Matsya Purana· Matsya Purāṇa
56
अध्याय 56 / 176

Adhyaya 56

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अध्याय ५६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ५६ कृष्णाष्टमीमथो वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशिनीम् शान्तिर्मुक्तिश्च भवति जयः पुंसां विशेषतः

matsya-purāṇa 56 kṛṣṇāṣṭamīmatho vakṣye sarvapāpapraṇāśinīm śāntirmuktiśca bhavati jayaḥ puṃsāṃ viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

बादल, नद-ये सभी सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये तुम्हारा अभिषेक करें'॥ ४९--५७॥ इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणद्वारा सर्वौषध एवं सम्पूर्ण सुगन्धित पदार्थोसे युक्त जलसे स्त्रान करा दिये जानेके पश्चात् सपत्नीक यजमान श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेपन करे और विस्मयरहित होकर शान्तचित्तवाले ऋत्विजोंका प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा आदि देकर पूजन करे तथा सूर्यके लिये कपिला गौका, चन्द्रमाके लिये शङ्कका, मंगलके लिये भार वहन करनेमें समर्थ एवं ऊँचे डीलवाले लाल रंगके बैलका, बुधके लिये सुवर्णका,

English

The tirtha of Prayaga i.s by its own virtue sacred of all the tirthas. The place having the Ganges along \yth 3 crores aiul 10,000 tirthas is the holiest of all. The whole of Prayaga is sacred owing to its being situated on the banks of tlie Ganges. -—1 1-12.

अध्याय ५६

श्लोक 2

शंकरं मार्गशिरसि शम्भुं पौषे ऽभिपूजयेत् माघे महेश्वरं देवं महादेवं च फाल्गुने

śaṃkaraṃ mārgaśirasi śambhuṃ pauṣe 'bhipūjayet māghe maheśvaraṃ devaṃ mahādevaṃ ca phālgune

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतिके लिये एक जोड़ा पीले वस्त्रका, शुक्रके लिये श्वेत रंगके घोड़ेका, शनैश्चरके लिये काली गौका, आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम्। सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा

English

Know tbis to be the truth. The good should din it into the ears ol their friends, pupils and tlie servants, that Prayaga is blessed, is the giver

अध्याय ५६

श्लोक 3

स्थाणुं चैत्रे शिवं तद्वद् वैशाखे त्वर्चयेन्नरः ज्येष्ठे पशुपतिं चार्चेद् आषाढे उग्रमर्चयेत्

sthāṇuṃ caitre śivaṃ tadvad vaiśākhe tvarcayennaraḥ jyeṣṭhe paśupatiṃ cārced āṣāḍhe ugramarcayet

हिन्दी अर्थ

कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणी। तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक। अष्टमूर्तरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे

English

THB MATSYA PURANAM,

अध्याय ५६

श्लोक 4

पूजयेच्छ्रावणे शर्वं नभस्ये त्र्यम्बकं तथा हरमाश्वयुजे मासि तथेशानं च कार्त्तिके

pūjayecchrāvaṇe śarvaṃ nabhasye tryambakaṃ tathā haramāśvayuje māsi tatheśānaṃ ca kārttike

हिन्दी अर्थ

पीतवस्त्रयुगं यस्माद् वासुदेवस्य वल्लभम्। प्रदानात् तस्य मे विष्णो ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ मे विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः । चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे

English

of heaven, is the veiy personification of bliss and truth; is sacred, and is the giver of Dharnia, the dispeller of all sins, and is not (fully) known even to the great sagos. The twice born by reading this Mahutyma become purified and go to heaven. — 13-13.

अध्याय ५६

श्लोक 5

कृष्णाष्टमीषु सर्वासु शक्तः सम्पूजयेद्द्विजान् गोभूहिरण्यवासोभिः शिवभक्तानुपोषितः

kṛṣṇāṣṭamīṣu sarvāsu śaktaḥ sampūjayeddvijān gobhūhiraṇyavāsobhiḥ śivabhaktānupoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

यस्मात् त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा। सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे यस्मादायसकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा। लाङ्कलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे छाग त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः। यानं विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे

English

One who, with a pure heart, listens everyday to the greatness of this tirtha, remembers his past lives and enjoys heaven. — Hi.

अध्याय ५६

श्लोक 6

गोमूत्रघृतगोक्षीरतिलान् यवकुशोदकम् गोशृङ्गोदशिरीषार्कबिल्वपत्त्रदधीनि च पञ्चगव्यं च संप्राश्य शंकरं पूजयेन्निशि

gomūtraghṛtagokṣīratilān yavakuśodakam gośṛṅgodaśirīṣārkabilvapattradadhīni ca pañcagavyaṃ ca saṃprāśya śaṃkaraṃ pūjayenniśi

हिन्दी अर्थ

यस्मात् तस्माच्छियै मे स्यादिह लोके परत्र च यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा। शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि

English

The good only attain this tirtha, therefore, 0, Viidhisthira, you should also bathe in these tirthas after discarding all misgiving. 0, King! I have explained all this as asked by you, yon have saved yonr ancosbus by putting all these questions to me.— 17-18. (), Yudhistliira! The tirthas ennmeialod before do not reach even igth the Sanctity of Prayaga.—

अध्याय ५६

श्लोक 7

अश्वत्थं च वटं चैवो-दुम्बरं प्लक्षमेव च पलाशं जम्बुवृक्षं च विदुः षष्ठं महर्षयः

aśvatthaṃ ca vaṭaṃ caivo-dumbaraṃ plakṣameva ca palāśaṃ jambuvṛkṣaṃ ca viduḥ ṣaṣṭhaṃ maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः। राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेका दान करे। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिए अथवा जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिए। किंतु सर्वत्र मन्त्रोच्वारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है

English

//ere ouls the one hniuhrd aiul (cntli chujtler the

अध्याय ५६

श्लोक 8

मार्गशीर्षाषाढमासाभ्यां द्वाभ्यां द्वाभ्यामितिक्रमात् एकैकं दन्तपवनं वृक्षेष्वेतेषु भक्षयेत्

mārgaśīrṣāṣāḍhamāsābhyāṃ dvābhyāṃ dvābhyāmitikramāt ekaikaṃ dantapavanaṃ vṛkṣeṣveteṣu bhakṣayet

हिन्दी अर्थ

(दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए-) 'कपिले! तुम रोहिणीरूपा हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंको पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। शङ्ख! तुम पुण्योंके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। जगतको आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और

English

threat of Prinj/iijit flvth<i CilAPTKIt CXI

अध्याय ५६

श्लोक 9

देवाय दद्यादर्घ्यं च कृष्णां गां कृष्णवाससम् दद्यात्समाप्ते दध्यन्नं वितानध्वजचामरम्

devāya dadyādarghyaṃ ca kṛṣṇāṃ gāṃ kṛṣṇavāsasam dadyātsamāpte dadhyannaṃ vitānadhvajacāmaram

हिन्दी अर्थ

अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। सुवर्ण ! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यफलके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। दो पीला वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो! उसका दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें । अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो । पृथ्वी ! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, केशवके सदृश फलदायिनी और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाली हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। लौह! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य सदा

English

Yudhistliira said O' S:ig(' ' lluw is ii. Iliai y«M( have heeii tellinn me only all about Prayaga V Prav rxplain ii to nit' so that iny I'amily may get salvation.- - i.

अध्याय ५६

श्लोक 10

द्विजानामुदकुम्भांश्च पञ्चरत्नसमन्वितान् गावः कृष्णाः सुवर्णं च वासांसि विविधानि च अशक्तस्तु पुनर्दद्याद् गामेकामपि शक्तितः

dvijānāmudakumbhāṃśca pañcaratnasamanvitān gāvaḥ kṛṣṇāḥ suvarṇaṃ ca vāsāṃsi vividhāni ca aśaktastu punardadyād gāmekāmapi śaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। छाग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्निदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। गौ! चूँकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भुवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी लक्ष्मी प्रदान करो। जिस प्रकार भगवान् केशवकी शय्या सदा अशून्य (लक्ष्मीसे युक्त) रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान को गयी शय्या जन्म-जन्ममें अशून्य बनी रहे।

English

llarkandt'ya &aid -King' 'i-ai d:onld Ix'ar in mind w liat has jiisr been told you aljoni Miayana, f.-r lhahmi. \'ivj|ti and viv.i, the Lord of Devas are eternal.- - -. Brahma creates ilie nr,i\.'i m-. \ k ami at the end oi tin-

अध्याय ५६

श्लोक 11

न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन्दोषमवाप्नुयात् कृष्णाष्टमीमुपोष्यैव सप्तकल्पशतत्रयम् पुमान्सम्पूजितो देवैः शिवलोके महीयते

na vittaśāṭhyaṃ kurvīta kurvandoṣamavāpnuyāt kṛṣṇāṣṭamīmupoṣyaiva saptakalpaśatatrayam pumānsampūjito devaiḥ śivaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

जैसे सभी रत्रोंमें समस्त देवता निवास करते हैं, वैसे तथा रल्रानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः॥ ७५ ही रत्रदान करनेसे वे देवता मुझे भी रत्न प्रदान करें। तुलनीय--' इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे' आदि (यजु० ८। ४३ और उसके उव्वट-महीधरादिभाष्य) ।

English

kalpa, fijva destroys it. At die lim.- d' ilm dr.-drueiion of (lie univt rse, Prayaga is saved. < bie \y1k» lo.)k' upon die saerf-tl Li*ayaga as tin' Ltird of all erealiire<, l)eeomes omni'CMO and blessed

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 56
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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