Matsya Purana· Matsya Purāṇa
54
अध्याय 54 / 176

Adhyaya 54

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अध्याय ५४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ५४ अतः परं प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषतः व्रतोपवाससंयुक्तान् यथामत्स्योदितानिह

matsya-purāṇa 54 ataḥ paraṃ pravakṣyāmi dānadharmānaśeṣataḥ vratopavāsasaṃyuktān yathāmatsyoditāniha

हिन्दी अर्थ

हेमाद्रि, कल्पतरु, पद्मपुराणादिमें-यहाँ 'विलेपनैः ' पाठ है। निवेश्यौ सर्वशैलेषु विशेषाच्छर्कराचले मन्दरे कामदेवस्तु प्रत्यग्वक्त्रः सदा भवेत्।

English

One whu, at the e'uiillncnu -d' thetianges and tljc Yamuna, lights cowdung iiics all round ami '-its in the ndeUi of t!it'in. enjoys hoaltliy body, with all his limbs in tin bri i*v)nduioiL

अध्याय ५४

श्लोक 2

महादेवस्य संवादे नारदस्य च धीमतः यथावृत्तं प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम्

mahādevasya saṃvāde nāradasya ca dhīmataḥ yathāvṛttaṃ pravakṣyāmi dharmakāmārthasādhakam

हिन्दी अर्थ

हैमी सुपार्श्वे सुरभिर्दक्षिणाभिमुखी भवेत् सौभाग्यामृतसारोऽयं पर्वतः शर्करायुतः। तस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा

English

He rojnaiiis iji heaven f a a- tnany y»*ais as there are liair on his ljody."* lo.

अध्याय ५४

श्लोक 3

कैलासशिखरासीनम् अपृच्छन्नारदः पुरा विनयनमनङ्गारिम् अनङ्गाङ्गहरं हरम्

kailāsaśikharāsīnam apṛcchannāradaḥ purā vinayanamanaṅgārim anaṅgāṅgaharaṃ haram

हिन्दी अर्थ

अमृतं पिबतां ये तु निपेतुर्भुवि शीकराः। देवानां तत्समुत्थस्त्वं पाहि नः शर्कराचल मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः। तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात् यो दद्याच्छर्कराशैलमनेन विधिना नरः। सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स याति परमं पदम्

English

And when i- arnan d.;vUlh, lie b ixaiics the emperor ol

अध्याय ५४

श्लोक 4

भगवन्देवदेवेश ब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक श्रीमदारोग्यरूपायुर् भाग्यसौभाग्यसम्पदा संयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान्भक्तः कथं भवेत्

bhagavandevadeveśa brahmaviṣṇvindranāyaka śrīmadārogyarūpāyur bhāgyasaubhāgyasampadā saṃyuktastava viṣṇorvā pumānbhaktaḥ kathaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

चन्द्रतारार्कसंकाशमधिरुह्यानुजीविभिः । सहैव यानमातिष्ठेत् तत्र विष्णुप्रचोदितः पर्वतोपस्करान् सर्वान् प्रापयेद् ब्राह्मणालयम्

English

the world. Aftej <. j-j'-yjoL. tin — ', in- again leiaemljci- tlie very same tirtha. -'-11.

अध्याय ५४

श्लोक 5

नारी वा विधवा सर्वगुणसौभाग्यसंयुता क्रमान्मुक्तिप्रदं देव किंचिद्व्रतमिहोच्यताम्

nārī vā vidhavā sarvaguṇasaubhāgyasaṃyutā kramānmuktipradaṃ deva kiṃcidvratamihocyatām

हिन्दी अर्थ

आसीत् पुरा बृहत्कल्पे धर्ममूर्तिर्जनाधिपः। मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष-इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको तो प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिए। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिए शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिए। मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति सदा पश्चिमाभिमुखी, गन्धमादनके शिखरपर कुबेरकी मूर्ति उत्तराभिमुखी, विपुलाचलपर वेदमूर्ति--ब्रह्मा और हंसको

English

UiK? wiio intvJ iIju saciod waUis a! tin; junction ol llic

अध्याय ५४

श्लोक 6

सम्यक्पृष्टं त्वया ब्रह्मन् सर्वलोकहितावहम् श्रुतमप्यत्र यच्छान्त्यै तद्व्रतं शृणु नारद

samyakpṛṣṭaṃ tvayā brahman sarvalokahitāvaham śrutamapyatra yacchāntyai tadvrataṃ śṛṇu nārada

हिन्दी अर्थ

मूर्ति पूर्वाभिमुखी और सुपार्श्व पर्वतपर स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिए तत्पश्चात् आवाहन आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी भाँति करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बिचला प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। (वे मन्त्र इस

English

(iangcsajjfl ihc Vainnin:, InjiiJg ihr turn. <1 llir lunar relit>se, goes to the World of the AIo j-! wiien- i!< onj w- in Ills -Muons ijompany and remains in heaven lor sL\lyl!ioii-.aiid yi ai-, and freed I'lom all liis sins - -12-13.

अध्याय ५४

श्लोक 7

नक्षत्रपुरुषं नाम व्रतं नारायणात्मकम् पादादि कुर्याद्विधिवद् विष्णुनामानुकीर्तनम्

nakṣatrapuruṣaṃ nāma vrataṃ nārāyaṇātmakam pādādi kuryādvidhivad viṣṇunāmānukīrtanam

हिन्दी अर्थ

प्रकारके अर्थवाले हैं-) 'शैलेन्द्र! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल! टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है; अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारकाओंके समान

English

At th(; end, he leaves ili.' \v*nhi e*f liidra where he was venerated by the Uisis and Gandhaivas, eli. and i- born in a rich family. - 14.

अध्याय ५४

श्लोक 8

प्रतिमां वासुदेवस्य मूलर्क्षादिषु चार्चयेत् चैत्रमासं समासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्

pratimāṃ vāsudevasya mūlarkṣādiṣu cārcayet caitramāsaṃ samāsādya kṛtvā brāhmaṇavācanam

हिन्दी अर्थ

कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अरब जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करनेका विधान है। सर्वत्र गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिए। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिए

English

One wIjo njjlifls his legs and l»aianee.:) ijiiiis('lf on lihs head, swings over the liamesof fire. lesi-Ies in heaven fora hnndrcdtlmnsand years. — In.

अध्याय ५४

श्लोक 9

मूले नमो विश्वधराय पादौ गुल्फावनन्ताय च रोहिणीषु जङ्घे ऽभिपूज्ये वरदाय चैव द्वे जानुनी वाश्विकुमारऋक्षे

mūle namo viśvadharāya pādau gulphāvanantāya ca rohiṇīṣu jaṅghe 'bhipūjye varadāya caiva dve jānunī vāśvikumāraṛkṣe

हिन्दी अर्थ

ईश्वरने कहा--नारद! पहले बृहत्कल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह सुहुच्छक्रस्य निहता येन हैत्याः सहस्त्रशः॥ १७ इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों हैत्योंका वध किया था। यथेच्छारूपधारी च मनुष्योऽप्यपराजितः

English

And, on being bm ii again, lie Ikcoiik's Agniholri wdicn, after various cijjoyraent.s, attuinj the same tirtlia again. Hh

अध्याय ५४

श्लोक 10

पूर्वोत्तराषाढयुगे तथोरू नमः शिवायेत्यभिपूजनीयौ पूर्वोत्तराफल्गुनियुग्मके च मेढ्रं नमः पञ्चशराय पूज्यम्

pūrvottarāṣāḍhayuge tathorū namaḥ śivāyetyabhipūjanīyau pūrvottarāphalguniyugmake ca meḍhraṃ namaḥ pañcaśarāya pūjyam

हिन्दी अर्थ

तस्य भानुमती नाम भार्या त्रैलोक्यसुन्दरी। लक्ष्मीवद् दिव्यरूपेण निर्जितामरसुन्दरी नृपकोटिसहस्त्रेण न कदाचित् स मुच्यते।

English

One who cuts and nders his flesh U» the biiils, giK's and resides in the domain of (Jhandra <Moon», ami, on lH*ing born again, becomes a very pious king,- 17-18.

अध्याय ५४

श्लोक 11

कटिं नमः शार्ङ्गधराय विष्णोः सम्पूजयेन्नारद कृत्तिकासु तथार्चयेद्भाद्रपदाद्वये च पार्श्वे नमः केशिनिषूदनाय

kaṭiṃ namaḥ śārṅgadharāya viṣṇoḥ sampūjayennārada kṛttikāsu tathārcayedbhādrapadādvaye ca pārśve namaḥ keśiniṣūdanāya

हिन्दी अर्थ

विस्मयेनावृततो राजा वसिष्ठमृषिसत्तमम् भगवन् केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा। कस्माच्च विपुलं तेजो मच्छरीरे सदोत्तमम् शूद्रः सुवर्णकारश्च नाम्ना शौण्डोऽभवत् तदा।

English

GliAPTBR CVIIL

अध्याय ५४

श्लोक 12

कुक्षिद्वयं नारद रेवतीषु दामोदरायेत्यभिपूजनीयम् ऋक्षे ऽनुराधासु च माधवाय नमस्तथोरःस्थलमेव पूज्यम्

kukṣidvayaṃ nārada revatīṣu dāmodarāyetyabhipūjanīyam ṛkṣe 'nurādhāsu ca mādhavāya namastathoraḥsthalameva pūjyam

हिन्दी अर्थ

धर्मकार्यमिति ज्ञात्वा न गृह्णाति कथञ्चन सा च लीलावती वेश्या कालेन महतापि च

English

Full of wisdom, knowledo, beauty and swoetiiesa of speeoli. After (Mijoyiiig life, lie again goes to that Tirtlia. -Kh

अध्याय ५४

श्लोक 13

पृष्ठं धनिष्ठासु च पूजनीयम् अघौघविध्वंसकराय तच्च श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय नमो विशाखासु भुजाश्च पूज्याः

pṛṣṭhaṃ dhaniṣṭhāsu ca pūjanīyam aghaughavidhvaṃsakarāya tacca śrīśaṅkhacakrāsigadādharāya namo viśākhāsu bhujāśca pūjyāḥ

हिन्दी अर्थ

कालधर्ममनृप्राा कर्मयोगेन नारद। सर्वपापविनिर्मुक्ता जगाम शिवमन्दिरम् योऽसौ सुवर्णकारस्तु दरिद्रोऽप्यतिसत्त्ववान्। न मौल्यमादाद् वेश्यातः स भवानिह साम्प्रतम् वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ था, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पल्लीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकीमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी।

English

On the northern bank of the Yamuna, to the south of PrayAga, then* is the most sacred Rinamochana tirtha, ~2.

अध्याय ५४

श्लोक 14

हस्ते तु हस्ता मधुसूदनाय नमो ऽभिपूज्या इति कैटभारेः पुनर्वसावङ्गुलिपूर्वभागाः साम्नामधीशाय नमो ऽभिपूज्याः

haste tu hastā madhusūdanāya namo 'bhipūjyā iti kaiṭabhāreḥ punarvasāvaṅgulipūrvabhāgāḥ sāmnāmadhīśāya namo 'bhipūjyāḥ

हिन्दी अर्थ

उसने लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीको तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। उसे असंख्य राजा सदा घेरे रहते थे। एक बार सभामण्डपमें आये हुए अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मयविमुग्ध हो ऐसा प्रश्न

English

Where, by resi<ling for a night and by bathing there, one remains no more liable to pay any debts, and goes to heaven and never runs into debts. — 21.

अध्याय ५४

श्लोक 15

भुजंगनक्षत्रदिने नखानि सम्पूजयेन्मत्स्यशरीरभाजः कूर्मस्य पादौ शरणं व्रजामि ज्येष्ठासु कण्ठे हरिरर्चनीयः

bhujaṃganakṣatradine nakhāni sampūjayenmatsyaśarīrabhājaḥ kūrmasya pādau śaraṇaṃ vrajāmi jyeṣṭhāsu kaṇṭhe harirarcanīyaḥ

हिन्दी अर्थ

राजाने पूछा--भगवन्! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है ? तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है ? वसिष्ठजीने कहा--राजन्! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्ता थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शूद्रजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका

English

flere rnch the one hundred and aecenth chapter dealinq nnth the fjreatnesH of the Praygu tirtha.

अध्याय ५४

श्लोक 16

श्रोत्रे वराहाय नमो ऽभिपूज्या जनार्दनस्य श्रवणेन सम्यक् पुष्ये मुखं दानवसूदनाय नमो नृसिंहाय च पूजनीयम्

śrotre varāhāya namo 'bhipūjyā janārdanasya śravaṇena samyak puṣye mukhaṃ dānavasūdanāya namo nṛsiṃhāya ca pūjanīyam

हिन्दी अर्थ

उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है--ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी नहीं लिया था। पुथ्वीपते! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और लीलावतीके पर्वत- दानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरु-शुश्रूषा आदि कार्योको सम्पन्न किया था। नारद! अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या

English

OflAPTKR CVIII.

अध्याय ५४

श्लोक 17

नमो नमः कारणवामनाय स्वातीषु दन्ताग्रमथार्चनीयम् आस्यं हरेर्भार्गवनन्दनाय संपूजनीयं द्विज वारुणे तु

namo namaḥ kāraṇavāmanāya svātīṣu dantāgramathārcanīyam āsyaṃ harerbhārgavanandanāya saṃpūjanīyaṃ dvija vāruṇe tu

हिन्दी अर्थ

लीलावती कर्मयोगके अनुसार जब कालधर्म (मृत्यु)- को प्राप्त हुई, तब समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, यथा सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः।

English

VadhisthiiM said: •" BhagavAn! my miiirl has lieeome purified I»y hearing the greatness of PrayAga narrated l)y you — 1.

अध्याय ५४

श्लोक 18

नमो ऽस्तु रामाय मघासु नासा संपूजनीया रघुनन्दनस्य मृगोत्तमाङ्गे नयने ऽभिपूज्ये नमो ऽस्तु ते राम विघूर्णिताक्ष

namo 'stu rāmāya maghāsu nāsā saṃpūjanīyā raghunandanasya mṛgottamāṅge nayane 'bhipūjye namo 'stu te rāma vighūrṇitākṣa

हिन्दी अर्थ

सम्यगुञ्चालिताः पत्न्या सेयं भानुमती तव यस्मात् कृतं तत् परिकर्म रात्रा- वनुद्धताभ्यां लवणाचलस्य

English

Risi! now bo good enough to tell me that great virtue that may lend one to some highci' world and he tlie souree of eveilasting bliss after washing olT all his sins. — 2. MArkaudeya said: — King! Now hear how one can attain ever- lasting bliss by going to Prayaga.— o.

अध्याय ५४

श्लोक 19

बुद्धाय शान्ताय नमो ललाटं चित्रासु संपूज्यतमं मुरारेः शिरो ऽभिपूज्यं भरणीषु विष्णोर् नमो ऽस्तु विश्वेश्वर कल्किरूपिणे

buddhāya śāntāya namo lalāṭaṃ citrāsu saṃpūjyatamaṃ murāreḥ śiro 'bhipūjyaṃ bharaṇīṣu viṣṇor namo 'stu viśveśvara kalkirūpiṇe

हिन्दी अर्थ

लोकेष्वपराजितत्व- तथेति सत्कृत्य स धर्ममूर्ति- लोकं जगामामरपूज्यमानः

English

Me enjoys the full bloom of his healtli and attains tlie benefit of A'tvameila sacrifice at every step in his pilgrimage to Prayaga. — 4.

अध्याय ५४

श्लोक 20

आर्द्रासु केशाः पुरुषोत्तमस्य संपूजनीया हरये नमस्ते उपोषितेनर्क्षदिनेषु भक्त्या संपूजनीया द्विजपुंगवाः स्युः

ārdrāsu keśāḥ puruṣottamasya saṃpūjanīyā haraye namaste upoṣitenarkṣadineṣu bhaktyā saṃpūjanīyā dvijapuṃgavāḥ syuḥ

हिन्दी अर्थ

स्पृशेन्मनुष्यैपि दीयमानान्। शैलेन्द्रैभवभयभेदनैर्मनुष्यैः । यः कुर्यात् किमु मुनिपुंगवेह सम्यक् शान्तात्मा सकलगिरीन्द्रसम्प्रदानम्

English

Such a man gets emancipation from bondage fnr his manes ami posterity for ten generations.—/). Yndhisthira said: — 'Pho way of getting everlasting happiness just explained by you, is very simple It is the.source of so many blessings. — (i.

अध्याय ५४

श्लोक 21

पूर्णे व्रते सर्वगुणान्विताय वाग्रूपशीलाय च सामगाय हैमीं विशालायतबाहुदण्डां मुक्ताफलेन्दूपलवज्रयुक्ताम्

pūrṇe vrate sarvaguṇānvitāya vāgrūpaśīlāya ca sāmagāya haimīṃ viśālāyatabāhudaṇḍāṃ muktāphalendūpalavajrayuktām

हिन्दी अर्थ

जो दस हजार सूर्योके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देव-मूर्तियोंको अत्यन्त चमकोला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है॥ २३--३०॥ मूर्तियोंको उज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायक रूपसे कर्म किया था, इसीलिये

English

" The merit.s of an Arfvamedha.sacrifice arc acquirefl with very great ditficulties. Mow can one attain similar merits in such a simple way? Pray remove my doubts, 0 blessed one. —7.

अध्याय ५४

श्लोक 22

जलस्य पूर्णे कलशे निविष्टाम् अर्चां हरेर्वस्त्रगवा सहैव शय्यां तथोपस्करभाजनादियुक्तां प्रदद्याद्द्विजपुंगवाय

jalasya pūrṇe kalaśe niviṣṭām arcāṃ harervastragavā sahaiva śayyāṃ tathopaskarabhājanādiyuktāṃ pradadyāddvijapuṃgavāya

हिन्दी अर्थ

तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता और सौभाग्यसम्पन्नता लक्ष्मीको प्राप्ति हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो । तब राजा धर्ममूर्तिने ' तथेति--ऐसा ही करूँगा' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणांद्वारा पूजित होकर भगवान् मुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट

English

Markaiidem said: — King! I have heard what Brandni first said to the sages.— 8. 'Phe circumference of Prayaga is live yojanas in extent, and by the treading on its ground one acquires the merits of A.*lvamedba sacrifice at every step. —

अध्याय ५४

श्लोक 23

यद्यस्ति यत्किंचिदिहास्ति देयं दद्याद्द्विजायात्महिताय सर्वम् मनोरथान्नः सफलीकुरुष्व हिरण्यगर्भाच्युतरुद्ररूपिन्

yadyasti yatkiṃcidihāsti deyaṃ dadyāddvijāyātmahitāya sarvam manorathānnaḥ saphalīkuruṣva hiraṇyagarbhācyutarudrarūpin

हिन्दी अर्थ

भक्तिपूर्वक इन पर्वत-दानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। मुनिपुंगव! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेनद्रोंके प्रसङ्गका पाठ करनेसे दुःस्वप्र शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ ३१--३५॥

English

One who passes away at Prayaga, liberates seven generations of his ance8toi*s and fourteen of his coming generations from bondage. — 10.

अध्याय ५४

श्लोक 24

सलक्ष्मीकं सभार्याय काञ्चनं पुरुषोत्तमम् शय्यां च दद्यान्मन्त्रेण ग्रन्थिभेदविवर्जिताम्

salakṣmīkaṃ sabhāryāya kāñcanaṃ puruṣottamam śayyāṃ ca dadyānmantreṇa granthibhedavivarjitām

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पर्वतप्रदानमाहात्म्यं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पर्वतप्रदानमाहात्म्य नामक बानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

King! Knowing this greatness of PrayAga, you should devote yourself unflinchingly to that sacred Tirtha, because those devoid of devotion and leading a life of sin cannot attain the benefits of this holy tirtha which is guarded by the Devns.*'— 11. 2{)2 THE MATSVA IVliANAAL

अध्याय ५४

श्लोक 25

यथा न विष्णुभक्तानां वृजिनं जायते क्वचित् तथा सुरूपतारोग्यं केशवे भक्तिमुत्तमाम्

yathā na viṣṇubhaktānāṃ vṛjinaṃ jāyate kvacit tathā surūpatārogyaṃ keśave bhaktimuttamām

हिन्दी अर्थ

शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मो तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम् श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत्।

English

Viidliistliira. -"() Sire! liow Jo lliey gel llio beuelits of t.lie sacred tirtlia who yield to tlioir desires, whetlu'r siieli he feelings of affection or greed of worldly ohjeets. lL\

अध्याय ५४

श्लोक 26

यथा न लक्ष्म्या शयनं तव शून्यं जनार्दन शय्या ममाप्यशून्यास्तु कृष्ण जन्मनि जन्मनि

yathā na lakṣmyā śayanaṃ tava śūnyaṃ janārdana śayyā mamāpyaśūnyāstu kṛṣṇa janmani janmani

हिन्दी अर्थ

वृष्ट्यायुःपुष्टिकामो वा तथैवाभिवरन् पुनः। येन ब्रह्मन् विधानेन तन्मे निगदतः श्रूणु ग्रहशान्ति प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम्

English

And what is the fate of the niiiii who n«)l knowing the dilToience between proper and inipicipiT, (*nrries on a trade V Pray explain all this to me.— 13. MArkandiwa said King! hear tlu* rare greatness of tin', holy place. The man who has restraiiied all his passions, attains emancipation by bathing for a month at Prayaga. • 1 J.

अध्याय ५४

श्लोक 27

एवं निवेद्य तत्सर्वं वस्त्रमाल्यानुलेपनम् नक्षत्रपुरुषज्ञाय विप्रायाथ विसर्जयेत्

evaṃ nivedya tatsarvaṃ vastramālyānulepanam nakṣatrapuruṣajñāya viprāyātha visarjayet

हिन्दी अर्थ

ग्रहान् ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत् ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविहैः। तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः ।

English

Hoar what Pray:'* ga does to a man whn ir('a('heroMsIy Kills another. He undonbtedy frees himscll' i'j jn. hi- ins hy living on adms and haihing 3 times a day, for a period of i)ire<' months, if).

अध्याय ५४

श्लोक 28

भुञ्जीतातैललवणं सर्वर्क्षेष्वप्युपोषितः भोजनं च यथाशक्ति वित्तशाठ्यविवर्जितः

bhuñjītātailalavaṇaṃ sarvarkṣeṣvapyupoṣitaḥ bhojanaṃ ca yathāśakti vittaśāṭhyavivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम्। संस्थापनाय देवानां चतुरस्त्रामुदङ्मुखाम्

English

(bic who repairs to a h<»ly j-lace nninlenlionalb, y.oes to hra'en, and, after spending all his store <>1 \irini* ilnn-o, 1- boj'n in a well-to-do family. One who goes to a saiTtd ]ilaef inlcniionally, always r('nnrnis liappy and rescues all his ancestors from hell. — 17.

अध्याय ५४

श्लोक 29

इति नक्षत्रपुरुषम् उपास्य विधिवत्स्वयम् सर्वान्कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते

iti nakṣatrapuruṣam upāsya vidhivatsvayam sarvānkāmānavāpnoti viṣṇuloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! पूर्वकालकी बात है, एक बार सुखपूर्वक बैठे हुए वैशम्पायनजीसे शौनकने पूछा-' महर्षे! सम्पूर्ण कामनाओंको अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोका अनुष्ठान किस प्रकार बैशम्पायनजीने कहा--ब्रह्मन्! लक्ष्मीकी कामनावाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना चाहिए। वह ग्रहयज्ञ जिस विधानसे करना चाहिए, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन करनेके पश्चात् विस्तृत ग्रन्थको संक्षिप्तकर पुराणों एवं श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका वर्णन कर रहा हूँ। इसके लिये ज्योतिषी ब्राह्मणद्वारा बतलाये गये पुण्यमय

English

O incarnation ol niiavnia and knower of al!, in r'on)])Iianeo with yoi.ir repeated mKiuirio-. i liavc niif-'ldod io yon iln' aneitnit virtue for yonr benefit. — 18.

अध्याय ५४

श्लोक 30

ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् इह वामुत्र वा कृतम् आत्मना वाथ पितृभिस् तत्सर्वं क्षयमाप्नुयात्

brahmahatyādikaṃ kiṃcid iha vāmutra vā kṛtam ātmanā vātha pitṛbhis tatsarvaṃ kṣayamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

दिनमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिए। पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारका ग्रहयज्ञ बतलाया है। पहला दस हजार आहुतियोंका, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ आहुतियोंका होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधिका, जो पुराणों एवं

English

Yndhistilira sai-l. O Sa.ge ' I wa.- ii'*t b -rn m. vain, my family lias been redeemed, I have ])<v'onfc doligl.ird l,v niecfin.e yon fndeed, yon liave sliown me veiy gieat Kin'jm'ss -l'> O Pioi!-, one! 1 Inave liO, rai'-.l lo'ii. la.v ''•iii'. i,y meeting

अध्याय ५४

श्लोक 31

इति पठति शृणोति वातिभक्त्या पुरुषवरो व्रतमङ्गनाथ कुर्यात् कलिकलुषविदारणं मुरारेः सकलविभूतिफलप्रदं च पुंसाम्

iti paṭhati śṛṇoti vātibhaktyā puruṣavaro vratamaṅganātha kuryāt kalikaluṣavidāraṇaṃ murāreḥ sakalavibhūtiphalapradaṃ ca puṃsām

हिन्दी अर्थ

श्रुतियोमें बतलायी गयी है, मैं वर्णन कर रहा हूँ। (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डको पूर्वोत्तर दिशामें देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिए राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः॥ १० राहु, केतु-ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं।

English

yon; ami I now f(-/'l my.'elf.-inlets -- j')

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 54
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.