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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक ८/२०40%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.8

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥

IAST लिप्यंतरण

śraddhasva tāta śraddhasva nātra mohaṃ kuruṣva bhoḥ |\njñānasvarūpo bhagavān ātmā tvaṃ prakṛteḥ paraḥ || 8 ||

सरल उच्चारण: shraddhasva taata shraddhasva naatra moham kurushva bhoh \njnyaanasvaroopo bhagavaan aatmaa tvam prakriteh parah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

श्रद्धस्व, तात, श्रद्धस्व, न, अत्र, मोहम्, कुरुष्व, भोः, ज्ञानस्वरूपः, भगवान्, आत्मा, त्वम्, प्रकृतेः, परः

तात
हे प्रिय जनक!
श्रद्धस्व श्रद्धस्व
श्रद्धा करो, पूर्ण विश्वास करो
अत्र मोहम् न कुरुष्व भोः
इस विषय में लेशमात्र भी संशय या भ्रम मत करो
त्वम् ज्ञानस्वरूपः
तुम स्वयं ज्ञानस्वरूप हो
भगवान्
समस्त ऐश्वर्य और दिव्यता से संपन्न
प्रकृतेः परः आत्मा (असि)
प्रकृति और उसके तीनों गुणों से परे परमात्मा हो

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

हे तात! श्रद्धा करो, श्रद्धा करो; इस विषय में संशय मत करो। तुम ज्ञान-स्वरूप, भगवान और प्रकृति से सर्वथा परे आत्मा हो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: शिष्य को जब अपने ब्रह्म-स्वरूप का उपदेश मिलता है, तो कभी-कभी उसकी बुद्धि अपनी पुरानी दीनता के कारण संशय में पड़ जाती है कि "क्या सचमुच मैं भगवान हूँ? क्या मैं सचमुच इतना महान हूँ?" गुरु अष्टावक्र अत्यंत वात्सल्य और अधिकार के साथ बार-बार कहते हैं: ‘श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व’—हे प्रिय, अपनी दिव्यता पर अविश्वास मत करो। तुम कोई तुच्छ पापी या नश्वर देह नहीं हो; तुम प्रकृति से परे स्वयं ज्ञानस्वरूप ईश्वर हो।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में गुरु का असीम प्रेम और शिष्य को जगाने की तड़प झलकती है।

हमें बचपन से यही सिखाया जाता है कि हम कमजोर हैं, पापी हैं या असहाय हैं। इसलिए जब कोई कहता है कि आप ही परमात्मा हैं, तो हमें विश्वास ही नहीं होता।

अष्टावक्र जनक के कंधे पर हाथ रखकर जैसे कह रहे हों: "मेरे बच्चे, मुझ पर भरोसा करो, खुद पर शक मत करो। तुम कोई छोटे-मोटे संसारी नहीं हो; तुम प्रकृति के सारे नियमों से परे, स्वयं ज्ञान के ईश्वर हो।" अपनी इस गरिमा को पहचानना ही जीवन की सबसे बड़ी श्रद्धा है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्रद्धस्व की द्विरुक्ति गुरु के गहन वात्सल्य और कथन की अचूक प्रामाणिकता दर्शाती है। 2. आत्म-संशय (self-doubt) अद्वैत मार्ग का सबसे बड़ा बाधक है जिसे यहाँ तोड़ा गया है। 3. भगवान् पद आत्मा के छहों ऐश्वर्यों (ज्ञान, वैराग्य, यश, श्री आदि) की अंतर्निहित पूर्णता बताता है। 4. प्रकृतेः परः का अर्थ है कि आत्मा काल, देश और प्रकृति के कार्य-कारण नियम से अप्रभावित है। 5. ज्ञानस्वरूपः सिद्ध करता है कि ज्ञान आत्मा का कोई गुण नहीं, बल्कि उसका स्वरूप ही है। 6. यह साधक के भीतर आत्म-गौरव और सर्वोच्च आत्म-विश्वास की प्रतिष्ठा करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे राजा के खोए हुए राजकुमार को जब कोई विश्वसनीय मंत्री आकर बताता है कि तू भिखारी नहीं बल्कि सम्राट का पुत्र है, तो उसे अपनी पहचान पर भरोसा करना पड़ता है, वैसे ही गुरु के वचन पर श्रद्धा करनी होती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति हीन-भावना (imposter syndrome) का शिकार होकर खुद को अयोग्य समझने लगता है और एक अनुभवी मेंटॉर उसे उसकी वास्तविक क्षमता का भरोसा दिलाता है, तो उसका जीवन बदल जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनी हीनता और कमजोरी के भ्रम को तोड़िए; गुरु-वचन पर भरोसा करके अपनी दिव्य आत्म-सत्ता को स्वीकार कीजिए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘भगवानात्मा त्वम्’ का अर्थ संसारी अहंकार बढ़ाकर दूसरों पर धौंस जमाना नहीं है, बल्कि अपनी शुद्ध, निष्काम दिव्यता को पहचानना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में असहायता या हीन-भावना आए, तो रीढ़ सीधी करके मन में कहें: "मैं प्रकृति से परे, शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने पुराने अपराध-बोध और कमजोरियों को पकड़कर अपनी दिव्य आत्मा पर अविश्वास कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन में श्रद्धा के साथ दोहराएं: "श्रद्धस्व—मैं वही शुद्ध, निर्दोष और अनंत चैतन्य हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: श्रद्धा करो, तनिक भी संशय मत करो; तुम ज्ञान-स्वरूप, भगवान और प्रकृति से परे आत्मा हो।

English

Translation: Have faith, my child, have faith; do not be bewildered here. You are the Lord, the very embodiment of knowledge, the Self beyond nature.

Simple explanation: With tender urgency, Sage Ashtavakra cuts through Janaka’s lingering self-doubt: "Have faith! You are not an impoverished mortal bound by nature’s laws; you are the sovereign, ever-effulgent Self."

विषय और संबंधित श्लोक

  • श्रद्धा
  • भगवानात्मा
  • प्रकृतेः परः
  • आत्मविश्वास
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 1.11: मुक्ताभिमानी मुक्तो हि।
  • श्लोक 15.9: गुणैः संवेष्टितो देहः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 213–214 (PDF पृ. 220–221)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। गुरु का वात्सल्य-भरा संबोधन।