Matsya Purana· Matsya Purāṇa
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अध्याय 50 / 176

Adhyaya 50

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पूर्ण अध्याय पाठ89 श्लोक

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अध्याय ५०

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ५० अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत

matsya-purāṇa 50 ajamīḍhasya nīlinyāṃ nīlaḥ samabhavannṛpaḥ nīlasya tapasogreṇa suśāntirudapadyata

हिन्दी अर्थ

रूपेणाप्रतिमं कान्त्या सोऽहसद् भृगुनन्दनः ईश्वरने कहा--पितामह! अब भविष्यमें घटित होनेवाले एक अन्य ब्रतके वृत्तान्तको सुनो, जो सुन्दरता और सम्पत्ति प्रदान करनेवाला है। उसी द्वापरयुगके अन्तमें युधिष्ठिर आदिके साथ महर्षि पिप्पलादका संवाद होगा। उस समय तपस्वी महामुनि पिप्पलादके नैमिषारण्यमें निवास करते समय धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर उनके . निकट जाकर एक प्रश्‍न करेंगे

English

The Yajurvedi BrAhmana, seated in the south, should recite the mantras relating to luti, God Indra, Saumyn, Kumanda, &c. — 132.

अध्याय ५०

श्लोक 2

पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुतः भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयाञ्छृणु

purujānuḥ suśāntestu pṛthustu purujānutaḥ bhadrāśvaḥ pṛthudāyādo bhadrāśvatanayāñchṛṇu

हिन्दी अर्थ

युधिष्ठिर पूछेंगे--नीरोगता, ऐश्वर्य, धर्ममें बुद्धि तथा गति, अव्यङ्गता (शरीरके सभी अङ्गोंकी पूर्णता) तथा शिव एवं विष्णुमें अनृपम भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्! (इस विषयमे) उन बुद्धिमान् पिप्पलादका वह उत्तर सुनो, जो वे धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरसे कहेंगे

English

The SAmavcdi Brahmiina, sitting in the west, should sing the hymns of uparna Vairaja, Agiuiya, RndrasatnhitA, Jyesthasania, and pe.ice chant. -133.

अध्याय ५०

श्लोक 3

मुद्गलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः

mudgalaśca jayaścaiva rājā bṛhadiṣustathā javīnaraśca vikrāntaḥ kapilaścaiva pañcamaḥ

हिन्दी अर्थ

पूछी है, अब मैं आपको इस अङ्गारक-व्रतको बतला रहा हूँ। यों कहकर वे मुनि राजा युधिष्ठिरसे इस ब्रतका (इस प्रकार) वर्णन करेंगे। महाराज युधिष्ठिर! इस है, जो विरोचन और बुद्धिमान् शुक्राचार्यके संवाद (रूप)-में है। एक बार प्रह्मदके षोडशवर्षीय पुत्र विरोचनको देखकर, जो अनृपम सौन्दर्याली और कान्तिमान् था, भृगुनन्दन शुक्राचार्य हँस पड़े और उससे हो।' उन्हें उस प्रकार हँसते देखकर देवशत्नु विरोचनने

English

The Athnrvavedi Brabmana, seated in tlie north, should read the following mantras S&nti Sukta, Saura, kunaka, Pautftika, Mah&r&jya. —134.

अध्याय ५०

श्लोक 4

पञ्चानां चैव पञ्चालान् एताञ्जनपदान्विदुः पञ्चालरक्षिणो ह्य् एते देशानामिति नः श्रुतम्

pañcānāṃ caiva pañcālān etāñjanapadānviduḥ pañcālarakṣiṇo hy ete deśānāmiti naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन् किमर्थमेतत् ते हास्यमाकस्मिकं कृतम्। साधु साध्विति मामेवमुक्तवांस्त्वं वदस्व मे वीरभद्र इति ख्यातः करपादायुतैर्युतः। कृत्वासौ यज्ञमथनं पुनर्भूतलसम्भवः। त्रिजगन्निर्दहन् भूयः शिवेन विनिवारितः

English

h'ive or seven Brahmanas should perform the homa sacrifice as before, (the remaining llomakas helping thenr). The manti'as relating to bath and the gift are the same as before. — 135.

अध्याय ५०

श्लोक 5

मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः एते ह्य् अङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्गलाः

mudgalasyāpi maudgalyāḥ kṣatropetā dvijātayaḥ ete hy aṅgirasaḥ pakṣaṃ saṃśritāḥ kāṇvamudgalāḥ

हिन्दी अर्थ

कृतं त्वया वीरभद्र दक्षयज्ञविनाशनम्। इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा प्रेक्षिष्यन्ते जनाः पूजां करिष्यन्ति वरान्मम १५ देवलोकेऽद्वितीयं च तव रूपं भविष्यति

English

The VasudhtirA or the way of letting the stream of clarified butter fall in the fire from a vase is the only peculiar rite of the sacrifice of a lac of offerings (as mentioned before. That should be done here also). One who performs this sacrifice of a crore of oiTerings, according to the prescribed rites, attains all his wishes and obtains the rank of Vifnu — 136.

अध्याय ५०

श्लोक 6

मुद्गलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहायशाः इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः

mudgalasya suto jajñe brahmiṣṭhaḥ sumahāyaśāḥ indrasenaḥ sutastasya vindhyāśvastasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

ये च त्वां पूजयिष्यन्ति चतुर्थ्या त्वहिने नराः। रूपमारोग्यमैश्चर्य॑ तेष्वनन्तं भविष्यति एवमुक्तस्तदा शान्तिमगमत् कामरूपधृक् । संजातस्तत्क्षणाद् राजन् ग्रहत्वमगमत् पुनः

English

He who reads or hears this description of these three sacrifices of the Grahas (Planets), becomes purified of all sins and attains the rank of Indra. —137.

अध्याय ५०

श्लोक 7

विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः दिवोदासश्च राजर्षिर् अहल्या च यशस्विनी

vindhyāśvānmithunaṃ jajñe menakāyāmiti śrutiḥ divodāsaśca rājarṣir ahalyā ca yaśasvinī

हिन्दी अर्थ

तेन त्वं रूपवाञ्जातः सुरशत्रुकुलोद्वह। विविधा च रुचिर्जाता यस्मात् तव विदूरगा विरोचन इति प्राहुस्तस्मात् त्वां देवदानवाः। उनसे पूछा- ब्रह्मन्! आपने किस प्रयोजनसे यह आकस्मिक हास्य किया है और मुझे 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है? इसका कारण मुझे बतलाइये।' इस प्रकार पूछनेपर विरोचनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने

English

The benefits of this sacrifice are similar to those derived by the per- formance of 18,000 Advamedha sacrifices.— 138.

अध्याय ५०

श्लोक 8

शरद्वतस्तु दायादम् अहल्या सम्प्रसूयत शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः

śaradvatastu dāyādam ahalyā samprasūyata śatānandamṛṣiśreṣṭhaṃ tasyāpi sumahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

कहा--' ब्रतके माहात्म्यसे आश्चर्यचकित होकर मैंने यह हास्य किया है। (उस प्रसङ्गको सुनो) पूर्वकालमें दक्ष-यज्ञका विनाश करनेके लिये जब भयंकर मुखवाले त्रिशूलधारी भगवान् शंकर कुपित हो उठे, तब उनके ललाटसे पसीनेकी एक बूँद टपक पड़ी। वह स्वेदबिन्दु अनेकों मुखों, नेत्रों और दस सहस्त्र हाथ-पैरोंसे युक्त एक पुरुषाकारमें परिणत हो गया। वह प्रज्वलित अग्रिके समान भयंकर पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ। उसने सातों

English

fSiva has said that the sin of killing a crore of BrAbmapas and of making 10 crores of abortions, is washed off by the performance of this sacrifice. — 139.

अध्याय ५०

श्लोक 9

सुतः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः आसीत्सत्यधृतेः शुक्रम् अमोघं धार्मिकस्य तु

sutaḥ satyadhṛtirnāma dhanurvedasya pāragaḥ āsītsatyadhṛteḥ śukram amoghaṃ dhārmikasya tu

हिन्दी अर्थ

पातालोंका भेदन कर सातों सागरोंको भस्म कर दिया। पुनः दक्ष-यज्ञका विध्वंस कर वह भूतलपर आ धमका और त्रिलोकीको जला डालनेके लिये उद्यत हुआ। यह देखकर शिवजीने उसे रोक दिया फिर उन्होंने उसे मना करते हुए कहा--' वीरभद्र ! तुमने दक्ष-यज्ञका विनाश तो कर ही दिया, अब तुम अपने इस लोक-दहनरूप क्रूर कर्मको बंद कर दो। मेरे वरदानसे तुम सभी ग्रहोंके लिये शान्ति-प्रदायक बनो और सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करो। लोग तुम्हारा दर्शन और पूजन करेंगे। पृथ्वीनन्दन! तुम अङ्गारक नामसे ख्याति प्राप्त करोगे और देवलोकमें तुम्हारा अनृपम रूप होगा। जो मनुष्य तुम्हारा जन्मदिन

English

TUB MATSYA PURABAy.

अध्याय ५०

श्लोक 10

स्कन्नं रेतः सत्यधृतेर् दृष्ट्वा चाप्सरसं जले मिथुनं तत्र संभृतं तस्मिन्सरसि संभृतम्

skannaṃ retaḥ satyadhṛter dṛṣṭvā cāpsarasaṃ jale mithunaṃ tatra saṃbhṛtaṃ tasminsarasi saṃbhṛtam

हिन्दी अर्थ

चतुर्थी तिथि आनेपर तुम्हारी पूजा करेंगे उन्हें अनन्त सौन्दर्य, नीरोगता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी ।' शिवजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वीरभद्र तुरंत शान्त हो गया। राजन्! पुनः उसी क्षण (पृथ्वीसे) उत्पन्न होकर उसने ग्रहका स्थान प्राप्त कर लिया। असुरकुलोटद्ठह! किसी समय शूद्रद्वारा व्यवस्थितरूपसे को जाती हुई उसकी अर्घ्य आदिसे सम्पन्न श्रेष्ठ पूजाको तुमने देख लिया था,

English

Magic and Sorcery.

अध्याय ५०

श्लोक 11

ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः दृष्ट्वा जग्राह कृपया शंतनुर्मृगयां गतः

tataḥ sarasi tasmiṃstu kramamāṇaṃ mahīpatiḥ dṛṣṭvā jagrāha kṛpayā śaṃtanurmṛgayāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

इसी कारण तुम सुन्दररूपसे युक्त होकर पैदा हुए हो और तुम्हारी रुचि--प्रतिभा विभिन्न प्रकारके ज्ञानोंवाली और वूरगामिनी है। इसी कारण देवता और दानव तुम्हे विरोचन नामसे पुकारते हैं। शूद्रद्धार किये जाते हुए ब्रतके दर्शनसे प्राप्त हुई तुम्हारी इस प्रकारकी रूप- आलोकितं तेन सुरारिगर्भ सम्भूतिरेषा तव हैत्य जाता

English

The sacrifice relating to the worehip of tlie nine planets should be performed before the perfonnaiioc of the rites of Abhichfira (sorcery), Uchohatana and Varfya Karma, &c. — 140.

अध्याय ५०

श्लोक 12

एते शरद्वतः पुत्रा आख्याता गौतमा वराः अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः

ete śaradvataḥ putrā ākhyātā gautamā varāḥ ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi divodāsasya vai prajāḥ

हिन्दी अर्थ

चतुर्थ्यङ्कारकदिने यदा भवति दानव। मृदा स्त्रानं तदा कुर्यात् पदारागविभूषितः चत्वारः करकाः कार्या भक्ष्यभोज्यसमन्विताः । तण्डुलै रक्तशालीयैः पदारागैश्च संयुताः

English

[iVotc. l?chchAtana:=A magioal incantation that causes a man to go away out of dis- gust. Vanya KarmaA magical spell that fascinates and snbdnos a foe.]

अध्याय ५०

श्लोक 13

दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृपः मैत्रायणावरः सो ऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः

divodāsasya dāyādo dharmiṣṭho mitrayurnṛpaḥ maitrāyaṇāvaraḥ so 'tha maitreyastu tataḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

चतुष्कोणेषु तान् कृत्वा फलानि विविधानि च। गन्धमाल्यादिकं सर्व तथैव विनिवेशयेत् रौप्यैः खुरैः कांस्यदुहां सवत्साम्। सम्पत्तिको देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। इसी कारण मैंने 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है। अहो! यह कैसा उत्तम माहात्म्य है कि जब देखनेवालेको भी ऐसी सुन्दरता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब

English

(Otherwise, no rite has the desired effect; so tliis sacrifice of ten thousand offerings to the planets shoidd necessarily be performed as a preliminary.— 141.

अध्याय ५०

श्लोक 14

एते वंश्या यतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः

ete vaṃśyā yateḥ pakṣāḥ kṣatropetāstu bhārgavāḥ rājā caidyavaro nāma maitreyasya sutaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

करनेवालेकी तो बात ही क्या है। दितिवंशज! चूँकि तुमने पृथ्वीपुत्र वीरभद्रके व्रतमें भक्तिपूर्वक दिये जाते हुए गो- दान आदि दानोंको अवहेलनापूर्वक देखा था, इसीलिये तुम्हारी उत्पत्ति राक्षस-योनिमें हुई है॥ १४--२३॥ ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्! महात्मा शुक्राचार्यके उस वचनको सुनकर प्रह्णाद-नन्दन विरोचनने विस्मय- विमुग्ध हो पुनः प्रश्‍न किया

English

In the sacrifice connected with Vailikarana ami rdichatana, the sacri- ficial pond shouhl bo made of the lueasnro of a hamlful (ell); it should bo surrounded with three girdles, be circular in shape, and have one mouth, and the offering of the wood of Ihitea frondosa, spi inkled with honey, cam- phor, gorochana and agara, dissolved in water, mixed with saffron, should be made.-' 142-143.

अध्याय ५०

श्लोक 15

अथ चैद्यवराद्विद्वान् सुदासस्तस्य चात्मजः अजमीढः पुनर्जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः

atha caidyavarādvidvān sudāsastasya cātmajaḥ ajamīḍhaḥ punarjātaḥ kṣīṇe vaṃśe tu somakaḥ

हिन्दी अर्थ

विरोचनने पूछा--- भगवन्! जन्मान्तरमें मैंने जिसके दिये जाते हुए दानको देखा था, उस व्रतको भलीभाँति आनृपूर्वी सुनना चाहता हूँ । आप मुझे उसके विधान और माहात्म्यको यथार्थ रूपसे बतलाइये। इस प्रकार विरोचनकी बात सुनकर शुक्राचार्यने विस्तारपूर्वक कहना प्रारम्भ किया शुक्र बोलेदानव! जब मंगलवारको चतुर्थी तिथि पड़ जाय तो उस दिन शरीरमें मिट्टी लगाकर स्त्नान करे और पद्मरागमणिकी अँगूठी आदि धारण करके उत्तराभिमुख बैठकर 'आग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०--'

English

An f)ffering of woodapple I Hael) and lotoses, mixe:l with honey and clarified butter, should he made. Ihahm r lias said that ton ihonsand offerings sliouM he made in.sm li sacrilices. — 141. «

अध्याय ५०

श्लोक 16

सोमकस्य सुतो जन्तुर् हते तस्मिञ्छतं बभौ पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः

somakasya suto jantur hate tasmiñchataṃ babhau putrāṇāmajamīḍhasya somakasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस मन्त्रका जप करता रहे। यदि व्रती शूद्र हो तो उसे भोगसे दूर रहकर चुपचाप मंगलका स्मरण करते हुए दिन बिताना चाहिए। फिर सूर्यास्त हो जानेपर आँगनको गोबरसे लीपकर सर्वाङ्गसुन्दर पुष्पमाला आदिसे चारों ओर पूजा कर दे। आँगनके मध्यमें कुङ्कमसे अष्टदल कमलकी रचना करे। कुङ्कमका अभाव हो तो लाल चन्दनसे काम चलाना चाहिए। फिर आँगनके चारों कोनोंमें चार करवा स्थापित करे, जिन्हें लाल अगहनीके

English

In a sacrifice for Vasikarnoa, tlie f)fforin£:s of w«)odapplc (Baen and lotuses should be made, and tlie 5*>iimitriy.\na Apa O'adha mantra should be recited in offering lloma. — 1 ITi.

अध्याय ५०

श्लोक 17

महिषी त्व् अजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी पुत्राभावे तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्चरम्

mahiṣī tv ajamīḍhasya dhūminī putravardhinī putrābhāve tapastepe śataṃ varṣāṇi duścaram

हिन्दी अर्थ

चावलसे भरकर उनके ऊपर पद्मरागमणि रख दे। वे भक्ष्य-भोज्य पदार्थांसे भी संयुक्त रहें । उनके निकट नाना प्रकारके ऋतुफल, चन्दन, पुष्पमाला आदि सभी पूजन- सामग्री भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् बछड़ेसहित एक कपिला गौका पूजन करे, जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढे गये हों तथा उसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो। इसी प्रकार लाल खुरोंसे युक्त सौम्य स्वभाववाले हृष्ट-पुष्ट एक वृषभकी भी पूजा करे और उसके निकट कुटुम्बिने नैव तु दाम्भिकाय।

English

No.sprinkling with lioly watix o7* )• cation of a pitclier of whaler should be made in these forms of 'sacrifices. A householder slionld bathe in the water mixed witli herbs, dress iu white, put on white fiowors, worship the Brhmaiias with gold threads. They should also be given fine costumes and Dak§ina of gold..A white cow should also be given. — I4fi-147.

अध्याय ५०

श्लोक 18

हुत्वाग्निं विधिवत्सम्यक् पवित्रीकृतभोजना अग्निहोत्रक्रमेणैव सा सुष्वाप महाव्रता

hutvāgniṃ vidhivatsamyak pavitrīkṛtabhojanā agnihotrakrameṇaiva sā suṣvāpa mahāvratā

हिन्दी अर्थ

शय्यां च शक्तितो दद्यात् सर्वोपस्करसंयुताम् यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे। तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता

English

This sacrifice subdues the worst of enemies, endears those W'ho have no love, and dispels ills.— 148,

अध्याय ५०

श्लोक 19

तस्यां वै धूमवर्णायाम् अजमीढः समीयिवान् ऋक्षं सा जनयामास धूमवर्णं शताग्रजम्

tasyāṃ vai dhūmavarṇāyām ajamīḍhaḥ samīyivān ṛkṣaṃ sā janayāmāsa dhūmavarṇaṃ śatāgrajam

हिन्दी अर्थ

भक्त्या यस्तु पुनः कुर्यादेवमङ्कारकाष्टकम्। चतुरो वाथवा तस्य यत् पुण्यं तद् वदामि ते सप्तकल्पसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते। तस्मात् त्वमपि हैत्येन्द्र व्रतमेतत् समाचर जगाम हैत्यश्च चकार सर्वम्।

English

The sacrificial prmd for tin* perfonnanci' of tlie sacrifice intended for Abhichira and Vidvesana, slioidd bo traingular in.shape, measuring one hand, surrounded by two girdles, and having openings towards the vertices.— 149.

अध्याय ५०

श्लोक 20

ऋक्षात्संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् ततः यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत्

ṛkṣātsaṃvaraṇo jajñe kuruḥ saṃvaraṇāt tataḥ yaḥ prayāgamatikramya kurukṣetramakalpayat

हिन्दी अर्थ

सात वस्त्रोंसे युक्त धान्यराशि भी प्रस्तुत कर दे। फिर अँगूठेके बराबर लम्बाई-चौड़ाईवाली एक पुरुषाकार मूर्ति बनवाये, जो चार बड़ी भुजाओंसे संयुक्त हो। उसे गुड़के ऊपर रखे हुए स्वर्णमय पात्रमें स्थापित कर दे और उसके निकट घी भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् मूर्तिसहित ये सारी वस्तुएँ ऐसे सुपात्र ब्राह्मणको दान करनी चाहिए, जो सामवेदके स्वर एवं अर्थका ज्ञाता,

English

[Note.— Vidvesana - A spell that causes fpiction.]

अध्याय ५०

श्लोक 21

कृष्यतस्तु महाराजो वर्षाणि सुबहून्यथ कृष्यमाणस्ततः शक्रो भयात्तस्मै वरं ददौ

kṛṣyatastu mahārājo varṣāṇi subahūnyatha kṛṣyamāṇastataḥ śakro bhayāttasmai varaṃ dadau

हिन्दी अर्थ

हो। दाम्भिकको कभी दान नहीं देना चाहिए। उस समय भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण करते हुए ऐसे द्विजवरको सारा सामान समर्पित कर दे। (उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है-) “महातेजस्वी भूमिपुत्र! आप पिनाकधारी भगवान् शिवके स्वेदबिन्दुसे उद्भूत हुए हैं। मैं सौन्दर्यका अभिलाषी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। आपको मेरा नमस्कार है। आप मेरे द्वारा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये।' इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक लाल चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य देनेके पश्चात् लाल पुष्पोंको माला और लाल रंगके वस्त्र आदि उपकरणोंसे उन द्विजवरकी अर्चना करे और इसी

English

Then the Brahmanas wearing red garland, red sandal, rod sacred thread, red turban, and red raiments, should perform the sacrifice. — 150.

अध्याय ५०

श्लोक 22

पुण्यं च रमणीयं च कुरुक्षेत्रं तु तत्स्मृतम् तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना तु कौरवाः

puṇyaṃ ca ramaṇīyaṃ ca kurukṣetraṃ tu tatsmṛtam tasyānvavāyaḥ sumahān yasya nāmnā tu kauravāḥ

हिन्दी अर्थ

मूर्तिको उन्हें दान कर दे। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिए। साथ ही दाताको लोकमें जो-जो वस्तुएँ अधिक इष्ट हों तथा अपने घरमें भी जो अधिक प्रिय हों, उन सबको अक्षयरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे गुणवान् (ब्राह्मण) -को देना चाहिए। तदनन्तर उन द्विजश्रेष्ठकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा कर दे तथा स्वयं रातमें एक बार क्षारनमकरहित एवं घृतयुक्त अन्नका भोजन करे। इस

English

With three vessels containing the blood of the young crows before them, bones of the hawks in their left hand and sacrificial fuel in the other, and their hair loose, the Biahmanas should perform the sacrifice,

अध्याय ५०

श्लोक 23

कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जह्नुरेव च परीक्षिच्च महातेजाः प्रजनश्चारिमर्दनः

kurostu dayitāḥ putrāḥ sudhanvā jahnureva ca parīkṣicca mahātejāḥ prajanaścārimardanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुनः इस अङ्गारक-व्रतका आठ अथवा चार बार अनुष्ठान करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। वह मनुष्य प्रत्येक जन्ममें सुन्दरता और सौभाग्यसे सम्पन्न होकर विष्णु अथवा शिवकी भक्तिमें लीन होता है और सातों द्वीपोंका अधीश्वर हो जाता है तथा सात हजार कल्पोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसलिये हैत्येन्द्र! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो॥ २७--४३॥ पिप्पलादने कहा--राजन्! इस प्रकार व्रतका विधान बतलाकर शुक्राचार्य चले गये। तत्पश्चात् हैत्य

English

all the while thinking ill of the enemiee at the time of making theae offerings.— 151.

अध्याय ५०

श्लोक 24

सुधन्वनस्तु दायादः पुत्रो मतिमतां वरः च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित्

sudhanvanastu dāyādaḥ putro matimatāṃ varaḥ cyavanastasya putrastu rājā dharmārthatattvavit

हिन्दी अर्थ

विरोचनने पूरी विधिके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। त्वं चापि राजन् कुरु सर्वमेतद् इसलिये आप भी इन सारे विधानोंके साथ इस ब्रतका यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति॥ ४४ अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि वेदवेत्तालोग इसका फल अक्षय बतलाते हैं

English

With the iJyenamafitra, 'durmitriyastasmai santn huip phata,' the razor 'should be sanctified; with tliis the image of the enemy should be cut piecemeiil and offered to the fire. — 152-153.

अध्याय ५०

श्लोक 25

च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाज्जज्ञे महातपाः कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यातस्त्विन्द्रसमो विभुः

cyavanasya kṛmiḥ putra ṛkṣājjajñe mahātapāḥ kṛmeḥ putro mahāvīryaḥ khyātastvindrasamo vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

पिप्पलादं ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्! तब अद्भुत पराक्रमपूर्ण तथेति सम्पूज्य स पिप्पलादं कर्मोको करनेवाले युधिष्ठिरने “तथेति-ऐसा ही करूँगा'-- वाक्यं चकाराद्भुतवीर्यकर्मा। कहकर महर्षि पिप्पलादकी विधिवत् पूजा की और उनके वचनोंका पालन किया। जो मनुष्य अनन्यचित्तसे शृणोति यश्चैनमनन्यचेता- इस व्रत-विधानका श्रवण करता है, भगवान् उसकी स्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते॥ ४५ सिद्धिका भी विधान करते हैं इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽङ्गारकब्रतं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः

English

Having performed tlie sacrifice of the Grahas, the proper AvichSra sacrifice should be performed. Such is the rule for Vidvesana ** sacrifice as well. — 154.

अध्याय ५०

श्लोक 26

चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षगः चैद्योपरिचराज्जज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान्

caidyoparicaro vīro vasurnāmāntarikṣagaḥ caidyoparicarājjajñe girikā sapta vai sutān

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गारकव्रत नामक बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि पिप्पलाद उवाच पिप्पलादने कहा--भूपाल! अब मैं विपरीत अथातः शृणु भूपाल प्रतिशुक्रं प्रशान्तये। शुक्रको शान्तिके लिये विधान बतला रहा हूँ, सुनिये।

English

Such deeds only hear fruit in the present life and do not beget good results in the ne.vt, so a man, desirous of iiltifuate good, sliould not indulge in such deeds. — 155.

अध्याय ५०

श्लोक 27

महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः प्रत्यश्रवाः कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहनः

mahāratho magadharāḍ viśruto yo bṛhadrathaḥ pratyaśravāḥ kuśaścaiva caturtho harivāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस लोकमें शुक्रके उदयकालमें यात्राके आरम्भ अथवा यात्रारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विह॥ १ समाप्तिके अवसरपर शुक्रकी एक चाँदीकी मूर्ति बनवाये, राजते वाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथवा पुनः। उसे श्वेत मुक्ताफल (मोती)-के साथ श्वेत चावलसे परिपूर्ण सुवर्ण, चाँदी अथवा काँसेके पात्रके ऊपर शुक्लपुष्पाम्बरयुते सिततण्डुलपूरिते॥ २ स्थापित करके श्वेत पुष्प और श्वेत चस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर इस वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण कर वह हि सारा सामान सामवेदके ज्ञाता (सस्वर गान करनेवाले)

English

One wlio performs the worship of the stars, along with the prescribed sacrifices, without any object in view, goes to the clime of Visnu, whence he never returns to this world. — 150.

अध्याय ५०

श्लोक 28

पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमी बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः

pañcamaśca yajuścaiva matsyaḥ kālī ca saptamī bṛhadrathasya dāyādaḥ kuśāgro nāma viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

है--) 'सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर! आपको नमस्कार है। नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते भृगुनन्दन भृगुनन्दन! आपको प्रणाम है। कवे! मैं आपको अभिवादन कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥ ४ करता हूँ। आप मेरी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये यह अर्ध्य ग्रहण करें।' भारत! जो मनुष्य शुक्रके विपरीत एवमस्योदये कुर्वन् यात्रादिषु च भारत। रहनेपर यात्रा आदि कार्योमे इस प्रकार विधान करता है,

English

One who hears or relates this to others, never suffers from any pain, owing to the evil intluenco of the planets 'U* lo the de&tnicdon of friends. — 157.

अध्याय ५०

श्लोक 29

कुशाग्रस्यात्मजश्चैव वृषभो नाम वीर्यवान् वृषभस्य तु दायादः पुण्यवान्नाम पार्थिवः

kuśāgrasyātmajaścaiva vṛṣabho nāma vīryavān vṛṣabhasya tu dāyādaḥ puṇyavānnāma pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते॥ ५ वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमं ज्योतिष्प्रकाश, रत्नमाला, गर्गसंहिता आदिमें शुक्रके सामने यात्रा अत्यन्त हानिकर कही गयी है। ज्योतिर्निबन्ध आदिमें प्रतिकूल शुक्र-शान्तिके लिये कई श्रेष्ठ स्तोत्र तथा 'रेवतीसे कृत्तिका'-तकमें उन्हें अन्धा बतलाकर यात्रा-विधान निर्दिष्ट है। वहाँ 'मत्स्यपुराण'के ही नामसे--' चतुःशालं चतुर्दारम्' आदि श्लोकको उद्धृत कर चार दरवाजेके मकानोंमें शुक्रदोष नहीं माना गया है । सम्भवतः वे श्लोक पहले मत्स्यपुराणमें यहाँ प्राप्त थे ज्योतिर्निबन्धकी विषयवस्तु इससे बहुधा मिलती है। वहाँ १०वें श्लोकमें इसी प्रकार अर्घ्यदानकी बात आयी है।

English

The children of the house in which these sacrifices are written down, never suffer from any ill, mental or physical, or any other calamity. — 158.

अध्याय ५०

श्लोक 30

पुण्यः पुण्यवतश्चैव राजा सत्यधृतिस्ततः दायादस्तस्य धनुषस् तस्मात्सर्वश्च जज्ञिवान्

puṇyaḥ puṇyavataścaiva rājā satyadhṛtistataḥ dāyādastasya dhanuṣas tasmātsarvaśca jajñivān

हिन्दी अर्थ

वटकै: पूरिकाभिश्च गोधूमैश्चणकैरपि। तावदन्नं न चाश्चीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये पीताङ्गरागवसनो घृतहोमं तु कारयेत्। प्रणम्य च गवा सार्ध ब्राह्मणाय निवेदयेत्

English

The sages are of opinion tliat this sacrifice of a crore of offerings begets fruits of many a sacrifice and dispels all ills; it is the giver of worldly prosperity and final emancipation. The sacrifice of a lac of offerings gives the benefit of the arfvamedha sacrifice. Tlie sacrifice performed in course of a twelve (lays and the sacrifice connected with the worship of stars, give equal benefits. — 159-lGO.

अध्याय ५०

श्लोक 31

सर्वस्य सम्भवः पुत्रस् तस्माद्राजा बृहद्रथः द्वे तस्य शकले जाते जरया संधितश् च सः

sarvasya sambhavaḥ putras tasmādrājā bṛhadrathaḥ dve tasya śakale jāte jarayā saṃdhitaś ca saḥ

हिन्दी अर्थ

क्रूरग्रहैः पीडितानाममृताय नमो नमः विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। शुक्रकी वह पूजा चनाद्वारा सम्पन्न न कर ली जाय, तबतक धर्म, अर्थ और कामकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको अपनी मनोरथ- सिद्धिके लिये भोजन नहीं करना चाहिए

English

Thus T have told the mode of the sacrifices of the Nine Grahas and the Abhiseka in divine sacrifices (the sprinkling of the devotee with the holy waters.) These are to bo done to dispel all ills and hindrances to ceremonies of rejoicings. These purge all sins, who reads or listens to it subdues all his foes and gets longevity and health. — IGl.

अध्याय ५०

श्लोक 32

जरया संधितो यस्माज् जरासंधस्ततः स्मृतः जेता सर्वस्य क्षत्रस्य जरासंधो महाबलः

jarayā saṃdhito yasmāj jarāsaṃdhastataḥ smṛtaḥ jetā sarvasya kṣatrasya jarāsaṃdho mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं बृहस्पतिकी भी पूजा- विधि बतला रहा हूँ । व्रतीको चाहिए कि वह सरसों, पलाश, पीपल और पञ्चगव्यसे युक्त जलसे स्रान करे, पीला वस्त्र पहनकर शरीरमें पीला अङ्गराग, चन्दन आदिका अनुलेप करे और ब्राह्मणद्वारा घीका हवन करावे तत्पश्चात् मूर्तिको प्रणाम करके गौसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे) 'वाणीके अधीश्वर! आप अङ्गिरा-बंशियोंके

English

Here ends the ninety-third eJtnpter describing the mode of Navogrcdia

अध्याय ५०

श्लोक 33

जरासंधस्य पुत्रस्तु सहदेवः प्रतापवान् सहदेवात्मजः श्रीमान् सोमवित् स महातपाः

jarāsaṃdhasya putrastu sahadevaḥ pratāpavān sahadevātmajaḥ śrīmān somavit sa mahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

स्वामी हैं। बृहस्पते! क्रूर ग्रहोंसे पीड़ित प्राणियोंके लिये आप अमृततुल्य फलदाता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है ।' कुन्तीनन्दन! सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, यात्राओंमें तथा अन्यान्य आभ्युदयिक कार्योके अवसरपर बृहस्पतिको पूजा करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको कुर्वन् बृहस्पतेः पूजां सर्वान् कामान् समश्नुते॥ ११ प्रास कर लेता है ॥ ७--११॥

English

homa santi.

अध्याय ५०

श्लोक 34

श्रुतश्रवास्तु सोमादेर् मागधाः परिकीर्तिताः जह्नुस्त्वजनयत्पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम्

śrutaśravāstu somāder māgadhāḥ parikīrtitāḥ jahnustvajanayatputraṃ surathaṃ nāma bhūmipam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे गुरुशुक्रपूजाविधिर्नाम त्रिसपततितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुक्र-गुरु-पूजाविधि नामक तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Iiva said The image of the God Sun who causes the lotus to bud- should be made as seated on a lotus (Padmsana). with color like that of a lotus, with two hands, with a lotus in one hand and the other hand raised

अध्याय ५०

श्लोक 35

सुरथस्य तु दायादो वीरो राजा विदूरथः विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इति स्मृतः

surathasya tu dāyādo vīro rājā vidūrathaḥ vidūrathasutaścāpi sārvabhauma iti smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

कल्याणसप्तमी्रतकी विधि और उसका माहात्म्य भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक। किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम् सौरं धर्म प्रवक्ष्यामि नाप्रा कल्याणसप्तमीम्। विशोकसप्तमीं तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम्

English

THE MATSVA PORAEAf.

अध्याय ५०

श्लोक 36

सार्वभौमाज्जयत्सेनो रुचिरस्तस्य चात्मजः रुचिरात्तु ततो भौमस् त्वरितायुस्ततो ऽभवत्

sārvabhaumājjayatseno rucirastasya cātmajaḥ rucirāttu tato bhaumas tvaritāyustato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

शर्करासप्तमीं पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्। मन्दारसप्तमी तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ब्रह्माने पूछा--भगवन्! आप तो भवसागररूपी

English

in the posture of giving blessings, ami having seven horses in His chariot, drawn by seven reins. — 1.

अध्याय ५०

श्लोक 37

अक्रोधनस् त्व् आयुसुतस् तस्माद्देवातिथिः स्मृतः देवातिथेस्तु दायादो दक्ष एव बभूव ह

akrodhanas tv āyusutas tasmāddevātithiḥ smṛtaḥ devātithestu dāyādo dakṣa eva babhūva ha

हिन्दी अर्थ

संसारसे उद्धार करनेवाले हैं, अतः कोई ऐसा व्रत बतलाइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्! अब मैं सूर्यसे सम्बन्धित धर्म (व्रत)-का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है।

English

iVofe*- Padmfisana: A Intus-soat. An opinion of S;iin. A particular poaturo in reli- gions meditation. (Seo Sacred Hooks of the Hindns, Vol. XV. -Tiie Yoga Sfistra.)

अध्याय ५०

श्लोक 38

भीमसेनस्ततो दक्षाद् दिलीपस् तस्य चात्मजः दिलीपस्य प्रतीपस्तु तस्य पुत्रास् त्रयः स्मृताः

bhīmasenastato dakṣād dilīpas tasya cātmajaḥ dilīpasya pratīpastu tasya putrās trayaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वानन्तफला: प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः। विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनृपूर्वशः प्राङ्मुर्रोऽष्टदलं मध्ये तद्वद् वृत्तां च कर्णिकाम्। पुष्पाक्षतैश्च देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात्

English

The image of the ihuni, the gixer (»r boons, should he nuulo in white color, (Iressevl in white ri»hos, seuleJ on a white eliariot, having a white horse for His conveyance, liaving two hainls, one holding a clnh and the other raised, in the posture of giving l)lcs<itigs. — 2.

अध्याय ५०

श्लोक 39

देवापिः शंतनुश्चैव वाह्लीकश्चैव ते त्रयः वाह्लीकस्य तु दायादाः सप्त वाह्लीश्वरा नृपाः देवापिस्तु ह्य् अपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः

devāpiḥ śaṃtanuścaiva vāhlīkaścaiva te trayaḥ vāhlīkasya tu dāyādāḥ sapta vāhlīśvarā nṛpāḥ devāpistu hy apadhyātaḥ prajābhirabhavanmuniḥ

हिन्दी अर्थ

याम्ये दिवाकरायेति विधात्र इति नैऋते पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले। सौम्ये विकर्तनायेति रवये चाष्टमे दले कृतस्त्रानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम्

English

The imago of the Mars should he made, having while hair, four hands, armed with a pear. a h.mee and cliih, wiili the fourth iiand raised in tlie posting of giving hlessings. wearing.ed rohs and garland.- '-i.

अध्याय ५०

श्लोक 40

प्रजाभिस्तु किमर्थं वै ह्य् अपध्यातो जनेश्वरः को दोषो राजपुत्रस्य प्रजाभिः समुदाहृतः

prajābhistu kimarthaṃ vai hy apadhyāto janeśvaraḥ ko doṣo rājaputrasya prajābhiḥ samudāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः। अनेन विधिना सर्व मासि मासि व्रतं चरेत् सस्त्रालङ्कारसंयुक्ताः सुवर्णास्याः पयस्विनीः

English

The image of the Mercury.slionld Ix' ma le yellow, dressed in jtIIow robes and wearing a yellow garland, with four han ts armed with i sword, shield and club, and tin? hnntli h m 1 ral'; *! in (he posture of giving ))los- singrt, and having a lion for hi- e 'uvt yaneo.- I.

अध्याय ५०

श्लोक 41

किलासीद्राजपुत्रस्तु कुष्ठी तं नाभ्यपूजयन् कार्यं चैव तु देवानां क्षत्रं प्रति द्विजोत्तमाः भविष्यं कीर्तयिष्यामि शंतनोस्तु निबोधत

kilāsīdrājaputrastu kuṣṭhī taṃ nābhyapūjayan kāryaṃ caiva tu devānāṃ kṣatraṃ prati dvijottamāḥ bhaviṣyaṃ kīrtayiṣyāmi śaṃtanostu nibodhata

हिन्दी अर्थ

एकामपि प्रदद्याद् वा वित्तहीनो विमत्सरः । ये सभी सप्तमियाँ देवर्षियांद्वारा पूजित हैं तथा अनन्त 'फल देनेवाली कही गयी हैं। मैं इनके विधानको आनृपूर्वी यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ॥२--४॥ जब शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रविवार पड़ जाय तो उस सप्तमीको कल्याणिनी (नामसे) कहा जाता है। उसीका दूसरा नाम विजया भी है। व्रतीको चाहिए कि वह उस दिन प्रातःकाल उठकर गोदुग्धयुक्त जलसे ख्रान

English

The Venus and (he Jnpi!< r i)f made in white and yellow

अध्याय ५०

श्लोक 42

शंतनुस्त्वभवद्राजा विद्वान्स वै महाभिषक् इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषक्

śaṃtanustvabhavadrājā vidvānsa vai mahābhiṣak idaṃ codāharantyatra ślokaṃ prati mahābhiṣak

हिन्दी अर्थ

करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करे। फिर पूर्वाभिमुख हो चावलोंद्वारा अष्टदल कमल बनावे। उसके मध्यभागमें उसी आकारवाली कर्णिकाको भी रचना करे। तत्पश्चात् पुष्प और अक्षतद्वारा क्रमशः सब ओर देवेश्वर सूर्यकी स्थापना करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे--'तपनाय नमः से पूर्वदलपर, ' मार्तण्डाय नमः ' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'दिवाकराय नमः' से दक्षिणदलपर, 'विधात्रे नमः' से नेक्रत्यकोणके दलपर, वरुणाय नमः” से

English

respectively. Tliey -liould havn h nr hand-, h elding '-tali', rosary, and karaandalu, and the fourlli han'1 rai<e<i in f'no ]>ostui'e of giving hies-* sings. — 5.

अध्याय ५०

श्लोक 43

यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं रोगिणमेव च पुनर्युवा च भवति तस्मात्तं शंतनुं विदुः

yaṃ yaṃ karābhyāṃ spṛśati jīrṇaṃ rogiṇameva ca punaryuvā ca bhavati tasmāttaṃ śaṃtanuṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

पञश्चिमदलपर, ' भास्कराय नमः” से वायव्यकोणवाले दलपर, 'विकर्तनाय नम: ' से उत्तरदलपर, 'रवये नमः ' से ईशानकोणस्थित आठवें दलपर और “परमात्मने नमः ' से आदि, मध्य और अन्तमें सूर्यका आवाहन करके स्थापित कर दे। फिर नमस्कारान्तसे सुशोभित इन मन्त्रोंका उच्चारण कर श्वेत वस्त्र, फल, नेवेद्य, धूप, पुष्पमाला और चन्दनसे भलीभाँति पूजन करे। वेदीपर भी व्याहति- करनेका विधान है। इसके बाद विसर्जन करना चाहिए। फिर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक गुड़, दूध और घी आदिके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और तिलसे भरा हुआ पात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दान कर दे। इस

English

The Saturn shoiild hr.1 ih.- roh,iir ao-d die lo-tre of an lunerald, having a vulture hv n;-. e*a,ri an:- an: J It h. Ml i- armed with a lance, bow and artoe:. an! 'hr T m*'- •.*!!; in 'h*- ottnrM -.f giving

अध्याय ५०

श्लोक 44

तत्तस्य शंतनुत्वं हि प्रजाभिरिह कीर्त्यते ततो ऽवृणुत भार्यार्थं शंतनुर्जाह्नवीं नृप

tattasya śaṃtanutvaṃ hi prajābhiriha kīrtyate tato 'vṛṇuta bhāryārthaṃ śaṃtanurjāhnavīṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

प्रकार विधानको पूरा करके व्रती मानव रात्रिमें शयन करे और प्रातःकाल उठकर स्त्रान-जप आदि नित्यकर्म पूरा करे। तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंके साथ ही घी और दूधसे बने हुए पदार्थोंका भोजन करे। अन्तमें विडालब्रत (छल- कपट)-से रहित वेदज्ञ ब्राह्मणको सुवर्णसहित घृतपूर्ण पात्र और जलसे भरा हुआ घट दान कर दे और उस समय इस प्रकार कहे--'मेरे इस व्रतसे परमात्मा भगवान् सूर्य प्रसन्न हों।' इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सभी व्रतोंका अनुष्ठान

English

blessings, -h.

अध्याय ५०

श्लोक 45

तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद्विभुः काली विचित्रवीर्यं तु दाशेयी जनयत्सुतम्

tasyāṃ devavrataṃ nāma kumāraṃ janayadvibhuḥ kālī vicitravīryaṃ tu dāśeyī janayatsutam

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। तदनन्तर तेरहवाँ महीना आनेपर तेरह गौ दान करनेका विधान है, जो सभी दुधारू हों, वस्त्र और अलंकार आदिसे सुसज्जित हों और जिनके मुखपर सोनेका पत्र लगा हुआ हो। यदि व्रती निर्धन हो तो वह अलंकाररहित होकर एक ही गौका दान करे, किंतु कृपणता न करे; क्योंकि न वित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात् पतत्यधः॥ १७ मोहवश कंजूसी करनेसे अधःपतन हो जाता है

English

Tim image of h-hn..i.d... i '• h m j a u ri Ihii- numth or

अध्याय ५०

श्लोक 46

शंतनोर्दयितं पुत्रं शान्तात्मानमकल्मषम् कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रविर्यके

śaṃtanordayitaṃ putraṃ śāntātmānamakalmaṣam kṛṣṇadvaipāyano nāma kṣetre vaicitraviryake

हिन्दी अर्थ

प्राय: ये सभी सप्तमियाँ भविष्यपुराणमें अन्य कई अधिक सप्तमीत्रतोंक साथ उपदिष्ट हैं। सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते। आयुरारोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते

English

appearanee, setifed on:i lyhe-o' iw; - i ho;. h.f. jn-.f h nr l!ai»*!s, armed with a sword, a leather a -P'Mt, an! t!io!' »;rti» Imnd raised in the

अध्याय ५०

श्लोक 47

धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत् धृतराष्ट्रस्तु गान्धार्यां पुत्रानजनयच्छतम्

dhṛtarāṣṭraṃ ca pāṇḍuṃ ca viduraṃ cāpyajījanat dhṛtarāṣṭrastu gāndhāryāṃ putrānajanayacchatam

हिन्दी अर्थ

सर्वपापहरा नित्यं सर्वहैवतपूजिता। कल्याणसप्तमी जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमौत्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी

English

posture of giving Mo-dn h'l.H l-., ].o made of

अध्याय ५०

श्लोक 48

तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वक्षत्रस्य वै प्रभुः माद्री कुन्ती तथा चैव पाण्डोर्भार्ये बभूवतुः

teṣāṃ duryodhanaḥ śreṣṭhaḥ sarvakṣatrasya vai prabhuḥ mādrī kuntī tathā caiva pāṇḍorbhārye babhūvatuḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा-कथाको सुनता अथवा पढ़ता

English

smoky color, with a vu'' I are f.jr Hi- f.nvry.inet-.•oi l having two hands- - one hand holdirtg a nirji*e *111 1 ih»* nh' i- rai--'H In the posture of giving blessings, and having a di•<':•d Tao.- -7 e All the planets shonid h* me. i witi? a mown on their liead, and the images sltould ho two (ingf*r- high or, *1' the lieigijt of one\ (nvn finger). The mantras relating to tlm p!an»-:- s'lonld lx* n*riied on the rosary 108 times each. (It may also tnejui tlial liie si/e of the planets sliould be 108 fingers or digits in lieight. if the afiguli ho ont' inch in l('ngth, the images will be nine feet high; if lie- measure of tlif* afiguli bo:}th of an inch, then the lieight will l)o h'J f(?et. The sen.se is obscure;, —!l.

अध्याय ५०

श्लोक 49

देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थे ऽभिजज्ञिरे धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः

devadattāḥ sutāḥ pañca pāṇḍorarthe 'bhijajñire dharmādyudhiṣṭhiro jajñe mārutācca vṛkodaraḥ

हिन्दी अर्थ

शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २० है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१८--२०॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीब्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीत्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Here ends the ninety-fovvlh chapter den*) Hdny the iconofjraphy of the Ptauels

अध्याय ५०

श्लोक 50

इन्द्राद्धनंजयश्चैव इन्द्रतुल्यपराक्रमः नकुलं सहदेवं च माद्र्यश्विभ्यामजीजनत्

indrāddhanaṃjayaścaiva indratulyaparākramaḥ nakulaṃ sahadevaṃ ca mādryaśvibhyāmajījanat

हिन्दी अर्थ

विशोकसप्तमीत्रतकी विधि और उसका माहात्म्य विशोकसप्तमीं तद्दद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव। यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्‍्नुते

English

CHAPTBR XOV. Ndrada said:—0 Lord, presiding over the Past and the Future! pray tell me about some other ordinance that may be the giver of happiness and emancipation. — 1.

अध्याय ५०

श्लोक 51

पञ्चैते पाण्डवेभ्यस्तु द्रौपद्यां जज्ञिरे सुताः द्रौपद्यजनयच्छ्रेष्ठं प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरात्

pañcaite pāṇḍavebhyastu draupadyāṃ jajñire sutāḥ draupadyajanayacchreṣṭhaṃ prativindhyaṃ yudhiṣṭhirāt

हिन्दी अर्थ

उपवासब्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भ्वेन्निशि कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममकायेति च पूजयेत्। करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च ईश्वरने कहा--मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीत्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिए कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी

English

Hearing the above words of the sage, Lord iva, the knower of all things, understood the inelimition of Narada, and said: NSrada! this sacred bull, wlio is my prijicipal attendant and who has become unified with me on account of his a.sceticism and knowledge of the lruti and the Pur/inas, will explain to you the rituals connected with my ordinance (Maherfvara Dharina)."— 2-3.

अध्याय ५०

श्लोक 52

श्रुतसेनं भीमसेनाच् छ्रुतकीर्तिं धनंजयात् चतुर्थं श्रुतकर्माणं सहदेवाद् अजायत

śrutasenaṃ bhīmasenāc chrutakīrtiṃ dhanaṃjayāt caturthaṃ śrutakarmāṇaṃ sahadevād ajāyata

हिन्दी अर्थ

तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे खान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वर्णनिर्मित कमलको स्थापित कर ' अर्काय नमः '-- इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्रार सूर्यकी पूजा करे और ऐसा

English

Lord Matsya sail: — Having said.so, that Lord of the God of gods, vanishod then and tlicve. Xarada also, being anxious to hear, asked Nandikeivaia thu<: - O Nandi keiivara, thou hast been ordered by iva, therefore, t(dl me tlie dhetvaril vrata. — 4. Nandikesvara saiti: — Hour with jittontion, O Bnlhmana! I shall tell you the Mihojlvaia vr ila. It is well-known in all the three worlds by the name of fjiva (JhatJirdasii.— o.

अध्याय ५०

श्लोक 53

नकुलाच्च शतानीकं द्रौपदेयाः प्रकीर्तिताः तेभ्यो ऽपरे पाण्डवेयाः षडेवान्ये महारथाः

nakulācca śatānīkaṃ draupadeyāḥ prakīrtitāḥ tebhyo 'pare pāṇḍaveyāḥ ṣaḍevānye mahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

कहे--' आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुडपूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे।

English

In the montli nf M/irgajlira, on tiic Lhirloenth day of the bright fort- night, the devotee slmuld take his meals once a!id pray to iva with this SaAkalpa mantra, ''Ofm-d of all the Deities! I take refuge in Thee. To-morrow, the Chaturdasji day, I shall observe a complete fast, without eating anything, and worship Siva. I shall also giveaway a bull, made of gold, and then take my meals the next day. ' — d-7.

अध्याय ५०

श्लोक 54

हैडम्बो भीमसेनात्तु पुत्रो जज्ञे घटोत्कचः काशी बलधराद्भीमाज् जज्ञे वै सर्वगं सुतम्

haiḍambo bhīmasenāttu putro jajñe ghaṭotkacaḥ kāśī baladharādbhīmāj jajñe vai sarvagaṃ sutam

हिन्दी अर्थ

ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता शय्यां सोपस्करां दद्यात् कपिलां च पयस्विनीम्

English

Having inad(! this Safikalpa, the devotee should go to bed and then rise early on the next morning and worship rfiva along with His Consort (UiTUiJ, with white lotus llowors, sandal, etc.— 8. (l) Tho feot shouM ho worshipped, after recitiug *.Siviya namah.' (2)

अध्याय ५०

श्लोक 55

सुहोत्रं तनयं माद्री सहदेवादसूयत करेणुमत्यां चैद्यायां निरमित्रस्तु नाकुलिः

suhotraṃ tanayaṃ mādrī sahadevādasūyata kareṇumatyāṃ caidyāyāṃ niramitrastu nākuliḥ

हिन्दी अर्थ

यावज्जन्मसहस्त्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत्। तावन्न शोकमभ्येति रोगदौर्गत्यवर्जितः यं यं प्रार्थयते कामं तं तमाप्नोति पुष्कलम्। निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति यः पठेच्छुणुयाद् वापि विशोकाख्यां च सप्तमीम्।

English

the head, after rocitini; Sarv&tmaue n.iinah. (S) tho eyes, after reciting

अध्याय ५०

श्लोक 56

सुभद्रायां रथी पार्थाद् अभिमन्युरजायत यौधेयं देवकी चैव पुत्रं जज्ञे युधिष्ठिरात्

subhadrāyāṃ rathī pārthād abhimanyurajāyata yaudheyaṃ devakī caiva putraṃ jajñe yudhiṣṭhirāt

हिन्दी अर्थ

स्वयं सप्तमीको तेल और नमकरहित अन्नका भोजन करके मौन धारण कर ले। वैभवकी इच्छा रखनेवाले व्रतीको उस दिन पुराणोंकी कथाएँ सुननी चाहिए। इस विधिसे दोनों पक्षोंमें सारा कार्य तबतक करते रहना चाहिए जबतक पुनः माघमासमें शुक्लपक्षको सप्तमी न आ जाय॥१--८॥ व्रतके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसमेत कलश, समस्त उपकरणोंसहित शय्या और दुधारू कपिला गौका दान करना चाहिए। इस प्रकार जो मनुष्य कृपणता

English

WtPlW : ' Triiiotnij'a naoiah.' (4; tho forehead, after reciting * Uaraye namafci.' (5) the mouth, after reciting ' Indumukhfiya naraah,' (6) the throat after reciting

अध्याय ५०

श्लोक 57

अभिमन्योः परीक्षित्तु पुत्रः परपुरजयः जनमेजयः परीक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः

abhimanyoḥ parīkṣittu putraḥ parapurajayaḥ janamejayaḥ parīkṣitaḥ putraḥ paramadhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

छोड़कर उपर्युक्त विधिके अनुसार विशोकसप्तमी- ब्रतका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है तथा करोड़ों जन्मतक उसे शोककी प्राप्ति नहीं होती। वह रोग और दुर्गतिसे रहित हो जाता है तथा जिस-जिस मनोरथको प्रार्थना करता है, उसे-उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त करता है। जो व्रती निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्रास होता है। जो मनुष्य इस विशोकसप्तमीव्रतको कथा या विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी इस लोकमें कभी दुःखी नहीं

English

iW»sni TC *srikunthdya nauiali.' (7) llte oars, after reciting 'Sadyojfttiya

अध्याय ५०

श्लोक 58

ब्रह्माणं कल्पयामास स वै वाजसनेयकम् स वैशम्पायनेनैव शप्तः किल महर्षिणा

brahmāṇaṃ kalpayāmāsa sa vai vājasaneyakam sa vaiśampāyanenaiva śaptaḥ kila maharṣiṇā

हिन्दी अर्थ

सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःखी जायते क्कचित्॥ १३ होता और अन्तमें इन्द्रलोकको प्राप्त होता है ॥९--१३॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे विशोकसप्तमीव्रतं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

English

namah.' (8) tho anus, after reciting • VAmadev&ya namah.' (9) tho heart, after reciting W ' Aghorahridayaya namah.' (10 1 the breasts, after reciting

अध्याय ५०

श्लोक 59

न स्थास्यतीह दुर्बुद्धे तवैतद्वचनं भुवि यावत्स्थास्यसि त्वं लोके तावदेव प्रपत्स्यति

na sthāsyatīha durbuddhe tavaitadvacanaṃ bhuvi yāvatsthāsyasi tvaṃ loke tāvadeva prapatsyati

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकसप्तमीत्रत नामक पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ 'फलसप्तमीत्रतकी विधि यामुपोष्य नरः पापाद् विमुक्तः स्वर्गभाग् भवेत्

English

WMJWW »ni; 'Tatpuni.sAya namah.' (ll) the stomach, after reciting 4WHU| 'IsBnftya (12) the ribs, after reciting * Auantadharinfiya iiauiah.* (18) the waist, after

अध्याय ५०

श्लोक 60

क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततःप्रभृति सर्वशः अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्

kṣatrasya vijayaṃ jñātvā tataḥprabhṛti sarvaśaḥ abhigamya sthitāścaiva nṛpaṃ ca janamejayam

हिन्दी अर्थ

तामुपोष्याथ कमलं कारयित्वा तु काञ्जनम् शर्करासंयुतं दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने। रविं काञ्जनकं कृत्वा पलस्यैकस्य धर्मवित्। दद्याद् द्विकालवेलायां भानुर्मे प्रीयतामिति

English

reciting nn: • JfiAnabhutfiya namah/ (U) the thighs, after reciting * Ananta Vairigyasiiihdya namah/ (15 the knees should bo worshipped, after reciting H; 'AiKUitaiavaryan&thfiya namah/ (16) the legs, after reciting vmm «

अध्याय ५०

श्लोक 61

ततःप्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततःप्रभृति सर्वशः

tataḥprabhṛti śāpena kṣatriyasya tu yājinaḥ utsannā yājino yajñe tataḥprabhṛti sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

और उसका माहात्म्य ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्! अब मैं फलसप्तमी नामक एक अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हुँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो स्वर्गभागी हो जाता है । व्रतनिष्ठ मनुष्यको चाहिए कि वह मार्गशीर्ष नामक शुभ मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको सोनेका एक कमल बनवाये और उस दिन उपवास कर उसे शक्करसमेत कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इसी प्रकार धर्मवेत्ता व्रती एक पल सोनेकी सूर्यकी मूर्ति

English

' PradhAndya namalb* (17) tho ankles, after reciting * Vyom&tmane nama.

अध्याय ५०

श्लोक 62

क्षत्रस्य याजिनः केचिच् छापात्तस्य महात्मनः पौर्णमासेन हविषा इष्ट्वा तस्मिन्प्रजापतिम् स वैशम्पायनेनैव प्रविशन्वारितस्ततः

kṣatrasya yājinaḥ kecic chāpāttasya mahātmanaḥ paurṇamāsena haviṣā iṣṭvā tasminprajāpatim sa vaiśampāyanenaiva praviśanvāritastataḥ

हिन्दी अर्थ

बनवाकर उसे सायंकालके समय "भगवान् सूर्य मुझपर प्रसन्न हों'—यों कहकर ब्राह्मणको दान करे। फिर अष्टमीके दिन ब्राह्मणोंको फलसहित दूधसे बने हुए अन्नका भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। ऐसा तबतक करते रहना चाहिए जबतक पुनः

English

(18) the hair, after reciting W: * VyomakesAtmarApiya namah.' (18) the bMk, ttbw Molting Jff 'Putyal n»ui»b*' («*) 5» 'Tntyoyi

अध्याय ५०

श्लोक 63

परीक्षितः सुतो ऽसौ वै पौरवो जनमेजयः द्विर् अश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः

parīkṣitaḥ suto 'sau vai pauravo janamejayaḥ dvir aśvamedhamāhṛtya mahāvājasaneyakaḥ

हिन्दी अर्थ

शर्करापात्रसंयुक्तं सस्त्रमाल्यसमन्वितम्। भानुरकों रविर्ब्रह्मा सूर्यः शक्रो हरिः शिवः। प्रतिमासं च सप्तम्यामेकैकं नाम कोीर्तयेत्। प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत् कुर्वन् समाचरेत्

English

Then the devotee should give to the Br&liuianas. a golden bull, along with a pitcher, full of water, white garment.s, Par diuratna, various kinds of eatables, — 14.

अध्याय ५०

श्लोक 64

प्रवर्तयित्वा तं सर्वम् ऋषिं वाजसनेयकम् विवादे ब्राह्मणैः सार्धम् अभिशप्तो वनं ययौ

pravartayitvā taṃ sarvam ṛṣiṃ vājasaneyakam vivāde brāhmaṇaiḥ sārdham abhiśapto vanaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

शर्कराकलशं दद्याद्धेमपद्ादलान्वितम् यथा न विफलाः कामास्त्वद्भक्तानां सदा रवे। तथानन्तफलावासप्तिरस्तु मे सप्तजन्मसु

English

Really good Bnihinanas should be invited and well-fed, after which curd mixed with clarified butter, saved from the sacrificial offerings, should be taken by the devotee, whosliould sleep on the ground, with bis head towards the north. On the full moon-day, he should feed the Brkbmanas end then take his own meals in silence. Similarly, he should do on the fourteenth day of the dark fortnight.*— 15-10. The worship should be performed in the same way all the four- teenth days of each fortnight of every month. Now the especial mantras to be recited in each month will he explained. — 17.

अध्याय ५०

श्लोक 65

जनमेजयाच्छतानीकस् तस्माज्जज्ञे स वीर्यवान् जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्ये ऽभिषिक्तवान्

janamejayācchatānīkas tasmājjajñe sa vīryavān janamejayaḥ śatānīkaṃ putraṃ rājye 'bhiṣiktavān

हिन्दी अर्थ

सूर्यलोके महीयते सर्वपापविशुद्धात्मा कृष्णपक्षकी सप्तमी न आ जाय। उस दिन भी उसी क्रमसे विधिपूर्वक उपवास करके स्वर्णमय कमलके साथ स्वर्णनिर्मित फलका दान करना चाहिए। उसके साथ शक्करसे भरा हुआ पात्र, वस्त्र और पुष्पमाला भी होना आवश्यक है। इस प्रकार

English

Commencing with the month of Margiulira, tin* mantras hereafter mentioned ahouhl be pronounced one by one: — (1) Sankaniya namal.i, (2) Karaviraknya naniah, 1Vyainvak;iya iiamah, (4; Maliesvaniya iiainah, (5) MahAdevuya nauiah, (ti-.Sthanavt* nainati, 7 ra.4npataye luiruah, i8) NAthaya nainah, Sarnbhave ininial.i, iPn Nuuinste Paranninunda, (ll) Nftmali Somardhadh;iriiy'. Blnniaya natnali. I am at Thy Mercy. These immos.should bo reoOeil ono by one, #'ach niorjlli, IVoni M;irgajfira. The devotee should as iVasana, ' I) uriii(\ (.••/vv-dung, (3i milk, (4) cunls, io.ciarified butter, -b. wat('r nnxctl with ku«<i-grass, (7) panchagavya, (8: w<joda['pIo vbacb, caiuphur, agarii, (11) barley, (12) black-sesamian, on the Chaturdasi of each month. -- 18-22.

अध्याय ५०

श्लोक 66

अथाश्वमेधेन ततः शतानीकस्य वीर्यवान् जज्ञे ऽधिसोमकृष्णाख्यः साम्प्रतं यो महायशाः

athāśvamedhena tataḥ śatānīkasya vīryavān jajñe 'dhisomakṛṣṇākhyaḥ sāmprataṃ yo mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी सप्तमीके दिन उपवास और दान कर क्रमश: सूर्य-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिए। भानु अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु कर प्रत्येक मासकी सप्तमी तिथिको उपर्युक्त नामोंमें क्रमशः एक-एकका कीर्तन करना चाहिए। प्रत्येक पक्षमें फलदान करनेका भी विधान है। इस प्रकार सारा कार्य करते हुए व्रतका अनुष्ठान करना चाहिए

English

Vote.— The mantras to ix- rrciicd in tsvolvo inuiilhs. wiili AgratiAyaiia, are giveu below

अध्याय ५०

श्लोक 67

तस्मिञ्छासति राष्ट्रं तु युष्माभिरिदमाहृतम् दुरापं दीर्घसत्त्रं वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे वर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमाः

tasmiñchāsati rāṣṭraṃ tu yuṣmābhiridamāhṛtam durāpaṃ dīrghasattraṃ vai trīṇi varṣāṇi puṣkare varṣadvayaṃ kurukṣetre dṛṣadvatyāṃ dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

व्रतकी समाप्तिपर वस्त्र और आभूषण आदिद्वारा सपल्लीक ब्राह्मणकी पूजा करे और स्वर्णमय कमलसहित शक्करसे भरा हुआ कलश दान करे। उस समय ऐसा कहे--' सूर्यदेव जिस प्रकार आपके भक्तोंकी कामनाएँ कभी विफल नहीं होतीं, उसी प्रकार मुझे भी सात जन्मोंतक अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहे।' जो मनुष्य इस अनन्त फलदायिनी 'फलसप्तमीका व्रत करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फलसप्तमीब्रतका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यद्वारा इस लोकमें अथवा परलोकमें मद्यपान आदि जो कुछ भी दुष्कर्म किया गया है, वह सारा-का-सारा विनष्ट हो जाता है। इस

English

(1) ainw Hfl; ".Sulut'vMioii to >atukara. I laka refuge in Tbee." This should ho proixiunt-od in tin* in-jiith «)i Martasira

अध्याय ५०

श्लोक 68

भविष्यं श्रोतुमिच्छामः प्रजानां लोमहर्षणे पुरा किल यदेतद्वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया

bhaviṣyaṃ śrotumicchāmaḥ prajānāṃ lomaharṣaṇe purā kila yadetadvai vyatītaṃ kīrtitaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

फलसप्तमीब्रतका निरन्तर अनुष्ठान करनेवाले मनुष्यके पास रोग नहीं फटकते और वह अपनी भूत एवं भविष्यकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। जो इस व्रत- विधानको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भी कल्याणभागी यःश्रृणोति पठेद् वापि सोऽपि कल्याणभाग् भवेत्॥ १३ हो जाता है

English

(2) WP •'.Salutation i.o Karaviraka. 1 take refuge in Thee," This should b«" jirououiu;ed in tin.- inuiilh <jf Pansa.

अध्याय ५०

श्लोक 69

येषु वै स्थास्यते क्षत्रम् उत्पत्स्यन्ते नृपाश्च ये तेषाम् आयुष्प्रमाणं च नामतश्चैव तान्नृपान्

yeṣu vai sthāsyate kṣatram utpatsyante nṛpāśca ye teṣām āyuṣpramāṇaṃ ca nāmataścaiva tānnṛpān

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे फलसप्तमीव्रतं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें फलसप्तमीब्रत नामक छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ 'द्रतकल्पद्रुम 'में इसके अतिरिक्त दो और भिन्न फलसप्तमियाँ निर्दिष्ट हुई हैं।

English

(3) w. '• ro rryaiutaUa; in MAglia."

अध्याय ५०

श्लोक 70

कृतयुगप्रमाणं च त्रेताद्वापरयोस्तथा कलियुगप्रमाणं च युगदोषं युगक्षयम्

kṛtayugapramāṇaṃ ca tretādvāparayostathā kaliyugapramāṇaṃ ca yugadoṣaṃ yugakṣayam

हिन्दी अर्थ

शर्करासप्तमीत्रतकी विधि और उसका माहात्म्य शर्करासप्तमीं वक्ष्ये तद्वत् कल्मषनाशिनीम्।

English

) 4|)l«W.ra VKPf Malu*»var:i; in PhAlguna." (5* WP Wi *171: •• To MaliAdova: in Uliaitra."

अध्याय ५०

श्लोक 71

सुखदुःखप्रमाणं च प्रजादोषं युगस्य तु एतत्सर्वं प्रसंख्याय पृच्छतां ब्रूहि नः प्रभो

sukhaduḥkhapramāṇaṃ ca prajādoṣaṃ yugasya tu etatsarvaṃ prasaṃkhyāya pṛcchatāṃ brūhi naḥ prabho

हिन्दी अर्थ

स्थण्डिले पदामालिख्य कुङ्कुमेन सकर्णिकम्। स्थापयेदुदकुम्भं च शर्करापात्रसंयुतम्। विश्ववेदमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यसे।

English

(C)?!nr iit«t »i7t: •' To Stlifinu; in Vai.-'aLliu."

अध्याय ५०

श्लोक 72

यथा मे कीर्तितं पूर्वं व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा भाव्यं कलियुगं चैव तथा मन्वन्तराणि च

yathā me kīrtitaṃ pūrvaṃ vyāsenākliṣṭakarmaṇā bhāvyaṃ kaliyugaṃ caiva tathā manvantarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

सौरसूक्तं जपंस्तिष्ठेत् पुराणश्रवणेन वा भोजयेच्छक्तितो विप्राञ्शर्कराघृतपायसैः।

English

(7) ait«? «w: •* To J';isiip?4ti; in.lyaistha." (8) W- -To.ViUha; 111 Asaija. ■

अध्याय ५०

श्लोक 73

अनागतानि सर्वाणि ब्रुवतो मे निबोधत अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भविष्या ये नृपास्तथा

anāgatāni sarvāṇi bruvato me nibodhata ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi bhaviṣyā ye nṛpāstathā

हिन्दी अर्थ

संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम् सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम्। गृहं च शक्तिमान् दद्यात् समस्तोपस्करान्वितम् सहस्त्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा।

English

(0> wj SIVV •!?!: •• To •Sainhiiii; in.SrAvana."

अध्याय ५०

श्लोक 74

ऐडेक्ष्वाक्वन्वये चैव पौरवे चान्वये तथा येषु संस्थास्यते तच्च ऐडेक्ष्वाकुकुलं शुभम् तान्सर्वान्कीर्तयिष्यामि भविष्ये कथितान्नृपान्

aiḍekṣvākvanvaye caiva paurave cānvaye tathā yeṣu saṃsthāsyate tacca aiḍekṣvākukulaṃ śubham tānsarvānkīrtayiṣyāmi bhaviṣye kathitānnṛpān

हिन्दी अर्थ

ईश्वरने कहा - ब्रह्मन्! अब मैं उसी प्रकार पापनाशिनी शर्करासप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है । ब्रतनिष्ठ पुरुष वेशाखमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रातःकाल श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्रान करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दन धारण कर ले। फिर वेदीपर कुङ्कमसे कर्णिकासहित कमलका चित्र बनावे। उसपर “सवित्रे नमः” कहकर गन्ध और धूप निवेदित

English

(10) wt sren *is: '' To Paramananila; in niiadra.'* (U) «nv«RY: **ToSoitiardhadh in Asvina."

अध्याय ५०

श्लोक 75

तेभ्यो ऽपरे ऽपि ये त्व् अन्ये ह्य् उत्पत्स्यन्ते नृपाः पुनः क्षत्राः पारशवाः शूद्रास् तथान्ये ये बहिश्चराः

tebhyo 'pare 'pi ye tv anye hy utpatsyante nṛpāḥ punaḥ kṣatrāḥ pāraśavāḥ śūdrās tathānye ye bahiścarāḥ

हिन्दी अर्थ

करे। फिर उसपर शक्करसे परिपूर्ण पात्रसहित जलपूर्ण कलश स्थापित करे, उसपर स्वर्णमयी मूर्ति रख दे और उसे श्वेत वस्त्रसे सुशोभित करके श्वेत पुष्पमाला और चन्दनद्वारा वक्ष्यमाण-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक पूजन करे। (वह मन्त्र इस प्रकार है--) “सूर्यदेव! विश्व और वेद आपके स्वरूप हैं, आप वेदवादी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंके लिये अमृततुल्य फलदायक हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कोजिये।' तत्पश्चात् पञ्चगव्य पान कर उसी कलशके पार्श्वभागमें भूमिपर शयन करे। उस समय सूर्यसूक्तका जप अथवा पुराणका श्रवण करते रहना चाहिए। इस प्रकार दिन-रात बीत जानेपर अष्टमीके दिन प्रातःकाल नित्यकर्मसे निवृत्त होकर पहलेकी तरह वह सारा सामान

English

(12) ntm wi TOT «ct: " To Uhima; in KArtik u"

अध्याय ५०

श्लोक 76

अन्धाः शकाः पुलिन्दाश्च चूलिका यवनास्तथा कैवर्ताभीरशबरा ये चान्ये म्लेच्छसम्भवाः पर्यायतः प्रवक्ष्यामि नामतश्चैव तान्नृपान्

andhāḥ śakāḥ pulindāśca cūlikā yavanāstathā kaivartābhīraśabarā ye cānye mlecchasambhavāḥ paryāyataḥ pravakṣyāmi nāmataścaiva tānnṛpān

हिन्दी अर्थ

वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे। पुन: अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको शक्कर, घी और दूधसे बने हुए पदार्थ भोजन करावे और स्वयं भी मौन रहकर तेल और नमकसे रहित पदार्थोंका भोजन करे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सारा कार्य करना चाहिए। एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर शक्करसे पूर्ण कलशसमेत समग्र उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा एक दुधारू गौ दान करनेका विधान है। ब्रती यदि धन- सम्पत्तिसे युक्त हो तो उसे समस्त उपकरणोंसे युक्त गृहका

English

Tlie worahip of fiva aiiould Ijo conducted I'roui tlic iiiontli of M&rga- dira oil ward, by uHeriug tbc following ilowura, luru by turn, vis.: — (1 M.-iiidSra, (2) jasmine, (3) Dbatfira, (4) Sambh&lfi (Sindulvara), (5i A4oka, (G MallikA, (7) PAtala, (8) Arka flower, (U) Kadainba, (10) lotus (atapatri), fJ 1) Kamalini (Utpala).- 23-24.

अध्याय ५०

श्लोक 77

अधिसोमकृष्णश् चैतेषां प्रथमं वर्तते नृपः तस्यान्ववाये वक्ष्यामि भविष्ये कथितान्नृपान्

adhisomakṛṣṇaś caiteṣāṃ prathamaṃ vartate nṛpaḥ tasyānvavāye vakṣyāmi bhaviṣye kathitānnṛpān

हिन्दी अर्थ

भी दान करना चाहिए । तदनन्तर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल दशभिर्वाथ निष्केण तदर्धेनापि शक्तितः॥ ११ माशेका एक निष्क होता है जिसे दीनार भी कहते हैं I) ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वाँ सूक्त सूर्यसूक्त है ।

English

Again, when the month of KArtika arrives, the Brahmanas should be ft.d with various kinds of eatables and offered garments, ornaments and garlands.— (25).

अध्याय ५०

श्लोक 78

अधिसोमकृष्णपुत्रस्तु विवक्षुर्भविता नृपः गङ्गया तु हृते तस्मिन् नगरे नागसाह्वये

adhisomakṛṣṇaputrastu vivakṣurbhavitā nṛpaḥ gaṅgayā tu hṛte tasmin nagare nāgasāhvaye

हिन्दी अर्थ

२९० मत्स्यपुराण सोनेका एक घोड़ा बनवाकर पहलेकी ही भाँति मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान करना चाहिए। इसमें कृपणता न करे, यदि करता

English

Afterwards, the devotee should let loose a black bull, in conjunction witi) the Vedic rites. A golden image of Siva and Parvati sliould be made and given away to a BrAhmana, along with a bull and a cow. A bedstead, with the following things, should also be given away: Eight white pearls, sheets, pillows, and a vase, full of water.— 26-27. The images of liva and Parvat! should be placed in a copper vessel, full of rice, and then located on top of the pitcher of water, after which they should be given away to a Brahmana versed in the Vedas, observing ordinances and having a calm disposition. — 28.

अध्याय ५०

श्लोक 79

त्यक्त्वा विवक्षुर्नगरं कौशाम्ब्यां तु निवत्स्यति भविष्याष्टौ सुतास्तस्य महाबलपराक्रमाः

tyaktvā vivakṣurnagaraṃ kauśāmbyāṃ tu nivatsyati bhaviṣyāṣṭau sutāstasya mahābalaparākramāḥ

हिन्दी अर्थ

शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान्। इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः शर्करासप्तमी चेयं कल्पमेकं वसेत् स्वर्गे ततो याति परं पदम्

English

It, is liest to give it to one acquainted with Saniaveda: it should never and on no iiccouut bo given to a hypocrite. Only one vereed in the Vedas, knowing the Vedic principles, is fit to receive such an ollering.— 21).

अध्याय ५०

श्लोक 80

भूरिर्ज्येष्ठः सुतस्तस्य तस्य चित्ररथः स्मृतः शुचिद्रवश्चित्ररथाद् वृष्णिमांश्च शुचिद्रवात्

bhūrirjyeṣṭhaḥ sutastasya tasya citrarathaḥ smṛtaḥ śucidravaścitrarathād vṛṣṇimāṃśca śucidravāt

हिन्दी अर्थ

परिपठतीह दिवाकरस्य लोके। मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै- है तो दोषभागी होना पड़ता है॥ १--१२॥

English

A finihmana, free from deformity and of simple habits, should be worshipped, along with his wife, with garments, garlands and ornaments. These things might be given to the preceptor (Guru), if there be one; otherwise, to a really gooil Brahmana, free from all feeling of miserliness; for such a feeling leads one to the lower region. — 30-31. One who observes the iva Chatiirdaf ordinance, according to these cites, gets the benefit of a thousand Advamedha sacriiices. — 32.

अध्याय ५०

श्लोक 81

वृष्णिमतः सुषेणश्च भविष्यति शुचिर्नृपः तस्मात्सुषेणाद्भविता सुनीथो नाम पार्थिवः

vṛṣṇimataḥ suṣeṇaśca bhaviṣyati śucirnṛpaḥ tasmātsuṣeṇādbhavitā sunītho nāma pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

अमृत-पान करते समय सूर्यके मुखसे जो अमृतबिन्दु और ईख नामसे कहे जाते हैं। इनमें ईखका सारभूत शक्कर अमृततुल्य सुस्वादु है, इसलिये यह तीनोंमें श्रेष्ठ है। इसी कारण यह पुण्यवती शर्करा सूर्यके हव्य एवं कव्य-दोनों हवनीय पदार्थोमें उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह शर्करासप्तमी अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायिनी, समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाली और पुत्र-पौत्रोंकी प्रवर्धिनी है। जो मानव उत्कृष्ट श्रद्धाके साथ इसका अनुष्ठान करता है, उसे सदरतिकी प्राप्ति होती है। वह एक कल्पतक

English

And the sius of killing a Brahmana and also against the parents, committed in this or in the previous life, are destroyed in a moment. — 33.

अध्याय ५०

श्लोक 82

नृपात्सुनीथाद्भविता नृचक्षुः सुमहायशाः नृचक्षुषस्तु दायादो भविता वै सुखीवलः

nṛpātsunīthādbhavitā nṛcakṣuḥ sumahāyaśāḥ nṛcakṣuṣastu dāyādo bhavitā vai sukhīvalaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वर्गमें निवास कर अन्तमें परमपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस निष्पाप व्रतका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। साथ ही जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवगणों रमरवधूजनमालयाभिपूज्यः॥ १७ एवं देवाङ्गनाओंके समूहसे पूजित होता है ॥१३--१७॥

English

'I'he devotee gets long life, health, domestic prosperity, and promo- tion in his husbandry, lie then eventually goes near the Lord of four hands, whose chief attendant he becomes; and then after, passing crores of kalpas in the heaven, he becomes unified with liva. — 34. Even the sage fifihaspati, the Deras, like the mighty Indra, and BrahuiA, can.not adequately describe the glories of this ordinance. Even I cannot do so with a crore of tongues.— 35.

अध्याय ५०

श्लोक 83

सुखीवलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः परिष्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृपः

sukhīvalasutaścāpi bhāvī rājā pariṣṇavaḥ pariṣṇavasutaścāpi bhavitā sutapā nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे शर्कराब्रतं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शर्करासप्तमीब्रत नामक सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कमलसप्तमीत्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

English

One wlio roads, hears or thinks about this ordinance becomes liber- ated from all his sins. The Divine Consorts also venerate it; therefore, a devotee should always observe it, free from all feelings of despise: — 36.

अध्याय ५०

श्लोक 84

मेधावी तस्य दायादो भविष्यति न संशयः मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरंजयः

medhāvī tasya dāyādo bhaviṣyati na saṃśayaḥ medhāvinaḥ sutaścāpi bhaviṣyati puraṃjayaḥ

हिन्दी अर्थ

यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते। ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्

English

The woman who observes this ordinance with the permission of her husband, son or the preceptor also attains bliss by the glory of liva.— . Here ends the ninety-fifth chapter describing the Chaturdasi Vrata. THE UAT8YA PUBAEAM.

अध्याय ५०

श्लोक 85

उर्वो भाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मजः तिग्माद्बृहद्रथो भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात्

urvo bhāvyaḥ sutastasya tigmātmā tasya cātmajaḥ tigmādbṛhadratho bhāvyo vasudāmā bṛhadrathāt

हिन्दी अर्थ

ईश्वरने कहा--ब्रह्मन्!। इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीब्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसको अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्माहस्ताय ते नमः ', 'विश्वधारिणे ते नमः ', “दिवाकर तुभ्यं नमः ', ' प्रभाकर ते नमोऽस्तु'-इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित

English

Nandikedvara said: — 0 Ntirada! also hear the benefits that accrue to the devotee in his next life, by his relinquishing the fruits of this ordi- nance.—!.

अध्याय ५०

श्लोक 86

वसुदाम्नः शतानीको भविष्योदयनस्ततः भविष्यते चोदयनाद् वीगे राजा वहीनरः

vasudāmnaḥ śatānīko bhaviṣyodayanastataḥ bhaviṣyate codayanād vīge rājā vahīnaraḥ

हिन्दी अर्थ

कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानृपस्करान्।

English

Sage! the ordinance vvrata) should be commenced on any one of the following days, in the month of Mlrgaiir: the third, the twelfth, the eight or the fourteenth day of the bright fortnight, after invoking the Brfthmatias.— 0 Narada! hi other auspicious months also, the devotee should, to the best of his ability, fee I tlie Brahmanas with rice cooked in milk and mixed with sugar, and then satisfy them witli Daksina.— 3.

अध्याय ५०

श्लोक 87

वहीनरात्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति दण्डपाणेर्निरमित्रो निरमित्रात्तु क्षेमकः

vahīnarātmajaścaiva daṇḍapāṇirbhaviṣyati daṇḍapāṇerniramitro niramitrāttu kṣemakaḥ

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते कल्पे कल्पे ततो लोकान् सप्त गत्वा पृथक् पृथक्। अप्सरोभिः परिंवृतस्ततो याति परां गतिम् भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक

English

The prohibited grains of eighteen kinds and fruits and roots should be avoided for a period of one year: hui there is no harm in taking anything in the form (d a medic ine. A g(ddcn image of liva ainl a bull should be made. The image of Dharmaraja should be made similarly. — 4.

अध्याय ५०

श्लोक 88

अत्रानुवंशश्लोको ऽयं गीतो विप्रैः पुरातनैः ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर् वंशो देवर्षिसत्कृतः क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे

atrānuvaṃśaśloko 'yaṃ gīto vipraiḥ purātanaiḥ brahmakṣatrasya yo yonir vaṃśo devarṣisatkṛtaḥ kṣemakaṃ prāpya rājānaṃ saṃsthāsyati kalau yuge

हिन्दी अर्थ

मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिए। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतको समापिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिए। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसञ्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीब्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त

English

The followingsixteen i;lnd-» •>[ fruits should bo imule in gold, accord- ing to the means of the devotee, r/? • —[Hmipkins, (jitrmis, egg-phinis, bread-fruits, mangoes, liog-plums, woodapples, Itidra grains, cucumbers, cocoamits, the holy figs, the juiiibes, the lemons, ilu' plantains, saffron, and pomegranates.— -j-tl. The following should be made of silver, airording to the means of the devotee, iu5:— Muti a kind of root ' egetabl'", Kniblica officinalis rose apple, tamarind, Kaiaunda. Kanlvdaberry, cartlamom, eottoji, bamboo, Kutaja, iarnl, Udumbara. coeoanut, grape.s, two kinds of egg-plants. -7-8.

अध्याय ५०

श्लोक 89

इत्येष पौरवो वंशो यथावदिह कीर्तितः धीमतः पाण्डुपुत्रस्य चार्जुनस्य महात्मनः

ityeṣa pauravo vaṃśo yathāvadiha kīrtitaḥ dhīmataḥ pāṇḍuputrasya cārjunasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्- पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥ ११ गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है

English

The fruits of the following "iliMuld be made of copper, according to the means of the devotee Palms, Agasti gramliflora, Kayaphala, (laipbharl, esculent root, the red esculent root, a bulbous root, svarnakhhiri, cucumber, chitravalti, Salrnali, mango, iicjnoritx*. kidney-bean, fig tree, patola (a species of cucumber). - -0-11.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 50
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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