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प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक ३/८38%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

yatra yatra bhavet tṛṣṇā saṃsāraṃ viddhi tatra vai | prauḍhavairāgyam āśritya vītatṛṣṇaḥ sukhī bhava || 3 ||

सरल उच्चारण: yatra yatra bhavet trishnaa samsaaram viddhi tatra vai praudhavairaagyam aashritya veetatrishnah sukhee bhava (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

यत्र, यत्र, भवेत्, तृष्णा, संसारम्, विद्धि, तत्र, वै, प्रौढवैराग्यम्, आश्रित्य, वीततृष्णः, सुखी, भव

यत्र यत्र भवेत् तृष्णा
जिस-जिस विषय में तृष्णा हो
संसारम् विद्धि तत्र वै
वहीं संसार जान
प्रौढवैराग्यम्
परिपक्व, असाधारण वैराग्य
आश्रित्य
आश्रय लेकर
वीततृष्णः
तृष्णा से रहित
सुखी भव
सुखी हो

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जहाँ-जहाँ तृष्णा हो, वहीं संसार जान। परिपक्व वैराग्य का आश्रय लेकर, तृष्णा-रहित होकर, सुखी हो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार अष्टावक्र कहते हैं कि जिस-जिस प्रसिद्ध विषय में मन की तृष्णा उत्पन्न होती है, उसी-उसी विषय को तुम संसार का हेतु जानो, क्योंकि विषयों की तृष्णा ही कर्म द्वारा संसार का कारण है। टीका योगवासिष्ठ का एक श्लोक-भाव देती है कि मनोरथ-रूपी रथ पर, जिसके आगे इन्द्रिय-रूपी घोड़े जुते हैं, सारा जगत् आरूढ़ है और तृष्णा-रूपी सारथि उसे भ्रमा रहा है। एक और भाव में कहा गया है कि जैसे गाय के दोनों सींग गाय के शरीर के साथ बराबर बढ़ते हैं, वैसे तृष्णा भी चित्त के साथ बढ़ती है। इसलिए प्राप्त पदार्थ के अधिक पाने की और अप्राप्त की इच्छा से रहित होकर आत्मा में निष्ठा करने से जीव सुखी होता है।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक एक सरल कसौटी देता है: जहाँ तृष्णा है, वहीं बंधन है। संसार कोई बाहरी जगह नहीं, उन-उन चीज़ों से बनता है जिन पर मन की प्यास अटकी है।

पुस्तक रथ की उपमा देती है: इच्छा रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और तृष्णा सारथि है, जो रथ को लगातार दौड़ाता रहता है। और तृष्णा चित्त के साथ-साथ बढ़ती भी है, इसलिए उसे केवल भोग से शांत नहीं किया जा सकता।

‘प्रौढ़ वैराग्य’ का अर्थ यहाँ परिपक्व, विचार-जनित वैराग्य है, जो बलपूर्वक दबाने या छोड़ देने से अलग है। इसका अर्थ कर्तव्य या देखभाल से मुँह मोड़ना नहीं है; केवल उस प्यास से अलग होना है जो हमें चलाती है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि जहाँ तृष्णा है वहीं संसार है; परिपक्व वैराग्य से तृष्णा-रहित होकर सुखी हो। 2. यह संसार को केवल बाहर की वस्तुओं में खोजने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह तृष्णा, संसार और सुख के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का तीसरा श्लोक है, जो तृष्णा को संसार की कसौटी बनाता है। 5. 10.1 की कामना की बात का यह सरल निचोड़ है। 6. यह परम दृष्टि और आत्म-निरीक्षण की कसौटी दोनों है। 7. इसे अपनी या दूसरों की चाह को दोष ठहराने का आधार न बनाएँ।

उदाहरण से समझें: जैसे प्यास लगने पर पहाड़ का झरना पीने से शांति मिलती है पर खारे पानी से और प्यास बढ़ती है, वैसे तृष्णा का हर पूरा होना अगली प्यास पैदा करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति देखता है कि नया फ़ोन पाने की इच्छा पूरी होते ही अगले मॉडल की इच्छा जग जाती है। वह खरीदने से पहले ‘क्या सचमुच ज़रूरत है?’ पूछना सीखता है और जो ज़रूरी है उसे बिना अपराध-बोध के खरीदता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: ज़रूरत और तृष्णा में फ़र्क करना सीखिए; ज़रूरत पूरी कीजिए, तृष्णा को देखिए।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। जीवन की सहज ज़रूरतें पूरी करना इस श्लोक के विरुद्ध नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज कोई भी चीज़ खरीदने या चाहने से पहले एक बार ठहरकर पूछिए: ‘यह ज़रूरत है या तृष्णा?’ (हर बार 30 सेकंड)

आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी कौन-सी तृष्णा हर बार पूरी होने पर और बढ़ जाती है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर पिछली बार जिस चीज़ की चाह थी, उसे पाने के बाद की भावना को याद कीजिए। देखिए कि तृप्ति कितनी देर रही।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जहाँ तृष्णा, वहीं संसार; परिपक्व वैराग्य से तृष्णा ढीली कर सुखी रहिए।

English

Translation: Wherever craving arises, know that to be worldly bondage. Relying on mature dispassion, free of craving, be happy.

Simple explanation: This verse gives a simple test: wherever craving arises, bondage lies there. Mature dispassion loosens the thirst while ordinary needs, duties and care remain; it does not ask for suppression or indifference.

विषय और संबंधित श्लोक

  • तृष्णा
  • वैराग्य
  • संसार
  • सुख
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 10.1: काम, अर्थ और सकाम कर्म।
  • श्लोक 10.4: तृष्णा ही बंध है।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 153–155 (PDF पृ. 160–162)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया।