Matsya Purana· Matsya Purāṇa
93
अध्याय 93 / 176

Adhyaya 93

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अध्याय ९३

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ९३ वैशम्पायनम् आसीनम् अपृच्छच्छौनकः पुरा सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम्

matsya-purāṇa 93 vaiśampāyanam āsīnam apṛcchacchaunakaḥ purā sarvakāmāptaye nityaṃ kathaṃ śāntikapauṣṭikam

हिन्दी अर्थ

इन सबका दल चैत्र और वैशाखमासमें सूर्यके रथपर निवास करता है। ग्रीष्म-ऋतुके ज्येष्ठ और आषाढ़मासमें मित्र और वरुण देवता, अत्रि और वसिष्ठ ऋषि, तक्षक और रम्भक नाग, मेनका और सहजन्या अप्सरा, हाहा और हूहू राक्षस-ये सभी सूर्यके निकट रहते हैं। इसी प्रकार श्रावण और भाद्रपद-मासमें इन्द्र और विवस्वान् देवता, अङ्गिरा और भृगु ऋषि, एलापत्र और शंखपाल नामक नाग, विश्वावसु ये सभी सूर्यके रथपर निवास करते हैं

English

Afterwards all the kings will be of the lddra origin. That Mahdpadma will be sole monarch and a universal Emperor. He will reign for 88 years on this earth. He will uproot all Eatriyas, through his ambition. His eight sons, beginning with Snkalpa will be kings for 12 years. They will be kings in succession to Mahdpadma one after another. Eautilya will uproot all these sons, during the course of 12 years. Then the empire will pass on to the Mauryas, after being enjoyed by (Eautilya?) for a hundred years (or then Eautilya, after enjoying the earth for hundred years, will go to heaven). — 19-22.

अध्याय ९३

श्लोक 2

श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् वृद्ध्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्पुनः येन ब्रह्मन्विधानेन तन्मे निगदतः शृणु

śrīkāmaḥ śāntikāmo vā grahayajñaṃ samārabhet vṛddhyāyuḥ puṣṭikāmo vā tathaivābhicaranpunaḥ yena brahmanvidhānena tanme nigadataḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

शरद्-ऋतुमें भी दो मासतक देवगण सूर्यके निकट वास करते हैं। पर्जन्य और पूषा देवता, भरद्वाज और गौतम ऋषि, चित्रसेन और सुरुचि गन्धर्व, शुभ और सुप्रसिद्ध धनञ्जय नाग, सेनजित्, और सेनानायक

English

The Mauryas.

अध्याय ९३

श्लोक 3

सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम् ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम्

sarvaśāstrāṇyanukramya saṃkṣipya granthavistaram grahaśāntiṃ pravakṣyāmi purāṇaśruticoditām

हिन्दी अर्थ

सभी आश्विन और कार्तिकमासमें सूर्यके रथपर अधिरोहण करते हैं। हेमन्त-ऋतुके दो महीने मार्गशीर्ष और पौषमें अंश और भग देवता, कश्यप और क्रतु ऋषि, महापद्म और कर्कोटक नाग, गानविद्यामें निपुण चित्रसेन तक्षाव और अरिष्टनेमि नामक सेनापति एवं ग्रामणी,

English

His son atadhanva will be the kmg for 6 years. His son Brihadratha will reign for 70 years. — 23.

अध्याय ९३

श्लोक 4

पुण्ये ऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ग्रहान्ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत्

puṇye 'hni viprakathite kṛtvā brāhmaṇavācanam grahāngrahādhidevāṃśca sthāpya homaṃ samārabhet

हिन्दी अर्थ

सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे त्वष्टा विष्णुर्जमदय्िर्विश्वामित्रस्तथैव च

English

For 36 years A4aka will be king. His grandson will then be king for 70 years. — 24.

अध्याय ९३

श्लोक 5

ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः प्रथमो ऽयुतहोमः स्याल् लक्षहोमस्ततः परम्

grahayajñastridhā proktaḥ purāṇaśrutikovidaiḥ prathamo 'yutahomaḥ syāl lakṣahomastataḥ param

हिन्दी अर्थ

काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ। गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोरमा। ग्रामणी ऋतजिच्चैव सत्यजिच्च महाबलः ब्रह्मोपेतश्च वै रक्षो यज्ञोपेतस्तथैव च। इत्येते निवसन्ति स्म द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे

English

His son Dadaratha will be king for 8 years. His son Saptati will reign for 9 years (or his son will be for 79 years). — 25.

अध्याय ९३

श्लोक 6

तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः अयुतेनाहुतीनां च नवग्रहमखः स्मृतः

tṛtīyaḥ koṭihomastu sarvakāmaphalapradaḥ ayutenāhutīnāṃ ca navagrahamakhaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

स्थानाभिमानिनो होते गणां द्वादश सप्तकाः । सूर्यमापादयन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम् एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः

English

These are the ten Mauryas who will enjoy the earth for full 137 yem, from whom she (the Earth) will pass to the Sungas.

अध्याय ९३

श्लोक 7

तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम् गर्तस्योत्तरपूर्वेण वितस्तिद्वयविस्तृताम्

tasya tāvadvidhiṃ vakṣye purāṇaśrutibhāṣitam gartasyottarapūrveṇa vitastidvayavistṛtām

हिन्दी अर्थ

यथायोगं यथाधर्मं यथातत्त्वं यथाबलम्। तपत्यसौ यथा सूर्यस्तेषां सिद्द्रिस्तु तेजसा एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति सानुगा दिवि एवं वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश। चतुर्दशेषु वर्तन्ते गणा मन्वन्तरेषु वै

English

Mots,— The text mys that there are ten Ifaarya king8,bnt its ennmetion ia short of that number. The following note from Mr. Pargiter is appropriate This dynasty is given by all i&ve PurApaSybut the account of it has suffered more than that of any other dynasty. Three versions exist hero, the earliest in the Matsysi the second in e Vftyn, and the third In the Yayn generally and the Brahmftpda. They agree in general purport, but have many differences. The second forms a stage of recension intermediate between the flrat and the third, and is the only copy that has preserved the names of all the kings. Tho Matsya version in all copies is incomploto and has one of its verses misplaced, thus only 5 MSS mention Ohandragupta, tho second king always omitted, and tho account

अध्याय ९३

श्लोक 8

वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रायसंमिताम् संस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदङ्मुखाम्

vapradvayāvṛtāṃ vediṃ vitastyucchrāyasaṃmitām saṃsthāpanāya devānāṃ caturasrāmudaṅmukhām

हिन्दी अर्थ

सूर्यके निकट वास करते हैं तत्पश्चात् शिशिर-ऋतुके माघ और फाल्गुनमासोंमें त्वष्टा और विष्णु देवता, जमदग्नि और विश्वामित्र ऋषि, कद्रूके पुत्र कम्बल तिलोत्तमा और मनोहारिणी रम्भा देवी अप्सरा, महाबली ऋतजित् और सत्यजित् ग्रामणी, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत राक्षस-ये सभी सूर्यके रथपर अधिरूढ़ होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक दो मासके अन्तरसे ये सभी क्रमशः

English

f>***»Oy be| Witt tt«k vmm M, potUng tto two Mop anti Aibto «Qd bia thvee sncaeaaoni.'*

अध्याय ९३

श्लोक 9

अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत्सुरान् देवतानां ततः स्थाप्या विंशतिर्द्वादशाधिका

agnipraṇayanaṃ kṛtvā tasyāmāvāhayetsurān devatānāṃ tataḥ sthāpyā viṃśatirdvādaśādhikā

हिन्दी अर्थ

सूर्यके निकट निवास करते हैं॥ १३--२४॥ ये बारह सप्तक (देव, ऋषि, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, ग्रामणी और राक्षस) गण अपने-अपने स्थानके अभिमानी देवता हैं। ये अपने तेजसे सूर्यके तेजको उत्कृष्ट कर देते हैं। वहाँ ऋषिगण स्वरचित वचनों- ्तोत्रोद्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं तथा गन्धर्व और अप्सराएँ नाच-गानके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। सूत-विद्यामें निपुण यक्षगण (सूर्यके रथके अश्चोंकी) बागडोर सँभालते हैं। सर्प सूर्यमण्डलमें इधर-उधर

English

and thon montioos only

अध्याय ९३

श्लोक 10

सूर्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः

sūryaḥ somastathā bhaumo budhajīvasitārkajāḥ rāhuḥ keturiti proktā grahā lokahitāvahāḥ

हिन्दी अर्थ

दौड़ते तथा राक्षसगण सूर्यका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य नामक ऋषि उदयकालसे ही सूर्यको घेरकर अस्ताचलको ले जाते हैं। इन देवताओंका जैसा पराक्रम, तपोबल, योगबल, धर्म, तत्त्व और शारीरिक बल होता है, उसीके अनुसार उनके तेजसे समृद्ध हुए सूर्य तपते हैं। वे अपने तेजसे प्राणियोके सभी अमङ्गलको दूर कर देते हैं तथा इन्हीं मङ्गलमय उपादानांद्वारा मनुष्योंके पापका अपहरण करते हैं। ये सहायकगण अपनी ओर

English

[Thoiigli the Matsya mentions only seven kings, and that also in a contused manner, the full list of tan kiiigs is given in the Vim Purana iBook IV. Chap 24. verses 7-8i.

अध्याय ९३

श्लोक 11

मध्ये तु भास्करं विद्याल् लोहितं दक्षिणेन तु उत्तरेण गुरुं विद्याद् बुधं पूर्वोत्तरेण तु

madhye tu bhāskaraṃ vidyāl lohitaṃ dakṣiṇena tu uttareṇa guruṃ vidyād budhaṃ pūrvottareṇa tu

हिन्दी अर्थ

अभिमुख होनेवालोंके पापको नष्ट कर देते हैं और अपने अनुचरोंसहित आकाशमण्डलमें सूर्यके साथ ही भ्रमण करते हैं। ये जप-तप करके सभी प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए उनकी रक्षा करते हैं और दयावश सभी प्राणियोंकी शुभ-कामना करते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानकालके इन स्थानाभिमानियोंका वह स्थान प्रत्येक मन्वन्तरमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार दो-दोके हिसाबसे उन सातों गणोंके चौदह देवता सूर्यके रथपर निवास करते हैं और चौदहों मन्वन्तरोंतक वर्तमान रहते हैं।

English

The yeara of accession noted against their names are taken from Mr. V.A. Smith's IlistOTii

अध्याय ९३

श्लोक 12

पूर्वेण भार्गवं विद्यात् सोमं दक्षिणपूर्वके पश्चिमेन शनिं विद्याद् राहुं पश्चिमदक्षिणे पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्लतण्डुलैः

pūrveṇa bhārgavaṃ vidyāt somaṃ dakṣiṇapūrvake paścimena śaniṃ vidyād rāhuṃ paścimadakṣiṇe paścimottarataḥ ketuṃ sthāpayecchuklataṇḍulaiḥ

हिन्दी अर्थ

देवान् पितुंश्च मनुजांश्च सुतर्पयन् वै देवाश्च सौम्याश्च तथैव कव्यम्।

English

(1) Chandra Gupfca

अध्याय ९३

श्लोक 13

भास्करस्येश्वरं विद्याद् उमां च शशिनस्तथा स्कन्दमङ्गारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम्

bhāskarasyeśvaraṃ vidyād umāṃ ca śaśinastathā skandamaṅgārakasyāpi budhasya ca tathā harim

हिन्दी अर्थ

अन्नेन जीवन्त्यनिशं मनुष्याः कामरूपः सकृद्युक्तैः कामगैस्तैर्मनोजवैः हरितैरव्यथैः पिड्केरीश्वरैब्रह्मवादिभिः। बाह्यतोऽनन्तरं चैव मण्डलं दिवसः क्रमात्

English

(2) Bindus&ra Amitragli&ta

अध्याय ९३

श्लोक 14

ब्रह्माणं च गुरोर्विद्याच् छुक्रस्यापि शचीपतिम् शनैश्चरस्य तु यमं राहोः कालं तथैव च

brahmāṇaṃ ca gurorvidyāc chukrasyāpi śacīpatim śanaiścarasya tu yamaṃ rāhoḥ kālaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

कल्पादौ सम्प्रयुक्ताश्च वहन्त्याभूतसम्प्लवम्। इस प्रकार सूर्य ग्रीष्म, हेमन्त और वर्षा-ऋतुओंमें क्रमश: अपनी किरणोंको परिवर्तित कर धूप, हिम और जलकी वर्षा करके देवताओं, पितरों और मानवोंको भलीभाँति तृप्त करते हुए प्रतिदिन रात-दिन चलते रहते हैं। जो

English

(3) Attoka Asoka died

अध्याय ९३

श्लोक 15

केतोर्वै चित्रगुप्तं च सर्वेषामधिदेवताः अग्निरापः क्षितिर्विष्णुर् इन्द्र ऐन्द्री च देवताः

ketorvai citraguptaṃ ca sarveṣāmadhidevatāḥ agnirāpaḥ kṣitirviṣṇur indra aindrī ca devatāḥ

हिन्दी अर्थ

शुद्ध अमृत उत्तम वृष्टिके लिये सूर्यकी किरणोंमें सुरक्षित रहता है, उसे देवगण प्रत्येक मासमें चन्द्रमामें प्रविष्ट होनेपर शुक्ल एवं कृष्णपक्षमें दिनके क्रमसे काल-क्षयके अनुसार पीते हैं। सभी देवगण तथा पितर कव्यस्वरूप उस अमृत चन्द्रमाका पान करते हैं। मानवगण सूर्यको किरणोंद्वारा पोषित, जलद्वारा परिवर्धित और वृष्टिद्वारा सिंचित ओषधियों और अन्नसे अपनी क्षुधा शान्त करते हैं। उस स्वाहारूप अमृतसे देवताओंकी तृप्ति पंद्रह दिनतक तथा उस स्वधारूप अमृतसे पितरोंकी तृप्ति एक महीनेतक होती है। मनुष्य अन्नरूप अमृतसे सर्वदा जीवन धारण करते हैं। वह अमृत सूर्यकी किरणोंमें स्थित है, अतः सूर्य अपनी किरणोंद्वारा

English

(4) Buy as as

अध्याय ९३

श्लोक 16

प्रजापतिश्च सर्पाश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः विनायकं तथा दुर्गां वायुराकाशमेव च आवाहयेद्व्याहृतिभिस् तथैवाश्विकुमारकौ

prajāpatiśca sarpāśca brahmā pratyadhidevatāḥ vināyakaṃ tathā durgāṃ vāyurākāśameva ca āvāhayedvyāhṛtibhis tathaivāśvikumārakau

हिन्दी अर्थ

सबका पालन करते हैं इस प्रकार सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे शीघ्रतापूर्वक गमन करते हैं । दिनके व्यतीत हो जानेपर भी वे उन सात अश्रोंद्वारा चलते ही रहते है । हरे रंगवाले घोड़े सूर्यको वहन करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा

English

(5) Dasaratha

अध्याय ९३

श्लोक 17

संस्मरेद्रक्तमादित्यम् अङ्गारकसमन्वितम् सोमशुक्रौ तथा श्वेतो बुधजीवौ च पिङ्गलौ मन्दराहू तथा कृष्णौ धूम्रं केतुगणं विदुः

saṃsmaredraktamādityam aṅgārakasamanvitam somaśukrau tathā śveto budhajīvau ca piṅgalau mandarāhū tathā kṛṣṇau dhūmraṃ ketugaṇaṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

हजारों प्रकारसे जल खींचते हैं। पुनः हरे रंगवाले घोड़ोंद्वारा वहन किये जाते हुए वे ही सूर्य उस जलको बरसाते हैं। इस तरह सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे दिनके क्रमानुसार मण्डलके बाहर और भीतर होते हुए सात-सातके क्रमसे सातों समुद्रोंमें दिन-रात वेगपूर्वक घूमते रहते हैं। जहाँ वह चक्र पहुँचता है, वहीं उनकी स्थिति मानी जाती है। उनके रथके (समुद्रसे उत्पन्न श्यामकर्ण) अश्व छन्दःस्वरूप, स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, एक ही बार जुते हुए, इच्छानुरूप गमन करनेवाले और मनके समान शीघ्रगामी हैं। उनके शरीरका रंग हरा और पीला है। उन्हें थकावट नहीं होती। वे शक्तिशाली और ब्रह्मवादी हैं। वे कल्पके आरम्भमें रथमें जोते जाते हैं और प्रलय-

English

(6) Sangata

अध्याय ९३

श्लोक 18

ग्रहवर्णानि देयानि वासांसि कुसुमानि च धूपामोदो ऽत्र सुरभिर् उपरिष्टाद् वितानिकम् शोभनं स्थापयेत्प्राज्ञः फलपुष्पसमन्वितम्

grahavarṇāni deyāni vāsāṃsi kusumāni ca dhūpāmodo 'tra surabhir upariṣṭād vitānikam śobhanaṃ sthāpayetprājñaḥ phalapuṣpasamanvitam

हिन्दी अर्थ

पर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। इस प्रकार वालखिल्य आवृतो वालखिल्यैश्च भ्रमते रात्र्यहानि तु॥ ४४ ऋषियोंद्वारा समावृत सूर्य रात-दिन भ्रमण करते रहते हैं।

English

(7) S&lUuka

अध्याय ९३

श्लोक 19

गुडौदनं रवेर्दद्यात् सोमाय घृतपायसम् अङ्गारकाय संयावं बुधाय क्षीरषष्टिके

guḍaudanaṃ raverdadyāt somāya ghṛtapāyasam aṅgārakāya saṃyāvaṃ budhāya kṣīraṣaṣṭike

हिन्दी अर्थ

सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः सकृद्युक्ते रथे तस्मिन् वहन्तस्त्वायुगक्षयम् अश्वास्तमेकवर्णास्ते वहन्ते शङ्वर्चसः

English

(8) Somasariiian...

अध्याय ९३

श्लोक 20

दध्योदनं च जीवाय शक्राय च घृतौदनम् शनैश्चराय कृसराम् अजामांसं च राहवे चित्रौदनं च केतुभ्यः सर्वभक्ष्यैरथार्चयेत्

dadhyodanaṃ ca jīvāya śakrāya ca ghṛtaudanam śanaiścarāya kṛsarām ajāmāṃsaṃ ca rāhave citraudanaṃ ca ketubhyaḥ sarvabhakṣyairathārcayet

हिन्दी अर्थ

एवं चन्द्रमसं देवं वहन्ति स्मायुगक्षयम् देवैः परिवृतः सोमः पितृभिः सह गच्छति। सोमस्य शुक्लपक्षादौ भास्करे परतः स्थिते

English

(0) Satadhanva...

अध्याय ९३

श्लोक 21

प्रागुत्तरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूषितम् चूतपल्लवसंछन्नं फलवस्त्रयुगान्वितम्

prāguttareṇa tasmācca dadhyakṣatavibhūṣitam cūtapallavasaṃchannaṃ phalavastrayugānvitam

हिन्दी अर्थ

पीतं पञ्चदशाहं च रश्मिनैकेन भास्करः। एवमाप्यायते सोमः शुक्लपक्षेष्वहः क्रमात्। ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशी पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं तथामृतम्

English

(10) Bfibadratha...

अध्याय ९३

श्लोक 22

पञ्चरत्नसमायुक्तं पञ्चभङ्गसमन्वितम् स्थापयेदव्रणं कुम्भं वरुणं तत्र विन्यसेत्

pañcaratnasamāyuktaṃ pañcabhaṅgasamanvitam sthāpayedavraṇaṃ kumbhaṃ varuṇaṃ tatra vinyaset

हिन्दी अर्थ

सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा भ्रक्षार्थमागताः सोमं पौर्णमास्यामुपासते उस समय महर्षिगण स्वरचित वचनोंद्वारा सूर्यकी स्तुति करते हैं। गन्धवों और अप्सराओंका समुदाय नाच-गानद्वारा सूर्यकी सेवा करता है। दिनके स्वामी सूर्य पक्षियोंके समान वेगशाली आश्रोंद्वारा सदा भ्रमण कराये जाते हुए

English

Date of aecension. 322 B.C. 208 B.G. 273 BC. 2ii2 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 23

गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्रांश्च सरांसि च गजाश्वरथ्यावल्मीकसंगमाद्ध्रदगोकुलात्

gaṅgādyāḥ saritaḥ sarvāḥ samudrāṃśca sarāṃsi ca gajāśvarathyāvalmīkasaṃgamāddhradagokulāt

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रसम्बन्धिनी वीथियोंका आश्रय लेकर भ्रमण करते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा भी चक्कर लगाते हैं। इनकी भी हास-वृद्धि और किरणें सूर्यके समान ही बतलायी गयी हैं। चन्द्रमाका रथ तीन पहियेका है और उसमें दोनों ओर घोड़े जुते रहते हैं घोड़े-सारथि और हारसे सुशोभित तथा तीन पहियॉंसे युक्त रथके साथ चन्द्रदेव (समुद्र मन्थनके समय) जलके मध्यसे प्रकट हुए थे। उसमें श्वेत रंगवाले तथा दस उत्तम घोड़े जुते हुए थे। वे अश्व दिव्य, अनृपम और मनके समान वेगशाली हैं। वे एक बार उस रथमें जोत दिये जानेपर युगप्रलयपर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। उस रथमें जुते हुए चक्षु: श्रवानामक घोड़े चन्द्रमाको वहन करते हैं, उनके नेत्र और कान भी श्वेत रंगके हैं। वे

English

B.C. 224 B.C. 213 B.C. 206 B.C. 100 B.G.... 101-185 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 24

मृदमानीय विप्रेन्द्र सर्वौषधिजलान्विताम् स्नानार्थं विन्यसेत्तत्र यजमानस्य धर्मवित्

mṛdamānīya viprendra sarvauṣadhijalānvitām snānārthaṃ vinyasettatra yajamānasya dharmavit

हिन्दी अर्थ

सभी शङ्खके समान उज्ज्वल एक ही रंगके हैं। चन्द्रमाके उन दस अश्वोंका नाम अज, त्रिपथ, वृष, वाजी, नर हय, अंशुमान्, सप्तधातु, हंस और व्योममृग है। इस प्रकार वे अश्व युगप्रलयपर्यन्त चन्द्रदेवको वहन करते हैं। चन्द्रमा पितरोंसहित शुक्लपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके परभागमें स्थित होनेपर चन्द्रमाका परभाग दिनके क्रमसे पूर्ण होता है। उस समय (देवताओंद्वारा अमृत) पी लेनेसे क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य एक ही बारमें पूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार पंद्रह दिनोंतक

English

Snvfjas,

अध्याय ९३

श्लोक 25

सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि च नदास्तथा आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः

sarve samudrāḥ saritaḥ sarāṃsi ca nadāstathā āyāntu yajamānasya duritakṣayakārakāḥ

हिन्दी अर्थ

अपनी एक ही किरणद्वारा दिनके क्रमसे परिपूर्ण करते रहते हैं। सूर्यकी सुषुम्ना नामक किरणद्वारा परिवर्धित चन्द्रमाको कलाएँ शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होती हैं तथा कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं । पुनः शुक्लपक्षमें वे बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके पराक्रमसे चन्द्रमाका शरीर वृद्धिगत होता है और धीरे-धीरे पूर्णिमा तिथिको पूर्ण होकर सम्पूर्ण मण्डल श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। इस प्रकार शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा वृद्धिको प्राप्त होते हैं । तदनन्तर जलके सारभूत एवं रसमात्रात्मक चन्द्रमाके मधु-सदृश जलमय अमृतको देवगण कृष्णपक्षकी द्वितीयासे लेकर चतुर्दशी तिथितक पान करते हैं। पंद्रह दिनोंतक सूर्यके तेजसे सञ्चित किये हुए अमृतको खानेके लिये

English

Pusyamitra the commander-in-(jliief will uproot Brihadratha an will rule the kingdom as king 30 years. — 27.

अध्याय ९३

श्लोक 26

एवमावाहयेदेतान् अमरान्मुनिसत्तम होमं समारभेत्सर्पिर् यवव्रीहितिलादिना

evamāvāhayedetān amarānmunisattama homaṃ samārabhetsarpir yavavrīhitilādinā

हिन्दी अर्थ

पूर्णिमा तिथिको चन्द्रमाके निकट आये हुए देवगण एकरात्रं सुराः सार्ध पितृभिर्त्रषिभिश्व वै। सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य वै

English

After him Vasnjyesiha will be king for seven years. After him Vasuniitra will be for ten years. — 28.

अध्याय ९३

श्लोक 27

अर्कः पलाशखदिराव् अपामार्गो ऽथ पिप्पलः औदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्

arkaḥ palāśakhadirāv apāmārgo 'tha pippalaḥ audumbaraḥ śamī dūrvā kuśāśca samidhaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

त्रयस्त्रिंशत् सहस्त्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै। इत्येवं पीयमानस्य कृष्णा वर्धन्ति ता: कला: एवं दिनक्रमात् पीते देवैश्चापि निशाकरे पितरश्चोपतिष्ठन्ति ह्यमावास्यां निशाकरम्

English

A'ote.— Oar text omits Aguimitr.'i >vhu was tho iminodiatc successor of Pusyamitra and who rcignod for 8 years, as in tlio VAya P.

अध्याय ९३

श्लोक 28

एकैकस्याष्टकशतम् अष्टविंशतिरेव वा होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः

ekaikasyāṣṭakaśatam aṣṭaviṃśatireva vā hotavyā madhusarpirbhyāṃ dadhnā caiva samanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छेषे निशाकरे। ततोऽपराह्ले पितरो यदन्यदिवसे पुनः पिबन्ति द्विकलं कालं शिष्टास्तस्य तु याः कला: ।

English

Then his son Antaka will be (reign) for 2 years. Then Pulindaka will

अध्याय ९३

श्लोक 29

प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनीः समिधः कल्पयेत्प्राज्ञः सर्वकर्मसु सर्वदा

prādeśamātrā aśiphā aśākhā apalāśinīḥ samidhaḥ kalpayetprājñaḥ sarvakarmasu sarvadā

हिन्दी अर्थ

काव्याश्चैव तु ये प्रोक्ताः पितरः सर्व एव ते। संवत्सरास्तु वै काव्याः पञ्चाब्दा ये द्विजैः स्मृताः एवं सूर्यनिमित्ते ते क्षयवृद्धी निशाकरे पितरों और ऋषियोंके साथ एक राततक चन्द्रमाकी उपासना करते हैं। कृष्णपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके सम्मुख उपस्थित चन्द्रमाका मन पान की जाती हुई कलाओंके क्रमसे अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उस समय तैंतीस हजार

English

be (reign) for 3 years. — 21).

अध्याय ९३

श्लोक 30

देवानामपि सर्वेषाम् उपांशु परमार्थवित् स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्

devānāmapi sarveṣām upāṃśu paramārthavit svena svenaiva mantreṇa hotavyāḥ samidhaḥ pṛthak

हिन्दी अर्थ

तीन सौ तैंतीस देवता चन्द्रमाकी अमृतकलाको पीते हैं। इस प्रकार पान किये जाते हुए चन्द्रमाकी वे कृष्णपक्षीय कलाएँ (शुक्लपक्षमें) बढ़ती हैं और शुक्लपक्षीय कलाएँ (कृष्णपक्षमें) घटती हैं । पुनः कृष्णपक्षीय कलाएँ बढ़ती हैं । (यही शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें बढ़ने-घटनेका क्रम है।)

English

Then Vajiamitra will be king for 9 years. Then SamAbhaga will reign for 32 years. Then after him his son Devabhunii will reign for 10

अध्याय ९३

श्लोक 31

होतव्यं च घृताभ्यक्तं चरुभक्षादिकं पुनः मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः

hotavyaṃ ca ghṛtābhyaktaṃ carubhakṣādikaṃ punaḥ mantrairdaśāhutīrhutvā homaṃ vyāhṛtibhistataḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार दिनके क्रमसे देवगण पंद्रह दिनतक चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं और अमावास्या तिथिको वे वहाँसे चले जाते हैं। तब पितृगण अमावास्या तिथिमें चन्द्रमाके पास आते हैं। तदनन्तर चन्द्रमाके पंद्रहवें भागके कुछ शेष रहनेपर वे पितर दूसरे दिन अपराहृके समय उन सभी अवशिष्ट कलाओंको केवल दो कला समयतक ही पान करते हैं। अमावास्यातक पंद्रह दिन पर्यन्त चन्द्रमाकी किरणोंसे निकलते हुए स्वधारूपी अमृतका पानकर पितृगण अमर हो जाते हैं। वे सभी पितर सौम्य, बर्हिषद्, अग्िष्वात्त और काव्य नामसे कहे गये हैं। पाँच वर्षके कार्यकालवाले जो पितर हैं, जिन्हें द्विजगण काव्य कहते हैं, वर्ष हैं ।

English

years. These ten petty kings will enjoy this earth for full 112 years. And then the earth will go to the Kanvas. — 30-32.

अध्याय ९३

श्लोक 32

उदङ्मुखाः प्राङ्मुखा वा कुर्युर्ब्राह्मणपुंगवाः मन्त्रवन्तश्च कर्तव्याश् चरवः प्रतिदैवतम्

udaṅmukhāḥ prāṅmukhā vā kuryurbrāhmaṇapuṃgavāḥ mantravantaśca kartavyāś caravaḥ pratidaivatam

हिन्दी अर्थ

सौम्य नामक पितरोंको पक्ष ऋतु जानना चाहिए। दो बर्हिषद् और अग्निष्वात्तको मास--ये तीनों पितूलोकमें निवास करनेवाले द्विज हैं । पूर्णिमा तिथिको पितरोंद्वारा पान की जाती हुई कलाका जितना अंश क्षीण होता है, वह पंद्रहवाँ भाग है। अमावास्याके बाद चन्द्रमाका रिक्त भाग पूर्ण होता है। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षय दोनों पक्षोंके प्रारम्भमें ही माना गया है, उसे सोलहवीं कला कहते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाकी क्षय-वृद्धि

English

omission is snpplied by the nauien of Agnlmitra and Ghoflav.asu as given in the Yinu Pur&ua The ten kings, therefore, are the following i'-

अध्याय ९३

श्लोक 33

हुत्वा च तांश्चरून्सम्यक् ततो होमं समाचरेत् आकृष्णेति च सूर्याय होमः कार्यो द्विजन्मना

hutvā ca tāṃścarūnsamyak tato homaṃ samācaret ākṛṣṇeti ca sūryāya homaḥ kāryo dvijanmanā

हिन्दी अर्थ

सूर्यके निमित्तसे ही होती है इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सूर्यादिगमनं नाम षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्यादिगमन नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

ll) Pusyamitra (2) Agniinitra

अध्याय ९३

श्लोक 34

आप्यायस्वेति सोमाय मन्त्रेण जुहुयात्पुनः अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत्

āpyāyasveti somāya mantreṇa juhuyātpunaḥ agnirmūrdhā divo mantra iti bhaumāya kīrtayet

हिन्दी अर्थ

देवताओंद्वारा चन्द्रकला-पानका वर्णन-कालिदासादिके रघुवंश (५। १६) के-' पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः ' आदिमें बड़े सरस ढंगसे किया गया है। हेमाद्रि आदि व्याख्याताओंने इसकी-- प्रथमां पिबते वहिद्वितीयां पिबते रविः ' आदिसे व्याख्या भी सुन्दर की है। पर वस्तुतः कालिदास तथा भर्तृहरि के “कत्वशेषश्चन्द्रः आदिका मूलाधार मत्स्यपुराणका यह प्रकरण ही दीखता है। ग्रहोंके रथका वर्णन और श्रुवकी प्रशंसा

English

(3) Siijyestha or Vasnjyosiha (4) Vasuniitra (5 1 Antaka

अध्याय ९३

श्लोक 35

अग्ने विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै बृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः

agne vivasvaduṣasa iti somasutāya vai bṛhaspate paridīyā ratheneti gurormataḥ

हिन्दी अर्थ

ततो भौमरथश्चापि ह्वाष्टाड्र:ः काञ्चनः स्मृतः। अतश्चाङ्गिरसो विद्वान् देवाचार्यो बृहस्पतिः । कार्ष्णायसं समारुह्य स्यन्दनं यात्यसौ शनिः

English

(6) Pulindaka

अध्याय ९३

श्लोक 36

शुक्रं ते अन्यदिति च शुक्रस्यापि निगद्यते शनैश्चरायेति पुनः शं नो देवीति होमयेत्

śukraṃ te anyaditi ca śukrasyāpi nigadyate śanaiścarāyeti punaḥ śaṃ no devīti homayet

हिन्दी अर्थ

रथं तमोमयं तस्य वहन्ति स्म सुदंशिता: ततः केतुमतस्त्वश्चा अष्टौ ते वातरंहसः।

English

(7) Ghosavasu

अध्याय ९३

श्लोक 37

कया नश्चित्र आभुवद् इति राहोरुदाहृतः केतुं कृण्वन्न् अपि ब्रूयात् केतूनामपि शान्तये

kayā naścitra ābhuvad iti rāhorudāhṛtaḥ ketuṃ kṛṇvann api brūyāt ketūnāmapi śāntaye

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो ! अब मैं (ग्रहकक्षानुसार बुधादि) ग्रहों, नक्षत्रों और राहुके रथका वर्णन कर रहा हूँ। सोमपुत्र बुधका रथ उज्वल एवं तेजोमय है। उसमें वायुके समान वेगशाली पीले रंगके दस घोड़े जोते जाते हैं। उनके नाम हैं-श्वेत, पिशङ्ग, सारङ्ग, नील, पीत, भाग्यशाली, अनृपम एवं वायुसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे वह रथ युक्त है। इसके बाद मङ्गलका रथ सुवर्णनिर्मित बतलाया जाता है। वह रथके सम्पूर्ण आठों अआङ्गांसे संयुक्त है तथा लाल रंगवाले आठ घोड़ोंसे युक्त है।

English

(8) Vajramitra

अध्याय ९३

श्लोक 38

आ वो राजेति रुद्रस्य बलिहोमं समाचरेत् आपो हि ष्ठेत्युमायास्तु स्योनेति स्वामिनस्तथा

ā vo rājeti rudrasya balihomaṃ samācaret āpo hi ṣṭhetyumāyāstu syoneti svāminastathā

हिन्दी अर्थ

उसपर अग्निसे प्रकट हुआ ध्वज फहराता रहता है। उसपर सवार होकर किशोरावस्थाके मङ्गल कभी सीधी एवं कभी वक्र गतिसे विचरण करते हैं। अङ्गिराके पुत्र देवाचार्य विद्वान् बृहस्पति पीले रंगके तथा वायुके-से वेगशाली आठ दिव्य अश्वोसे जुते हुए सुवर्णमय रथपर चलते हैं । वे एक राशिपर एक वर्षतक रहते हैं, इसलिये इस रथके द्वारा स्वाधिष्ठित राशिकी दिशाकी ओर (दोनों गतियों)-से अपने वर्गसहित जाते हैं। शुक्र भी अपने

English

(9) Bbilgavata or SamabhAga (10) DevabliOti or DevabhOmi

अध्याय ९३

श्लोक 39

विष्णोरिदं विष्णुरिति तमीशेति स्वयम्भुवः इन्द्रम् इद्देवतातेति इन्द्राय जुहुयात्ततः

viṣṇoridaṃ viṣṇuriti tamīśeti svayambhuvaḥ indram iddevatāteti indrāya juhuyāttataḥ

हिन्दी अर्थ

वेगशाली रथपर आरूढ़ होकर भ्रमण करते हैं। उनके रथमें अग्निके समान रंगवाले आठ घोड़े जुते रहते हैं और वह ध्वजाओंसे सुशोभित रहता है। शनैश्वर अपने लोहनिर्मित रथपर सवार होकर चलते हैं । उसमें वायुतुल्य वेगशाली एवं बलवान् घोड़े जुते रहते हैं। राहुका रथ तमोमय है। उसे कवच आदिसे सुसज्जित वायुके समान वेगवाले काले रंगके आठ घोड़े खींचते हें । सूर्यके भवनमें निवास करनेवाला वह राहु पूर्णिमा आदि पर्वोमें चन्द्रमाके पास चला जाता है और अमावास्या आदि पर्वोमें चन्द्रमाके पाससे सूर्यके निकट लौट आता है। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान शीघ्रगामी आठ घोड़े जोते जाते हैं। उनके शरीरकी

English

B.C. (36 years).

अध्याय ९३

श्लोक 40

तथा यमस्य चायं गौर् इति होमः प्रकीर्तितः कालस्य ब्रह्म जज्ञानम् इति मन्त्रः प्रशस्यते

tathā yamasya cāyaṃ gaur iti homaḥ prakīrtitaḥ kālasya brahma jajñānam iti mantraḥ praśasyate

हिन्दी अर्थ

कान्ति पुआलके धुँएके सदृश है। वे दुबले-पतले शरीरवाले और बड़े भयंकर हैं। ये सभी वायुरूपी रस्सीसे ध्रुवके साथ सम्बद्ध हैं । इस प्रकार मैंने ग्रहोंके सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते निबद्धा वातरश्मिभिः॥ १२ रथोंके साथ-साथ घोड़ोंका वर्णन कर दिया

English

H.C. (Byears).

अध्याय ९३

श्लोक 41

चित्रगुप्तस्य चाज्ञातम् इति मन्त्रविदो विदुः अग्निं दूतं वृणीमह इति वह्नेरुदाहृतः

citraguptasya cājñātam iti mantravido viduḥ agniṃ dūtaṃ vṛṇīmaha iti vahnerudāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

एते वै भ्राम्यमाणास्ते यथायोगं वहन्ति वै। वायुरूपी अदृश्य रस्सियोंद्वारा बँधे हुए ये सभी वायव्याभिरदृश्याभि: प्रबद्धा वातरश्मिभिः॥ १३ अध भ्रमण करते हुए नियमानुसार उन रथोंको खींचते

English

B.O. (7 years).

अध्याय ९३

श्लोक 42

उद् उत्तमं वरुणमित्य् अपां मन्त्रः प्रकीर्तितः भूमेः पृथिव्यन्तरिक्षम् इति वेदेषु पठ्यते

ud uttamaṃ varuṇamity apāṃ mantraḥ prakīrtitaḥ bhūmeḥ pṛthivyantarikṣam iti vedeṣu paṭhyate

हिन्दी अर्थ

यथा नद्युदके नौस्तु उदकेन सहोह्यते। तथा देवगृहाणि स्युरुह्यन्ते वातरंहसा। तस्माद्यानि प्रगृह्यन्ते व्योग्मि देवगृहा इति तैलपीडाकरं चक्रं भ्रमद् भ्रामयते यथा। तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातबद्धानि सर्वशः

English

B.C. (10 years).

अध्याय ९३

श्लोक 43

सहस्रशीर्षा पुरुष इति विष्णोरुदाहृतः इन्द्रायेन्दो मरुत्वत इति शक्रस्य शस्यते

sahasraśīrṣā puruṣa iti viṣṇorudāhṛtaḥ indrāyendo marutvata iti śakrasya śasyate

हिन्दी अर्थ

यस्मात् प्रवहते तानि प्रवहस्तेन स स्मृतः यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्टा निशि मुञ्जति। शिशुमारशरीरस्था यावत्यस्तारकास्तु ताः वर्षाणि दृष्टा जीवेत तावदेवाधिकानि तु। शिशुमाराकृतिं ज्ञात्वा प्रविभागेन सर्वशः

English

B.C. (2 y«'.»r8).

अध्याय ९३

श्लोक 44

उत्तानपर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत् प्रजापतेः पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृतः

uttānaparṇe subhage iti devyāḥ samācaret prajāpateḥ punarhomaḥ prajāpatiriti smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञोऽधरस्तु विज्ञेयो धर्मो मूर्धानमाश्रितः हैं। जिस प्रकार धुवसे बँधे हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह गगनमण्डलमें परिभ्रमण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्योतिर्गण ध्रुवके पीछे-पीछे घूमता है। जिस प्रकार नदीके जलमें पड़ी हुई नौका जलके साथ बहती जाती

English

B.C. (3 years).

अध्याय ९३

श्लोक 45

नमो ऽस्तु सर्पेभ्य इति सर्पाणां मन्त्र उच्यते एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्य इति ब्रह्मण्युदाहृतः

namo 'stu sarpebhya iti sarpāṇāṃ mantra ucyate eṣa brahmā ya ṛtvigbhya iti brahmaṇyudāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

है, उसी तरह देवताओंके गृह भी वायुके वेगसे वहन किये जाते हैं, इसीलिये वे आकाशमण्डलमें देव-गृह नामसे पुकारे जाते हैं। आकाशमण्डलमें जितनी तारकाएँ हैं, उतनी ही ध्रुवकी किरणें भी हैं। ये सभी तारकाएँ धुवसे संलग्न हैं, इसलिये स्वयं घूमती हुई किरणें उन्हें भी घुमाती हैं। जैसे तेल पेरनेवाला चक्र (कोल्हू) स्वयं घूमता है और अपनेसे लगी हुई सभी वस्तुओंको घुमाता है, वैसे ही वायुरूपी रस्सीसे बँधी हुई ज्योतियाँ सब ओर भ्रमण करती हैं। वातचक्रसे प्रेरित होकर घूमती हुई वे ज्योतियाँ अलातचक्र (जलती हुई बनेठी)-की भाँति प्रतीत होती हैं। चूँकि वायु उन ज्योतियोंको वहन करता है, इसलिये वह 'प्रवह' नामसे प्रसिद्ध है। इस

English

B.C. (.n years).

अध्याय ९३

श्लोक 46

विनायकस्य चानूनम् इति मन्त्रो बुधैः स्मृतः जातवेदसे सुनवाम दुर्गामन्त्रो ऽयमुच्यते

vināyakasya cānūnam iti mantro budhaiḥ smṛtaḥ jātavedase sunavāma durgāmantro 'yamucyate

हिन्दी अर्थ

प्रकार ध्रुवसे बँधा हुआ यह ज्योतिश्चक्र भ्रमण करता है। इसी प्रकार गगनमण्डलमें स्थित शिशुमारचक्रमें ये ध्रुव तारामय अर्थात् ताराओंसे युक्त कहे जाते हैं। दिनमें जो पाप किया जाता है, वह रात्रिमें उस चक्रको देखनेसे नष्ट हो जाता है॥ १३--१९१॥

English

U6B.C. (9 years).

अध्याय ९३

श्लोक 47

आदित्प्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः क्राणा शिशुर्महीनां च वायोर्मन्त्रः प्रकीर्तितः

āditpratnasya retasa ākāśasya udāhṛtaḥ krāṇā śiśurmahīnāṃ ca vāyormantraḥ prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

शिशुमारचक्रके शरीरमें जितनी तारकाएँ स्थित हैं, उनका दर्शन कर तथा सर्वथा शिशुमारकी आकृतिको जानकर मनुष्य उतने ही अधिक वर्षोतक जीवित रह सकता है। उत्तानपादको उस शिशुमारचक्रका ऊपरी जबड़ा तथा यज्ञको निचला जबड़ा समझना चाहिए। धर्म उसके मस्तकपर स्थित हैं। हृदयमें नारायण और साध्यगणोंको तथा अगले पैरोंमें अश्चिनीकुमारोंको जानना चाहिए। वरुण और अर्यमा उसकी पिछली जाँघें हैं। शिश्न (जननेन्द्रिय)-के स्थानपर संवत्सरको समझिये और गुदास्थानपर मित्र स्थित हैं। उसकी

English

B.C. (82 years).

अध्याय ९३

श्लोक 48

एषो उषा अपूर्व्या इत्य् अश्विनोर्मन्त्र उच्यते पूर्णाहुतिस्तु मूर्धानं दिव इत्यभिपातयेत्

eṣo uṣā apūrvyā ity aśvinormantra ucyate pūrṇāhutistu mūrdhānaṃ diva ityabhipātayet

हिन्दी अर्थ

पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च मरीचिः कश्यपो धुवः॥ २४ पूँछमें अग्नि, महेन्द्र, मरीचि, कश्यप और ध्रुव स्थित हैं। ४४८ मत्स्यपुराण

English

B.C. (10 years).

अध्याय ९३

श्लोक 49

अथाभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः पूर्णकुम्भेन तेनैव होमान्ते प्रागुदङ्मुखम्

athābhiṣekamantreṇa vādyamaṅgalagītakaiḥ pūrṇakumbhena tenaiva homānte prāgudaṅmukham

हिन्दी अर्थ

एष तारामयः स्तम्भो नास्तमेति न बोदयम्। ताराओंद्वारा निर्मित यह स्तम्भ नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह॥ २५ और तारागणोंके साथ न अस्त होता है न उदय, अपितु ्रुवेणाधिष्टिताश्चैव धुवमेव प्रदक्षिणम्॥ २६ देखते हुए स्थित हैं। ये धुवसे अधिकृत होकर आकाशस्थित

English

Assasiiiatcd in 65 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 50

अव्यङ्गावयवैर्ब्रह्मन् हेमस्रग्दामभूषितैः यजमानस्य कर्तव्यं चतुर्भिः स्नपनं द्विजैः

avyaṅgāvayavairbrahman hemasragdāmabhūṣitaiḥ yajamānasya kartavyaṃ caturbhiḥ snapanaṃ dvijaiḥ

हिन्दी अर्थ

कसी प्रकाल्यपोना (तोय आग्रीध्र तथा कश्यपके वंशमें धुव ही सर्वश्रेष्ठ हैं। ये आग्जीश्चकाश्यपानां तु तेषां स परमो श्रुवः ॥ २७ धुव अकेले ही मेरुके अन्तर्वर्ती शिखरपर ज्योतिश्चक्रको साथ एक एव भ्रमत्येष मेरोरन्तरमूर्धनि। लेकर उसे खींचते हुए भ्रमण करते हैं। उस समय उनका ज्योतिषां चक्रमादाय आकर्षस्तमधोमुखः॥ २८ मुख नीचेकी ओर रहता है। इस प्रकार वे मेरुको प्रकाशित मेरुमालोकयन्नेव प्रतियाति प्रदक्षिणम्॥ २९ करते हुए उसकी प्रदक्षिणा करते हैं

English

Total... 120 years.

अध्याय ९३

श्लोक 51

सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः वासुदेवो जगन्नाथस् तथा संकर्षणो विभुः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते

surāstvāmabhiṣiñcantu brahmaviṣṇumaheśvarāḥ vāsudevo jagannāthas tathā saṃkarṣaṇo vibhuḥ pradyumnaścāniruddhaśca bhavantu vijayāya te

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ध्रुवप्रशंसा नाम सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें ध्रुव-प्रशंसा नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन

English

UATB7A PDBAJA, OHAPTBB 272.

अध्याय ९३

श्लोक 52

आखण्डलो ऽग्निर्भगवान् यमो वै निरृतिस्तथा वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः ब्रह्मणा सहितः शेषो दिक्पालास्त्वामवन्तु ते

ākhaṇḍalo 'gnirbhagavān yamo vai nirṛtistathā varuṇaḥ pavanaścaiva dhanādhyakṣastathā śivaḥ brahmaṇā sahitaḥ śeṣo dikpālāstvāmavantu te

हिन्दी अर्थ

ऋषय ऊचुः ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! आपने जो यह सारा यदेतद् भवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः। विषय पूर्णरूपसे र र है, उसे तो 3325 , वदय ज्योतीचे सुना, परंतु देव-गृह वे ते हैं? (यह जान कथं देवगृहाणि स्युः कथं ज्योतींषि वर्णय॥ १ विशेष उत्कण्ठा हो रही हैं।) अतः आप पुनः (पूर्वकथित) सूत उवाच ज्योतिश्चक्रका कुछ और विस्तारसे वर्णन कीजिये

English

[The aggeregate of the reigns is, however, 130 years and not 112, but all the Parfi:as agree in giving 113 years as the duration of Sunga dynasty. This discrepancy might be explained by omitting Agnimitra from the list. He perhaps never reigned as a king apart from his father Puyamitra, who though defaeto king always styled himsef Senfipati or Commander-in-chief and so Agninitra's name is not mentioned by the' Matsya Purina. There is much uncertainty about his reign as pointed out by Mr. Pargiter. Or may it be that Agnimitra was practically a king during the life-time of his father on certain parts of the vast empire. And the verse " tat-suto ' gnimitr-astau bhaviyati samd nirph " may be read as "tat-suto' ganimitrastu bhavisyati sami nripah." According to this

अध्याय ९३

श्लोक 53

कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिस् तुष्टिः क्रान्तिश्च मातरः एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु धर्मपत्न्यः समागताः

kīrtirlakṣmīrdhṛtirmedhā puṣṭiḥ śraddhā kriyā matiḥ buddhirlajjā vapuḥ śāntis tuṣṭiḥ krāntiśca mātaraḥ etāstvāmabhiṣiñcantu dharmapatnyaḥ samāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

स्व सूतजी कहते हें--क्रषियो! अब मैं जिस प्रकार एतत् सर्व प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्। देव-गृह एवं सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके गृह होते हैं तथा जैसी यथा देवगृहाणि स्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा॥ २ सूर्य और चन्द्रमाकी गति होती है, वह सब बतला रहा हूँ। अग्रेर्व्युष्टी रजन्यां वै ब्रह्मणाव्यक्तयोनिना। ब्रह्माने देखा कि जगतूकी कोई वस्तु दीख नहीं रही है । सारा अव्याकृतमिदं त्वासीनेशेने तमसाऽऽवृतम्॥ ३ जगत् रात्रिके अन्धकारसे आच्छन्न है। (कहीं प्रकाशका चिहमात्र भी अवशेष नहीं है।) ब्रह्माद्वारा अधिष्ठित इस चतुर्भूतावशिष्टेऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते। जगत्में केवल चार पदार्थ अवशिष्ट थे, तब लोकोंके स्वयम्भूर्भगवांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः॥ ४ तत्त्वार्थको सिद्ध करनेवाले स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा खद्योत (अत्ता विधां (जुगनू) -के रूपमें विचरण करते हुए प्रकाशको आविर्भूत खद्योतरूपी विचरत्नाविर्भावं व्यचिन्तयत्। करनेके लिये विचार करने लगे। (उस समय उन्हें स्मरण ज्ञात्वाग्निं कल्पकालादावपः पृथ्वीं च संश्रिताः ५ हुआ कि) कल्पकालके आदिमें अग्नि-तत्त्व जल और

English

calculation Sunga dynasty wmdd appear to have come to an end not

अध्याय ९३

श्लोक 54

आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधो जीवः सितो ऽर्कजः ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः

ādityaścandramā bhaumo budho jīvaḥ sito 'rkajaḥ grahāstvāmabhiṣiñcantu rāhuḥ ketuśca tarpitāḥ

हिन्दी अर्थ

नोता पृथ्वीमें सम्मिलित हो गया था । यह जानकर उन्होंने तीनोंको स सम्भृत्य प्रकाशार्थ त्रिधा तुल्योऽभवत् पुनः। एकत्र कर प्रकाश करनेके लिये तीन भागोंमें विभक्त कर पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते॥ ६ दिया। इस प्रकार इस लोकमें जो पाचक नामक अग्नि है, तेजोभिश्चाप्यते कञ्चित् कञ्चिदेवाप्यनिन्धनः। काफ्ठे्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः

English

in 65 B. C. but in 73 The Matsya Purana verse 33 is rather inaccurate.

अध्याय ९३

श्लोक 55

देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ऋषयो मुनयो गावो देवमातर एव च

devadānavagandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ ṛṣayo munayo gāvo devamātara eva ca

हिन्दी अर्थ

यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे। अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्रेये तु तेजसी। परस्परानृप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्

English

It says: —

अध्याय ९३

श्लोक 56

देवपत्न्यो द्रुमा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च

devapatnyo drumā nāgā daityāścāpsarasāṃ gaṇāḥ astrāṇi sarvaśastrāṇi rājāno vāhanāni ca

हिन्दी अर्थ

उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं । जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है उदरमें स्थित अग्नि विद्युतूसे उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं । इस वैद्युताग्रिका इन्धन जल है । कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है।

English

I tlRT av: SfFRiSr*

अध्याय ९३

श्लोक 57

औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये सरितः सागराः शैलास् तीर्थानि जलदा नदाः एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये

auṣadhāni ca ratnāni kālasyāvayavāśca ye saritaḥ sāgarāḥ śailās tīrthāni jaladā nadāḥ ete tvāmabhiṣiñcantu sarvakāmārthasiddhaye

हिन्दी अर्थ

काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मथ्यँ है।यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्चालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे आग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्रिका प्रकाश अधिक होता है॥ २--१० ॥ पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निको ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज--इन सबके परस्पर अनृप्रवेश करनेके कारण दिन-

English

" These ten Kudra kings will eujoy this earth full 100 and 200 (total 300) years. Then it will go to the Sungas." This is evidently a mistake. The earth could not have gone to the Snngas after the Sungas. Nor did the Sungas reign for 300 years. Instead of tatah SungSn gamisyati, another reading is tatali svargam gamisyati, which may refer to the last king namely, Devabhumi who will go to heaven. This reading is more appro- priate than Sung&u gamifyati. Moreover who are these petty kings Ksudi arSjanah which the text mentions. It only mentions 8 kings and not 10 for it does not mention Agnimitra and Ghosavasn. We have therefore adopted Mr. Pargiter' reading: — Dailaite Sunga-iAjtino bhok$yant-tm&m vasundhardm ltam phrnam daiia dve cha tatiih Ranvan gamisyati." This is in accordance with Visnu pur& also which in IV. 24. 11 says.

अध्याय ९३

श्लोक 58

ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः सर्वौषधैः सर्वगन्धैः स्नापितो द्विजपुंगवैः

tataḥ śuklāmbaradharaḥ śuklagandhānulepanaḥ sarvauṣadhaiḥ sarvagandhaiḥ snāpito dvijapuṃgavaiḥ

हिन्दी अर्थ

रातकी पूर्ति होती है पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है । पुन: सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है । इसी कारण जल रातमें उज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है । इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमशः जलमें प्रवेश

English

W I (RT:

अध्याय ९३

श्लोक 59

यजमानः सपत्नीक ऋत्विजः सुसमाहितान् दक्षिणाभिः प्रयत्नेन पूजयेद्गतविस्मयः

yajamānaḥ sapatnīka ṛtvijaḥ susamāhitān dakṣiṇābhiḥ prayatnena pūjayedgatavismayaḥ

हिन्दी अर्थ

करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं । सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाडियोंसे नदी, समुद्र, हद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा तस्य रश्मिसहस्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्त्रवः॥ १८ और गरमीका प्रादुर्भाव होता है

English

The Kanvdyanas.

अध्याय ९३

श्लोक 60

सूर्याय कपिलां धेनुं शङ्खं दद्यात्तथेन्दवे रक्तं धुरंधरं दद्याद् भौमाय च ककुद्मिनम्

sūryāya kapilāṃ dhenuṃ śaṅkhaṃ dadyāttathendave raktaṃ dhuraṃdharaṃ dadyād bhaumāya ca kakudminam

हिन्दी अर्थ

उन सहस्रो किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाडियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका

English

The minister Vasudeva forcibly overthrowing the dissolute king Debhabdmi will become king among the Sungas. He the Ranvdyana, will be king for 9 years. — 33.

अध्याय ९३

श्लोक 61

बुधाय जातरूपं तु गुरवे पीतवाससी श्वेताश्वं दैत्यगुरवे कृष्णां गामर्कसूनवे

budhāya jātarūpaṃ tu gurave pītavāsasī śvetāśvaṃ daityagurave kṛṣṇāṃ gāmarkasūnave

हिन्दी अर्थ

स्वरूपनिरूपण हुआ है। चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा॥ १९ चन्दना, मेध्या, केतना, चेतना, अमृता और जीवना--ये चन्द्रताराग्रहैः सर्वैः पीता भानोर्गभस्तयः

English

His son Bhhmitra will reign 14 years. His sou Ndrdyana will be fox 12 years. — 34.

अध्याय ९३

श्लोक 62

आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम् सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा

āyasaṃ rāhave dadyāt ketubhyaśchāgamuttamam suvarṇena samā kāryā yajamānena dakṣiṇā

हिन्दी अर्थ

सम्बिभ्रति हि ताः सर्वा मनुष्यान् देवताः पितृन् मनुष्यानौषधीभिश्च स्वधया च पितृनपि। अमृतेन सुरान् सर्वान् सततं परितर्पयन्

English

APPmmzui

अध्याय ९३

श्लोक 63

सर्वेषामथवा गावो दातव्या हेमभूषिताः सुवर्णमथवा दद्याद् गुरुर्वा येन तुष्यति समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः

sarveṣāmathavā gāvo dātavyā hemabhūṣitāḥ suvarṇamathavā dadyād gururvā yena tuṣyati samantreṇaiva dātavyāḥ sarvāḥ sarvatra dakṣiṇāḥ

हिन्दी अर्थ

एवं रश्मिसहस्त्रं तु सौरं लोकार्थसाधकम् इत्येवं मण्डलं शुक्लं भास्वरं लोकसंज्ञितम् हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत्

English

Suisrma, his son, will be for 10 years only. These are recorded as Sangabbrityas, or Kanvfiyana kings.— 35.

अध्याय ९३

श्लोक 64

कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणी तीर्थदेवमयी यस्माद् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

kapile sarvadevānāṃ pūjanīyāsi rohiṇī tīrthadevamayī yasmād ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम्। विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः सभी किरणें विशेषरूपसे वृष्टि करनेवाली हैं। सूर्यकी तीन सौ किरणें हिमसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं। उन्हे चन्द्रमा, तारा और सभी ग्रह पीते रहते हैं । ये मध्य नाडियाँ कहलाती हैं । इनके अतिरिक्त अन्य ह्रादिनी आदि नाडियाँ

English

These 40 (fonr; Kanvas are BrfthmaQasand they will enj(7 die earth for 45 years.— 35.

अध्याय ९३

श्लोक 65

पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम् विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे

puṇyastvaṃ śaṅkha puṇyānāṃ maṅgalānāṃ ca maṅgalam viṣṇunā vidhṛtaścāsi tataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

हिमको सृष्टि करनेवाली हैं। शुक्ला, ककुभ, गौ और विश्वभृत् नामकी जो नाडियाँ हैं, वे सभी शुक्ला नामसे कही जाती हैं। इनकी भी संख्या तीन सौ हैं ये धूपको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सभी मनुष्यों, देवताओं और पितरोंका भरण-पोषण करती हैं। ये किरणें ओषधियों (एवं अन्नों) द्वारा सभी मनुष्योंको, स्वधाद्वारा पितरोंको और अमृतके माध्यमसे ग्रीष्म-ऋतुमें शनैः-शनैः अपनी तीन सौ किरणोंसे ताप उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शरद्-ऋतुमें चार सौ किरणोंके माध्यमसे वर्षा करते हैं। पुनः हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें तीन सौ किरणोंद्वारा बर्फ गिराते हैं । यही

English

They will have the neigbbonring kings respect them and will be virtuous. At the time of their period of reign coming to an end the earth will go to the Andhras.— 37.

अध्याय ९३

श्लोक 66

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक अष्टमूर्तेरधिष्ठानम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

dharmastvaṃ vṛṣarūpeṇa jagadānandakāraka aṣṭamūrteradhiṣṭhānam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

सूर्य ओषधियोंमें बल, स्वधामें सुधा और अमृतमें अमरत्वका आधान करते हैं अर्थात् तीनों पदार्थोमें तीन तरहके गुण उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सूर्यकी ये हजारों किरणें लोगोंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हैं । ऋतुओंके क्रमानुसार जलकी शीतलता और उष्णतामें परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार उद्दीपत एवं श्वेत वर्णवाला वह लोकसंज्ञक मण्डल नक्षत्र, ग्रह और सोमकी प्रतिष्ठा एवं योनि है। इन सभी चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंको सूर्यसे उत्पन्न हुआ जानना चाहिए

English

(1) Vasucleva Kanva... (9 years) 78 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 67

हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमबीजं विभावसोः अनन्तपुण्यफलदम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

hiraṇyagarbhagarbhastvaṃ hemabījaṃ vibhāvasoḥ anantapuṇyaphaladam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

सूर्यको जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह क्षीण हुए चन्द्रमाको पुनः बढ़ाती है । पूर्वदिशामें जो हरिकेश नामकी किरण है, वह नक्षत्रोंकी जननी है। दक्षिण दिशामें स्थित विश्वकर्मा नामकी किरण बुधको तृप्त करती है। पश्चिम दिशामें जो विश्वावसु नामक किरण है, उसे शुक्रकी योनि (उत्पत्तिस्थान) कहा जाता है। जो संवर्धन किरण है, वह लोहित (मंगल)-की योनि है। छठी किरणको अश्वभू कहते हैं, वह बृहस्पतिकी योनि है। पुनः सुराट् नामक किरण शनैश्चरकी वृद्धि करती है। चूँकि ये (चन्दर, नक्षत्र और ग्रह) कभी नष्ट नहीं होते, इसीलिये इनकी नक्षत्रता मानी गयी है । उपर्युक्त नक्षत्रोंके क्षेत्र सूर्यपर आकर गिरते हैं और सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उन

English

(2) BhUmimitra... (14 yoars) 69 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 68

पीतवस्त्रयुगं यस्माद् वासुदेवस्य वल्लभम् प्रदानात्तस्य मे विष्णो ह्य् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

pītavastrayugaṃ yasmād vāsudevasya vallabham pradānāttasya me viṣṇo hy ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः॥ ३३ क्षेत्रोंको ग्रहण करते हैं, इसीसे उनकी नक्षत्रता सिद्ध होती अस्माल्लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम्। तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव शुक्लिकाः

English

(8) Nftrhyana... (18 years). 47 B C.

अध्याय ९३

श्लोक 69

विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः चन्द्रार्कवाहनो नित्यम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

viṣṇustvamaśvarūpeṇa yasmādamṛtasambhavaḥ candrārkavāhano nityam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

वसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः। मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋषिसूर्यग्रहादयः तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि। सौरे सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च ज्योतींषि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तु वै

English

(4) Susarma... (10 years) 37 B.C.

अध्याय ९३

श्लोक 70

यस्मात्त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा सर्वपापहरा नित्यम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

yasmāttvaṃ pṛthivī sarvā dhenuḥ keśavasaṃnibhā sarvapāpaharā nityam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै अभिमाने न तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः।

English

Total... 46 years.

अध्याय ९३

श्लोक 71

यस्मादायासकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे

yasmādāyāsakarmāṇi tavādhīnāni sarvadā lāṅgalādyāyudhādīni tasmācchāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

सूर्यो देवो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितेः सुतः द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः। शुक्रो हैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः है। इस लोकसे परलोकमें जानेवाले पुण्यात्माओंका उद्धार करनेके कारण ये किरणें तारका नामसे प्रसिद्ध हैं तथा शुक्ल-वर्णकी होनेके कारण शुक्ला भी कही जाती हैं। दिव्य (स्वर्गीय) एवं पार्थिव (भौमिक) सभी प्रकारके

English

[The last king Susarma was slain by the king iSisuka about 27 or 28 B.C.]

अध्याय ९३

श्लोक 72

यस्मात्त्वं सर्वयज्ञानाम् अङ्गत्वेन व्यवस्थितः यानं विभावसोर्नित्यम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

yasmāttvaṃ sarvayajñānām aṅgatvena vyavasthitaḥ yānaṃ vibhāvasornityam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

वंशोंके तेजके संयोगसे सम्पन्न होनेके कारण सूर्यको “तपन' कहा जाता है। 'सवति (सूते) अर्थात् 'सु' धातु “उत्पत्ति अथवा चेतनाभाव' के अर्थमें प्रयुक्त होती है। इसलिये ( भूमि-) जल-तेजके उत्पादक होनेके कारण सूर्य सविता कहलाते हैं । इसी प्रकार 'चदि आह्वादने ' यह बह्वर्थक धातु आह्वादित करनेके अर्थमें भी प्रयुक्त होती है। इसका शुक्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अन्य अनेकों अर्थोमें प्रयोग किया जाता है । (इसी धातुसे

English

Here ends chapter 272 describing the Pradyota Sisundga the Nanda the Uauryat the Sungas and the Kdnvdyana dynasties.

अध्याय ९३

श्लोक 73

गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश यस्मात्तस्माच्छ्रिये मे स्याद् इह लोके परत्र च

gavāmaṅgeṣu tiṣṭhanti bhuvanāni caturdaśa yasmāttasmācchriye me syād iha loke paratra ca

हिन्दी अर्थ

चन्द्र या चन्द्रमा शब्द निष्पन्न हुआ है ।) ॥ २९--३७॥ सूर्य और चन्द्रमाके दिव्य मण्डल गगनतलमें उद्धासित होते हैं। वे सुन्दर श्वेत रंगवाले, जल और तेजसे सम्पन्न एवं कुम्भ-सदृश गोलाकार हैं। उनमें सभी मन्वन्तरोंके ऋषि एवं सूर्यादि ग्रह कर्मदेवताके रूपसे निवास करते हैं। ये ही उनके स्थान हैं, इसीसे उन्हें देव-गृह कहा जाता है। वे देव- गृह उन्हीं देवोंके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। सूर्य सौर नामक स्थानमें तथा चन्द्रमा सौम्य स्थानमें प्रवेश करते हैं। शुक्र शौक्र स्थानमें प्रवेश करते हैं, जो सोलह आरोंसे युक्त और

English

Andhras.

अध्याय ९३

श्लोक 74

यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि

yasmādaśūnyaṃ śayanaṃ keśavasya ca sarvadā śayyā mamāpyaśūnyāstu dattā janmani janmani

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कान्तिमान् है। इसी प्रकार बृहस्पति बृहत्त्व स्थानमें, मंगल लोहित स्थानमें, शनैश्वर शानैश्वर स्थानमें, बुध बुधस्थानमें और राहु भानुस्थानमें प्रवेश करते हैं। सभी नक्षत्र नाक्षत्र स्थानमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार इन सभी ज्योतियोंको उन पुण्यात्माओंके देव-गृह जानने चाहिए। ये सभी स्थान प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। सभी मन्वन्तरोंमें वे ही देवस्थान होते हैं। सभी देवता पुनः-पुनः उन्हीं अपने-अपने स्थानांमें निवास करते हैं। अतीतकालीन स्थानीय देवता अतीतोंके

English

The Andhra Simnka (iiuka) with his fellow tribesmen, the servants of Su&rman, will assail the KanvSyanas and him (Snrfarman,) and destroy the remains of the Mangas' power and will obtain this earth. —1-2.

अध्याय ९३

श्लोक 75

यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः तथा रत्नानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः

yathā ratneṣu sarveṣu sarve devāḥ pratiṣṭhitāḥ tathā ratnāni yacchantu ratnadānena me surāḥ

हिन्दी अर्थ

साथ, भविष्यत्कालीन स्थानीय देवता भावी देवताओंके साथ और वर्तमानकालीन स्थानीय देवता वर्तमान देवताओंके साथ वर्तमान रहते हैं॥ ३८-४५ ई॥ अदितिके आठवें पुत्र विवस्वान् सूर्य चन्द्रदेव वसु कहे गये हैं। भृगुनन्दन शुक्रको, जो

English

our text the reading is

अध्याय ९३

श्लोक 76

यथा भूमिप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् दानान्यन्यानि मे शान्तिर् भूमिदानाद्भवत्विह

yathā bhūmipradānasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm dānānyanyāni me śāntir bhūmidānādbhavatviha

हिन्दी अर्थ

असुरोंके पुरोहित हैं, कर्मानुसार हैत्य समझना चाहिए । निरुक्त, अमरटीका, धातुवृति, उणादिकोश आदिके अनुसार भी ' षूङ् प्राणिप्रसवे ' धातुसे “सविता' शब्द बनता है, जिसका

English

"worasireRTl Jjjir; smif

अध्याय ९३

श्लोक 77

एवं सम्पूजयेद्भक्त्या वित्तशाठ्येन वर्जितः रत्नकाञ्चनवस्त्रौघैर् धूपमाल्यानुलेपनैः

evaṃ sampūjayedbhaktyā vittaśāṭhyena varjitaḥ ratnakāñcanavastraughair dhūpamālyānulepanaiḥ

हिन्दी अर्थ

अर्थ है--जगतूको उत्पन्न करनेवाला। बृहस्पतिर्बृहत्तेजा देवाचार्यो5डिर:सुत: । बुधो मनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहिताधिपः

English

This would mean:— ** Then KhQvfiyana nobles of Susarma having assailed her (Earth) and putting to an end what remained of the Sungas will become powerful." This shows that the chieftains of the last Eava King, Surarman, revolted against him and put an end to the Sitnga power.

अध्याय ९३

श्लोक 78

अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत् सर्वान्कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते

anena vidhinā yastu grahapūjāṃ samācaret sarvānkāmānavāpnoti pretya svarge mahīyate

हिन्दी अर्थ

स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंतापनोऽसुरः चन्द्रार्क ग्रहनक्षत्रेष्वभिमानी प्रकीर्तितः । स्थानान्येतानि चोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः

English

Their tribesman (a kinsman of these KAnv&yana chieftains (bhdp4s) who had revolted against Sutfarmani called (1) i4uka Andhra will get this earth. For 23 years Muka will be the king. — 2.

अध्याय ९३

श्लोक 79

यस्तु पीडाकरो नित्यम् अल्पवित्तस्य वा ग्रहः तं च यत्नेन सम्पूज्य शेषानप्यर्चयेद्बुधः

yastu pīḍākaro nityam alpavittasya vā grahaḥ taṃ ca yatnena sampūjya śeṣānapyarcayedbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्रः षोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो ह्यपोमयः तारणात्तारका: होता: शुक्लत्वाच्चैव तारकाः मण्डलं त्रिगुणं चास्य विस्तारो भास्करस्य तु

English

His younger brother (2) Kripa will be 18 years. His son (3) rl« mallakarpi (ri takarpi) will be 10 yean. Then (4) Ffirpoteanga will he king 18 years. —3.

अध्याय ९३

श्लोक 80

ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यवमानिताः

grahā gāvo narendrāśca brāhmaṇāśca viśeṣataḥ pūjitāḥ pūjayantyete nirdahantyavamānitāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वोपरि निसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः। योजनार्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानि गणानि तु ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तृतीयं तु तमोमयम्। आदित्यात् स तु निष्क्रम्य सोमं गच्छति पर्वसु

English

Parglter interto (S) "SkandhastMnbhi wUl be king It yean" after

अध्याय ९३

श्लोक 81

यथा बाणप्रहाराणां कवचं भवति वारणम् तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम्

yathā bāṇaprahārāṇāṃ kavacaṃ bhavati vāraṇam tadvaddaivopaghātānāṃ śāntirbhavati vāraṇam

हिन्दी अर्थ

महर्षिं अङ्गिराके पुत्र परम तेजस्वी बृहस्पति देवोंके आचार्य हैं। मनोहर रूपवाले बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं। शनैश्चर कुरूप कहे गये हैं। ये सूर्यके संयोगसे उत्पन्न हुए संज्ञाके पुत्र हैं। लाल रंगके अधिपति मंगल नवयुवक (माने गये) हैं। स्वयं अग्निदेव ही रूपमें विकेशी (भूमि) के गर्भसे उत्पन्न हुए थे। नक्षत्र नामवाली सत्ताईस नक्षत्राभिमानी देवियाँ दाक्षायणीकी कन्या मानी गयी हैं। राहु सिंहिकाका पुत्र है। यह सभी प्राणियोंको कष्ट देनेवाला राक्षस है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन किया गया। साथ ही उनके स्थान तथा स्थानी देवता भी बतलाये गये। सहस्र किरणधारी सूर्यका स्थान दिव्य, श्वेत वर्णवाला तथा अग्निके समान तेजस्वी है। चन्द्रमाका स्थान तैजस एवं

English

Pamotaanga.

अध्याय ९३

श्लोक 82

तस्मान्न दक्षिणाहीनं कर्तव्यं भूतिमिच्छता सम्पूर्णया दक्षिणया यस्मादेको ऽपि तुष्यति

tasmānna dakṣiṇāhīnaṃ kartavyaṃ bhūtimicchatā sampūrṇayā dakṣiṇayā yasmādeko 'pi tuṣyati

हिन्दी अर्थ

जलमय है। बुधका स्थान जलमय है और वह सूर्यकी किरणरूपी गृहमें स्थित है शुक्रदेवका स्थान सोलह किरणोंसे युक्त एवं जलमय है। मंगल नौ किरणोंसे युक्त हैं, उनका स्थान जलमय है। बृहस्पतिका स्थान बारह किरणोंसे युक्त है और उसकी कान्ति हल्दीके समान पीली है। शनैश्चरका स्थान आठ किरणोंसे युक्त, प्राचीन, लौहमय एवं काले रंगका है। राहुका स्थान लोहेका बना है, वह प्राणियोंको कष्ट देनेवाला है। ताराएँ सुकृतीजनोंका आश्रय स्थान हैं। इनकी

English

UATSYA PORIVA, OBAPTER 273.

अध्याय ९३

श्लोक 83

सदैवायुतहोमो ऽयं नवग्रहमखे स्थितः विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्मसु

sadaivāyutahomo 'yaṃ navagrahamakhe sthitaḥ vivāhotsavayajñeṣu pratiṣṭhādiṣu karmasu

हिन्दी अर्थ

किरणें स्वर्णमयी हैं। जीवोंका निस्तार करनेके कारण ये तारका कहलाती हैं और शुक्लवर्ण होनेके कारण इनका शुक्ला भी नाम है सूर्यके व्यासका विस्तार नौ हजार योजन है और इनका सम्पूर्ण मण्डल इस (व्यास) से तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बतलाया जाता है। चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल विपुलतामें सूर्य-मण्डलसे तिगुना है। सबके ऊपर तारकाओंके मण्डल हैं। उनका विस्तार आधे योजनका बतलाया जाता है। उनसे नीचे अन्य गणोंके स्थान हैं। राहु उनकी तुलनामें समान होते हुए भी उनके नीचेसे भ्रमण करता है।

English

(6) ltakBiQi will be 66 years. Hie son (7) Lambodara 18 years.'Hl.

अध्याय ९३

श्लोक 84

निर्विघ्नार्थं मुनिश्रेष्ठ तथोद्वेगाद्भुतेषु च कथितो ऽयुतहोमो ऽयं लक्षहोममतः शृणु

nirvighnārthaṃ muniśreṣṭha tathodvegādbhuteṣu ca kathito 'yutahomo 'yaṃ lakṣahomamataḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माद्वारा निर्मित वह तीसरा स्थान तमोमय है। उसे पृथ्वीकी छायाको ऊपर उठाकर मण्डलाकार बनाया गया है। राहु पूर्णिमा आदि पर्वोमें सूर्यमण्डलसे निकलकर चन्द्रमण्डलमें चला जाता है और सूर्य-सम्बन्धी अमावास्या आदि पर्वोमें पुन: चन्द्रमण्डलसे निकलकर सूर्यमण्डलमें चला आता है। वह अपनी कान्तिसे प्राणियोंको कष्ट पहुँचाता है, इसीलिये उसे स्वर्भानु कहते हैं।

English

His son (8) Apttaka(Aptlaka) will be 12 years. Then (9) Meghasr&ti will be 18 years. — 5.

अध्याय ९३

श्लोक 85

सर्वकामाप्तये यस्माल् लक्षहोमं विदुर्बुधाः पितॄणां वल्लभं साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

sarvakāmāptaye yasmāl lakṣahomaṃ vidurbudhāḥ pitṝṇāṃ vallabhaṃ sākṣād bhuktimuktiphalapradam

हिन्दी अर्थ

सभी पुराणों तथा मूर्त्यष्टक शिवव्याख्यानोमें विकेशीको भूमि कहा गया है। उनके पुत्र होनेसे ही मङ्गलको भौम कहा जाता है। सर्वोपरि विसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः उपरिष्टात्तु ये तेषां ग्रहा ये क्रूरसात्तिचकाः

English

Then (10; SrAti will be king 18 yean. (11) Skandhasvftti will then be king 7 yean. — 6.

अध्याय ९३

श्लोक 86

ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद्बुधः

grahatārābalaṃ labdhvā kṛtvā brāhmaṇavācanam gṛhasyottarapūrveṇa maṇḍapaṃ kārayedbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं देवाचार्योपरि स्थितः

English

Then (12) Mrigendra Srfitikaroa will be 3 yean. Then (13) Kuntala SvfitikarQa will be king 8 yean. Then (14) Sv&tivarpa will be king for one year. — 7-8.

अध्याय ९३

श्लोक 87

रुद्रायतनभूमौ वा चतुरस्रमुदङ्मुखम् दशहस्तमथाष्टौ वा हस्तान्कुर्याद्विधानतः

rudrāyatanabhūmau vā caturasramudaṅmukham daśahastamathāṣṭau vā hastānkuryādvidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

व्यास और बाह्यवृत्त-दोनोंके योजन-परिमाणमें शुक्रका परिमाण चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर बतलाया जाता है। बृहस्पतिका परिमाण शुक्रके परिमाणसे एक चतुर्थांश कम जानना चाहिए। शनि और मंगल--ये दोनों प्रमाणमें बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम बतलाये गये हैं। बुध इन दोनों ग्रहासे विस्तार और मण्डलमें चौथाई कम हैं। आकाशमण्डलमें तारा, नक्षत्र आदि जितने शरीरधारी हैं, वे सभी विस्तार और मण्डलके हिसाबसे बुधके समकक्ष हैं। तारा और नक्षत्र परस्पर एक-दूसरेसे कम हैं ॥५७--६६॥

English

Then (16) Ariktavarpa will be 25 years. After him (17) H&la will be king for 5 yean. — 9.

अध्याय ९३

श्लोक 88

प्रागुदक्प्लवनां भूमिं कारयेद्यत्नतो बुधः प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु

prāgudakplavanāṃ bhūmiṃ kārayedyatnato budhaḥ prāguttaraṃ samāsādya pradeśaṃ maṇḍapasya tu

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार उन सभी ज्योतिर्गणोंका मण्डल पाँच, चार, तीन, दो अथवा एक योजनमें विस्तृत है । तारकाओंके मण्डल सबसे ऊपर हैं। उनका प्रमाण आधा योजन है। इनसे कम विस्तारवाला अन्य कोई नहीं है। इनके ऊपर जो क्रूर और सात्त्विक ग्रह स्थित हैं, उन्हें शनैश्वर, बृहस्पति और मंगल समझना चाहिए। ये सभी मन्द गतिवाले हैं। इनके नीचे चन्द्र, सूर्य, बुध और शुक्र-ये चार अन्य महान् ग्रह विचरण करते हैं। ये सभी शीघ्रगामी हैं। जितने

English

varyAni PulomAvi bhaviyyati/* hich means then (15) Polom&vi will reign 88 years. Instead of Ariktavarua another reading is Ariftakarna. Then (18) Mandulaka will be king 5 yean (another reading Manta- laka.) Then (19; Purindrasena (Porikasena) will be king. After him (20) Saumya will be king.— 10.

अध्याय ९३

श्लोक 89

शोभनं कारयेत्कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम् चतुरस्रं समन्तात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्

śobhanaṃ kārayetkuṇḍaṃ yathāvallakṣaṇānvitam caturasraṃ samantāttu yonivaktraṃ samekhalam

हिन्दी अर्थ

नक्षत्र हैं, उतने ही करोड़ तारकाएँ हैं। सूर्य सभी ग्रहोंके निचले भागमें गमन करते हैं। सूर्यके ऊपरी भागमें चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके चलते हैं। नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। इसी प्रकार नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति और देवाचार्य बृहस्पतिके ऊपर शनैश्चर स्थित हैं। शनैश्चरसे ऊपर सप्तर्षि-मण्डलको जानना चाहिए। सपर्षियाँसे ऊपर ध्रुव हैं और ध्रुवसे ऊपर सारा आकाशमण्डल है। नक्षत्रमण्डलसे ऊपर प्रत्येक ग्रह दो लाख योजनोंके अन्तरपर स्थित है। ताराओं और ग्रहोंके अन्तर परस्पर एक-दूसरेके ऊपर स्थित हैं। आकाशमण्डलमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगण दिव्य तेजसे युक्त हो निश्चित क्रमानुसार चलते हुए

English

Aote.— The number of years of the reigns of Pnrlndrasenaand Saumya are not given in onr edition. Moreover, it is doubtful whether, Saumya is the name of a king. Mr. Pargiter says Saumya cannot well be a king, fhough the line says so on its face, because in this dynasty two kings are never put tosether in a single line without any mention of their reigns, * Saumyo bhaviyyati ' is probably a corruption. Mr. Pargiter also points out that instead of the above the following verse is in the YAyn Pancha Pattalako rAj& bhaviyyati mahftbaUh. ''BhAvyAh Pnrikasenas tu samAh so'py eka- vimAatfm." Thus according to this reading Purikssena will reign 21 years.

अध्याय ९३

श्लोक 90

चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्वदुच्छ्रिता प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता

caturaṅgulavistārā mekhalā tadvaducchritā prāgudakplavanā kāryā sarvataḥ samavasthitā

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रोंसे मिलते है ॥ ६७-७६ ६ ॥ ऊँचे गृहोंमें स्थित होते हैं। इसी क्रमसे इनका समागम और वियोग भी होता है। उस अवसरपर सभी प्राणी इन्हें एक साथ देखते हैं। इस प्रकार स्थित रहकर ये

English

Then (21) Sundara ntikai-a (iatakarni) will reign 1 year. Then (22) Chakora Svdtikara (ltakarni) will reign for 6 months. —11. Then (23) livasvftti will be 28 years. Then (24) King Oautamt- putra will be king next 21 years.— 12.

अध्याय ९३

श्लोक 91

शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः मानहीनाधिकं कुण्डम् अनेकभयदं भवेत् यस्मात्तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते

śāntyarthaṃ sarvalokānāṃ navagrahamakhaḥ smṛtaḥ mānahīnādhikaṃ kuṇḍam anekabhayadaṃ bhavet yasmāttasmāt susampūrṇaṃ śāntikuṇḍaṃ vidhīyate

हिन्दी अर्थ

परस्पर संयुक्त होते हैं । विद्वानूलोग इनके इस सम्बन्धको असंकरेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः। सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छितः। 'लोकसंव्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः ८२

English

His son (25) PulomS will be king 28 years.

अध्याय ९३

श्लोक 92

अस्माद्दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च

asmāddaśaguṇaḥ prokto lakṣahomaḥ svayambhuvā āhutībhiḥ prayatnena dakṣiṇābhistathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तेषां शक्यं न संख्यातुं याथातथ्येन केनचित्। अमिश्रित ही मानते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, ज्योतिर्गणों, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष, नदी तथा उनमें निवास करनेवाले प्राणियोंको स्थिति है । ज्योतिर्गणोंका यह स्थितिक्रम सूर्यके कारण ही है। (मण्डलाकार घूमते

English

[Then (26) IAtakari will be king 29 years ] This is a very doubtful lin&as pointed out by Mr. Pargiter and it is not in onr text.

अध्याय ९३

श्लोक 93

द्विहस्तविस्तृतं तद्वच् चतुर्हस्तायतं पुनः लक्षहोमे भवेत्कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्

dvihastavistṛtaṃ tadvac caturhastāyataṃ punaḥ lakṣahome bhavetkuṇḍaṃ yonivaktraṃ trimekhalam

हिन्दी अर्थ

समय) उन गणोंके मध्यमें आवर्त-सा दीख पड़ता है। वह बीचमें ध्रुवके आ जानेसे संक्षिप्त हो जाता है। वह चारों ओर ऊँचाईपर गोलाकार फैला रहता है। परमेश्वरने लोकोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये उसे बनाया है। ब्रह्माने कल्पके आदिमें बहुत सोच- विचारकर इसे स्थापित किया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलकी स्थिति है। प्रधान (प्रकृति)- का यह विश्वरूप परिणाम अत्यन्त अद्भुत है। कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता। मनुष्य अपने चर्मचक्षुओंसे इन ज्योतिर्गणोंके गमनागमनको नहीं देख

English

After Pulomft (27) divarfri-Pulomft will be king 7 years.— 13.

अध्याय ९३

श्लोक 94

तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम् प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समन्ततः

tasya cottarapūrveṇa vitastitrayasaṃsthitam prāgudakplavanaṃ tacca caturasraṃ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा॥ ८४ सकता ॥ ७७--८४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे देवगृहवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

English

Then (28; diva skandha after Sdntikarna will be king as his son for(?) years. itthtts niam vAr: aai: i

अध्याय ९३

श्लोक 95

विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्

viṣkambhārdhocchritaṃ proktaṃ sthaṇḍilaṃ viśvakarmaṇā saṃsthāpanāya devānāṃ vapratrayasamāvṛtam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें देवगृहवर्णन नामक एक सौ अट्टाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ त्रिपुर -निर्माणका कथं जगाम भगवान् पुरारित्वं महेश्वरः। ददाह च कथं देवस्तन्नो विस्तरतो वद

English

samali," and then the verse would mean **Sivaakandhaaintikarna will be king 3 years*"'

अध्याय ९३

श्लोक 96

द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि

dvyaṅgulo hyucchrito vapraḥ prathamaḥ sa udāhṛtaḥ aṅgulocchrayasaṃyuktaṃ vapradvayamathopari

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सबको मान देनेवाले सूतजी! भगवान् महेश्वर पुरारि (त्रिपुरके शत्रु) किस कारण हो गये तथा उन देवाधिदेवने उसे कैसे दग्ध किया? यह आप हमलोगोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये। हम सब लोग परम सम्मानपूर्वक आपसे बारंबार पूछ रहे हैं कि मयदानवकी मायाद्वारा विनिर्मित उस त्रिपुर दुर्गको भगवान् शंकरने एक ही बाणसे जिस प्रकार जला दिया था, हमलोगोंसे उस

English

Then (29) Yajnairi dftntikarika will be 29 years.— 14. APPmUDlX 111

अध्याय ९३

श्लोक 97

त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात्तथोपरि तस्मिन्नावाहयेद्देवान् पूर्ववत्पुष्पतण्डुलैः

tryaṅgulasya ca vistāraḥ sarveṣāṃ kathyate budhaiḥ daśāṅgulocchritā bhittiḥ sthaṇḍile syāttathopari tasminnāvāhayeddevān pūrvavatpuṣpataṇḍulaiḥ

हिन्दी अर्थ

देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो वद मानद॥ २ प्रसङ्गका विस्तारसे वर्णन कीजिये शृणुध्वं त्रिपुरं देवो यथा दारितवान् भवः। मयो नाम महामायो मायानां जनकोऽसुरः तपस्यन्तं तु तं विप्रा हैत्यावन्यावनुग्रहात्

English

Then after him (30) Vijayamll be king 6 yewrs. Then (31) Chtqiiufrl ntikangia; hie son will be 10 years.— 15.

अध्याय ९३

श्लोक 98

आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः

ādityābhimukhāḥ sarvāḥ sādhipratyadhidevatāḥ sthāpanīyā muniśreṣṭha nottareṇa parāṅmukhāḥ

हिन्दी अर्थ

विद्युन्माली च बलवांस्तारकाख्यश्च वीर्यवान् लोका इव यथा मूर्तास्त्रयस्त्रय इवाग्रयः

English

Then (32) Pnlomft, anotlier them, (vie., Pulomk II) will reign 7 yew;?.— (16a.) Tliese 19 Andhras will enjoy the earth for 460 years. On the king- dom of the Andhras coining to an end, there will be kings belonging to the lineage of their servants. — 16-17.

अध्याय ९३

श्लोक 99

गरुत्मानधिकस्तत्र संपूज्यः श्रियमिच्छता सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः विषपापहरो नित्यम् अतः शान्तिं प्रयच्छ मे

garutmānadhikastatra saṃpūjyaḥ śriyamicchatā sāmadhvaniśarīrastvaṃ vāhanaṃ parameṣṭhinaḥ viṣapāpaharo nityam ataḥ śāntiṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

लोकत्रयं तापयन्तस्ते तेपुर्दानवास्तपः। हेमन्ते जलशय्यासु ग्रीष्मे पञ्चतपे तथा वर्षासु च तथाऽऽकाशे क्षपयन्तस्तनूः प्रियाः । सेवानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च अन्यथाचरिताहाराः पङ्केनाचितवल्कलाः। मग्नाः शैवालपङ्केषु विमलाविमलेषु च

English

If ote,— The PnrAua mentions at the end that the niiiubor of kiiij will t)o 10, but as a matter of fact, itonumorates 80 kiiiga, and the number would rise to 52 if the kings Inserted by Mr. Parglter bo taken into account.

अध्याय ९३

श्लोक 100

पूर्ववत्कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत् सहस्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः घृतकुम्भवसोर्धारां पातयेदनलोपरि

pūrvavatkumbhamāmantrya tadvaddhomaṃ samācaret sahasrāṇāṃ śataṃ hutvā samitsaṃkhyādhikaṃ punaḥ ghṛtakumbhavasordhārāṃ pātayedanalopari

हिन्दी अर्थ

निर्मासाश्च ततो जाताः कृशा धमनिसंतताः। तेषां तपःप्रभावेण प्रभावविधुतं यथा दह्यमानेषु लोकेषु तैस्त्रिभिर्दानवाग्मिभिः

English

[We give in a their reigns (1) SisokaAadhn (3) Efisa

अध्याय ९३

श्लोक 101

औदुम्बरीं तथार्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम् बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि घृतधारां तया सम्यग् अग्नेरुपरि पातयेत्

audumbarīṃ tathārdrāṃ ca ṛjvīṃ koṭaravarjitām bāhumātrāṃ srucaṃ kṛtvā tataḥ stambhadvayopari ghṛtadhārāṃ tayā samyag agnerupari pātayet

हिन्दी अर्थ

ततः साहसकर्तारः प्राहुस्ते सहसागतम् स्वकं पितामहं हैत्यास्तं वै तुष्टुवु रेव च। सूतजी कहते हैं ऋषियो! भगवान् शंकरने जिस प्रकार त्रिपुरको विदीर्ण किया था (उसका वर्णन कर

English

(8) lrimiliakarni

अध्याय ९३

श्लोक 102

श्रावयेत्सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम् महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत्

śrāvayetsūktamāgneyaṃ vaiṣṇavaṃ raudramaindavam mahāvaiśvānaraṃ sāma jyeṣṭhasāma ca vācayet

हिन्दी अर्थ

था। वह विभिन्न प्रकारकी मायाओंका उत्पादक था। वह संग्राममें देवताओंद्वारा पराजित हो गया था, इसलिये घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। द्विजवरो! उसे तपस्या करते देख दो अन्य हैत्य भी अनुग्रहवश उसीके कार्यके उद्देश्यसे उग्र तपस्यामें जुट गये। उनमें एक महाबली

English

(4) POrnotsanga [(5) Skandhaatambhi (6) 6&takarnl

अध्याय ९३

श्लोक 103

स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत्स्वस्तिवाचनम् दातव्या यजमानेन पूर्ववद्दक्षिणाः पृथक्

snānaṃ ca yajamānasya pūrvavatsvastivācanam dātavyā yajamānena pūrvavaddakṣiṇāḥ pṛthak

हिन्दी अर्थ

मयके तेजसे आकृष्ट होकर उसीके पार्श्वभागमें बैठकर तपस्या कर रहे थे। उस समय तपस्यासे उद्भासित होते हुए वे तीनों ऐसा प्रतीत हो रहे थे, मानो लौकिक रूपमें मूर्तिमान् तीनों अग्नियाँ हों। वे तीनों दानव त्रिलोकीको संतप्त करते हुए तपस्यामें संलग्न थे। वे हेमन्त-ऋहतुमें जलमें शयन करते, ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तापते और वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे खुले मैदानमें खड़े रहते थे। इस प्रकार वे सबको परम प्रिय लगनेवाले अपने शरीरको सुखा रहे थे और मात्र फल, मूल, फूल और जलके आहारपर जीवन व्यतीत कर रहे थे अथवा वे कभी-कभी निराहार भी रह जाते थे। उनके वल्कलोंपर कीचड़ जम गया था और वे स्वयं विमल देहधारी

English

(7) Lambodara

अध्याय ९३

श्लोक 104

कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा नवग्रहमखे विप्राश् चत्वारो वेदवेदिनः

kāmakrodhavihīnena ṛtvigbhyaḥ śāntacetasā navagrahamakhe viprāś catvāro vedavedinaḥ

हिन्दी अर्थ

होकर भी गंदे सेवारके कीचड़ोंमें निमग्न रहते थे। इस कारण उनके शरीरका मांस गल गया था। वे इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके शरीरकी नसें बाहर उभड़ आयी थीं। उनकी तपस्याके प्रभावसे सारा जगत् निष्प्रभ हो गया-काँप उठा। सर्वत्र उदासी छा गयी। सभीके स्वर मन्द पड़ गये। इस प्रकार उन तीनों दानवरूपी अग्नियोंसे त्रिलोकीको जलते देखकर जगद्रन्धु पितामह ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए

English

(8) Apitaka (0) MoghasTti

अध्याय ९३

श्लोक 105

अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे

athavā ṛtvijau śāntau dvāveva śrutikovidau kāryāvayutahome tu na prasajyeta vistare

हिन्दी अर्थ

तब वे हैत्य अपने पितामहको सहसा सम्मुख उपस्थित देखकर अत्यन्त साहस करके बोले और उनकी स्तुति करने लगे। उस समय ब्रह्माके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे थे। तब उन्होंने तपस्याके अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान्॥ १३ प्रभावसे सूर्यके समान प्रभावशाली उन दानवोंसे यह महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग बहुत कुछ स्कन्द ५। ४३, शिव, सौरपु० २९-३० लिङ्गपु० ७३-४, आदि पुराणोंसे मिलता है। वैसे यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक विस्तृत है तथा आगेके नर्मदा-माहात्म्यमें इसी ग्रन्थमें पुनः आया है। इसका बीज तै० सं० ६।३। २। १, शतप० ६।३।३। २५ आदिमे प्राप्त होता है और पुष्पदन्तने भी ' शिवमहिग्रःस्तव' १८-१९ आदिके ' रथः क्षोणी यन्ता' ““'त्रिपुरतृण', "त्रिपुरहर

English

(10) Syftti

अध्याय ९३

श्लोक 106

तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः कर्तव्याः शक्तितस्तद्वच् चत्वारो वा विमत्सरः

tadvacca daśa cāṣṭau ca lakṣahome tu ṛtvijaḥ kartavyāḥ śaktitastadvac catvāro vā vimatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

आदिमें इसकी खूब उत्प्रेक्षा की है। विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः। देव हैत्याः पुरा देवैः संग्रामे तारकामये

English

(11) SkandbasTati (12) Mfigendra (18) Kuntala (14) Sv&tiYarfia [(15) Pulom&vi (10) Arlktavarna

अध्याय ९३

श्लोक 107

नवग्रहमखात्सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम् भक्ष्यान्दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः

navagrahamakhātsarvaṃ lakṣahome daśottaram bhakṣyāndadyānmuniśreṣṭha bhūṣaṇānyapi śaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

देवैर्वैरानुबन्धाच्च धावन्तो भयवेपिताः इच्छामि कर्तु तद् दुर्ग यद् देवैरपि दुस्तरम्। तस्मिंश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां वर भूम्यग्रिजलदुर्गाणां शापानां मुनितेजसाम्। देवप्रहरणानां च देवानां च प्रजापते

English

tabular form the list of the names of the Icings with

अध्याय ९३

श्लोक 108

शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान्

śayanāni savastrāṇi haimāni kaṭakāni ca karṇāṅgulipavitrāṇi kaṇṭhasūtrāṇi śaktimān

हिन्दी अर्थ

विश्वकर्मा इतीवोक्तः स तदा विश्वकर्मणा उवाच प्रहसन् वाक्यं मयं हैत्यगणाधिपम्। सर्वामरत्वं नैवास्ति असदवृत्तस्य दानव

English

years.... 18 .. 18.. 7.. 8.. 8.. 1.. 86... 25

अध्याय ९३

श्लोक 109

न कुर्याद्दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः अददल्लोभतो मोहात् कुलक्षयम् अवाप्नुते

na kuryāddakṣiṇāhīnaṃ vittaśāṭhyena mānavaḥ adadallobhato mohāt kulakṣayam avāpnute

हिन्दी अर्थ

पितामहवचः श्रुत्वा तहैव दानवो मयः प्राञ्जलिः पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसम्भवम्। यस्तदेकेषुणा दुर्ग सकृन्मुक्तेन निर्दहेत् एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा मयं देवः पितामहः

English

Various Local Dynasties,

अध्याय ९३

श्लोक 110

अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत्

annadānaṃ yathāśaktyā kartavyaṃ bhūtimicchatā annahīnaḥ kṛto yasmād durbhikṣaphalado bhavet

हिन्दी अर्थ

गते पितामहे हैत्या गता मयरविप्रभाः कहा-' बच्चो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुमलोगोंकी जो अभिलाषा , उसे कहो और अपना अभीष्ट वर माँग लो।' वर देनेके लिये उत्सुक पितामहको इस प्रकार कहते हुए

English

(17) H4la (18) Mandnlaka

अध्याय ९३

श्लोक 111

अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः यष्टारं दक्षिणाहीनं नास्ति यज्ञसमो रिपुः

annahīno dahedrāṣṭraṃ mantrahīnastu ṛtvijaḥ yaṣṭāraṃ dakṣiṇāhīnaṃ nāsti yajñasamo ripuḥ

हिन्दी अर्थ

देखकर असुरोंके शिल्पी मयके नेत्र अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे। तब उसने कहा--' देव! प्राचीनकालमें घटित हुए तारकामय संग्राममें देवताओंने हैत्योंको पराजित कर दिया था। उन्होंने अस्त्रोंके प्रहारसे कुछको तो मौतके घाट उतार दिया था और कुछको बुरी तरहसे घायल कर दिया था। उस समय देवताओंके साथ वैर बँध जानेके कारण हमलोग भयसे कम्पित होकर चारों दिशाओंमें भागते फिरे, परंतु हम शरणार्थियोंको यह ज्ञात न हुआ कि हमारे लिये शरणदाता कौन है तथा हमारा कल्याण कैसे होगा। इसलिये मैं अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपकी भक्तिके बलपर एक ऐसे दुर्गका निर्माण करना चाहता हूँ, जिसका पार करना देवताओंके लिये भी कठिन हो। सुकृती

English

(19) Pnrindresona

अध्याय ९३

श्लोक 112

न वाप्यल्पधनः कुर्याल् लक्षहोमं नरः क्वचित् यस्मात्पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः

na vāpyalpadhanaḥ kuryāl lakṣahomaṃ naraḥ kvacit yasmātpīḍākaro nityaṃ yajñe bhavati vigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मेरे द्वारा निर्मित उस त्रिपुरमें पृथ्वी, जल एवं अग्निसे निर्मित तथा सुरक्षित दुर्गाका और मुनियोंके प्रभावसे दिये गये शापों, देवताओंके अस्त्रं और देवोंका प्रवेश न हो सके। प्रजापते! यदि आपको अच्छा लगे तो वह त्रिपुर सभीके लिये अलङ्कनीय हो जाय॥ १२-२० ३॥ तब असुरोंके विश्वकर्मा (महाशिल्पी) मयद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर विश्व-स््रष्टा ब्रह्मा हैत्यगणोंके अधीश्वर मयसे हँसते हुए बोले--'दानव! (तुझ-जैसे)

English

(20) Sanmya (a wrong name with no years).

अध्याय ९३

श्लोक 113

तमेव पूजयेद्भक्त्या द्वौ वा त्रीन्वा यथाविधि एकमप्यर्चयेद्भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान्

tameva pūjayedbhaktyā dvau vā trīnvā yathāvidhi ekamapyarcayedbhaktyā brāhmaṇaṃ vedapāragam dakṣiṇābhiḥ prayatnena na bahūnalpavittavān

हिन्दी अर्थ

असदाचारीके लिये सर्वामरत्वका विधान नहीं है, अतः तुम तृणसे ही अपने दुर्गका निर्माण करो।' उस समय पितामहको ऐसी बात सुनकर मयदानवने हाथ जोड़कर पुनः पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा--“जो एक ही बारके छोड़े गये एक ही बाणसे उस दुर्गको जला दे, वही युद्धस्थलमें हम सबको मार सके, शेष प्राणियासे हमलोग अवध्य हो जायँ।' तदनन्तर मयसे “एवमस्तु--ऐसा ही हो' कहकर भगवान् ब्रह्मा स्वप्रमें प्राप्त हुए धनकी तरह वहीं अन्तर्हित हो गये। पितामहके चले जानेपर सूर्यके समान प्रभावशाली मय आदि दानव भी अपने स्थानको चले गये। वे महाबली

English

(21) Suudara '...

अध्याय ९३

श्लोक 114

लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यथावित्तं भवेद्बहु यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन्कामान्विधानतः

lakṣahomastu kartavyo yathāvittaṃ bhavedbahu yataḥ sarvānavāpnoti kurvankāmānvidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

दानव तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे अत्यन्त शोभित हो स॒ मयस्तु महाबुद्धिर्दानवो वृषसत्तमः॥ २७ रहे थे। कुछ समयके बाद दानवश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् मय-

English

(22) Chakora (28) bivasvAti (24) Gautamiputra

अध्याय ९३

श्लोक 115

पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः यावत्कल्पशतान्यष्टाव् अथ मोक्षमवाप्नुयात्

pūjyate śivaloke ca vasvādityamarudgaṇaiḥ yāvatkalpaśatānyaṣṭāv atha mokṣamavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

दुर्ग व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा। कथं नाम भवेद् दुर्ग तन्मया त्रिपुरं कृतम् यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्। विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु

English

(25) Pa1oni&

अध्याय ९३

श्लोक 116

सकामो यस्त्विमं कुर्याल् लक्षहोमं यथाविधि स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यम् अश्नुते

sakāmo yastvimaṃ kuryāl lakṣahomaṃ yathāvidhi sa taṃ kāmamavāpnoti padamānantyam aśnute

हिन्दी अर्थ

कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्। पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति। आयसं तु क्षितितले राजतं तु नभस्तले

English

[(26) bWkarni (27) bivasri biyaskandha Yajnasri Yijaya ChandaSfi Poloma 11

अध्याय ९३

श्लोक 117

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम्

putrārthī labhate putrān dhanārthī labhate dhanam bhāryārthī śobhanāṃ bhāryāṃ kumārī ca śubhaṃ patim

हिन्दी अर्थ

द्वरै्महामन्दरमेरुकल्यैः प्राकार- सतारकाख्येन मयेन गुप्त को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो

English

5 years.

अध्याय ९३

श्लोक 118

भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति

bhraṣṭarājyastathā rājyaṃ śrīkāmaḥ śriyamāpnuyāt yaṃ yaṃ prārthayate kāmaṃ sa vai bhavati puṣkalaḥ niṣkāmaḥ kurute yastu sa paraṃ brahma gacchati

हिन्दी अर्थ

दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा । मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिए। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या

English

months. 28 yc»n.

अध्याय ९३

श्लोक 119

अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च

asmācchataguṇaḥ proktaḥ koṭihomaḥ svayambhuvā āhutībhiḥ prayatnena dakṣiṇābhiḥ phalena ca

हिन्दी अर्थ

शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥२१--३ ७ ॥ इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे

English

(dou11)tful).]

अध्याय ९३

श्लोक 120

पूर्ववद्ग्रहदेवानाम् आवाहनविसर्जने होममन्त्रास्त एवोक्ताः खाने दाने तथैव च कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषो ऽयं निबोध मे

pūrvavadgrahadevānām āvāhanavisarjane homamantrāsta evoktāḥ khāne dāne tathaiva ca kuṇḍamaṇḍapavedīnāṃ viśeṣo 'yaṃ nibodha me

हिन्दी अर्थ

विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्प होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रो, चक्र, त्रिशूल, उपल और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर

English

On the kingdom of the Andhras coming to an end, there will be kings in the lineage of their servants who would be called Sr!p4rvaUya Andhras. — 17. There will be 7 (kings in the line of the servants of) Andhras, 10 Abhtra kings, also 7 Gardabhilas and 18 Akas. — 18.

अध्याय ९३

श्लोक 121

कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस् त्रिमेखलम्

koṭihome caturhastaṃ caturasraṃ tu sarvataḥ yonivaktradvayopetaṃ tadapyāhus trimekhalam

हिन्दी अर्थ

दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६ सकेगा॥३१--३६॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

There will be 8 Yavana kings, and 14 Tunitlra kings and 13 Garup(|a kings and 19 (or 11 Mauna) Huna kings.— 19.

अध्याय ९३

श्लोक 122

द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता

dvyaṅgulābhyucchritā kāryā prathamā mekhalā budhaiḥ tryaṅgulābhyucchritā tadvad dvitīyā parikīrtitā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ४५८ मत्स्यपुराण

English

The 8 Yavana kings will reign for 87 years. The 7 Gardhabhilas will enjoy this earth again (no. years given. 72 according to Vayu.) — 20 The earth is recorded to have belonged to the TuQ&ras for 7000 yers. And 18 kings for 183;.yoar8 as well [printed text corrupt. Ought tolbe " Eighteen fiakas for 183 years."]— 21.

अध्याय ९३

श्लोक 123

उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते

ucchrāyavistarābhyāṃ ca tṛtīyā caturaṅgulā dvyaṅgulaśceti vistāraḥ pūrvayoreva śasyate

हिन्दी अर्थ

दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना इति चिन्तायुतो हैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्। चकार त्रिपुरं दुर्ग मनःसंचारचारितम्॥ प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्। कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्। तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।

English

iiATSVA WBA1A, CEAPTEn m.

अध्याय ९३

श्लोक 124

वितस्तिमात्रा योनिः स्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता

vitastimātrā yoniḥ syāt ṣaṭsaptāṅgulavistṛtā kūrmapṛṣṭhonnatā madhye pārśvayoścāṅgulocchritā

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं--ऋषियो! इस प्रकार सोच- विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिए, यहाँ दोनों ओर

English

For half low hondred years there will reign the 13 Ooradas of Mlechohha along with lddra kings. (Or, the 13 future Garavdas abng with low caste men, all of MlflohchTia origin, will enjoy it half four hundred years, i,e., 200 years. — 22.

अध्याय ९३

श्लोक 125

गजौष्ठसदृशी तद्वद् आयता छिद्रसंयुता एतत्सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते

gajauṣṭhasadṛśī tadvad āyatā chidrasaṃyutā etatsarveṣu kuṇḍeṣu yonilakṣaṇamucyate

हिन्दी अर्थ

पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिए, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्त:पुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट- वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान्

English

For 103 years the 11 kings will enjoy the earth (no name). (The word Hfina should be supplied to complete the verse, and it would then mean "the 11 Hfinas will enjoy the earth for 103 years"). The (seven) ripkrvatiya Andhras will endure 52 years. — 23.

अध्याय ९३

श्लोक 126

मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम् वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्

mekhalopari sarvatra aśvatthadalasaṃnibham vedī ca koṭihome syād vitastīnāṃ catuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल

English

The 10 Abhira kings will be for 67 years. When they are over* thrown by time, then there will be Kilakila kings. — 24. tabular form

अध्याय ९३

श्लोक 127

चतुरस्रा समन्ताच्च त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः

caturasrā samantācca tribhirvapraistu saṃyutā vaprapramāṇaṃ pūrvoktaṃ vedīnāṃ ca tathocchrayaḥ

हिन्दी अर्थ

विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १० पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्। पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा कृतवांस्त्रपुरं हैत्यस्त्रनेत्रः पुष्पकं यथा।

English

Dynasties Periods of Reign, No, of Kings

अध्याय ९३

श्लोक 128

तथा षोडशहस्तः स्यान् मण्डपश्च चतुर्मुखः पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्

tathā ṣoḍaśahastaḥ syān maṇḍapaśca caturmukhaḥ pūrvadvāre ca saṃsthāpya bahvṛcaṃ vedapāragam

हिन्दी अर्थ

रल्लाितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्। प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च। सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च

English

(1) Andhra-Bhfityas (8ri-pftryati- 52 years or twice 50 or 100 years... 7 (2) Abhiras

अध्याय ९३

श्लोक 129

यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम् अथर्ववेदिनं तद्वद् उत्तरे स्थापयेद्बुधः

yajurvidaṃ tathā yāmye paścime sāmavedinam atharvavedinaṃ tadvad uttare sthāpayedbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च। चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च बहुध्वजपताकानि ्त्रग्दामालङ्कतानि च यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकफलशानि च। गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च

English

... 67 years...

अध्याय ९३

श्लोक 130

अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः एवं द्वादश विप्राः स्युर् वस्त्रमाल्यानुलेपनैः पूर्ववत्पूजयेद्भक्त्या वस्त्राभरणभूषणैः

aṣṭau tu homakāḥ kāryā vedavedāṅgavedinaḥ evaṃ dvādaśa viprāḥ syur vastramālyānulepanaiḥ pūrvavatpūjayedbhaktyā vastrābharaṇabhūṣaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः । पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव हैमराजतलौहाद्यमणिरल्राञ्जनाङ्किताः । प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभा:

English

(8) Gardabhilas ... 72 years (as in YAyu)

अध्याय ९३

श्लोक 131

रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम् पूर्वतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः

rātrisūktaṃ ca raudraṃ ca pāvamānaṃ sumaṅgalam pūrvato bahvṛcaḥ śāntiṃ paṭhannāste hyudaṅmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्पकको रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले

English

(4) SAkas

अध्याय ९३

श्लोक 132

शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च पाठयेद्दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्

śāktaṃ śākraṃ ca saumyaṃ ca kauṣmāṇḍaṃ śāntimeva ca pāṭhayeddakṣiṇadvāri yajurvedinamuttamam

हिन्दी अर्थ

थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूजती रहती थीं। उनमें बड़ी- क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द

English

years... (5) Yavanas

अध्याय ९३

श्लोक 133

सुपर्णमथ वैराजम् आग्नेयं रुद्रसंहिताम् ज्येष्ठमास तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्

suparṇamatha vairājam āgneyaṃ rudrasaṃhitām jyeṣṭhamāsa tathā śāntiṃ chandogaḥ paścime japet

हिन्दी अर्थ

हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थांसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्चल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं

English

... 87 years......

अध्याय ९३

श्लोक 134

शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम् पौष्टिकं च महाराज्यम् उत्तरेणाप्यथर्ववित्

śāntisūktaṃ ca sauraṃ ca tathā śākunakaṃ śubham pauṣṭikaṃ ca mahārājyam uttareṇāpyatharvavit

हिन्दी अर्थ

वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्र और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए

English

(6) TuAras ... 7000 years (107?)

अध्याय ९३

श्लोक 135

पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्यो ऽत्र पूर्ववत् स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस् त एव मुनिसत्तम

pañcabhiḥ saptabhirvāpi homaḥ kāryo 'tra pūrvavat snāne dāne ca mantrāḥ syus ta eva munisattama

हिन्दी अर्थ

एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम् । सपताकाध्वजवतां दृश्यन्ते गिरिश्ृङ्गवत् नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत्पुराण्यपि। स्वर्गा्तिरिक्तश्रीकाणि तत्र कन्यापुराणि च पुष्पोत्करेश्च सुभगास््त्रपुरस्योपनिर्गमाः।

English

(7) Gurundas

अध्याय ९३

श्लोक 136

वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत् सर्वान्कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्

vasordhārāvidhānaṃ ca lakṣahome viśiṣyate anena vidhinā yastu koṭihomaṃ samācaret sarvānkāmānavāpnoti tato viṣṇupadaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा। दितेः सुता हैवतराजवैरिणः जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसंनिभ्चैः ।

English

years...... (8) HAnas

अध्याय ९३

श्लोक 137

यः पठेच्छृणुयाद्वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति

yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi grahayajñatrayaṃ naraḥ sarvapāpaviśuddhātmā padamindrasya gacchati

हिन्दी अर्थ

थे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो पर्वतोंकी चहारदीवारी हो। उस एक-एक पुरमें सैकड़ों गोपुर बने थे, जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे पर्वत-शिखरके समान दीख रहे थे। उस त्रिपुरमें नूपुरोंकी झनकार होती थी, जिससे वे अत्यन्त रमणीय लग रहे थे। उन पुरोंका सौन्दर्य स्वर्गसे भी बढ़कर था। उनमें कन्यापुर भी बने हुए थे। वे बगीचों, विहारस्थलों, तड़ागों, वटवृक्षके नीचे बने चबूतरों, सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनोंसे सम्पन्न थे। वे दिव्य भोगकी सामग्रियों और नाना प्रकारके रल्रोंसे परिपूर्ण थे। उस त्रिपुरके बाहर निकलनेवाले मार्गोपर पुष्प बिखेरे गये थे, जिससे वे बड़े सुन्दर लग रहे थे। उनमें मायाको निवारण करनेवाले उपकरणोंद्वारा सैकड़ों

English

... 108 years...

अध्याय ९३

श्लोक 138

अश्वमेधसहस्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित् कृत्वा यत्फलमाप्नोति कौटिहोमात् तदश्नुते

aśvamedhasahasrāṇi daśa cāṣṭau ca dharmavit kṛtvā yatphalamāpnoti kauṭihomāt tadaśnute

हिन्दी अर्थ

गहरी खाइयाँ बनायी गयी थीं। अद्भुत पराक्रमयुक्त कर्म करनेवाले मयके द्वारा निर्मित उस उत्तम दुर्गकी रचनाका वृत्तान्त सुनकर देवराज इन्द्रके शत्रु अनन्त पराक्रमी हजारों हैत्य वहाँ आ पहुँचे। उस समय वह त्रिपुर गर्वीले शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले, जनताके लिये कष्टदायक तथा पर्वतीय गजेन्द्रोंके समान विशालकाय असुराँसे उसी प्रकार खचाखच भर गया, जैसे अधिक जलवाले

English

or 19 (9) Kilakilas

अध्याय ९३

श्लोक 139

ब्रह्महत्यासहस्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्

brahmahatyāsahasrāṇi bhrūṇahatyārbudāni ca koṭihomena naśyanti yathāvacchivabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

यथाम्बरं भूरिजलैर्जलप्रहैः॥ २८ बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है॥२१--२८॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

marizes the nnmber of kings in each dynasty, and the second states its duration, while the third adds certain subsequent kings. In the first part, the Matsya, Yfiyu, and Brahmftndaagreegenerally, but in the second, the Matsya has one version and the two others another. Here the dynastic matter in the Matsya ends.

अध्याय ९३

श्लोक 140

वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम् नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्

vaśyakarmābhicārādi tathaivoccāṭanādikam navagrahamakhaṃ kṛtvā tataḥ kāmyaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

त्रिपुरमें हैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्र-दर्शन और हैत्योंका अत्याचार सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! इस प्रकार असुरशिल्पी मयने त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया, परंतु अन्ततोगत्वा

English

« These local dynasties are all classed together as more or less contemporaneous; The nnmber of years assigned to them must be considered according to the remarks in Introduction Sec. 42 ff., and with reference to the middle of the 8rd century A.D. When the account was first compiled as preserved in the Mt, for the revised versions tn YA and Bd did not revise the periods. If those remarks be sound, the bVipArvatiya Andhrabhfityas had at that time reigned * years, or (if we read dvipanchasatam) possibly too roundly, according to Mt, while the Ya. and Bd reading is no doubt corrupt and should perhaps be 112 or 102 years. The Abhiras had then reigned 67 years, the Gardabhilas 72 years, the Sakas 188 years, the Yavanas 87 or 82 years, and the TufAras 7,000 or 500 according to the proper construction of the sentences but perhaps 107 or 105 Is really meant. The 18 Gurundas or Murundas had then reigned half of the quadruple of 100 years, that is 200, according to Mt, or 350 according to YA and Bd, but the latter is probably a corruption of the former reading, for Y9 and Bh say precisely 199 years. The 11 Hfinas or Mauuas had then lasted 108 years. ** Mention of thoso races is found in the inscriptions, thus Abhiras in Lndors' List of BrAhm! Inscriptions, Nos. 963, 1187 (Epig. Ind. 3 Appondi) and Fleet's Gupta InscriptioiB,. P* 14, b'akas, Lnder's list, Nos. 1128, 1185, 1187, 1148, 1149, il62, and perhaps 1001-2, and

अध्याय ९३

श्लोक 141

अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित् तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्

anyathā phaladaṃ puṃsāṃ na kāmyaṃ jāyate kvacit tasmādayutahomasya vidhānaṃ pūrvamācaret

हिन्दी अर्थ

तद् दुर्ग दुर्गतां प्राप बद्धवैरैः सुरासुरैः ॥ १ परस्पर बँधे हुए वैरवाले देवताओं और असुरोंके लिये सकलत्राः सपुत्राश्च शस्त्रवन्तोऽन्तकोपमाः। वह दुर्ग दुर्गम हो गया। उस समय वे सभी शस्त्रधारी हैत्य जो यमराजके समान भयंकर थे, मयके आदेशसे

English

xxtfin Appmntx tit.

अध्याय ९३

श्लोक 142

वृत्तं वोच्चाटने कुण्डं तथा च वश्यकर्मणि त्रिमेखलं चैकवक्त्रम् अरत्निर्विस्तरेण तु

vṛttaṃ voccāṭane kuṇḍaṃ tathā ca vaśyakarmaṇi trimekhalaṃ caikavaktram aratnirvistareṇa tu

हिन्दी अर्थ

मयादिष्टानि विविशुर्गृहाणि हृषिताश्व ते॥ २ अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ हर्षपूर्वक उन गृहोंमे सिंहा वनमिवानेके मकरा इव सागरम्। रोषैश्चैवातिपारुष्यैः शरीरमिव संहतैः

English

VaTp.l4,TaTtiMa.£nder'«lis(, Nw. ««9, MS, lOM, ItSS, 1140, llH 1160, Hnnuiduin VGI, and lInrandadeTi,|ld., pp. ISO, ISO, IM Bunas. BQl. p , 148, SOO, A Vakataka, prince Vindhyasakti is mentioned in Kielliorn's Inscriptions of Norfetiem India, No. OSS (lIg: Ind. V, Appendix)." (PaiglWs Erii Dynasty ) THE EVILS OF KALI AGE.

अध्याय ९३

श्लोक 143

पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः

palāśasamidhaḥ śastā madhugorocanānvitāḥ candanāguruṇā tadvat kuṅkumenābhiṣiñcitāḥ

हिन्दी अर्थ

तद्द् बलिभिरध्यस्तं तत्पुरं देवतारिभिः। त्रिपुरं संकुलं जातं हैत्यकोटिशताकुलम् यो यं प्रार्थयते कामं सम्प्राप्स्त्रिपुराश्रयात्। तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति सः प्रियाभिः प्रियकामाभिर्हावभावप्रसूतिभि: । नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः

English

There will be Yavanas here for the sake of religious feeling rpilgrim' age or propaganda) or pleasure or profit. The Aryas and the Mlecbchhas (will dwell) mixed up in all provinces (janapadas).— 25.

अध्याय ९३

श्लोक 144

होमयेन्मधुसर्पिर्भ्यां बिल्वानि कमलानि च सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा

homayenmadhusarpirbhyāṃ bilvāni kamalāni ca sahasrāṇi daśaivoktaṃ sarvadaiva svayambhuvā

हिन्दी अर्थ

अर्थे धर्मे च कामे च निदधुस्ते मतीः स्वयम् ब्रजति स्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा

English

The people will steadily deteriorate by adopting a contrary course of life, so also the kings will be greedy and speakers of untruth. — 26. All will be overpowered (killed) everywhere by Kalki whether they be Aryas or Mlecbchhas. They will be irreligious, avaricious, and hereti- cal and cruel hypocrites everywhere. — 27.

अध्याय ९३

श्लोक 145

वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित् सुमित्रिया न आप ओषधय इति होमयेत्

vaśyakarmaṇi bilvānāṃ padmānāṃ caiva dharmavit sumitriyā na āpa oṣadhaya iti homayet

हिन्दी अर्थ

नाधर्मस्त्रिपुरस्थानां बाधते वीर्यवानपि। अर्चयन्तो दितेः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम् हासश्च वरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः। प्रविष्ट हुए। जैसे अनेकों सिंह वनको, अनेकों मगरमच्छ सागरको और क्रोध एवं अत्यन्त कठोरता परस्पर सम्मिलित होकर शरीरको अपने अधिकारमें कर लेते हैं, वैसे ही उन महाबली देव-शत्रुओंद्वारा वह पुर व्याप्त

English

When the royal family will be destroyed, and the close of the Kali Age will come and righteousness will perish, there will remain few good people not given to coveteousness. — 28.

अध्याय ९३

श्लोक 146

न चात्र स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम् स्नानं सर्वौषधैः कृत्वा शुक्लपुष्पाम्बरो गृही

na cātra sthāpanaṃ kāryaṃ na ca kumbhābhiṣecanam snānaṃ sarvauṣadhaiḥ kṛtvā śuklapuṣpāmbaro gṛhī

हिन्दी अर्थ

हो गया। इस प्रकार वह त्रिपुर असंख्य (अरबों) हैत्योंसे भर गया। उस समय सुतल और पाताल (दानवोंके निवासस्थान) -से निकलकर आये हुए दानव तथा (देवताओंकि भयसे छिपकर) पर्वतोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले हैत्य भी, जो काले बादलकी-सी कान्तिवाले थे, (शरणार्थीके रूपमें) वहाँ उपस्थित हुए। त्रिपुरमें आश्रय लेनेके कारण जो असुर जिस वस्तुकी कामना करता था, उसकी उस कामनाको मयदानव मायाद्वारा पूर्ण कर देता था। जिनके

English

The people will be unholy, unrighteous and oppressed with disease ' and sorrow; and goaded by failure of rain they will be eager to destroy each other. — 29. Unprotected by anyone, always living in terror, surroimded by deep difficulties, the entire population will begin to live on (the top of) mountains and on the banks of rivers. — 30.

अध्याय ९३

श्लोक 147

कण्ठसूत्रैः सकनकैर् विप्रान् समभिपूजयेत् सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्ला गावः सकाञ्चनाः

kaṇṭhasūtraiḥ sakanakair viprān samabhipūjayet sūkṣmavastrāṇi deyāni śuklā gāvaḥ sakāñcanāḥ

हिन्दी अर्थ

सुडौल शरीरपर चन्दनका अनुलेप लगा था, जो निर्मल आभूषण, वस्त्र, माला और अङ्गरागसे अलंकृत थे तथा मतवाले गजेन्द्रसरीखे दीख रहे थे, ऐसे दानव चाँदनी रातोंमें एवं सायंकालके समय कमलसे सुशोभित सरोवरोंके तटपर, आमके बगीचों और तपोवनोंमें अपनी पल्लियोंके साथ निरन्तर हर्षपूर्वक विहार करते थे इस प्रकार मयद्वारा निर्मित उस स्थानपर निवास करते हुए वे महासुर आनन्दका उपभोग कर रहे थे। उन्होंने स्वयं ही धर्म, अर्थ और कामके सम्पादनमें अपनी बुद्धि लगायी। त्रिपुरमें निवास करनेवाले उन

English

When the royal families will be destroyed, the people, will desert their homes; and devoid of affection they will abandon their brothers and fi'iends, and will have no one to protect them.— 31.

अध्याय ९३

श्लोक 148

अवश्यानि वशी कुर्यात् सर्वशत्रुबलान्यपि अमित्राण्यपि मित्राणि होमो ऽयं पापनाशनः

avaśyāni vaśī kuryāt sarvaśatrubalānyapi amitrāṇyapi mitrāṇi homo 'yaṃ pāpanāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

देव-शत्रुओंका समय ऐसा सुखमय व्यतीत हो रहा था, जैसे स्वर्गवासियोंका व्यतीत होता है। वहाँ पुत्र पितृगणोंकी तथा पल्लियाँ पतियोंकी सेवा करती थीं। वे परस्पर कलह नहीं करते थे। उनमें परम प्रेम था। किसी प्रकारका अधर्म प्रबल होनेपर भी त्रिपुर- निवासियोंको बाधा नहीं पहुँचाता था। वे हैत्य शिव- मन्दिरमें शङ्करजीकी अर्चना करते हुए वेदोक्त माङ्गलिक शब्दों एवं आशीर्वादोंका उच्चारण करते थे । त्रिपुरमें

English

They will not observe the rules of caste and order of life, and be addicted to unrighteousness. They will subsist on fruits, roots and leaves of trees, and will be clothed in tattered garments, barks and skins, and thus they will wander over the earth in search of livelihood. — 32. Thus the people having suffered (innumerable) miseries during the close of the Kali Age will become totally extinct, along with the extinction of the Kali Age. — 33.

अध्याय ९३

श्लोक 149

विद्वेषणे ऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते द्विमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रं च सर्वशः

vidveṣaṇe 'bhicāre ca trikoṇaṃ kuṇḍamiṣyate dvimekhalaṃ koṇamukhaṃ hastamātraṃ ca sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

आनन्द मनानेवाले दानवेनद्रोंके अपने नूपुरकी झनकारसे मिश्रित वेणु एवं वीणाके शब्द तथा सुन्दरी नारियोंके त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥ १५ चित्तको व्याकुल कर देनेवाले हास सदा सुनायी पड़ते थे। तेषामर्चयतां देवान् ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्। धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत

English

When the Kali Age will be exhausted, after having been on earth fdr full 1000 divine years together with the Sandhi periods, then on its end, the Kfita Age will come.— 34.

अध्याय ९३

श्लोक 150

होमं कुर्युस्ततो विप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः

homaṃ kuryustato viprā raktamālyānulepanāḥ nivītalohitoṣṇīṣā lohitāmbaradhāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

संध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरं च भयावहाः। स्वप्रे भयावहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान्

English

Chronological Particulars. Thus have I declared in due order the entire series of genealogy —

अध्याय ९३

श्लोक 151

नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिरशिवं रिपौ

navavāyasaraktāḍhyapātratrayasamanvitāḥ samidho vāmahastena śyenāsthibalasaṃyutāḥ hotavyā muktakeśaistu dhyāyadbhiraśivaṃ ripau

हिन्दी अर्थ

उदिते च सहस्त्रांशौ शुभभासाकरे रबौ। मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः आसीनाः काञ्जनगिरेः शृङ्गे तोयमुचो यथा पार्श्चयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्माली च दानवः। उपविष्टौ मयस्यान्ते हस्तिनः कलभाविव

English

UATSYA PURINA, CSAPTBR m.

अध्याय ९३

श्लोक 152

दुर्मित्रियास् तस्मै सन्तु तथा हुंफडितीति च श्येनाभिचारमन्त्रेण क्षुरं समभिमन्त्र्य च

durmitriyās tasmai santu tathā huṃphaḍitīti ca śyenābhicāramantreṇa kṣuraṃ samabhimantrya ca

हिन्दी अर्थ

ततः सुरारयः सर्वेऽशेषकोपा रणाजिरे। उपविष्टा दृढं विद्धा दानवा देवशत्रवः निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः

English

the kings who have passed away» and those who exist now and those who have not yet come to existence. — 36. Now from MahSptidma's inaogimtioii up till the birth of Parikfit, this interral is indeed known as 1060 years (1016 according to and 1600 according to our

अध्याय ९३

श्लोक 153

प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षुरेण परिकर्तयेत् रिपुरूपस्य शकलान् यथैवाग्नौ विनिष्क्षिपेत्

pratirūpaṃ ripoḥ kṛtvā kṣureṇa parikartayet ripurūpasya śakalān yathaivāgnau viniṣkṣipet

हिन्दी अर्थ

चतस्त्रः प्रमदास्तत्र त्रयो मर्त्या भयावहाः। 'कोपानलादीपतमुखाः प्रविष्टास्त्रपुरार्दिनः इस प्रकार देवताओंकी अर्चना और ब्राह्मणोंको नमस्कार करनेवाले तथा धर्म, अर्थ एवं कामके साधक उन हैत्योंका महान् समय व्यतीत होता गया। तदनन्तर अलक्ष्मी (दरिद्रता), असूया (गुणोंमें दोष निकालना), साथ मिलकर त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। इन भयदायक दुर्गुणोंने सायंकाल त्रिपुरमें प्रवेश किया था। इन्होंने राक्षसोंपर ऐसा अधिकार जनाया, जैसे भयंकर व्याधियाँ शरीरोंको काबूमें कर लेती हैं। त्रिपुरके भीतर प्रवेश

English

wading.)— 86.

अध्याय ९३

श्लोक 154

ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन्पुनः विद्वेषणं तथा कुर्वन् नेतदेव समाचरेत्

grahayajñavidhānānte sadaivābhicaranpunaḥ vidveṣaṇaṃ tathā kurvan netadeva samācaret

हिन्दी अर्थ

करते हुए इन दुर्गुणोंको मयने स्वप्रमें दानवोंके शरीरमें भयानक रूपसे प्रविष्ट होते हुए देख लिया। तब सहस्र किरणधारी एवं उज्चल प्रकाश करनेवाले सूर्यके उदय होनेपर मयने (तारक और विद्युन्मालीके साथ) दो सूर्योसे युक्त बादलकी तरह सभाभवनमें प्रवेश किया। वहाँ वे मेरुगिरिके शिखरके समान सुन्दर स्वर्णमण्डित रमणीय आसनपर आसीन हो गये। उस समय वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सुमेरुगिरिके शिखरपर बादल

English

fiimilarly in Mss. 1, n of Matsya and V, 1, of Vinu the reading is Pancharsat-ottaram, meaning 1600. This period of 1600 is the true interval obtained by adding up the periods of reigns of the BArhadrathas, Pradyotas and SisunSgas as given in the Yif pn Pnrd na and other PurSnas. Thus Bflrhadrathas from Somipi to RIpuSjaya......... 1000 years.

अध्याय ९३

श्लोक 155

इहैव फलदं पुंसाम् एतन्नामुत्र शोभनम् तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्तव्यं भूतिमिच्छता

ihaiva phaladaṃ puṃsām etannāmutra śobhanam tasmācchāntikamevātra kartavyaṃ bhūtimicchatā

हिन्दी अर्थ

उमड़ आये हों। मयदानवके निकट एक ओर तारकासुर और दूसरी ओर दानवश्रेष्ठ विद्युन्माली बैठे हुए थे, जो हाथीके बच्चेको तरह दीख रहे थे तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होनेके कारण जिनके क्रोध शेष रह गये थे, वे सभी देवशत्रु दानव वहाँ आकर यथास्थान बैठ गये। इस प्रकार उन सबके सुखपूर्वक आसनपर बैठ जानेके पश्चात् मायाके उत्पादक मयने उन दानवोंसे इस प्रकार कहा--' अरे दाक्षायणीके पुत्रो! तुमलोग आकाशमें विचरण करनेवाले तथा आकाशचारियोंमें विशेषरूपसे गर्जना करनेवाले हो। मैंने यह एक भयानक स्वप्र देखा है, उसे तुमलोग ध्यानपूर्वक

English

Pradyotas.................. 188,,

अध्याय ९३

श्लोक 156

ग्रहयज्ञत्रयं कुर्याद् यस् त्वकाम्येन मानवः स विष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्

grahayajñatrayaṃ kuryād yas tvakāmyena mānavaḥ sa viṣṇoḥ padamāpnoti punarāvṛttidurlabham

हिन्दी अर्थ

सुनो। मैंने स्वप्रमें चार स्त्रियों और तीन पुरुषोंको पुरमें प्रवेश करते हुए देखा है। उनके रूप भयानक थे तथा दक्षकी कन्या दनुको ही यहाँ दाक्षायणी कहा गया है। सभी दानव कश्यपजीके द्वारा उत्पन्न इन्हीं दनुके पुत्र थे। हैत्यगण

English

b'isunigas.................. 862 Therefore the Mss. of the Matsya referred to by Mr. Pargiter are more correct tan the printed text. This verse, therefore, should read

अध्याय ९३

श्लोक 157

य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि मानवः न तस्य ग्रहपीडा स्यान् न च बन्धुजनक्षयः

ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ śrāvayedvāpi mānavaḥ na tasya grahapīḍā syān na ca bandhujanakṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

दितिके पुत्र थे। प्रविश्य रुषितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमा: । प्रविष्टाः स्म शरीराणि भूत्वा बहुशरीरिणः ईदूशी प्रमदा दृष्टा मया चातिभयावहा

English

vmsm i mi TOggr g h

अध्याय ९३

श्लोक 158

ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं यत्र तिष्ठति न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्

grahayajñatrayaṃ gehe likhitaṃ yatra tiṣṭhati na pīḍā tatra bālānāṃ na rogo na ca bandhanam

हिन्दी अर्थ

यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्थ चेद्द्रितम्। निबोधध्वं सुमनसो न चासूयितुमहथ कामं चेर्ष्या च कोपं च असूयां संविहाय च। सत्ये दमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत

English

This is the reading we prefer to adopt as being in harmony with the text of Tifpu PurApa. Mah&padma Nanda was anointed in 422 B.C. Therefore, Parik$it was born in 1922 B.O. which was the year of the Great War. Now from Mahfipadma'a inauguration to Pariksit's birth, this interval is indeed known as 1500 years. — 36.

अध्याय ९३

श्लोक 159

अशेषयज्ञफलदं निःशेषाघविनाशनम् कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

aśeṣayajñaphaladaṃ niḥśeṣāghavināśanam koṭihomaṃ viduḥ prājñā bhuktimuktiphalapradam

हिन्दी अर्थ

कुप्यते नो ध्रुवं रुद्रो देवदेवस्त्रिलोचनः। भविष्याणि च दृश्यन्ते यतो नस्त्रिपुरेऽसुराः स्वप्रोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च मुख क्रोधाग्निसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे ऐसा लगता था मानो वे त्रिपुरके विनाशक हैं । वे अतुल पराक्रमशाली प्राणी क्रोधसे भरे हुए थे और पुरोंमें प्रवेश करके अनेकों शरीर धारणकर दानवोंके शरीरोंमें भी घुस गये हैं। यह

English

Moreover in the interval which elapsed from the last Andhra Xing Pulomfivi to Mahftpadma— that interval was 836 years. — 37.

अध्याय ९३

श्लोक 160

अश्वमेधफलं प्राहुर् लक्षहोमं सुरोत्तमाः द्वादशाहमखस् तद्वन् नवग्रहमखः स्मृतः

aśvamedhaphalaṃ prāhur lakṣahomaṃ surottamāḥ dvādaśāhamakhas tadvan navagrahamakhaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिपुर नगर अन्धकारसे आच्छन्न हो गया है और गृह तथा तुमलोगोंके साथ ही सागरके जलमें डूब गया है। एक सुन्दरी स्त्री नंगी होकर उलूकपर सवार थी तथा उसके साथ एक पुरुष था, जिसके ललाटमें लाल तिलक लगा था। उसके चार पैर और तीन नेत्र थे। वह गधेपर चढ़ा हुआ था। उसने उस स्त्रीको प्रेरित किया, तब उसने मुझे नींदसे जगा दिया। इस प्रकारको अत्यन्त भयावनी नारीको मैंने स्वप्रमें देखा है। दितिपुत्रो! मैंने इस

English

te Cyde of 2700 years or Sajrfi or Laukika Bra. The same future interval of time, beginning from Parikeit till the end of the Andhras, is thus expressed in the Bhavisya (Pnrflnal regards ing those (kings) enumerated by the jrutaris who know the ancient stories (in these terms). — 38.

अध्याय ९३

श्लोक 161

इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः परिपठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गाद् अभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः

iti kathitamidānīmutsavānandahetoḥ sakalakaluṣahārī devayajñābhiṣekaḥ paripaṭhati ya itthaṃ yaḥ śṛṇoti prasaṅgād abhibhavati sa śatrūnāyurārogyayuktaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकारका स्वप्र देखा है और यह भी देखा है कि यह स्वप्र असुरोंके लिये किस प्रकार कष्टदायक होगा। इसलिये यदि तुमलोग हमें अपना उचितरूपसे राजा मानते हो और यह समझते हो कि इनका कथन हितकारक होगा तो मन लगाकर मेरी बात सुनो। तुमलोग किसीकी असूया (झूठी निन्दा) मत करो। काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुर्गुणोंको एकदम छोड़कर सत्य, दम, धर्म और मुनिमार्गका आश्रय लो। शान्तिदायक अनुष्ठानोंका प्रयोग करो और महेश्वरकी पूजा करो। सम्भवतः ऐसा करनेसे स्वप्रकी शान्ति हो जाय। असुरो! (ऐसा प्रतीत हो रहा है कि) त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव भगवान् रुद्र निश्चय ही हमलोगोंपर कुपित हो गये हैं; क्योंकि हमारे

English

" When again (there will be end) of 27 future Andhras, (the Great Bear) will be in a line with the towering brilliant Agni (the presiding deitj of EfittikS asterism).'' — 39.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 93
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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