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प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक ६/८75%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.6

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ॥ ६ ॥

IAST लिप्यंतरण

rājyaṃ sutāḥ kalatrāṇi śarīrāṇi sukhāni ca | saṃsaktasyāpi naṣṭāni tava janmani janmani || 6 ||

सरल उच्चारण: raajyam sutaah kalatraani shareeraani sukhaani cha samsaktasyaapi nashtaani tava janmani janmani (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

राज्यम्, सुताः, कलत्राणि, शरीराणि, सुखानि, च, संसक्तस्य, अपि, नष्टानि, तव, जन्मनि, जन्मनि

राज्यम् सुताः कलत्राणि
राज्य, पुत्र, पत्नियाँ
शरीराणि सुखानि च
शरीर और सुख
संसक्तस्य अपि
आसक्त रहते हुए भी
नष्टानि
नष्ट हुए हैं
तव जन्मनि जन्मनि
तेरे हर जन्म में

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

राज्य, संतान, पत्नियाँ, शरीर और सुख, तेरे आसक्त रहने पर भी, तेरे हर जन्म में नष्ट हुए हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार अष्टावक्र जगत् को असत्य-रूप दिखाते हैं। हे जनक, राजभोग और स्त्री, पुत्र आदि ये सब तो तुम्हें अनेक जन्मों में मिलते ही रहे और नष्ट भी होते रहे। पहले जन्मों में जो तुम्हें प्राप्त हुए थे, उनका इस काल में कहीं पता नहीं है, और इस जन्म में जो मिले हैं, उनका आगे नाम-निशान नहीं रहेगा। इससे सिद्ध होता है कि ये सब असत्, यानी मिथ्या हैं। जैसे जाग्रत् के पदार्थ स्वप्न में और स्वप्न के जाग्रत् में असत् हो जाते हैं, वैसे ही जब मनुष्य अज्ञान-रूपी स्वप्न से जागकर ज्ञान-रूपी जाग्रत् को पाता है, तब सारा जगत् मिथ्या प्रतीत होने लगता है।

टीका फिर सांख्य मत के कारण-कार्य की सत्यता के तर्क का लंबा खंडन देती है (घड़े और मिट्टी, कपड़े और तन्तु के उदाहरणों से) और निष्कर्ष देती है कि सब पदार्थ अनिर्वचनीय और मिथ्या हैं। (यह दार्शनिक वाद विस्तृत और तकनीकी है; इसे यहाँ संक्षेप में रखा गया है।)

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक एक पुरानी बात याद दिलाता है: जो राज्य, संतान, पत्नियाँ, शरीर और सुख आज बहुत ज़रूरी लगते हैं, वे हर जन्म में नष्ट होते रहे हैं, चाहे आप कितने भी आसक्त रहे हों। इसलिए उनसे अंतिम सहारे की उम्मीद ठीक नहीं।

पुस्तक इस बात को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के उदाहरण से समझाती है: जैसे हर अवस्था में दूसरी अवस्था के पदार्थ असत् हो जाते हैं, वैसे ज्ञान की जाग में पूरा जगत् असत् जान पड़ता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि जो लोग आपके जीवन में हैं वे असली नहीं, या उनके लिए आपकी देखभाल और प्रेम व्यर्थ है। यह पकड़ और अंतिम सहारे की उम्मीद पर प्रश्न है। यदि आप हाल की किसी हानि से जूझ रहे हैं, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि राज्य, संतान, पत्नियाँ, शरीर और सुख आसक्ति के बावजूद हर जन्म में नष्ट हुए हैं। 2. यह इन्हें स्थायी और अंतिम सहारा मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह आसक्ति और नाश के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का छठा श्लोक है, जो जगत् की मिथ्यात्व-दृष्टि को स्पष्ट करता है। 5. 10.2 के स्वप्न-इन्द्रजाल की बात को जन्मों के क्रम में फैलाता है। 6. यह परम दृष्टि है, जो जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है। 7. इसे संबंधों को निरर्थक या स्त्रियों/संतान को वस्तु मानने का आधार न बनाएँ।

उदाहरण से समझें: जैसे बच्चा रेत के किले बार-बार बनाता है और लहर बार-बार उन्हें ले जाती है, वैसे इच्छित वस्तुएँ बार-बार बनती और बिगड़ती हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति देखता है कि पुराने साल की जिन चीज़ों के लिए वह परेशान था, आज उनका कोई नाम-निशान नहीं। वह आज की चिंताओं को भी थोड़ी दूरी से देखने लगता है और अपने निर्णय पहले से शांत मन से लेता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जो बदल जाता है, उसे पूरा भार न दीजिए; उसके प्रति कृतज्ञ और ज़िम्मेदार रहिए।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। पुस्तक की टीका में यहाँ स्त्री, संतान और संबंधियों को केवल ‘भोग के साधन’ या बंधन की तरह वर्णित करने वाले अंश हैं; यह किसी व्यक्ति या वर्ग को निम्न ठहराने के रूप में न पढ़ें। संबंध मनुष्यों के साथ हैं, वस्तुएँ नहीं। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी पुरानी चिंता को याद कीजिए जो अब कोई मायने नहीं रखती, और आज की एक चिंता को उसी दूरी से देखिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैं आज किस ऐसी चीज़ पर इतना भार रख रहा हूँ जो शायद कल यादों में भी न रहे?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर पाँच साल पहले की एक बड़ी चिंता याद कीजिए, और देखिए कि आज उसकी जगह क्या है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जो हर जन्म में बनता-बिगड़ता रहा, उसे अंतिम सहारा मत मानिए; उसके प्रति कृतज्ञ रहिए।

English

Translation: Kingdom, children, spouses, bodies and pleasures: even for one attached, they have perished in birth after birth.

Simple explanation: The verse says that everything held dear has passed away life after life, so it cannot be the final support. It does not say the people in your life are unreal or worthless; care and responsibility toward them remain.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनित्यता
  • जगत्-मिथ्यात्व
  • वैराग्य
  • आसक्ति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 10.2: स्वप्न-इन्द्रजाल जैसी संपत्ति।
  • श्लोक 10.7: संसार-वन में मन का विश्राम न पाना।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 158–161 (PDF पृ. 165–168)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। छपे अन्वय में ‘+च’ और ‘एते’ जोड़े गए हैं और ‘नष्टानि’ दो बार आया है; मूल में एक ही बार है, मूल रखा गया। टीका का सांख्य-खंडन का लंबा तकनीकी वाद केवल संक्षिप्त रूप में लिया गया।