Matsya Purana· Matsya Purāṇa
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अध्याय 46 / 176

Adhyaya 46

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पूर्ण अध्याय पाठ29 श्लोक

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अध्याय ४६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ४६ ऐक्ष्वाकी सुषुवे शूरं ख्यातमद्भुतमीढुषम् पौरुषाज्जज्ञिरे शूराद् भोजायां पुत्रका दश

matsya-purāṇa 46 aikṣvākī suṣuve śūraṃ khyātamadbhutamīḍhuṣam pauruṣājjajñire śūrād bhojāyāṃ putrakā daśa

हिन्दी अर्थ

एतदेव यदा पद्यामभूद्धैरण्मयं जगत्। तत्पुराणं च यो दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्। ज्येष्ठे मासि तिलैर्युक्तमश्वमेधफलं लभेत्

English

Shta said: — -Aiksvaki, the daughter of King Iksvilku bore Sdra, a heroic son, named and renowned as Adbliutamidhasara, to her lord, Porusa. Sftra, the son of Puru?a, begot from Bhojii ten sons, named, the famous and mighty-armed Vasudeva, known also as Anakcidundubhi, Deva- in&rga, Devairava, AmuHnihti, 6ini, Nanda, Srinjaya, Sy.lma, mika, SamyApa, and tlio following live daughters, cw.— rutakirtl, Prithil, rutadevi, Srutailrava, Rajudhiilevl. All these five girls were mothers of heroes. — 1-4.

अध्याय ४६

श्लोक 2

वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुन्दुभिः देवमार्गस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवाः पुनः

vasudevo mahābāhuḥ pūrvamānakadundubhiḥ devamārgastato jajñe tato devaśravāḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

यत् प्राह धर्मानखिलांस्तद्युक्तं वैष्णवं विदुः श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान् वायुरिहाब्रवीत्। चतुर्विशत्सहस्त्राणि पुराणं तदिहोच्यते

English

Krita begot from rutadevi hie son, Sugriva; Kaikaya begot Anu- vrata from rutakirti; the King Chaidya heoame the father of Snnitha, from his wife, rutaifravA, who was the conqueror of his enemies and the observer of all religious rites in the year. — 5-0.

अध्याय ४६

श्लोक 3

अनाधृष्टिः शिनिश्चैव नन्दश्चैव ससृञ्जयः श्यामः शमीकः संयूपः पञ्च चास्य वराङ्गनाः

anādhṛṣṭiḥ śiniścaiva nandaścaiva sasṛñjayaḥ śyāmaḥ śamīkaḥ saṃyūpaḥ pañca cāsya varāṅganāḥ

हिन्दी अर्थ

उसका पूरा सारांश मैंने संक्षेपसे इस चार लाख श्लोकोंवाले पुराणमें भर दिया है। अब उन अठारह पुराणोंका यहाँ वर्णन किया जाता है ॥३--११॥ श्रेष्ठ मुनियो ! अब मैं उनका नाम निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिके प्रति जितने श्लोकोंका वर्णन किया था, वह प्रथम ब्रह्मपुराण कहा जाता है। उसमें तेरह हजार श्लोक हैं। जो मानव इस

English

After that fira, out of friendship, gave ids daughter, Prithfi., for being adopted by Kuntibhoja, who was very old, and for that reason she also came to he known as Kunti, the sister of Vasudeva. Vasudeva gave in marriage his sister, Kunti, to King PApd'i, for whom he bore several brave sons, through Devas. — 7-8.

अध्याय ४६

श्लोक 4

श्रुतकीर्तिः पृथा चैव श्रुतादेवी श्रुतश्रवाः राजाधिदेवी च तथा पञ्चैता वीरमातरः

śrutakīrtiḥ pṛthā caiva śrutādevī śrutaśravāḥ rājādhidevī ca tathā pañcaitā vīramātaraḥ

हिन्दी अर्थ

पुराणको लिखकर उस पुस्तकका जलधेनु (दानके लिये जलके घड़ेमें कल्पित गौ)-के साथ वैशाखकी पूर्णिमा तिथिके दिन ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जिस समय यह जगत् स्वर्णमय कमलके रूपमें परिणत था, उस समयका वृत्तान्त जिसमें वर्णन किया गया है, उसे विद्वानूलोग (द्वितीय) पद्मपुराण नामसे अभिहित करते हैं। उस पद्मपुराणकी श्लोक-संख्या पचपन हजार बतायी जाती है। स्वर्णनिर्मित कमलसे युक्त उस पुराणका जो मनुष्य तिलके साथ ज्येष्ठमासमें ब्राह्मणफो दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञौके फलकी प्राप्ति होती है। महर्षि पराशरने वाराह-कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर जिन सम्पूर्ण धर्मोका वर्णन किया है, उनसे युक्त (तृतीय) पुराणको वैष्णव (विष्णुपुराण)

English

Kunti gave birth to Yudhistbira, through Dharma, Bhimasena through VAyu, Arjuna, as powerful as akra, through fndra. Mfidri gave birth to Nakula and Sabadeva, through the glory of the AiJvini Kumfiras, Both of the brothers were brave, modest and handsome. — 9-10.

अध्याय ४६

श्लोक 5

कृतस्य तु श्रुतादेवी सुग्रीवं सुषुवे सुतम् कैकेय्यां श्रुतकीर्त्यां तु जज्ञे सो ऽनुव्रतो नृपः

kṛtasya tu śrutādevī sugrīvaṃ suṣuve sutam kaikeyyāṃ śrutakīrtyāṃ tu jajñe so 'nuvrato nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

कहा जाता है। विद्वानूलोग उसका प्रमाण तेईस हजार श्लोकोंका बतलाते हैं। जो मानव आषाढ्मासकी पूर्णिमाको घृतधेनुयुक्त इस पुराणका दान करता है, उसका आत्मा पवित्र हो जाता है और वह वरुण-लोकमें जाता है। श्वेतकल्पके प्रसङ्गवश वायुने इस मर्त्यलोकमें जिन धर्मोका वर्णन किया था, उनका संकलन जिसमेंहुआ है उसे (चतुर्थ) वायवीय (वायुपुरण या शिवपुरण ) कहते हैं। वह शङ्करजीके माहात्म्यसे भी परिपूर्ण है। इस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है।

English

Rohini, of the Puru family, the wife of Vasudeva known as Anaka- dundubhi, gave birth to the eldest son, BalarAma, and to his brothers, Sirapa, Durduma, Damana, Subhru, Pipdlraka, and MahAhanu. She also gave birth to two beautiful daughters, named ChitrA and Ak§i. — 11-12,

अध्याय ४६

श्लोक 6

श्रुतश्रवसि चैद्यस्य सुनीथः समपद्यत बहुशो धर्मचारी स संबभूवारिमर्दनः

śrutaśravasi caidyasya sunīthaḥ samapadyata bahuśo dharmacārī sa saṃbabhūvārimardanaḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य श्रावणमासमें श्रावणी पूर्णिमाको गुडधेनु और बैलके साथ इस पुराणका कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोके स पूतात्मा कल्पमेकं वसेन्नरः॥ १९ पवित्रात्मा होकर शिवलोकमें एक कल्पतक निवास करता १. जलधेनु-दानकी विधि वाराहादि पुराणोंमें तथा इसी मत्स्यपुराणके ८२ वें अध्यायमें भी आयी है। इसके आगे घृतधेनु आदिकी भी विधि है, जिसकी चर्चा यहाँ भी आगे १७ वें श्लोकमें हुई है। २. विष्णुपुराण (५। ५। १४) तथा मनुस्मृति (११। २६०) आदि स्मृतियोके अनुसार यह क्रतुराट्-सभी यज्ञोंका राजा तथा

English

Vasudeva begot from his other wife, Devakl: — Supepa, KlrtimApa, UdAid, Bhadrasena, Riivasa, and Bhadravideha the sixth, who were all hilled by the King Kaipsa, as soon as they were born. —13.

अध्याय ४६

श्लोक 7

अथ सख्येन वृद्धे ऽसौ कुन्तिभोजे सुतां ददौ एवं कुन्ती समाख्याता वसुदेवस्वसा पृथा

atha sakhyena vṛddhe 'sau kuntibhoje sutāṃ dadau evaṃ kuntī samākhyātā vasudevasvasā pṛthā

हिन्दी अर्थ

सर्वपापापनोदक है। शतपथन्राह्मणके अश्वमेधकाण्डके पचासों पृष्ठों तथा ऐतरेय-तैत्तिरीय ब्राह्मणां, तैत्तिरीय संहिता-भाष्य, आश्वलायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, कात्यायनादि श्रौतसूत्रों तथा वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड, पद्म आदि कई स्थानों और रामाश्वमेध, महाभारतके आश्वमेधिकपर्व, जैमिनीयाश्वमेध आदि कई ग्रन्थोमें इसकी विस्तृत महिमा एवं विधि निरूपित है। इसमें प्रति आठवें पूरे दिन “परिप्लव 'में पुराण (विशेषकर मत्स्यपुराण) सुननेकी विधि है और इसमें पुराण-श्रवणकी ३६ बार पुनरावृत्ति होती है। ३. यह संख्या विष्णुधर्मोत्तरको लेकर है। अन्यथा लिङ्गपुराणादिके वचनानुसार इसमें साढ़े पाँच सहस्र श्लोक ही हैं।

English

obaptm tLn.

अध्याय ४६

श्लोक 8

वसुदेवेन सा दत्ता पाण्डोर्भार्या ह्य् अनिन्दिता पाण्डोरर्थेन सा जज्ञे देवपुत्रान् महारथान्

vasudevena sā dattā pāṇḍorbhāryā hy aninditā pāṇḍorarthena sā jajñe devaputrān mahārathān

हिन्दी अर्थ

४. पुराणगणनामें चौथी संख्यापर कहीं वायु और कहीं शिवपुराणका उल्लेख है। शिवपुराणमें भी एक वायवीय संहिता है तथा शूलपाणिके वचनानुसार वायुपुराण भी शैवपुराण ही है। यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यते धर्मविस्तर: । वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवतमुच्यते तद्वुत्तान्तोद्भवं लोके तद् भागवतमुच्यते

English

Lord was born on the first Am&v&sTa of the year, in the

अध्याय ४६

श्लोक 9

धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे वायोर्जज्ञे वृकादेरः इन्द्राद्धनंजयश् चैव शक्रतुल्यपराक्रमः

dharmādyudhiṣṭhiro jajñe vāyorjajñe vṛkāderaḥ indrāddhanaṃjayaś caiva śakratulyaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

अष्टादश सहस्त्राणि पुराणं तत् प्रचक्षते यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च। पञ्चविंशत्सहस्त्राणि नारदीयं तदुच्यते

English

month of Vaufekha. — 14.

अध्याय ४६

श्लोक 10

माद्रवत्यां तु जनिताव् अश्विभ्याभिति शुश्रुम नकुलः सहदेवश्च रूपशीलगुणान्वितौ

mādravatyāṃ tu janitāv aśvibhyābhiti śuśruma nakulaḥ sahadevaśca rūpaśīlaguṇānvitau

हिन्दी अर्थ

यत्राधिकृत्य शकुनीन् धर्माधर्मविचारणा। व्याख्याता वै मुनिप्रश्‍ने मुनिभिर्धर्मचारिभिः पुराणं नवसाहस्त्रं मार्कण्डेयमिहोच्यते प्रतिलिख्य च यो दद्यात् सौवर्णकरिसंयुतम्। कार्तिक्यां पुण्डरीकस्य यज्ञस्य फलभाग् भवेत्

English

(It is so stated in the Paranas, owing to the difference in Ealpa: other- wise it is laid down in the Bhigavata that Efina was born in the month of Bh&dra, on the 8th of the dark fortnight.) Tlie sweet-speaking SubhadrA, the beautiful sister of Erisna, was born after him. Both Epia and SubhadiA were born of DevaU.— 15.

अध्याय ४६

श्लोक 11

रोहिणी पौरवी नाम भार्या ह्य् आनकदुन्दुभेः लेभे ज्येष्ठं सुतं रामं सारणं च सुतं प्रियम्

rohiṇī pauravī nāma bhāryā hy ānakadundubheḥ lebhe jyeṣṭhaṃ sutaṃ rāmaṃ sāraṇaṃ ca sutaṃ priyam

हिन्दी अर्थ

है । जिसमें गायत्रीका आश्रय लेकर विस्तारपूर्वक धर्मका वर्णन किया गया है तथा जो वृत्रासुरवधके वृत्तान्तसे संयुक्त है, उसे (पञ्चम) भागवतपुराण कहा जाता है । इसी प्रकार सारस्वतकल्पमें जो श्रेष्ठ मनुष्य हो गये हैं, लोकमें उनके वृत्तान्तसे सम्बन्धित पुराणको ' भागवतपुराण ' कहा जाता है। यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया जाता है । जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित सिंहके साथ भाद्रपदमासकी पूर्णिमा तिथिको दान कर देता है

English

Vasudeva begot from his wife, T&mr4, Safaadeva, after whom Up&- saligadhara and his sister were bom. She was also killed by Kaipsa.— 16.

अध्याय ४६

श्लोक 12

दुर्दमं दमनं सुभ्रुं पिण्डारकमहाहनू चित्राक्ष्यौ द्वे कुमार्यौ तु रोहिण्यां जज्ञिरे तदा

durdamaṃ damanaṃ subhruṃ piṇḍārakamahāhanū citrākṣyau dve kumāryau tu rohiṇyāṃ jajñire tadā

हिन्दी अर्थ

वह परमगति-मोक्षको प्राप्त हो जाता है जिस पुराणमें बृहत्कल्पका आश्रय लेकर देवर्षि नारदने धर्मोका उपदेश किया है, उसे (षष्ठ) नारदीय (नारदपुराण) कहा जाता है। उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य आश्विनमासकी पूर्णिमा तिथिको धेनुके साथ इस पुराणका दान करता है, वह पुनर्जन्मसे रहित परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। जिस पुराणमें पक्षियोंका आश्रय लेकर एक मुनिके प्रश्‍न करनेपर धर्मचारी मुनियोंद्वारा धर्म और अधर्मके विचारका जो कुछ व्याख्यान दिया

English

Vasudeva begot from Upadevi: — Rochm&na, Vardhamina, Devala, and from Vrikadevi be begot Mah4tm&, Avag&ha, and Nandaka.— 17-19.

अध्याय ४६

श्लोक 13

देवक्यां जज्ञिरे शौरेः सुषेणः कीर्तिमानपि उदासी भद्रसेनश्च ऋषिवासस्तथैव च षष्ठो भद्रविदेहश्च कंसः सर्वानघातयत्

devakyāṃ jajñire śaureḥ suṣeṇaḥ kīrtimānapi udāsī bhadrasenaśca ṛṣivāsastathaiva ca ṣaṣṭho bhadravidehaśca kaṃsaḥ sarvānaghātayat

हिन्दी अर्थ

गया है, उन सबका महर्षि मार्कण्डेयने पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, वह लोकमें (सप्तम) मार्कण्डेयपुराणके नामसे विख्यात है । इसकी श्लोक-संख्या नौ हजार है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर स्वर्णनिर्मित हाथीके सहित कार्तिकी पूर्णिमाको उस पुस्तकका दान करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके फलका भागी होता है। जिसमें ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निने महर्षि वसिष्ठके प्रति उपदेश किया है, उसे (अष्टम) आग्नेय

English

Afterwards, Vasudeva begot.\Iadana, the seventh son of Devakl, and from raddh&devi he begot Qavesana. Formerly, he ha>l begotten Eauijika from his wife of the Vaidya clan. — 20.

अध्याय ४६

श्लोक 14

प्रथमा या अमावास्या वार्षिकी तु भविष्यति तस्यां जज्ञे महाबाहुः पूर्वं कृष्णः प्रजापतिः

prathamā yā amāvāsyā vārṣikī tu bhaviṣyati tasyāṃ jajñe mahābāhuḥ pūrvaṃ kṛṣṇaḥ prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

(अग्निपुराण) कहते हैं। इसमें सोलह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित कमल और तिलधेनुसहित मार्गशीर्षमासकी पूर्णिमा तिथिको विधि-विधानके साथ दान करता है,उसके लिये यह सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता हो जाता है। १. भागवतपुराण बहुत प्राचीन सर्वाधिक प्रसिद्ध है; क्योंकि इसपर ११ वीं शतीकी श्रीधरीसे १९ वीं शतीकी अन्वितार्थप्रकाशिका- तक पचासों संस्कृत टीकाएँ हैं तथा सूरसागर आदि-जैसे सैकड़ों देशी-विदेशी भाषाओंमें इसके गद्य-पद्यानुवाद हैं। बर्नफका फ्रेंच अनुवाद भी श्रेष्टरूप पर्याप्त प्रसिद्ध है। इसपर प्रथम शतीसे लेकर मध्वादितकके ' भागवत '-तात्पर्यनिर्णय, लघुभागवतामृत, बृहद्धागवतामृतादि अगणित प्रबन्ध निबद्ध हुए हैं और गोपाल भट्ट आदिके हरिभक्तिविलासादिमें इसके हजारों वचन उद्धुत हैं। कल्याणके

English

Pandra and Eapila were born from the wives of Vasndeva, Butanu and Rathar&jl, respectively.— 21.

अध्याय ४६

श्लोक 15

अनुजा त्व् अभवत्कृष्णा सुभद्रा भद्रभाषिणी देवक्यां तु महातेजा जज्ञे शूरो महायशाः

anujā tv abhavatkṛṣṇā subhadrā bhadrabhāṣiṇī devakyāṃ tu mahātejā jajñe śūro mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

२. इस यज्ञकी विस्तृत महिमा एवं प्रक्रिया आश्वलायन, सत्याषाढ, कात्यायन देवयाज्ञिक पद्धति आदिमें है। यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदन्तं वर्णितं मुहुः। तदष्टादशसाहस्त्र ब्रह्मवैवर्तमुच्यते

English

Of whom, the first came to be known as a great archer among the Nisddha clan, known as JorA After him, Saubhadra and Bhava were born of his wife, of the Vaiiya caste.— 22.

अध्याय ४६

श्लोक 16

सहदेवस्तु ताम्रायां जज्ञे शौरिः कुलोद्वहः उपासङ्गधरं लेभे तनयं देवरक्षिता एकां कन्यां च सुभगां कंसस्ताम् अभ्यघातयत्

sahadevastu tāmrāyāṃ jajñe śauriḥ kulodvahaḥ upāsaṅgadharaṃ lebhe tanayaṃ devarakṣitā ekāṃ kanyāṃ ca subhagāṃ kaṃsastām abhyaghātayat

हिन्दी अर्थ

पुराणं ब्रह्मवैवर्त यो दद्यान्माघमासि च। पौर्णमास्यां शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते यत्राग्रिलिङ्गमध्यस्थः प्राह देवो महेश्वर: । धर्मार्थकाममोक्षार्थमाग्रेयमधिकृत्य च कल्पान्ते लैङ्गमित्युक्तं पुराणं ब्रह्मणा स्वयम्। तदेकादशसाहस्त्रं फाल्गुन्यां यः प्रयच्छति। तिलधेनुसमायुक्तं स याति शिवसाम्यताम्

English

Uddhava was the son of Devamdrga, who is known to be a man of great learning. — 23.

अध्याय ४६

श्लोक 17

विजयं रोचमानं च वर्धमानं तु देवलम् एते सर्वे महात्मानो ह्य् उपदेव्यां प्रजज्ञिरे

vijayaṃ rocamānaṃ ca vardhamānaṃ tu devalam ete sarve mahātmāno hy upadevyāṃ prajajñire

हिन्दी अर्थ

विष्णुनाभिहितं क्षोण्यै तद्वाराहमिहोच्यते मानवस्य प्रसङ्गेन कल्पस्य मुनिसत्तमाः। चतुर्विशत्सहस्त्राण तत्पुराणमिहोच्यते

English

Anftdhristi became the father of atrughna from Iksvdkfi, who also begot Brftddha. — 24.

अध्याय ४६

श्लोक 18

अवगाहो महात्मा च वृकदेव्यामजायत वृकदेव्यां स्वयं जज्ञे नन्दको नाम नामतः

avagāho mahātmā ca vṛkadevyāmajāyata vṛkadevyāṃ svayaṃ jajñe nandako nāma nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

काञ्चनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम्। यह ज्योतिष्टोमका एक अङ्ग है। जिसमें अघोर कल्पके वृत्तान्तके प्रसङ्गवश सूर्यके माहात्म्यका आश्रय लेकर ब्रह्माने मनुके प्रति जगत्की स्थिति और प्राणिसमूहके लक्षणका वर्णन किया है तथा जिसमें प्रायः भविष्यकालीन चरितका वर्णन आया है, उसे इस लोकमें

English

Eing Earusa, who had no issue, was given in adoption a powerful son, named Suchandra, by ri Efisa. — 25.

अध्याय ४६

श्लोक 19

सप्तमं देवकीपुत्रं मदनं सुषुवे नृप गवेषणं महाभागं संग्रामेष्वपराजितम्

saptamaṃ devakīputraṃ madanaṃ suṣuve nṛpa gaveṣaṇaṃ mahābhāgaṃ saṃgrāmeṣvaparājitam

हिन्दी अर्थ

(नवम) भविष्यपुराण कहते हैं। उसमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक हैं। जो मनुष्य इर्ष्या-द्वेषरहित हो पौषमासकी पूर्णिमा तिथिको उसका गुड्से पूर्ण घड़ेसहित दान करता है, उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। जिसमें रथन्तर कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सावर्णि मनुने नारदजीके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन किया है तथा जिसमें ब्रह्मवराहका वृत्तान्त बारम्बार वर्णित हुआ है, उसे (दशम) ब्रह्मवैवर्तपुराण कहते

English

Efa begot Ch&mdeppa and mba from his wife, J&mbavatt.— 26.

अध्याय ४६

श्लोक 20

श्रद्धादेव्या विहारे तु वने हि विचरन्पुरा वैश्यायामदधाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमग्रजम्

śraddhādevyā vihāre tu vane hi vicaranpurā vaiśyāyāmadadhācchauriḥ putraṃ kauśikamagrajam

हिन्दी अर्थ

हैं । इसमें अठारह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य माघमासमें पूर्णिमा तिथिको शुभ दिनमें इस ब्रह्मवैवर्तपुराणका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सत्कृत होता है ॥२३--३५॥ जिसमें कल्पान्तके समय अग्निका आश्रय लेकर देवाधिदेव महेश्वरने अग्निलिङ्गके मध्यमें स्थित रहते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारोंकी प्रा्िके लिये उपदेश दिया है, उस पुराणको स्वयं ब्रह्माने (एकादश) लैङ्ग (लिङ्ग)-पुराण नामसे अभिहित किया है उसमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। जो मानव फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको तिलधेनुसहित इस पुराणका दान करता है, वह शिवजीकी साम्यताको प्राप्त कर लेता है। मुनिवरो!

English

Tantipdla and Tantt were the sons of Nandaua. Banilka begot four powerful sons, named VirAja, Dhanu, lyamya and lSrinjaya.-.

अध्याय ४६

श्लोक 21

सुतनू रथराजी च शौरेरास्तां परिग्रहौ पुण्ड्रश्च कपिलश्चैव वसुदेवात्मजौ बलौ

sutanū ratharājī ca śaurerāstāṃ parigrahau puṇḍraśca kapilaścaiva vasudevātmajau balau

हिन्दी अर्थ

जिसमें मानवकल्पके प्रसङ्गवश पुन: महावराहके माहात्म्यका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीके प्रति उपदेश दिया है, उसे भूतलपर (द्वादश) वराहपुराण कहते हैं। उस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य गरुड़की सोनेकी मूर्ति बनवाकर उस मूर्ति तथा तिल-धेनुके साथ इस पुराणका चैत्रमासकी पूर्णिमा तिथिको कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह वराहभगवानूकी कृपासे विष्णुपदको प्राप्त कर लेता है।

English

Sy&mya Lad no issue, and iratka despising all pleasures went to the forest, where he attained to RAjarihood. — 28.

अध्याय ४६

श्लोक 22

जरा नाम निषादो ऽभूत् प्रथमः स धनुर्धरः सौभद्रश्च भवश्चैव महासत्त्वौ बभूवतुः

jarā nāma niṣādo 'bhūt prathamaḥ sa dhanurdharaḥ saubhadraśca bhavaścaiva mahāsattvau babhūvatuḥ

हिन्दी अर्थ

यत्र माहेश्वरान् धर्मानधिकृत्य च षण्मुख:। कल्पे तत्पुरुषं वृत्तं चरितैरुपबृंहितम् स्कान्दं नाम पुराणं च ह्योकाशीति निगद्यते। सहस्त्राणि शतं चैकमिति मर्त्येषु गद्यते त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम्

English

One who daily bears or recites the birth and family history of Lord Sr! Eri§9a, will become liberated from all his sins and go to heaven. — 29.

अध्याय ४६

श्लोक 23

देवभागसुतश्चापि नाम्नासाव् उद्धवः स्मृतः पण्डितं प्रथमं प्राहुर् देवश्रवःसमुद्भवम्

devabhāgasutaścāpi nāmnāsāv uddhavaḥ smṛtaḥ paṇḍitaṃ prathamaṃ prāhur devaśravaḥsamudbhavam

हिन्दी अर्थ

पुराणं दशसाहस्त्रं कूर्मकल्पानुगं शिवम्। यः शरद्विषुवे दद्याद् वैष्णवं यात्यसौ पदम् यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च रसातले। माहात्म्यं कथयामास कूर्मरूपी जनार्दनः

English

Btre end$ the forty-sixth chapter dealing with the dynasty of the Friftite.

अध्याय ४६

श्लोक 24

ऐक्ष्वाक्यलभतापत्यम् अनाधृष्टेर्यशस्विनी निधूतसत्त्वं शत्रुघ्नं श्राद्धस्तस्मादजायत

aikṣvākyalabhatāpatyam anādhṛṣṭeryaśasvinī nidhūtasattvaṃ śatrughnaṃ śrāddhastasmādajāyata

हिन्दी अर्थ

इनद्र्युम्रप्रसङ्गेन ऋषिभ्यः शक्रसंनिधौ। अष्टादश सहस्त्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम् मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम् जिसमें कल्पान्तके समय स्वामिकार्तिकने माहेश्वर धर्मांका आश्रय लेकर शिवजीके सुशोभन चरित्रॉसे युक्त वृत्तान्तका वर्णन किया है, उस (त्रयोदश पुराण)-का नाम स्कन्दपुराण है। वह मृत्युलोकमें इक्यासी हजार एक सौ

English

THE MATSYA. PURANAM.

अध्याय ४६

श्लोक 25

करूषायानपत्याय कृष्णस्तुष्टः सुतं ददौ सुचन्द्रं तु महाभागं वीर्यवन्तं महाबलम्

karūṣāyānapatyāya kṛṣṇastuṣṭaḥ sutaṃ dadau sucandraṃ tu mahābhāgaṃ vīryavantaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

श्लोकोंका बतलाया जाता है। जो मनुष्य उसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित त्रिशूलके साथ सूर्यके मीन राशिपर आनेपर (प्रायः चैत्रमासमें) दान करता है, वह शिव-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें ब्रह्माने त्रिविक्रमके माहात्म्यका आश्रय लेकर त्रिवर्गोंका वर्णन किया है, उसे (चतुर्दश) वामनपुराण कहते हैं। इसमें दस हजार श्लोक हैं। यह कूर्मकल्पका अनुगमन करनेवाला तथा मङ्गलप्रद है। जो मानव शरत्कालीन विषुवयोग

English

THE MATSYA. PURANAM.

अध्याय ४६

श्लोक 26

जाम्बवत्याः सुताव् एतौ द्वौ च सत्कृतलक्षणौ चारुदेष्णश्च साम्बश्च वीर्यवन्तौ महाबलौ

jāmbavatyāḥ sutāv etau dvau ca satkṛtalakṣaṇau cārudeṣṇaśca sāmbaśca vīryavantau mahābalau

हिन्दी अर्थ

(१८ सितम्बरके लगभग दिन-रातके बराबर होनेके काल--तुलासंक्रान्ति)-में इसका दान करता है, वह विष्णु-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें कूर्मरूपी भगवान् जनार्दनने रसातलमें इन्द्रद्युप्नकी कथाके प्रसङ्गवश इन्द्रके निकट धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके माहात्म्यका ऋषियोंके प्रति वर्णन किया है, उसे (पञ्चदश) कूर्मपुराण कहते हैं। यह लक्ष्मीकल्पसे सम्बन्ध रखनेवाला है। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके प्रारम्भकालमें स्वर्णनिर्मित कच्छपसहित कूर्मपुराणका दान करता है, उसे एक हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है ॥ ३६--४८॥

English

THE MATSYA. PURANAM.

अध्याय ४६

श्लोक 27

तन्तिपालश्च तन्तिश्च नन्दनस्य सुताव् उभौ शमीकपुत्राश् चत्वारो विक्रान्ताः सुमहाबलाः विराजश्च धनुश्चैव श्यामश्च सृञ्जयस्तथा

tantipālaśca tantiśca nandanasya sutāv ubhau śamīkaputrāś catvāro vikrāntāḥ sumahābalāḥ virājaśca dhanuścaiva śyāmaśca sṛñjayastathā

हिन्दी अर्थ

मुनिवरो! जिसमें कल्पके प्रारम्भमें भगवान् जनार्दने मत्स्य-रूप धारण करके मनुके प्रति श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके निमित्त नृसिंहावतारके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सातों कल्पोंके वृत्तन्तोंका वर्णन किया है, उसे (षोडश' मात्स्य) १. यहाँके अतिरिक्त विष्णुपुराण ३। ६। २१-२४; भागवत १२।७ तथा १३; मार्कण्डेय १३४; वाराह ११२। ७९-७२; कूर्म

English

THE MATSYA. PURANAM.

अध्याय ४६

श्लोक 28

अनपत्यो ऽभवच्छ्यामः शमीकस्तु वनं ययौ जुगुप्समानो भोजत्वं राजर्षित्वमवाप्तवान्

anapatyo 'bhavacchyāmaḥ śamīkastu vanaṃ yayau jugupsamāno bhojatvaṃ rājarṣitvamavāptavān

हिन्दी अर्थ

१। १३-१५; लिङ्ग १। ३९। ६१-४; पद्म १। ६२। २-७; नारद १। ९२-१०९ आदिमें पुराणक्रम एवं श्लोक-संख्यादिका वर्णन है। शोधकर्ताओंने इन क्रमोंको तीन भागोंमें क्रमबद्ध किया है। इनमें मत्स्य, भागवत, विष्णु आदि क्रमको मत्स्य या विष्णुपुराणक्रम कहा है। इनके अनुसार स्कन्दपुराण १३वीं संख्यापर तथा लिङ्गपुराणद्वारा निर्दिष्ट क्रममें १७ वीं संख्यापर निर्दिष्ट है। इसके सूतसंहितादि छ: संहिताओंका एक रूप तथा माहेश्वरादि सात खण्डोंका दूसरा रूप-दोनों मिलकर पौने दो लाख श्लोक होते हैं। फिर शम्भल- माहात्म्य, सत्यनारायण-व्रतकथा आदि इसके अनेक खिल ग्रंथ भी हैं। २. यह विष्णुपुराण आदिक्रममें १६ वीं संख्यापर, पर लिङ्गादिक्रममें १५ वीं संख्यापर परिगणित है।

English

THE MATSYA. PURANAM.

अध्याय ४६

श्लोक 29

कृष्णस्य जन्माभ्युदयं यः कीर्तयति नित्यशः शृणोति मानवो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते

kṛṣṇasya janmābhyudayaṃ yaḥ kīrtayati nityaśaḥ śṛṇoti mānavo nityaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

विषुवे हेममत्स्येन धेन्वा चैव समन्वितम्। यो दद्यात् पृथिवी तेन दत्ता भवति चाखिला स सिद्धि लभते मुख्यां शिवलोके च संस्थितिम्

English

THE MATSYA. PURANAM.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 46
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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