दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक ४/८50%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.4

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

IAST लिप्यंतरण

tṛṣṇāmātrātmako bandhas tannāśo mokṣa ucyate | bhavāsaṃsaktimātreṇa prāptituṣṭir muhur muhuḥ || 4 ||

सरल उच्चारण: trishnaamaatraatmako bandhas tannaasho moksha uchyate bhavaasamsaktimaatrena praaptitushtir muhur muhuh (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तृष्णामात्रात्मकः, बन्धः, तन्नाशः, मोक्षः, उच्यते, भवासंसक्तिमात्रेण, प्राप्तितुष्टिः, मुहुः, मुहुः

तृष्णामात्रात्मकः बन्धः
तृष्णा-मात्र-स्वरूप बंध
तन्नाशः
उसका नाश
मोक्षः उच्यते
मोक्ष कहा जाता है
भवासंसक्तिमात्रेण
संसार में असंग होने मात्र से
प्राप्तितुष्टिः मुहुर्मुहुः
बार-बार (आत्मा की) प्राप्ति और तृप्ति

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

बंध तृष्णा-मात्र-स्वरूप है, और उसका नाश मोक्ष कहा जाता है। संसार में असंग होने मात्र से बार-बार (आत्मा की) प्राप्ति और तृप्ति होती है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार तृष्णा-मात्र का नाम ही बंध है और उसके नाश का नाम मोक्ष। टीका योगवासिष्ठ का एक श्लोक-भाव देती है कि पुरुष के दाँत टूट जाते हैं, केश श्वेत हो जाते हैं, दृष्टि कम हो जाती है और पाँव कदम-कदम पर फिसलते हैं, फिर भी तृष्णा उससे नहीं छूटती। एक और श्लोक-भाव में तृष्णा को देवी कहकर नमस्कार किया गया है, क्योंकि वह धैर्य नष्ट करने वाली है और जिसने तीनों लोकों में पूज्य विष्णु को भी वामन बना दिया। अंत में टीका कहती है कि तृष्णा का त्याग ही मुक्ति का हेतु है।

सरल हिन्दी में समझें

अब बंध और मुक्ति की परिभाषा बहुत छोटी हो गई: बंध यानी तृष्णा, और मोक्ष यानी तृष्णा का मिट जाना। जब संसार से मन की पकड़ ढीली होती है, तब अपने भीतर की तृप्ति बार-बार अनुभव होती है।

पुस्तक का योगवासिष्ठ वाला उदाहरण बहुत भावुक है: शरीर थक जाता है, पर तृष्णा नहीं थकती। इसे वृद्धावस्था या शरीर की निंदा न समझिए; यह तृष्णा की ज़िद का चित्र है।

मोक्ष का अर्थ यहाँ भावशून्य हो जाना नहीं, बल्कि भीतरी तृप्ति है जो चाह के पूरी होने पर निर्भर नहीं करती।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि तृष्णा ही बंध है, उसका नाश मोक्ष, और असंग होने से बार-बार तृप्ति मिलती है। 2. यह बंध को किसी बाहरी जंजीर की तरह मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह तृष्णा, मोक्ष और भीतरी तृप्ति के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का चौथा श्लोक है, जो बंध-मोक्ष की सबसे छोटी परिभाषा देता है। 5. 8.1–8.4 की बंध और मुक्ति की कसौटी का तृष्णा के रूप में संक्षेप। 6. यह परम दृष्टि है; इसे चाहत मात्र को दोषी ठहराने का आधार न बनाएँ। 7. इसे अपने किसी विशेष अनुभव को ‘मुक्ति’ घोषित करने का पैमाना न बनाएँ।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे बहुत भरी जेब वाला भी और की चाह में भूखा रह सकता है, और संतुष्ट व्यक्ति थोड़े में भरा रह सकता है, वैसे तृप्ति का संबंध पाने से कम और पकड़ से अधिक है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति देखता है कि उसकी बेचैनी का बड़ा हिस्सा ‘और चाहिए’ की आवाज़ से आता है। जब वह इस आवाज़ को सुनकर भी काम करता है, पर उसके पीछे नहीं भागता, तो भीतर थोड़ी तृप्ति महसूस करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: ‘और चाहिए’ की आवाज़ पहचानिए; उसे सुनिए, पर हर बार उसके पीछे मत चलिए।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। तृष्णा के नाश का अर्थ भावशून्यता या सार्थक लक्ष्य छोड़ना नहीं है। टीका के उद्धरणों में वृद्धावस्था के वर्णन हैं; उन्हें बुज़ुर्गों या शरीर के प्रति तिरस्कार के रूप में न पढ़ें। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज ‘और चाहिए’ की एक आवाज़ पकड़िए और उसे नाम दीजिए: ‘यह तृष्णा बोल रही है।’ फिर एक छोटा काम बिना उसके कहने के कीजिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मुझे कब पर्याप्त महसूस होता है, और उसके लिए क्या चाहिए होता है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर याद कीजिए कि पिछली बार कब बिना किसी चीज़ के पाए संतोष लगा था। उस क्षण में क्या मौजूद था और क्या नहीं?

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: तृष्णा ही बंध है और उसका ढीला होना ही मोक्ष; इससे भीतर की तृप्ति खुलती है।

English

Translation: Bondage is nothing but craving, and its end is called liberation; through non-attachment to worldly becoming comes repeated fulfilment.

Simple explanation: Bondage is defined as craving and liberation as its ending, with a steady inner contentment that does not depend on getting. This does not condemn wanting as such, and it is not emotional numbness.

विषय और संबंधित श्लोक

  • तृष्णा
  • बंध-मोक्ष
  • तृप्ति
  • असंग
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 8.1: बंध का लक्षण।
  • श्लोक 10.3: जहाँ तृष्णा वहाँ संसार।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 155–156 (PDF पृ. 162–163)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया (मूल ‘तृष्णामात्रात्मको’ और पदच्छेद ‘तृष्णामात्रात्मकः’ में सुसंगत)। टीका के उद्धरणों के लंबे वृद्धावस्था-वर्णन यहाँ संक्षिप्त किए गए।