अध्याय ५०
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ५० अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत
matsya-purāṇa 50 ajamīḍhasya nīlinyāṃ nīlaḥ samabhavannṛpaḥ nīlasya tapasogreṇa suśāntirudapadyata
हिन्दी अर्थ
रूपेणाप्रतिमं कान्त्या सोऽहसद् भृगुनन्दनः ईश्वरने कहा--पितामह! अब भविष्यमें घटित होनेवाले एक अन्य ब्रतके वृत्तान्तको सुनो, जो सुन्दरता और सम्पत्ति प्रदान करनेवाला है। उसी द्वापरयुगके अन्तमें युधिष्ठिर आदिके साथ महर्षि पिप्पलादका संवाद होगा। उस समय तपस्वी महामुनि पिप्पलादके नैमिषारण्यमें निवास करते समय धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर उनके . निकट जाकर एक प्रश्न करेंगे
English
The Yajurvedi BrAhmana, seated in the south, should recite the mantras relating to luti, God Indra, Saumyn, Kumanda, &c. — 132.