Matsya Purana· Matsya Purāṇa
82
अध्याय 82 / 176

Adhyaya 82

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अध्याय ८२

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ८२ गुडधेनुविधानं मे समाचक्ष्व जगत्पते किंरूपं केन मन्त्रेण दातव्यं तदिहोच्यताम्

matsya-purāṇa 82 guḍadhenuvidhānaṃ me samācakṣva jagatpate kiṃrūpaṃ kena mantreṇa dātavyaṃ tadihocyatām

हिन्दी अर्थ

है। उसी पर्वतसे इन्द्र नित्य अधिक-से-अधिक जल ग्रहण करते हें ॥१--१०॥ वहीं महान् समृद्धिशाली नारद नामक पर्वत है, जिसे दुर्गशैल भी कहते हैं। पूर्वकालमें ये दोनों नारद और दुर्गशैल पर्वत यहीं उत्पन्न हुए थे। उसके बाद श्याम नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें ये सारी प्रजाएँ श्यामलताको प्राप्त हो गयी थीं। श्यामपर्वतके सदृश काले रंगवाला वहीं दुन्दुभि पर्वत भी है, जिसपर प्राचीनकालमें देवताओंद्वारा दुन्दुभिके बजाये जानेपर उसके शब्दसे ही (शत्रुओंकी) मृत्यु हो

English

Now M'lhdipadma, called also Nanda, the founder of the Nanda dynasty was crowned one hundred years before Chandra Qupta, according to the reading of all the Puranas. Consequently, the coronation of Mahapadma took place in 422 B C. or 100 years before tlie accession of Chandra Gupta Maurja in 322 B.C. Ad<ling this figure 422 to 1050 we get 1472, That was the time when Pariksit was born (during the Mahabhdrata war) as the posthumous son of Abhimanyu who was killed in that war, if we taka the above verse as correct, which it is not as will be proved later on. According to this calculation the Great War took place 1472 years before Christ. Our previous calculation gave us 1763 B.C. as the year of the Great War, while this gives us 1472 B C. as the year of that war. Thus there is a difference of 291 years.

अध्याय ८२

श्लोक 2

गुडधेनुविधानस्य यद्रूपमिह यत्फलम् तदिदानीं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम्

guḍadhenuvidhānasya yadrūpamiha yatphalam tadidānīṃ pravakṣyāmi sarvapāpavināśanam

हिन्दी अर्थ

जाती थी। इसके अन्तःप्रदेशमें रत्नोंक समूह भरे पडे हैं और यह सेमलके वृक्षोंसे सुशोभित है। उसके बाद महान् अस्ताचल है, जो रजतमय है। उसे सोमक भी कहते हैं । इसी पर्वतपर पूर्वकालमें गरुड़ने अपनी माताके हितार्थ देवताओंद्वारा संचित किये गये अमृतका अपहरण किया था। उसके बाद आम्बिकेय नामक महापर्वत है, जिसे सुमना भी कहते हैं। इसी पर्वतपर वराहभगवानूने हिरण्याक्षका वध किया था। आम्बिकेय पर्वतके बाद

English

irr. But in the Visnu P. also occurs a similar verse (Book IV. ch. 24 V. 32).

अध्याय ८२

श्लोक 3

कृष्णाजिनं चतुर्हस्तं प्राग्ग्रीवं विन्यसेद्भुवि गोमयेनानुलिप्तायां दर्भानास्तीर्य सर्वतः

kṛṣṇājinaṃ caturhastaṃ prāggrīvaṃ vinyasedbhuvi gomayenānuliptāyāṃ darbhānāstīrya sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण ओषधियोंसे परिपूर्ण एवं स्फटिककी शिलाओंसे व्याप्त परम रमणीय महान् पर्वत है, जो विभ्राज नामसे विभ्राजस्तु समाख्यातः स्फाटिकस्तु महान् गिरिः॥ १७ विख्यात है। इससे अग्नि विशेष उद्दी्त होती है, इसी यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः। सैवेह केशवेत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च

English

"From the birth of Pariksit up to the inauguration of Nanda the interval is 1015 years." Adding 1015 to 422 we get 1437, which is similar to the figure just obtained. The Great War took place in 1437 B.C.

अध्याय ८२

श्लोक 4

लघ्वेणकाजिनं तद्वद् वत्सं च परिकल्पयेत् प्राङ्मुखीं कल्पयेद्धेनुम् उदक्पादां सवत्सकाम्

laghveṇakājinaṃ tadvad vatsaṃ ca parikalpayet prāṅmukhīṃ kalpayeddhenum udakpādāṃ savatsakām

हिन्दी अर्थ

तदेव शैशिरं नाम वर्ष तत् परिकीर्तितम्। नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम् आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्

English

Shall we, therefore, take 1437 B C. as the year of the Great war, in preference to 1763 B.C. a figure arrived at by adding the periods of reigns from Somadlii up to Chandra Gnpta's 322 B.C.? This is the ques- tion that we liave to consider next.

अध्याय ८२

श्लोक 5

उत्तमा गुडधेनुः स्यात् सदा भारचतुष्टयम् वत्सं भारेण कुर्वीत द्वाभ्यां वै मध्यमा स्मृता

uttamā guḍadhenuḥ syāt sadā bhāracatuṣṭayam vatsaṃ bhāreṇa kurvīta dvābhyāṃ vai madhyamā smṛtā

हिन्दी अर्थ

सोमकस्य शुभं वर्ष विज्ञेयं कुसुमोत्करम्। तदेवासितमित्युक्तं वर्ष सोमकसंज्ञितम् आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्। तदेव श्वुवमित्युक्त वर्ष विभ्राजसंज्ञितम् शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः। एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः

English

IV. The next question that naturally arises is what kings reigned after this Great War. Some of the Puranas contain list of kings that reigned in various parts of India, at the time of the Mahabharata war. Three such dynasties are important, though only one of them is useful, as fi.King the date of the Great War. The first dynasty is that of the Pauravas, whose capitsrl was Indraprastha, subsequently removed to Kauitmbi, on the banks of the Yamuna, thirty miles to the west of Allahabad. The second dytuiaty is that of the IkfivAkus, whoso capital was Ajodhya and in later tiikito

अध्याय ८२

श्लोक 6

अर्धभारेण वत्सः स्यात् कनिष्ठा भारकेण तु चतुर्थांशेन वत्सः स्याद् गृहवित्तानुसारतः

ardhabhāreṇa vatsaḥ syāt kaniṣṭhā bhārakeṇa tu caturthāṃśena vatsaḥ syād gṛhavittānusārataḥ

हिन्दी अर्थ

अनुतप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता

English

APPENDIX IL

अध्याय ८२

श्लोक 7

धेनुवत्सौ घृतास्यौ च सितसूक्ष्माम्बरावृतौ शुक्तिकर्णाविक्षुपादौ शुचिमुक्ताफलेक्षणौ

dhenuvatsau ghṛtāsyau ca sitasūkṣmāmbarāvṛtau śuktikarṇāvikṣupādau śucimuktāphalekṣaṇau

हिन्दी अर्थ

शिबिका च चतुर्थी स्याद द्विविधा च पुनः स्मृता। इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः कारण इसे विभ्राज कहते हैं । इसीको “केशव” भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है द्विजवरो! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षाका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनृपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और

English

was also included in its sphere. The third dynasty is that of the Barhadra- thas of Magadlia, and their succeasors the Pradyotas and irfnnSgaa. Thia laat ia the dynaaty, the hiatorical exiatence of which ia put beyond all reasonable doubt, by the rise of Biiddhiam at a time when Bimbia&ra a idumga king waa reigning in Magadha.

अध्याय ८२

श्लोक 8

सितसूत्रशिरालौ तौ सितकम्बलकम्बलौ ताम्रगण्डकपृष्ठौ तौ सितचामररोमकौ

sitasūtraśirālau tau sitakambalakambalau tāmragaṇḍakapṛṣṭhau tau sitacāmararomakau

हिन्दी अर्थ

जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिए।

English

The Mataya Purana givea a aomewhat complete list of these kings of Magadha in chapter 271. Thus, it aaya

अध्याय ८२

श्लोक 9

विद्रुमभ्रूयुगोपेतौ नवनीतस्तनावुभौ क्षौमपुच्छौ कांस्यदोहाव् इन्द्रनीलकतारकौ

vidrumabhrūyugopetau navanītastanāvubhau kṣaumapucchau kāṃsyadohāv indranīlakatārakau

हिन्दी अर्थ

उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं । (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विश्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूट्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं । इनमें प्रत्येक वर्षमें

English

" When tlie Bharata's battle took place and Sahadeva, the king of Magadha, waa slain, his heir, Somddlii, became king in Girivraja."

अध्याय ८२

श्लोक 10

सुवर्णशृङ्गाभरणौ राजतैः खुरसंयुतौ नानाफलसमायुक्तौ घ्राणगन्धकरण्डकौ इत्येवं रचयित्वा तौ धूपदीपैरथार्चयेत्

suvarṇaśṛṅgābharaṇau rājataiḥ khurasaṃyutau nānāphalasamāyuktau ghrāṇagandhakaraṇḍakau ityevaṃ racayitvā tau dhūpadīpairathārcayet

हिन्दी अर्थ

समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं। मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुतप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है इक्षुको पाँचवीं गङ्गा

English

He and hia auccessors are named below together with their periods of reign.

अध्याय ८२

श्लोक 11

या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवेष्ववस्थिता धेनुरूपेण सा देवी मम शान्तिं प्रयच्छतु

yā lakṣmīḥ sarvabhūtānāṃ yā ca deveṣvavasthitā dhenurūpeṇa sā devī mama śāntiṃ prayacchatu

हिन्दी अर्थ

समझना चाहिए। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं। वेणुका चामृता चैव षष्टी सम्परिकीर्तिता। सुकृता च गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता एताः सप्त महाभागाः प्रतिवर्ष शिवोदकाः। भावयन्ति जनं सर्व शाकद्वीपनिवासिनम्

English

Namf, Period of reign.

अध्याय ८२

श्लोक 12

देहस्था या च रुद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु

dehasthā yā ca rudrāṇī śaṃkarasya sadā priyā dhenurūpeṇa sā devī mama pāpaṃ vyapohatu

हिन्दी अर्थ

आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाश्च नवैः सह। वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुता: त्रेतायुगसमः कालः सदा तत्र प्रवर्तते

English

1, Som&dbi

अध्याय ८२

श्लोक 13

विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये

viṣṇorvakṣasi yā lakṣmīḥ svāhā yā ca vibhāvasoḥ candrārkaśakraśaktiryā dhenurūpāstu sā śriye

हिन्दी अर्थ

देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकः स्मृतः न तेषु सङ्करः कश्चिद् वर्णाश्रमकृतः क्रचित्। धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजा: 'कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः । स्वधर्मेण च धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम्

English

firntasravaa

अध्याय ८२

श्लोक 14

चतुर्मुखस्य या लक्ष्मीर् या लक्ष्मीर्धनदस्य च लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे

caturmukhasya yā lakṣmīr yā lakṣmīrdhanadasya ca lakṣmīryā lokapālānāṃ sā dhenurvaradāstu me

हिन्दी अर्थ

अन्यैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपहैस्तथा छठी गङ्गा वेणुका और अमृता नामसे प्रसिद्ध हैं । सातवीं गङ्गाको सुकृता और गभस्ती कहा जाता है। कल्याणमय जलसे परिपूर्ण एवं महान् भाग्यशालिनी ये सातों गङ्गाएँ शाकद्वीपके प्रत्येक वर्षके सभी प्राणियोंको पवित्र करती

English

S. Ayntnjns or Aprafipi

अध्याय ८२

श्लोक 15

स्वधा या पितृमुख्याणां स्वाहा यज्ञभुजां च या सर्वपापहरा धेनुस् तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे

svadhā yā pitṛmukhyāṇāṃ svāhā yajñabhujāṃ ca yā sarvapāpaharā dhenus tasmācchāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

हैं। दूसरे बड़े-बड़े नद, नदियाँ और सरोवर भी इन्हीं गङ्गाको धाराओंमें आकर मिलते हैं, जिसके कारण ये सभी अथाह जल बहानेवाली हैं। इन्हांसे जल ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ २६--३५॥ उन सहायक नदियोंके नाम और परिमाणकी गणना नहीं की जा सकती। ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पुण्यतोया हैं। इनके तटपर निवास करनेवाले जनपदवासी सदा हर्षपूर्वक इनका जल पीते हैं। उनके तटपर स्थित शान्तमय, विश्व-विख्यात देश हैं । यहाँ वर्ण और आश्रमके धर्मोंका सुचारुरूपसे पालन होता है । यहाँके सभी निवासी नीरोग, बलवान् और मृत्युसे रहित होते हैं । उनमें अवसर्पिणी

English

Niramitra

अध्याय ८२

श्लोक 16

एवमामन्त्र्य तां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत् विधानमेतद्धेनूनां सर्वासाम् अभिपठ्यते

evamāmantrya tāṃ dhenuṃ brāhmaṇāya nivedayet vidhānametaddhenūnāṃ sarvāsām abhipaṭhyate

हिन्दी अर्थ

नहीं होती है। वहाँ कहीं भी चारों युगोंद्वारा की गयी युगव्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा त्रेतायुगके समान ही समय वर्तमान रहता है। शाकद्वीप आदि इन पाँचों द्वीपॉमें ऐसी ही दशा जाननी चाहिए; क्योंकि देशके विचारसे ही कालकी स्वाभाविक गति जानी जाती है। उन द्वीपोंमें कहीं भी वर्ण एवं आश्रमजन्य संकर नहीं पाया जाता। इस प्रकार धर्मका परित्याग न करनेके कारण बहाँकी प्रजा एकान्त सुखका अनुभव करती है। उनमें न

English

E. Siikatpa (or Pnraksa)

अध्याय ८२

श्लोक 17

यास्ताः पापविनाशिन्यः पठ्यन्ते दश धेनवः तासां स्वरूपं वक्ष्यामि नामानि च नराधिप

yāstāḥ pāpavināśinyaḥ paṭhyante daśa dhenavaḥ tāsāṃ svarūpaṃ vakṣyāmi nāmāni ca narādhipa

हिन्दी अर्थ

तो माया (छल-कपट) है, न लोभ, तब भला ईर्ष्या, असूया और भय कैसे हो सकते हैं ? उनमें धर्मका विपर्यय भी नहीं देखा जाता धर्म तो उनके लिये स्वाभाविक कर्म माना गया है। उनपर कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वहाँ न तो दण्डका विधान है, न कोई दण्ड देनेवाला ही है। वहाँके निवासी धर्मके ज्ञाता हैं, अतः वे स्वधर्मानुसार परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते रहते हैं ॥ ३६--४४॥ है। उसके चारों ओर नदियोंका जल प्रवाहित होता रहता है। वह बादल-सदृश रंगवाले, सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त होनेके कारण रंगे-बिरंगे तथा मणियों और मूँगोंसे विभूषित पर्वतोंद्वारा घिरा हुआ है। उसमें चारों ओर विभिन्न

English

Bvihatkarmlt

अध्याय ८२

श्लोक 18

प्रथमा गुडधेनुः स्याद् घृतधेनुस् तथापरा तिलधेनुस्तृतीया तु चतुर्थी जलसंज्ञिता

prathamā guḍadhenuḥ syād ghṛtadhenus tathāparā tiladhenustṛtīyā tu caturthī jalasaṃjñitā

हिन्दी अर्थ

आकारवाले रमणीय जनपद तथा फूल-फलोंसे लदे हुए आनृपूर्व्यात् समासेन कुशद्वीपं निबोधत

English

d0 yoars The V&yu PurAna then adds to the above list " Semljit Sanipratam chfipi, etfi vai bhoksj-ate samnh " Seuajit is now enjoying the earth the same number of years." It waa thus in tlie reign of tliis Senajit, that the Great sacrificial session took place in Naimiaranya. At that time, Adhisima Kriijna of the I'aurava dynaaty was reigning in Indrapiaatha. About him, the Matsya PurAna in chapter 50 says: —

अध्याय ८२

श्लोक 19

क्षीरधेनुश्च विख्याता मधुधेनुस्तथा परा सप्तमी शर्कराधेनुर् दधिधेनुस्तथाष्टमी रसधेनुश्च नवमी दशमी स्यात् स्वरूपतः

kṣīradhenuśca vikhyātā madhudhenustathā parā saptamī śarkarādhenur dadhidhenustathāṣṭamī rasadhenuśca navamī daśamī syāt svarūpataḥ

हिन्दी अर्थ

रल्लाकरास्तथा नझस्तेषां नामानि मे श्रृणु। द्विनामानश्च ते सर्वे शाकद्वीपे यथा तथा प्रथमः सूर्यसंकाशः कुमुदो नाम पर्वतः। विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः विशल्यकरणी चैव मृतसंजीवनी तथा

English

" Adhisima Krina dharmAtmA Stimpratam yo niahnya§ah " that ia Adhisima Krina was tlie leiguing king, when tliis original of the Mataya PurAna waa recited by Suta.

अध्याय ८२

श्लोक 20

कुम्भाः स्युर्द्रवधेनूनाम् इतरासां तु राशयः सुवर्णधेनुमप्यत्र केचिदिच्छन्ति भानवः

kumbhāḥ syurdravadhenūnām itarāsāṃ tu rāśayaḥ suvarṇadhenumapyatra kecidicchanti bhānavaḥ

हिन्दी अर्थ

वृक्षोंके समूह शोभायमान हो रहे हैं। वह धन-धान्यसे परिपूर्ण है। बह सदा पुष्पों और फलोंसे युक्त रहता है। उसमें सभी प्रकारके रत्न पाये जाते हैं। वह सर्वत्र ग्रामीण एवं जंगली पशुओंसे भरा हुआ है। उस कुशद्वीपका संक्षेपमें आनृपूर्वी वर्णन सुनिये। अब मैं तीसरे कुशद्वीपका समग्ररूपसे वर्णन कर रहा हूँ। कुशद्वीपसे क्षीरसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। यह शाकद्वीपके दुगुने विस्तारसे युक्त है। यहाँ भी रल्लोंकी खानोंसे युक्त सात पर्वत जानना

English

Thus this Adliisiina Kriana of the Paurava dynasty, and SenAjit of BArahadratlia dynasty, were conteaiporariea, and they flourished several years after the Great War. Next arises tlie question: — When these two kings w'ere reigning in Indrapi-astha and Girivraja (Magadha,) respectively, who waa their contemporary in Ayodhya? The answer is tliat DivAkaraof the TkpwAku family was the contemporary of iSensjit and Adhisima Kriana. Ab(Dlt this DivAkara, tlie Matsya PurAna, in chapter 271 aaya

अध्याय ८२

श्लोक 21

नवनीतेन रत्नैश्च तथान्ये तु महर्षयः एतदेवंविधानं स्यात् त एवोपस्कराः स्मृताः

navanītena ratnaiśca tathānye tu maharṣayaḥ etadevaṃvidhānaṃ syāt ta evopaskarāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए। यहाँकी नदियाँ भी रल्रोंकी भण्डार हैं। अब मुझसे उनका नाम सुनिये। जैसे शाकद्वीपमें सभी पर्वतों और नदियोंके दो नाम थे, वैसे ही यहाँके भी पर्वत एवं नदी दो नामवाली हैं। पहला सूर्यके समान चमकीला कुमुद नामक पर्वत है। वह पर्वत विद्रुमोच्चय नामसे भी कहा जाता है। वहाँ दूसरा पर्वत उन्नत नामसे विख्यात है। वह सम्पूर्ण धातुओंसे परिपूर्ण एवं शिला-समूहोंसे समन्वित शिखरोंसे युक्त है। वही पर्वत हेमपर्वत नामसे तीसरा बलाहक पर्वत है, जो अञ्जनके समान काला है। यह अपने हरितालमय शिखरोंसे सर्वत्र द्वीपको आवृत किये हुए है। यही पर्वत द्युतिमान् नामसे भी पुकारा जाता है। चौथा पर्वत द्रोण है। इस महान्

English

" Tasyaia MadhyadesJetu.

अध्याय ८२

श्लोक 22

मन्त्रावाहनसंयुक्ताः सदा पर्वणि पर्वणि यथाश्रद्धं प्रदातव्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः

mantrāvāhanasaṃyuktāḥ sadā parvaṇi parvaṇi yathāśraddhaṃ pradātavyā bhuktimuktiphalapradāḥ

हिन्दी अर्थ

गिरिपर विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी आदि महाबलवती ओषधियाँ पायी जाती हैं। वही महान् समृद्धिशाली पर्वत पुष्पवान् नामसे विख्यात है। उनमें पाँचवाँ कङ्क पर्वत है, जो सारयुक्त पदार्थाँसे सम्पन्न है । इस पर्वतको कुशेशय भी कहते हैं। वहाँ छठा महिष पर्वत है, जो मेघ-सदृश काला है । वह दिव्य पुष्पों एवं फलोंसे युक्त तथा दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न है। वही पुनः हरि नामसे विख्यात है। उस पर्वतपर महिष नामक अग्नि, जो जलसे उत्पन्न

English

Ayodylia iiagari ubliA. Div&karaaya aabita".

अध्याय ८२

श्लोक 23

गुडधेनुप्रसङ्गेन सर्वास्तावन्मयोदिताः अशेषयज्ञफलदाः सर्वाः पापहराः शुभाः

guḍadhenuprasaṅgena sarvāstāvanmayoditāḥ aśeṣayajñaphaladāḥ sarvāḥ pāpaharāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

हुआ है, निवास करता है। वहाँ सातवें पर्वतको ककुद्मान् कहा जाता है। उसीको मन्दर जानना चाहिए। वह मन्द इत्येष यो धातुरपामर्थे प्रकाशकः तत्र रत्रान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः

English

TEE DATE OF TEE MAEABBAEATA WAR.

अध्याय ८२

श्लोक 24

व्रतानामुत्तमं यस्माद् विशोकद्वादशीव्रतम् तदङ्गत्वेन चैवात्र गुडधेनुः प्रशस्यते

vratānāmuttamaṃ yasmād viśokadvādaśīvratam tadaṅgatvena caivātra guḍadhenuḥ praśasyate

हिन्दी अर्थ

वेणुमण्डलकं चैव तथैव परिकीर्तितम्। बलाहकस्य जीमूतः स्वैरथाकारमित्यपि महिषं महिषस्यापि पुनश्चापि प्रभाकरम्। ककुद्धिनस्तु तद्वर्ष कपिलं नाम विश्रुतम्

English

and VSyu Purfina makes it clearer, by saying Yadcba sdmpratam adhy&ste. AyodliSm nagaiim nripah".

अध्याय ८२

श्लोक 25

अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते ऽथवा पुनः गुडधेन्वादयो देयास् तूपरागादिपर्वसु

ayane viṣuve puṇye vyatīpāte 'thavā punaḥ guḍadhenvādayo deyās tūparāgādiparvasu

हिन्दी अर्थ

धूतपापा नदी नाम योनिश्चैव पुनः स्मृता। सीता द्वितीया विज्ञेया सा चैव हि निशा स्मृता अन्यास्ताभ्योऽपि संजाताः शतशोऽथ सहस्त्रश: कुशद्वीप: समुद्रेण घृतमण्डोदकेन च

English

Thus these three kings, Adhistma Krisna in Hastindpur of the Faurava dynasty, Divfkara at Ayodhyd, of the Iksv&ku dynasty, and Sena jit in Oirivraja of the B&rhadratha dynasty were contemporaries.

अध्याय ८२

श्लोक 26

विशोकद्वादशी चैषा पुण्या पापहरा शुभा यामुपोष्य नरो याति तद्विष्णोः परमं पदम्

viśokadvādaśī caiṣā puṇyā pāpaharā śubhā yāmupoṣya naro yāti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त और अत्यन्त सुन्दर है। जो यह मंद धातु है, वह जलरूप अर्थको प्रकट करनेवाली है, अतः जलका विदारण करके निकलनेके कारण इस पर्वतको मन्दर कहा जाता है। उस पर्वतपर अनेकों प्रकारके रत्न पाये जाते हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं। साथ ही स्वयं इन्द्र बहाँकी प्रजाओंकी भी देख-भाल करते हैं। इनके अन्तर-विष्कम्भ पर्वत परिमाणमें दुगुने बतलाये जाते हैं। कुशद्वीपमें ये सात पर्वत कहे गये हैं।

English

The list of the successors of Senjit with the periods of their reign as given in the Matsya Purana, chapter 271 may now be resumed, viz: — Sratanjaya

अध्याय ८२

श्लोक 27

इह लोके च सौभाग्यम् आयुरारोग्यमेव च वैष्णवं पुरमाप्नोति मरणे च स्मरन्हरिम्

iha loke ca saubhāgyam āyurārogyameva ca vaiṣṇavaṃ puramāpnoti maraṇe ca smaranharim

हिन्दी अर्थ

अब मैं इनके सात वर्षाका विभागपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। कुमुद पर्वतके वर्षका नाम श्वेत है। इसे उन्नत नामसे भी पुकारते हैं। उन्नत पर्वतका लोहित नामक वर्ष जानना चाहिए। इसे वेणुमण्डलक भी कहते हैं। बलाहक पर्वतका वर्ष जीमूत है, इसीका नाम स्वैरथाकार भी है ॥ ५४--६६॥ द्रोणपर्वंतके वर्षका नाम हरिक है, इसे लवण भी कहते हैं। कङ्क पर्वतका वर्ष ककुद् है, इसे धृतिमान् भी कहा जाता है। महिष पर्वतके वर्षका नाम महिष है, इसे प्रभाकर नामसे अभिहित किया जाता है। ककुद्मी पर्वतका जो वर्ष है, वह कपिल नामसे विख्यात है। कुशद्वीपमें ये सातों विशिष्ट वर्ष तथा सात पर्वत पृथक्-पृथक् हैं। अब उन वर्षाको नदियोंको सुनिये। वहाँ प्रत्येक वर्षमें

English

Sunetra...

अध्याय ८२

श्लोक 28

नवार्बुदसहस्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित् न शोकदुःखदौर्गत्यं तस्य संजायते नृप

navārbudasahasrāṇi daśa cāṣṭau ca dharmavit na śokaduḥkhadaurgatyaṃ tasya saṃjāyate nṛpa

हिन्दी अर्थ

नदियाँ भी सात ही बतलायी जाती हैं। वे सभी दो नामोंवाली तथा पुण्यसलिला हैं। उनमें पहली नदीका नाम धूतपापा है, उसे योनि भी कहते हैं। दूसरी नदीको सीता नामसे जानना चाहिए। वही निशा भी कही जाती है। पवित्राको तीसरी नदी समझना चाहिए। उसीका नाम वितृष्णा भी है। चौथी ह्रादिनी नामसे पुकारी जाती है,

English

Nirvritl... Trinetra

अध्याय ८२

श्लोक 29

नारी वा कुरुते या तु विशोकद्वादशीव्रतम् नृत्यगीतपरा नित्यं सापि तत्फलमाप्नुयात्

nārī vā kurute yā tu viśokadvādaśīvratam nṛtyagītaparā nityaṃ sāpi tatphalamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

यही चन्द्रमा नामसे भी प्रसिद्ध है। पाँचवीं नदीको विद्युत् कहते हैं, यही शुक्ला नामसे भी अभिहित होती है। पुण्ड़ाको छठी नदी जानना चाहिए, इसको विभावरी भी कहते हैं। सातवीं नदीका नाम महती है, यही धृति नामसे भी कही जाती है। इनके अतिरिक्त अन्य भी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों नदियाँ हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें जाकर मिली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण करके इन्द्र ०

English

Dridasoiut...

अध्याय ८२

श्लोक 30

तस्मादग्रे हरेर्नित्यम् अनन्तं गीतवादनम् कर्तव्यं भूतिकामेन भक्त्या तु परया नृप

tasmādagre harernityam anantaṃ gītavādanam kartavyaṃ bhūtikāmena bhaktyā tu parayā nṛpa

हिन्दी अर्थ

यहाँ वर्षा करते हैं। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कुशद्वीपकी संस्थितिका वर्णन कर दिया तथा उसके शाकद्वीपसे :

English

fahinetra... Siicli.'ila...

अध्याय ८२

श्लोक 31

इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह सम्यङ् मधुमुरनरकारेर् अर्चनं यश्च पश्येत् मतिमाप च जनानां यो ददातीन्द्रलोके वसति स विबुधौघैः पूज्यते कल्पमेकम्

iti paṭhati ya itthaṃ yaḥ śṛṇotīha samyaṅ madhumuranarakārer arcanaṃ yaśca paśyet matimāpa ca janānāṃ yo dadātīndraloke vasati sa vibudhaughaiḥ pūjyate kalpamekam

हिन्दी अर्थ

दुगुने सनातन विस्तारको भी बतला दिया। यह महान् कुशद्वीप चारों ओरसे चन्द्रमाकी भाँति घृत और मद्देसे : तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते। देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः

English

Satyajit...

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 82
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.