अध्याय ५५
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ५५ उपवासेष्वशक्तस्य तदेव फलमिच्छतः अनभ्यासेन रोगाद्वा किमिष्टं व्रतमुत्तमम्
matsya-purāṇa 55 upavāseṣvaśaktasya tadeva phalamicchataḥ anabhyāsena rogādvā kimiṣṭaṃ vratamuttamam
हिन्दी अर्थ
यह न आथर्वण कल्पों--नक्षत्र, वैतान, संहिताविधि, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १। २९५--३०८, वृद्धपाराशर ११, पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ८२--८६, नारदपुराण १। ५१, भविष्यपुराण, अग्निपुराण २६४--७४ आदिमें भी प्राप्त है। मत्स्यका पाठ बहुत अशुद्ध है। उपर्युक्त ग्रन्थोंकी सहायतासे इसे पूर्णतया शुद्ध कर लिया गया है। इनकी कई बातें शान्ति-संग्रहो और ज्योतिषग्रन्थोंमें भी आयी हँ । मध्ये तु भास्करं विद्याल्लोहितं दक्षिणेन तु। उत्तरेण गुरुं विद्याद् बुधं पूर्वोत्तरेण तु
English
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