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प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक २/८25%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.2

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥

IAST लिप्यंतरण

svapnendrajālavat paśya dināni trīṇi pañca vā | mitrakṣetradhanāgāradāradāyādisampadaḥ || 2 ||

सरल उच्चारण: svapnendrajaalavat pashya dinaani treeni panycha vaa mitrakshetradhanaagaaradaaradaayaadisampadah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

स्वप्न, इन्द्रजालवत्, पश्य, दिनानि, त्रीणि, पञ्च, वा, मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः

स्वप्नेन्द्रजालवत्
स्वप्न और इन्द्रजाल के समान
पश्य
देख
दिनानि त्रीणि पञ्च वा
तीन या पाँच दिन के
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः
मित्र, खेत, धन, घर, स्त्री, उत्तराधिकारी आदि सम्पत्तियाँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

मित्र, खेत, धन, घर, पत्नी और उत्तराधिकारी आदि संपत्तियों को तीन या पाँच दिन के स्वप्न और इन्द्रजाल जैसा देख।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार प्रश्न उठता है कि अनेक प्रकार के सुख देने वाले स्त्री-पुत्र आदि विषयों का निरादर करके त्याग कैसे हो सकता है। उत्तर में कहा गया है कि स्त्री, पुत्र, धन, मित्र, क्षेत्र आदि जितने भोग के साधन हैं, उन सबको स्वप्न और इन्द्रजाल की तरह देखो, क्योंकि ये सब थोड़े दिन के रहने वाले हैं और दृष्टनष्ट हैं, यानी देखते ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिए इनमें ममता का त्याग करना उत्तम है।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक एक सहारा देता है: जिन चीज़ों और रिश्तों को हम स्थायी मानकर पकड़ते हैं, वे थोड़े दिनों के हैं। उन्हें स्वप्न या इन्द्रजाल की तरह देखिए, यानी जैसे उनके बीच हमारी पकड़ बहुत भारी हो जाती है, उतना भारी वे हैं नहीं।

यह वाक्य किसी रिश्ते, संतान, परिवार या मित्र को निरर्थक, नकली या तुच्छ कहने का आदेश नहीं है। यहाँ ‘स्वप्न’ का अर्थ है बदलने वाला, अस्थायी, पकड़ के लायक नहीं। जिन लोगों से हम जुड़े हैं, वे हमारे जीवन के सचमुच महत्वपूर्ण लोग हैं और देखभाल, प्रेम और कर्तव्य उनके लिए बने रहते हैं।

यदि आपको किसी हानि या वियोग से बहुत दुख है, तो इस श्लोक को उसे दबाने का कारण न बनाइए; किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात कीजिए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि मित्र, खेत, धन, घर और संबंधों की संपत्ति को तीन या पाँच दिन के स्वप्न-इन्द्रजाल जैसा देखो। 2. यह इन्हें स्थायी और अंतिम सहारा मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह अस्थायी संपत्ति और ममता के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का दूसरा श्लोक है, जो तृष्णा के विषयों की क्षणिकता बताता है। 5. 9.3 की अनित्यता की बात का यह ठोस उदाहरण-रूप है। 6. यह परम दृष्टि है, जो जगत् की स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है। 7. इसे अपने परिवार या संबंधों को तुच्छ समझने का आधार न बनाएँ।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे नाटक के पात्र मंच पर पूरी तरह निभाए जाते हैं पर पात्र जानता है कि नाटक खत्म होगा, वैसे संबंध और संपत्ति पूरी निष्ठा से निभाई जा सकती है बिना उन्हें अंतिम मान लिए। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति पुरानी संपत्ति या रिश्ते को खोने के बाद देखता है कि उसने कितना कुछ उन पर टिका रखा था। वह शोक को जीता है और धीरे-धीरे अपनी पकड़ और अपनी नींव दोनों को समझता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जिन्हें आप प्रेम करते हैं, उन्हें पूरे मन से निभाइए; बस उन्हें अपनी शांति की एकमात्र नींव मत बनाइए।

सामान्य गलतफहमी

पुस्तक की टीका में यहाँ स्त्री, संतान और संबंधियों को केवल ‘भोग के साधन’ या बंधन की तरह वर्णित करने वाले अंश हैं; यह किसी व्यक्ति या वर्ग को निम्न ठहराने के रूप में न पढ़ें। संबंध मनुष्यों के साथ हैं, वस्तुएँ नहीं। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘स्वप्न’ कहने का अर्थ दुख को न मानना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जिन चार चीज़ों या संबंधों से आपकी पकड़ सबसे ज़्यादा है, उनके लिए कृतज्ञता से कुछ करिए और देखिए कि पकड़ कैसी रहती है। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैंने अपनी शांति को किन चीज़ों या लोगों पर पूरी तरह टिका रखा है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर अपनी तीन बड़ी चीज़ें या संबंध लिखिए। हर एक के आगे लिखिए: ‘इसके लिए मेरा प्रेम और कर्तव्य क्या है, और पकड़ क्या है?’ दोनों को अलग-अलग देखिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संपत्ति और संबंध अस्थायी हैं; उन्हें निभाइए, पर शांति की इकलौती नींव मत बनाइए।

English

Translation: See friends, fields, wealth, home, spouse and heirs as dream and conjuring that last three or five days.

Simple explanation: The verse invites seeing possessions and ties as passing so that the grip loosens. It does not call any person unreal or worthless, and love, care and duty toward them continue; grief at loss should not be suppressed.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनित्यता
  • ममता-त्याग
  • वैराग्य
  • संबंध
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 9.3: सब कुछ अनित्य है।
  • श्लोक 10.6: हर जन्म में सब नष्ट हुआ।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 152–153 (PDF पृ. 159–160)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। टीका के ‘भोग के साधन’ वाले शब्द संबंधों के लिए अपमानजनक पढ़े जा सकते हैं; इसलिए इन्हें यहाँ नहीं दोहराया गया।