अध्याय ६९
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ६९ पुरा रथंतरे कल्पे परिपृष्टो महात्मना मन्दरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम्
matsya-purāṇa 69 purā rathaṃtare kalpe paripṛṣṭo mahātmanā mandarastho mahādevaḥ pinākī brahmaṇā svayam
हिन्दी अर्थ
है, उसे “अश्रद्धेय” तो नहीं कहना चाहिए। अश्रद्धालु, अपवित्र, दुर्बुद्धि और माङ्गलिक कार्योसे विमुख--ये सभी पापी कहलाते हैं । (ऐसा प्रतीत होता है कि मानो तुम्हारे सिरपर भी कोई पाप सवार है) जिसके कारण तुमने ऐसी बात कही है। अब प्रयागका माहात्म्य जैसा मैंने देखा अथवा सुना है, उसे बतला रहा हूँ, सुनो। जगतूमें जो बात प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपमें देखी अथवा सुनी गयी हो, उसे शास्त्रोंद्वारा प्रमाणित कर अपने कल्याण-कार्यमें लगाना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता, वह कष्टभागी होता है और उसे योगकी प्राप्ति नहीं होती। यह योग हजारों युगों या जन्मोंमें किन्हीं मनुष्योंको सुलभ होता या नहीं भी होता है। जो मनुष्य सभी प्रकारके रत्न
English
The Lord said; —In the past, during the Rathantara Kalpa, Brahmfl asked biraon tlie summit of the Mandarachala Mountain. — 1.