अध्याय ६१
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ६१ भूर्लोको ऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोको ऽथ महर्जनः तपः सत्यं च सप्तैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः
matsya-purāṇa 61 bhūrloko 'tha bhuvarlokaḥ svarloko 'tha maharjanaḥ tapaḥ satyaṃ ca saptaite devalokāḥ prakīrtitāḥ
हिन्दी अर्थ
दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिए। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी- व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर
English
]N'ofe.«-Madhyade£(ii tho central region, the country lylog between tho Himalaya and the VIndhyh. Tho aangettc doab. iir«9enas=yaino of country.about Mathura.