Matsya Purana· Matsya Purāṇa
84
अध्याय 84 / 176

Adhyaya 84

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अध्याय ८४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ८४ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लवणाचलमुत्तमम् यत्प्रदानान्नरो लोकान् आप्नोति शिवसंयुतान्

matsya-purāṇa 84 athātaḥ sampravakṣyāmi lavaṇācalamuttamam yatpradānānnaro lokān āpnoti śivasaṃyutān

हिन्दी अर्थ

जानना चाहिए। राजन्! मैंने इस मण्डलका यहाँतक सम्यकू प्रकारसे वर्णन कर दिया; क्योंकि मण्डलके वृत्तान्तको यहाँतक ही सुनना चाहिए ॥ ५५--६४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सप्त द्वीपनिवेशनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सपतद्वीपनिवेशन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

iSiva said: — I am now going to tell you about the mount of salt, the donor of which goes to My region. — 1.

अध्याय ८४

श्लोक 2

उत्तमः षोडशद्रोणैः कर्तव्यो लवणाचलः मध्यमः स्यात्तदर्धेन चतुर्भिरधमः स्मृतः

uttamaḥ ṣoḍaśadroṇaiḥ kartavyo lavaṇācalaḥ madhyamaḥ syāttadardhena caturbhiradhamaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

यह वर्णन अन्य पुराणमें भी है। पर इन सबॉका आचार्य यामुनने 'स्तोत्ररत्नम्'में परमात्मसम्बन्धसहित- “ यदण्डमण्डान्तरगोचरं च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च। गुणाः प्रधानं पुरुषाः परं पदं परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः ॥' इस एक ही श्लोकमें बड़े संक्षेपमें, पर सुन्दर शब्दों तथा भावोंमें चित्रण कर दिया है। ४२८ मत्स्यपुराण

English

The first best mount of salt is of 25(5 seers (of the measure of 16 drSnas), the next best is of 128 seers (eiglit dronas), and the last is of 64 seers (f.r?., 4 dronas). — 2.

अध्याय ८४

श्लोक 3

वित्तहीनो यथाशक्त्या द्रोणादूर्ध्वं तु कारयेत् चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वतान्कारयेत्पृथक्

vittahīno yathāśaktyā droṇādūrdhvaṃ tu kārayet caturthāṃśena viṣkambhaparvatānkārayetpṛthak

हिन्दी अर्थ

मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग चतुरमुख कहाँ, संख असुर स्त्रुत लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ। भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ॥ स्वान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै। मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥ कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यकौ रूप किर्हि काज कीन्हौ!

English

The poor may make it of any weiglit rising from 16 seers (one drdna) onwards. The four corner mounts (vijjkambha) should be of the quarter measurement of this main mount. — 3.

अध्याय ८४

श्लोक 4

विधानं पूर्ववत्कुर्याद् ब्रह्मादीनां च सर्वदा तद्वद्धेममयान्सर्वांल् लोकपालान्निवेशयेत्

vidhānaṃ pūrvavatkuryād brahmādīnāṃ ca sarvadā tadvaddhemamayānsarvāṃl lokapālānniveśayet

हिन्दी अर्थ

कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ॥ सर्प इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सौं नाव मम संग बाँधौ। यहै कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥ सातवैं दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावैं।

English

And Brahma, along with the other Devas, should be arranged in the same way as mentioned before, and tlie golden Lokapfilas should also be so located. — 4.

अध्याय ८४

श्लोक 5

सरांसि कामदेवादींस् तद्वदत्रापि कारयेत् कुर्याज्जागरणं चापि दानमन्त्रान्निबोधत

sarāṃsi kāmadevādīṃs tadvadatrāpi kārayet kuryājjāgaraṇaṃ cāpi dānamantrānnibodhata

हिन्दी अर्थ

पुनि कह्यौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहि धारौ। मत्स्य अरु सर्पु तिहि ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥ ज्यौ महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी। अहं-ममता हमें सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी॥ कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत। करन-कारन महराज हैं आप हो, ध्यान प्रभुकौ न मन माहि धारत॥ बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै। जनम अरु मरनमें सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहँ सदा जीजै॥ मत्स्य भगवान कहाँ ज्ञान पुनि नृपति सौं, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ। लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥

English

The ponds and Kamadeva and otljers sinmld he made a.s before. Tlje devotee should keep up all the night. 1 now explain to you the mantra of giving it awiy. ' O Salt! 'Fhoii liast heen b'»rn of tlie ocean of fortune, in consequence of whicli thou art tyled as the best of all the flavours, ilonce this gift of the mount of salt may protect me from tlje evils of this mundane world. — 5-6.

अध्याय ८४

श्लोक 6

सौभाग्यसरः सम्भूतो यतो ऽयं लवणो रसः तद्दानकर्तृकत्वेन त्वं मां पाहि नगोत्तम

saubhāgyasaraḥ sambhūto yato 'yaṃ lavaṇo rasaḥ taddānakartṛkatvena tvaṃ māṃ pāhi nagottama

हिन्दी अर्थ

कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥ सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सके कहि कौन, यह कछुक गाई॥

English

'There is jio flavour iu anything without a pinch of salt. It is always dear to both fcJiva and iva \(muri). Hence, 0 Salt! give me peace. — 7.

अध्याय ८४

श्लोक 7

यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना प्रियं च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे

yasmādannarasāḥ sarve notkaṭā lavaṇaṃ vinā priyaṃ ca śivayornityaṃ tasmācchāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥ र पर्यासपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः। पर्यासपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्

English

* The salt that has sprung from the body of Visnu is the giver of health. Therefore, 0 Salt in the shape of a mountain, carry me through the mun- dane ocean of troubles in peace.' -8.

अध्याय ८४

श्लोक 8

विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम् तस्मात्पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्

viṣṇudehasamudbhūtaṃ yasmādārogyavardhanam tasmātparvatarūpeṇa pāhi saṃsārasāgarāt

हिन्दी अर्थ

भवति त्रीनि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन् अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत

English

One who gives away the mount of salt in this way, attains bliss after passing a Kalpa in the realm of iva and Parvati. — 9.

अध्याय ८४

श्लोक 9

अनेन विधिना यस्तु दद्याल्लवणपर्वतम् उमालोके वसेत्कल्पं ततो याति परां गतिम्

anena vidhinā yastu dadyāllavaṇaparvatam umāloke vasetkalpaṃ tato yāti parāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

नवयोजनसाहस्त्रो विस्तारो भास्करस्य तु। विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी। इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः

English

Here ends the eujhtij- fourth chapter describiug the rjift of the mount of salt.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 84
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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