ yadṛcchayā ca govindo bilasyābhyāśamāgamat

हिन्दी अर्थ

आत्मगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहते हैं; जैसे समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, दुःखसे पीडित प्राणीको आश्वासन प्रदान करना और उसकी रक्षा करना, जगत्में किसीसे ईर्ष्या द्वेष न करना, बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता, परिश्रमरहित अथवा अनायास प्राप्त हुए कार्योके अवसरपर उन्हें माङ्गलिक आचार- व्यवहारके द्वारा सम्पन्न करना, अपने द्वारा उपार्जित ्रव्योंसे दीन-दुखियोंकी सहायता करते समय कृपणता न करना तथा पराये धन और परायी स्त्रीके प्रति सदा निःस्पृह

English

Then Kfisna presented Syamantaka to Satrajita in the assemblage of the Satvatas, and told them how much aggrieved he was by the false accusation levelled by them against him. — 19-20.

अध्याय ४५

श्लोक 12

तं दृष्ट्वा तु महाशब्दं स चक्रे ऋक्षराड्बली शब्दं श्रुत्वा तु गोविन्दः खड्गपाणिः प्रविश्य सः अपश्यज्जाम्बवन्तं तम् ऋक्षराजं महाबलम्

taṃ dṛṣṭvā tu mahāśabdaṃ sa cakre ṛkṣarāḍbalī śabdaṃ śrutvā tu govindaḥ khaḍgapāṇiḥ praviśya saḥ apaśyajjāmbavantaṃ tam ṛkṣarājaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

अष्टावात्मगुणाः प्रोक्ताः पुराणस्य तु कोविहैः । अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्य साधकः कर्मयोगं विना ज्ञानं कस्यचिन्नेह दूश्यते। श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममुपतिष्ठेत् प्रयत्नतः कुर्यादहरहर्यज्ञैर्भूतर्षिगणतर्पणम्

English

Then all the Yadavas thus spoke to Vasudeva: — " Our idea was that Prasena was killed by Thee." — 21.

अध्याय ४५

श्लोक 13

ततस्तूर्णं हृषीकेशस् तमृक्षपतिमञ्जसा जाम्बवन्तं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः

tatastūrṇaṃ hṛṣīkeśas tamṛkṣapatimañjasā jāmbavantaṃ sa jagrāha krodhasaṃraktalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

पितृञ्श्राद्धैरन्नदानैर्भूतानि बलिकर्मभिः पञ्चैते विहिता यज्ञा:

English

King Kaikayahad ten daughters, who all were married to Satrajita. The sons born of them were one hundred and one, of worldwide fame and the eldest of them was Bhahgakrua. Then Bliaftgakara begot from his wife Vratavati ihAe graceful and lotus-cred daughters named, Satyabhama the best amongst women, and Vratini, of strong vows, and Padmavati. All three of them were the most virtuous of all women. Satrajita, to please Krina, gave them all in marriage to him. — 22-24.

अध्याय ४५

श्लोक 14

तुष्टावैनं तदा ऋक्षः कर्मभिर्वैष्णवैः प्रभुम् ततस्तुष्टस्तु भगवान् वरेणैनमरोचयत्

tuṣṭāvainaṃ tadā ṛkṣaḥ karmabhirvaiṣṇavaiḥ prabhum tatastuṣṭastu bhagavān vareṇainamarocayat

हिन्दी अर्थ

तत्पापनाशनायामी पञ्च यज्ञाः प्रकीर्तिताः द्वात्रिंशच्च तथाष्टौ च ये संस्काराः प्रकीर्तिताः । तद्युक्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्वात्मगुणवर्जितः तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकर्म समाचरेत्। गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत्

English

Auamitra, the youngest of the sons of Vrisni, was the father of Sini, whose son was Satyaka, whose son was Satyaka. Yuyudhana, the truthful, was the grandson of Sini and was powerful. Asahga was the son of Yuyudhana and the father of Dyuinna. Yugandhara was the son of Dyuinna. This is how the family of ini has been described. — 25-26.

अध्याय ४५

श्लोक 15

इच्छे चक्रप्रहारेण त्वत्तो ऽहं मरणं प्रभो कन्या चेयं मम शुभा भर्तारं त्वामवाप्नुयात् यो ऽयं मणिः प्रसेनं तु हत्वा प्राप्तो मया प्रभो

icche cakraprahāreṇa tvatto 'haṃ maraṇaṃ prabho kanyā ceyaṃ mama śubhā bhartāraṃ tvāmavāpnuyāt yo 'yaṃ maṇiḥ prasenaṃ tu hatvā prāpto mayā prabho

हिन्दी अर्थ

गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकेन पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्रवस्वात्मकं शिवम् वासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयो हामी

English

The family'of Animitra belonging to the Vri§ni clan, has been thus described: Animitra was the father of Yudh&jita, the brave, whose brothers were Vfisabha and Katra, both great heroes. Vriabha was married to the daughter of the King of Kadi. His wife, Jayanti, bore him Jayanta who performed many sacrifices and was renowned for his prowess and hospit- ality.—27-29.

अध्याय ४५

श्लोक 16

ततः स जाम्बवन्तं तं हत्वा चक्रेण वै प्रभुः कृतकर्मा महाबाहुः सकन्यं मणिमाहरत्

tataḥ sa jāmbavantaṃ taṃ hatvā cakreṇa vai prabhuḥ kṛtakarmā mahābāhuḥ sakanyaṃ maṇimāharat

हिन्दी अर्थ

रहना-पुराणोंके ज्ञाता विद्वानोंद्वारा ये आठ आत्मगुण बतलाये गये हैं। यही कर्मयोग ज्ञानयोगका साधक है। जगत्में कर्मयोगके बिना किसीको ज्ञानकी प्राप्ति हुई हो, ऐसा नहीं देखा गया है; इसलिये श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा कहे गये धर्मका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए। प्रतिदिन सर्वदा साथ ही पितरों और ऋषियोंके तर्पणका कार्य भी कर्तव्य है । विद्वान् पुरुषको चाहिए कि वह स्वाध्यायद्वारा देवताओंकी, हवनद्वारा ऋषियोंको, श्राद्धद्वारा पितरोंकी, अन्नद्वारा अतिथियोंकी तथा बलिकर्मद्वारा मृत प्राणियोंकी विधिपूर्वक अर्चना करे।

English

Jayanta was the father of Akrdra, who was also famous for the per* formance of sacrifices and giving of many presents. He was married to Ratn&, the daughter of Saivya from whom he begot eleven sous, viz. — Upalambha, SadMambha, Vrikala, Virya, Sini (Savitara), Mahdpaka, (Sadapak§a), Satrughna, Vdrimojaya, Dharmabhrit, Dharinavarmd and Dbristam&na. Those sons of Ratnd were all very pious.— 31-33.

अध्याय ४५

श्लोक 17

ददौ सत्राजितायैनं सर्वसात्वतसंसदि तेन मिथ्यापवादेन संतप्तो ऽयं जनार्दनः

dadau satrājitāyainaṃ sarvasātvatasaṃsadi tena mithyāpavādena saṃtapto 'yaṃ janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

गृहस्थोंके घरमें जीवहिंसाके पाँच प्रकारके स्थानोंपर घटित हुए पापकी निवृत्तिके लिये इन पाँच प्रकारके यज्ञोंका विधान बतलाया गया है गृहस्थके घरमें जीवहिंसाके पाँच स्थान ये हैं-कण्डनी (वस्तुओंके कूटनेका पात्र ओखली, खरल आदि), पेषणी (पीसनेका उपकरण चक्की, सिलवट

English

AkrQra was also the father of two sons, named Devavdna and Upadeva, from his other wife, Ugrasend. Both of them were handsome like the Devds. — 34.

अध्याय ४५

श्लोक 18

ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन् अस्माकं तु मतिर्ह्यासीत् प्रसेनस्तु त्वया हतः

tataste yādavāḥ sarve vāsudevamathābruvan asmākaṃ tu matirhyāsīt prasenastu tvayā hataḥ

हिन्दी अर्थ

घड़े) और प्रमार्जनी ( झाडू आदि) । इन स्थानोंपर उत्पन्न हुए पापके कारण गृहस्थ पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता, अत: उन पापोंके विनाशके लिये ये पाँचों यज्ञ बतलाये गये हैं ॥ ५-- १६ ॥ द्विजातियोंके लिये जो चालीस प्रकारके संस्कार बतलाये गये हैं, उनसे संस्कृत होनेपर भी जो मनुष्य (उपर्युक्त आठ) आत्मगुणोंसे रहित है, वह मोक्षका भागी नहीं हो सकता। इसलिये आत्मगुणोंसे सम्पन्न होकर ही वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिए। गृहस्थको सदा उपार्जित धनद्वारा गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण करना चाहिए उसका कर्तव्य है कि वह ब्रत एवं उपवास आदि करके गौ, पृथ्वी, सुवर्ण, वस्त्र, गन्ध, माला और जल आदिसे ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, रुद्र और वसुस्वरूप

English

Besides them, Akrfira had the following sons from his wife, Adrint Pfithu, Vipfithu, Aiivathdnil, SabAhn, Sup&nSva, Gavesana, Vpiitinemi, Sudharmas, Sarydti, AbhAmi, Vajrabhdmi, Sramistha and Sravapa. --35-36.

अध्याय ४५

श्लोक 19

कैकेयस्य सुता भार्या दश सत्राजितः शुभाः तासूत्पन्नाः सुतास्तस्य शतमेकं तु विश्रुताः ख्यातिमन्तो महावीर्या भङ्गकारस्तु पूर्वजः

kaikeyasya sutā bhāryā daśa satrājitaḥ śubhāḥ tāsūtpannāḥ sutāstasya śatamekaṃ tu viśrutāḥ khyātimanto mahāvīryā bhaṅgakārastu pūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

शिवको श्रद्धापूर्वक विधिसहित पूजा करे; इसमें कृपणता न करे । जो ये इन्द्रियोंके अगोचर, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अव्यक्त, अविनाशी एवं विश्वस्वरूप भगवान् वासुदेव हैं,

English

Srilirinpa saved Himself from the calumny of stealing the Sysmantaka jewel, by killing Jarabavana. One who hears or recites to others this piece, will never be liable to be falsely defamed a thief. — 37.

अध्याय ४५

श्लोक 20

अथ व्रतवती तस्माद् भङ्गकारात्तु पूर्वजात् सुषुवे सुकुमारीस्तु तिस्रः कमललोचनाः

atha vratavatī tasmād bhaṅgakārāttu pūrvajāt suṣuve sukumārīstu tisraḥ kamalalocanāḥ

हिन्दी अर्थ

ये १३-१६ तकके ४ श्लोक मनुस्मृति ३। ६८-७१ में भी प्राप्त होते हैं। और आठ गुणोंके निर्देशक श्लोक गौतमधर्मसूत्र शुक स० २१। १७१, चाणक्य० १२। १५ आदिमें उपलब्ध भी हैं। ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् मार्तण्डो वृषवाहनः ।

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 21

सत्यभामा वरा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता तथा पद्मावती चैव ताश्च कृष्णाय सो ऽददात्

satyabhāmā varā strīṇāṃ vratinī ca dṛḍhavratā tathā padmāvatī caiva tāśca kṛṣṇāya so 'dadāt

हिन्दी अर्थ

अष्टौ च वसवस्तद्ददेकादश गणाधिपाः। लोकपालाधिपाश्चैव पितरो मातरस्तथा ब्रह्माद्याश्चतुरो मूलमव्यक्ताधिपतिः स्मृतः

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 22

अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद्वृष्णिनन्दनात् सत्यकस्तस्य पुत्रस्तु सात्यकिस्तस्य चात्मजः

anamitrācchinirjajñe kaniṣṭhādvṛṣṇinandanāt satyakastasya putrastu sātyakistasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणा चाथ सूर्येण विष्णुनाथ शिवेन वा। अभेदात् पूजितेन स्यात् पूजितं सचराचरम् ब्रह्मादीनां परं धाम त्रयाणामपि संस्थितिः । विकर्मभीतस्य सदा न किंचित्

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 23

सत्यवान्युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान् असङ्गो युयुधानस्य द्युम्निस्तस्यात्मजो ऽभवत्

satyavānyuyudhānastu śinernaptā pratāpavān asaṅgo yuyudhānasya dyumnistasyātmajo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

उन्हींकी ये विभूतियाँ हैं । उन विभूतियोंके नाम ये हैं--ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, सूर्य, शिव, आठ वसु, ग्यारह गणाधिप, लोकपालाधी श्वर, पितर और मातृकाएँ । चराचर जगत्सहित ये सभी विभूतियाँ बतलायी गयी हैं । ब्रह्मा आदि चार ( ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, शिव) देवता मूलरूपसे इस जगतूके अव्यक्त अधिपति कहे जाते हैं । इसलिये ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु अथवा शिवकी अभेदभावसे पूजा करनेपर चराचर जगतूकी पूजा सम्पन्न हो जाती है सूर्य ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंके परम

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 24

द्युम्नेर्युगंधरः पुत्र इति शैन्याः प्रकीर्तिताः अनमित्रान्वयो ह्य् एष व्याख्यातो वृष्णिवंशजः

dyumneryugaṃdharaḥ putra iti śainyāḥ prakīrtitāḥ anamitrānvayo hy eṣa vyākhyāto vṛṣṇivaṃśajaḥ

हिन्दी अर्थ

धाम हैं, जिनमें वे निवास करते हैं ।सूर्यदेव वेदोंके मूर्तस्वरूप हैं, अत: इनकी प्रयत्रपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसलिये मनुष्यको चाहिए कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणोंके मुखोंमें इनका आवाहन करके दान, व्रत, उपवास, जप, हवन आदि- द्वारा इनकी पूजा करे। इस प्रकार जो मनुष्य कर्मयोगनिष्ठ, वेदान्तशास्त्र और स्मृतियोंका प्रेमी तथा अधर्मसे सदा भयभीत रहता है, उसके लिये इस लोक अथवा परलोकमें

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 25

अनमित्रस्य संजज्ञे पृथ्व्यां वीरो युधाजितः अन्यौ तु तनयौ वीरौ वृषभः क्षत्र एव च

anamitrasya saṃjajñe pṛthvyāṃ vīro yudhājitaḥ anyau tu tanayau vīrau vṛṣabhaḥ kṣatra eva ca

हिन्दी अर्थ

कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रह जाता, अर्थात् सभी पदार्थ उसके प्राप्तव्यमस्तीह परे च लोके ॥ २६ हस्तगत हो जाते हैं ॥ १७--२६ ॥

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 26

वृषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत जयन्तस्तु जयन्त्यां तु पुत्रः समभवच्छुभः

vṛṣabhaḥ kāśirājasya sutāṃ bhāryāmavindata jayantastu jayantyāṃ tu putraḥ samabhavacchubhaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कर्मयोगमाहात्म्यं नाम द्विपञ्चाशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कर्मयोगमाहात्म्यनामक बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ पुराणसंख्यामाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्। दानधर्ममशेषं तु यथावदनृपूर्वशः

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 27

सदायज्ञो ऽतिवीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः अक्रूरः सुषुवे तस्मात् सदायज्ञो ऽतिदक्षिणः

sadāyajño 'tivīraśca śrutavānatithipriyaḥ akrūraḥ suṣuve tasmāt sadāyajño 'tidakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इदमेव पुराणेषु पुराणपुरुषस्तदा। यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्निबोधत पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 28

रत्ना कन्या च शैब्यस्य अक्रूरस्तामवाप्तवान् पुत्रानुत्पादयामास एकादश महाबलान्

ratnā kanyā ca śaibyasya akrūrastāmavāptavān putrānutpādayāmāsa ekādaśa mahābalān

हिन्दी अर्थ

पुराणमेकमेवासीत् तदा कल्पान्तरेऽनघ। त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया। अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम् मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम्। मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे

English

Here ends the forty-fifth chapter describing the Vrii branch of the Lunar dynasty.

अध्याय ४५

श्लोक 29

उपलम्भः सदालम्भो वृकलो वीर्य एव च सवीतरः सदापक्षः शत्रुघ्नो वारिमेजयः

upalambhaḥ sadālambho vṛkalo vīrya eva ca savītaraḥ sadāpakṣaḥ śatrughno vārimejayaḥ

हिन्दी अर्थ

अशेषमेतत् कथितमुदकान्तर्गतेन श्रुत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवांश्चतुर्मुखः प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत् तत: । कालेनाग्रहणं दृष्टा पुराणस्य ततो नृप

English

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अध्याय ४५

श्लोक 30

धर्मभृद्धर्मवर्माणौ धृष्टमानस्तथैव च सर्वे च प्रतिहोतारो रत्नायां जज्ञिरे च ते

dharmabhṛddharmavarmāṇau dhṛṣṭamānastathaiva ca sarve ca pratihotāro ratnāyāṃ jajñire ca te

हिन्दी अर्थ

तथाष्टादशधा कृत्वा भूर्लोकेऽस्मिन् प्रकाश्यते अद्यापि देवलोकेऽस्मिञ्शतकोटिप्रविस्तरम् ऋषियोंने पूछा-सूतजी! अब आप हमलोगोंसे क्रमशः पुराणोंकी संख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। साथ ही उनके दान और धर्मकी सम्पूर्ण आनृपूर्वी विधि भी यथार्थरूपसे बतलाइये सूतजी कहते हैं-ऋषियो! ऐसे ही प्रश्नके उत्तरमें उस समय पुराणपुरुष विश्वात्मा मत्स्यभगवानूने मनुके प्रति पुराणोंके विषयमें जो कुछ कहा था, उसे सुनिये

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अध्याय ४५

श्लोक 31

अक्रूराद् उग्रसेनायां सुतौ द्वौ कुलवर्धनौ देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंनिभौ

akrūrād ugrasenāyāṃ sutau dvau kulavardhanau devavānupadevaśca jajñāte devasaṃnibhau

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा--राजर्षे! ब्रह्माजीने (सृष्टिनिर्माणके समय) समस्त शास्त्रोमें सर्वप्रथम पुराणका ही स्मरण किया था। उसके बाद उनके मुखोंसे वेद प्रादुर्भूत हुए हैं। अनघ! उस कल्पान्तरमें सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत, पुण्यप्रद और त्रिवर्ग-तीन पुरुषार्थके समुदाय (धर्म, अर्थ, काम)-का साधनस्वरूप पुराण एक ही था। सभी लोकोंके जलकर नष्ट हो जानेपर मैंने ही अश्व (हयग्रीव)-रूपसे व्याकरणादि छहों अङ्गोंसहित

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अध्याय ४५

श्लोक 32

अश्विन्यां च ततः पुत्राः पृथुर् विपृथुरेव च अश्वत्थामा सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ

aśvinyāṃ ca tataḥ putrāḥ pṛthur vipṛthureva ca aśvatthāmā subāhuśca supārśvakagaveṣaṇau

हिन्दी अर्थ

चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्रको ग्रहण करके उनका संकलन किया था। पुनः मैंने ही कल्पके आदिमें एकार्णबके समय मत्स्यरूपसे जलके भीतर स्थित रहकर इस (विषय)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया था। उसे सुनकर ब्रह्माने देवताओं और मुनियोंसे कहा था। राजन्! तभीसे संसारमें समस्त शास्त्रों और पुराणोंका प्रचार हुआ। काल-प्रभावसे पुराणकी ओरसे लोगोंको उदासीनता देखकर प्रत्येक द्वापरयुगमे मैं सदा व्यासरूपसे प्रकट होता हूँ और उस (पुराण)-का संक्षेप कर चार लाख श्लोकोंमें बना देता हूँ। वही अठारह भागोंमें विभक्त होकर इस भूलोकमें प्रकाशित होता है। आज भी यह पुराण इस देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंमें ही है।

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अध्याय ४५

श्लोक 33

वृष्टिनेमिः सुधर्मा च तथा शर्यातिरेव च अभूमिर् वर्जभूमिश्च श्रमिष्ठः श्रवणस्तथा

vṛṣṭinemiḥ sudharmā ca tathā śaryātireva ca abhūmir varjabhūmiśca śramiṣṭhaḥ śravaṇastathā

हिन्दी अर्थ

व्यासजीके विष्णुरूप होनेकी बात महाभारत, विष्णुपुराण (३।४।५) आदिमें भी कही गयी है, यथा--' कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥' इत्यादि। पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते

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अध्याय ४५

श्लोक 34

इमां मिथ्याभिशस्तिं यो वेद कृष्णादपोहिताम् न स मिथ्याभिशापेन अभिशाप्यो ऽथ केनचित्

imāṃ mithyābhiśastiṃ yo veda kṛṣṇādapohitām na sa mithyābhiśāpena abhiśāpyo 'tha kenacit

हिन्दी अर्थ

नामतस्तानि वक्ष्यामि श्रृणुध्वं मुनिसत्तमाः। ब्रह्मणाभिहितं पूर्व यावन्मात्रं मरीचये ब्राह्मं त्रिदशसाहस्त्रं पुराणं परिकोीर्त्यते। वैशाखपूर्णिमायां च ब्रह्मलोके महीयते

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 45
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.