Matsya Purana· Matsya Purāṇa
71
अध्याय 71 / 176

Adhyaya 71

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अध्याय ७१

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ७१ मोहाद्वापि मदाद्वापि यः परस्त्रीं समाश्रयेत् तस्यापि निष्कृतिं देव वद सर्वकृपाकर

matsya-purāṇa 71 mohādvāpi madādvāpi yaḥ parastrīṃ samāśrayet tasyāpi niṣkṛtiṃ deva vada sarvakṛpākara

हिन्दी अर्थ

जीवित रहते हैं ॥ ६३-७३ ६॥ मेरुगिरिके दक्षिण तथा निषधपर्वतके उत्तर भागमें

English

Brahmd said. — " Lord be pleased to explain to me the ordinance, by the observance of which there may be no separation between husband and wife, nor should there be any grief, disaster or pain." — 1.

अध्याय ७१

श्लोक 2

भगवन्पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम् शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद्येन तद्वद

bhagavanpuruṣasyeha striyāśca virahādikam śokavyādhibhayaṃ duḥkhaṃ na bhavedyena tadvada

हिन्दी अर्थ

नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवमावृत्य तिष्ठति। तस्य जम्बूफलरसो नदी भूत्वा प्रसर्पति तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्। इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भासुरं च यत्

English

Lord said. — Ke*lava always reposes in company with Laksinf, in the ocean of milk, on the second day of the dark fortnight, in the month of Srftvana. — 2.

अध्याय ७१

श्लोक 3

श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा वसति केशवः

śrāvaṇasya dvitīyāyāṃ kṛṣṇāyāṃ madhusūdanaḥ kṣīrārṇave sapatnīkaḥ sadā vasati keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

स्कन्नं तु काञ्जनं शुश्रं जायते देवभूषणम् रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतास्तु ते। हेमकूटे तु विज्ञेया गन्धर्वाः साप्सरोगणाः

English

TEE MATS7A PURAVAM.

अध्याय ७१

श्लोक 4

तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं सर्वान्कामान्समश्नुते गोभूहिरण्यदानादि सप्तकल्पशतानुगम्

tasyāṃ sampūjya govindaṃ sarvānkāmānsamaśnute gobhūhiraṇyadānādi saptakalpaśatānugam

हिन्दी अर्थ

सर्वे नागा निषेवन्ते शेषवासुकितक्षकाः । महामेरौ त्रयस्त्रिंशत् क्रीडन्ते यज्ञियाः शुभाः नीलवैदूर्ययुक्तेऽस्मिन् सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽवसन्। हैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते तेषां वृद्धिर्बहुविधा दृश्यते देवमानुषैः। अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया च बुभूषता

English

By worshipping Qovinda on th«it clay all the desires are fulfilled; and by giving away cows, land, gohl. &o., the devotee goes and resides in the region of Vispu for a period of 700 Kalpas.— 3.

अध्याय ७१

श्लोक 5

अशून्यशयनं नाम द्वितीया संप्रकीर्तिता तस्यां सम्पूजयेद्विष्णुम् एभिर्मन्त्रैर्विधानतः

aśūnyaśayanaṃ nāma dvitīyā saṃprakīrtitā tasyāṃ sampūjayedviṣṇum ebhirmantrairvidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

सुदर्शन नामका एक विशाल प्राचीन जामुनका वृक्ष है। वह सदा पुष्प और फलोंसे लदा रहता है। सिद्ध और चारण सदा उसका सेवन करते हैं। उसी वृक्षके नामपर यह द्वीप जम्बूद्वीपके नामसे विख्यात हुआ है उस वृक्षराजको ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है । वह महान् वृक्ष स्वर्गलोकतक व्याप्त है। उसके फलोंका रस नदीरूपमें प्रवाहित होता है । वह नदी मेरुकी प्रदक्षिणा करके पुन: उसी जम्बूवुक्षके मूलपर पहुँचती है। इलावृतवर्षमें वहाँके निवासी सदा

English

The ordinance is known under the name of Afidnyaayan4dvitty&, on which daj Visnu should be worshipped, according to tlie rituals and mantras mentioned hereafter. — 4.

अध्याय ७१

श्लोक 6

श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकान्त श्रीधामञ्छ्रीपते ऽव्यय गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्

śrīvatsadhāriñchrīkānta śrīdhāmañchrīpate 'vyaya gārhasthyaṃ mā praṇāśaṃ me yātu dharmārthakāmadam

हिन्दी अर्थ

हर्षपूर्वक उस जम्बूरसका पान करते हैं । उस जम्बूवृक्षके 'फलोंका रस पान करनेके कारण वहाँके निवासियोंको वृद्धावस्था बाधा नहीं पहुँचाती। न उन्हें भूख लगती है और न थकावट ही प्रतीत होती है तथा न किसी प्रकारका दुःख ही होता है । वहाँ जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है जो देवताओंके लिये आभूषणके काममें आता है। वह इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल और अत्यन्त चमकीला होता है। उस वर्षके सभी वृक्षोंमें इस जामुन- वृक्षे फलोंका रस परम शुभकारक है। वह वृक्षसे टपकनेपर निर्मल सुवर्ण बन जाता है जिससे देवताओंके आभूषण बनते हैं। ईश्वरकी कृपासे वहाँकी भूमि आठों दिशाओंमें सब ओर इलावृत-निवासियोंके मूत्र, विष्ठा

English

The devotee should pray 0, lrivatsadhari, nlointa, Srldhftmana, iSripati, Avina«ii, let this house-hohUM-'s life of mine which is the giver of tfivarga (dhanna, arlha and kaina) may never l)e ilestroyed.— 5.

अध्याय ७१

श्लोक 7

अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम्

agnayo mā praṇaśyantu devatāḥ puruṣottama pitaro mā praṇaśyantu māstu dāmpatyabhedanam

हिन्दी अर्थ

और मृत शरीरोंको आत्मसात् कर लेती है। राक्षस, पिशाच और यक्ष-ये सभी हिमालय पर्वतपर निवास करते हैं। हेमकूट पर्वतपर अप्सराओंसहित गन्धर्वोका निवास जानना चाहिए तथा शेष, वासुकि और तक्षक आदि सभी प्रधान नाग भी उसपर स्थित रहते हैं। महामेरुपर यज्ञसम्बन्धी मङ्गलमय तैंतीस देवता क्रीडा करते रहते हैं। नीलम एवं वैदूर्य मणियोंसे सम्पन्न नीलपर्वतपर सिद्धों और ब्रह्मर्षियोंका निवास है। श्वेतपर्वत हैत्यों और दानवोंका निवासस्थान

English

Piinisottania! let there be no desinietiou of my Agni or Pitfis, nor let there be any separation between liusl)and and wife. — 0.

अध्याय ७१

श्लोक 8

लक्ष्म्या वियुज्यते देव न कदाचिद्यथा भवान् तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम्

lakṣmyā viyujyate deva na kadācidyathā bhavān tathā kalatrasambandho deva mā me viyujyatām

हिन्दी अर्थ

बतलाया जाता है । पर्वतश्रेष्ठ शृङ्गवान् पितरोंका विहारस्थल है। इस प्रकार मैंने भारतवर्षके अन्तर्गत इन नौ वर्षाका वर्णन कर दिया। इनमें प्राणी निवास करते हैं । ये परस्पर गतिमान् और स्थिर हैं । देवताओं और मनुष्योंने अनेकों प्रकारसे इनकी वृद्धि देखी है। उनकी गणना करना असम्भव है, अतः मङ्गलार्थी मनुष्यको इनपर श्रद्धा रखनी चाहिए ॥ ७४--८७॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

English

Deva, as 3)n iiever remain apart from your consort, Laksnii, similar- l}', let tliere bo no aloofness Ijetween me and my wifi. — 7.

अध्याय ७१

श्लोक 9

लक्ष्म्या न शून्यो वरद शय्यां त्वं शयनं गतः शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथैव मधुसूदन

lakṣmyā na śūnyo varada śayyāṃ tvaṃ śayanaṃ gataḥ śayyā mamāpyaśūnyāstu tathaiva madhusūdana

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनमें एक सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ३९० मत्स्यपुराण

English

Madhnsudana! as yonr household is never l)ereft of the goddess Laksmi, similarly, let tiot mi»ie be devoicl of niy wife'h'—S.

अध्याय ७१

श्लोक 10

गीतवादित्रनिर्घोषं देवदेवस्य कीर्तयेत् घण्टा भवेदशक्तस्य सर्ववाद्यमयी यतः

gītavāditranirghoṣaṃ devadevasya kīrtayet ghaṇṭā bhavedaśaktasya sarvavādyamayī yataḥ

हिन्दी अर्थ

राजा पुरूरवाके पूर्वजन्मका वृत्तान्त श्रुतः श्राद्धविधिः पुण्यः सर्वपापप्रणाशनः॥ श्रुत्वा रूपं नरेन्द्रस्य बुधपुत्रस्य केशव।

English

After this prayer, the hymns of Visnu should he sung in accom- paniment of various kinds of musical irist!*nm?nts; if that tnav not bo feasi- ble, then the mere ringing of the hell is sufiioient, for a hell is an embodi- ment of all musical instruments. — U

अध्याय ७१

श्लोक 11

एवं सम्पूज्य गोविन्दम् अश्नीयात्तैलवर्जितम् नक्तमक्षारलवणं यावत्तत्स्याच्चतुष्टयम्

evaṃ sampūjya govindam aśnīyāttailavarjitam naktamakṣāralavaṇaṃ yāvattatsyāccatuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

केन कर्मविपाकेन स तु राजा पुरूरवाः। देवांस्त्रिभुवनश्रेष्ठान् गन्धर्वाश्च मनोरमान्।

English

After thus worshipping (xovin la, the devotee slionld have his meala at night, avoiding oil and salt and acids. — U).

अध्याय ७१

श्लोक 12

ततः प्रभाते संजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम् दीपान्नभाजनैर्युक्तां शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्

tataḥ prabhāte saṃjāte lakṣmīpatisamanvitām dīpānnabhājanairyuktāṃ śayyāṃ dadyādvilakṣaṇām

हिन्दी अर्थ

शृणु कर्मविपाकेन येन राजा पुरूरवाः। अतीते जन्मनि पुरा योऽयं राजा पुरूरवाः। चाक्षुषस्यान्वये राजा चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।

English

In the morning, the image >>f I/iksmi and Visnn, candle, food grain, cloth, utensils, ami hedsteal should be glv'en away. — IJ.

अध्याय ७१

श्लोक 13

पादुकोपानहच्छत्त्रचामरासनसंयुताम् अभीष्टोपस्करैर्युक्तां शुक्लपुष्पाम्बरावृताम्

pādukopānahacchattracāmarāsanasaṃyutām abhīṣṭopaskarairyuktāṃ śuklapuṣpāmbarāvṛtām

हिन्दी अर्थ

स वै नृपगुणैर्युक्तः केवलं रूपवर्जितः॥ पुरूरवा मद्रपतिः कर्मणा केन पार्थिव: ।

English

A pair of sandles, shoes, iiini>rr'lia, chamara, mattress, white sheet should also be given away with tln bedstead.- - 1 2.

अध्याय ७१

श्लोक 14

सोपधानकविश्रामां फलैर्नानाविधैर्युताम् तथाभरणधान्यैश्च यथाशक्त्या समन्विताम्

sopadhānakaviśrāmāṃ phalairnānāvidhairyutām tathābharaṇadhānyaiśca yathāśaktyā samanvitām

हिन्दी अर्थ

बभूव कर्मणा केन रूपवांश्चैव सूतज॥ मनुने पूछा जनार्दन! मैंने आपके मुखसे बुधपुत्र राजा पुरूरवाका जीवन-चरित्र तो सुना और समस्त पापोंका विनाश करनेवाली पुण्यमयी श्राद्धविधिका भी श्रवण किया तथा ब्यायी हुई गौके दानका, काले मृगचर्मके दानका एवं वृषोत्सर्गका भी फल सुन लिया, परंतु केशव! बुधपुत्र नरेश्वर पुरूरवाके रूपको सुनकर मुझे महान् कौतूहल उत्पन्न हो गया है, इसीलिये पूछ रहा हूँ। अब आप मुझे यह बतलाइये कि किस कर्मके

English

Pillows, bedding, fruits, o! uamenis, sli-mld aUo be; given away, along witli the bedstead, according to (Ijc means of tlie worshipper, without exercising jealousy and miserliness, tn a Ih.ilimana. who may be versed in the Vedas and be a dovot-'C of Vd-rm, having a large family and having no bodilv" defects -13-14.

अध्याय ७१

श्लोक 15

अव्यङ्गाङ्गाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने दातव्या वेदविदुषे भावेनापतिताय च

avyaṅgāṅgāya viprāya vaiṣṇavāya kuṭumbine dātavyā vedaviduṣe bhāvenāpatitāya ca

हिन्दी अर्थ

परिणामस्वरूप राजा पुरूरवाको वैसा सुन्दर रूप और उत्तम सौभाग्य प्रास हुआ था? (जिसपर मोहित होकर अप्सराओंमें श्रेष्ठ) उर्वशी त्रिलोकीमें श्रेष्ठ देवताओं और सौन्दर्यशाली गन्धर्वोका त्याग करके सब प्रकारसे राजा पुरूरवाकी सङ्गिनी बनी थी॥ १--५॥

English

At the time of giving away the bedstead, the Brahmana, along with his wife, should be seated on it, and the former should be given a vessel, full of nice eatables —15.

अध्याय ७१

श्लोक 16

तत्रोपविश्य दाम्पत्यम् अलंकृत्य विधानतः पत्न्यास्तु भाजनं दद्याद् भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्

tatropaviśya dāmpatyam alaṃkṛtya vidhānataḥ patnyāstu bhājanaṃ dadyād bhakṣyabhojyasamanvitam

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवान्ने कहा--राजन्! राजा पुरूरवाको जिस कर्मके फलस्वरूप वैसे सुन्दर रूप और उत्तम सौभाग्यकी प्राप्ति हुई थी, वह बतला रहा हुँ, सुनो। यह राजा पुरूरवा पूर्वजन्ममें भी पुरूरवा नामसे ही विख्यात था। यह चाक्षुष मन्वन्तरमें चाक्षुष मनुके वंशमें उत्पन्न होकर मद्र देश (पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग)-का अधिपति था (जहाँका राजा शल्य तथा पाण्डुपत्नी माद्री थी) । उस समय इसमें राजाओंके सभी गुण तो विद्यमान थे, पर वह केवल रूपरहित अर्थात् कुरूप था। (मत्स्यभगवानुट्वारा आगे कहे जानेवाले प्रसङ्गको ऋषियोंके पूछनेपर सूतजीने वर्णन किया है, अतः इसके आगे पुनः वही प्रसङ्ग चलाया गया है।)

English

The image of Visnu should be given away to the BrAhinapa after placing it on a pitcher full of water.— 16.

अध्याय ७१

श्लोक 17

ब्राह्मणस्यापि सौवर्णीम् उपस्करसमन्विताम् प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुम्भां निवेदयेत्

brāhmaṇasyāpi sauvarṇīm upaskarasamanvitām pratimāṃ devadevasya sodakumbhāṃ nivedayet

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतनन्दन! राजा पुरूरवा किस कर्मके फलस्वरूप मद्र देशका स्वामी हुआ तथा किस कर्मके परिणामस्वरूप परम सौन्दर्यशाली हुआ? यह बतलाइये सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पूर्वजन्ममें यह राजा पुरूरवा किसी नदीके तटवर्ती ब्राह्मणोंके एक गाँवमें श्रेष्ठ

English

A woman with a husband, or a widow, who keeps up this ordinance according to the prescribed rites, witliout niggardliness, goes to and resides in Iieaven. They, being always dutiful and free froni sorrow and blessed with sons, cattle and wealth, always remain in company of their husband.

अध्याय ७१

श्लोक 18

एवं यस्तु पुमान्कुर्याद् अशून्यशयनं हरेः वित्तशाठ्येन रहितो नारायणपरायणः

evaṃ yastu pumānkuryād aśūnyaśayanaṃ hareḥ vittaśāṭhyena rahito nārāyaṇaparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

नद्याः कूले महाराजः पूर्वजन्मनि पार्थिवः॥ १० ब्राह्मण था। उस समय भी इसका नाम पुरूरवा ही था। स तु मद्रपती राजा यस्तु नास्ना पुरूरवा: । अनघ! वह मद्र देशका स्वामी जो राजा पुरूरवाके नामसे तस्मिञ्जन्मन्यसौ विप्रो द्वादश्यां तु सदानघ॥ १९ विख्यात था, उस जन्ममें ब्राह्मणरूपसे राज्यप्रापिकी कामनासे उपोष्य पूजयामास राज्यकामो जनार्दनम्। उणु होकर सदा द्वादशी तिथिको उपवास कर भगवान् विष्णुका

English

A woman with a husband, or a widow, who keeps up this ordinance according to the prescribed rites, witliout niggardliness, goes to and resides in Iieaven. They, being always dutiful and free froni sorrow and blessed with sons, cattle and wealth, always remain in company of their husband.

अध्याय ७१

श्लोक 19

न तस्य पत्न्या विरहः कदाचिदपि जायते नारी वा विधवा ब्रह्मन् यावच्चन्द्रार्कतारकम् न विरूपौ न शोकार्तौ दम्पती भवतः क्वचित्

na tasya patnyā virahaḥ kadācidapi jāyate nārī vā vidhavā brahman yāvaccandrārkatārakam na virūpau na śokārtau dampatī bhavataḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

सोपवासश्च ख्रानमभ्यटगपूर्वकम् पूजन किया करता था। एक बार उसने व्रतोपवास करके चकार श्च ॥ १२ शरीरमें तेल लगाकर स्नान कर लिया--जिस कारण उसे उपवासफलात् प्राप्ं राज्यं मद्रेष्वकण्टकम्। 'उपवासके फलस्वरूप मद्र देशका निष्कण्टक राज्य तो प्राप्त उपोषितस्तथाभ्यङ्गाद् रूपहीनो व्यजायत॥ ९३ हुआ, परंतु उपवासी होकर शरीरमें तेल लगानेके कारण वह उपोषितै्नरैस्तस्मात् स्त्रानमभ्यङ्गपूर्वकम्। कुरूप होकर पैदा हुआ । इसलिये त्रतोपवासी मनुष्यको प्रयत्नपूर्वक वर्जनीयं प्रयत्नेन रूपञ्नं तत्परं नृप॥ १४ शरीरमें तेल लगाकर स्त्रान करना छोड़ देना चाहिए; क्योंकि

English

A woman with a husband, or a widow, who keeps up this ordinance according to the prescribed rites, witliout niggardliness, goes to and resides in Iieaven. They, being always dutiful and free froni sorrow and blessed with sons, cattle and wealth, always remain in company of their husband.

अध्याय ७१

श्लोक 20

न पुत्रपशुरत्नानि क्षयं यान्ति पितामह सप्त कल्पसहस्राणि सप्त कल्पशतानि च कुर्वन्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते

na putrapaśuratnāni kṣayaṃ yānti pitāmaha sapta kalpasahasrāṇi sapta kalpaśatāni ca kurvannaśūnyaśayanaṃ viṣṇuloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

सतँ यह सुन्दरताका विनाशक है। इस प्रकार उसके पूर्वजन्मका जो एतद् वः कथितं सर्व यद् वृत्तं पूर्वजन्मनि। वृत्तान्त था, वह सब मैंने आप लोगोंको बतला दिया। अब उस मद्रेश्वरानुचरितं श्रृणु तस्य महीपतेः॥ १५ भूपालके मद्रेश्वर हो जानेके बादका चरित्र सुनिये। यद्यपि राजा तस्य राजगुणैः सर्वैः समुपेतस्य भूपतेः। पुरूरवा सभी राज्यगुणॉसे सम्पन्न था, किंतु रूपहीन होनेके शने रूपप्रापिकी कामनासे तपस्याका निश्चय करके राज्य- A हैः सशास्तपस, करत अगर भार मन्त्रीको सौंपकर हिमालय पर्वतकी ओर प्रस्थान किया। राज्यं मन्त्रिगतं कृत्वा जगाम हिमपर्वतम्॥ १७ उस समय तपरूप व्यवसाय ही उसका सहायक था। वह व्यवसायद्वितीयस्तु पद्ध्यामेव महायशाः। महायशस्वी नरेश तीर्थस्थानोंका दर्शन करनेकी लालसासे दरष्टुं स तीर्थसदनं विषयान्ते स्वके नदीम्। पैदल ही चल रहा था। आगे बढ़नेपर उसने अपने देशकी

English

A woman with a husband, or a widow, who keeps up this ordinance according to the prescribed rites, witliout niggardliness, goes to and resides in Iieaven. They, being always dutiful and free froni sorrow and blessed with sons, cattle and wealth, always remain in company of their husband.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 71
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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