अध्याय ७२
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ७२ शृणु चान्यद्भविष्यं यद् रूपसम्पद्विधायकम् भविष्यति युगे तस्मिन् द्वापरान्ते पितामह पिप्पलादस्य संवादो युधिष्ठिरपुरःसरैः
matsya-purāṇa 72 śṛṇu cānyadbhaviṣyaṃ yad rūpasampadvidhāyakam bhaviṣyati yuge tasmin dvāparānte pitāmaha pippalādasya saṃvādo yudhiṣṭhirapuraḥsaraiḥ
हिन्दी अर्थ
तुहिनगिरिभवां महौघवेगां न खा। वह नदी हिमालय प ; तुहिनगिरिभवां 'महीघवेगा अथाह जलके कारण गम्भीर वेगसे प्रवाहित हो रही थी, तुहिनगभस्तिसमानशीतलोदाम् । उसका जल चन्द्रमाके समान शीतल था और वह बर्फकी तुहिनसदृशहैमवर्णपुञ्जा राशि-सरीखी उज्ज्वल प्रतीत हो रही थी। बर्फसदूश निर्मल तुहिनयशाः सरितं ददर्श राजा॥ १९ यशवाले राजा पुरूरवाने उस नदीको देखा
English
without being separated so long as the sun, moon and stars remain in heaven.-— 17-18.