Atharva Veda· Atharvaveda Saṁhitā
11
अध्याय 11 / 20

Kanda 11

काण्ड 11

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पूर्ण अध्याय पाठ164 श्लोक

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अध्याय ११

श्लोक 3.1

ओदनः।(१) १-३१ अथर्वा।ओदनः (बार्हस्पत्यौदनः।) ( त्रयः पर्याया)।१, १४ आसुरी गायत्री, २ त्रिपदा समविषमा गायत्री, ३, ६, १० आसुरी पङ्क्तिः, ४, ८ साम्न्यनुष्टुप्, ५, १३, १५, २५ साम्न्युष्णिक्, ७, १९-२२ प्राजापत्याऽनुष्टुप्, ९, १७-१८ आसुर्यनुष्टुप्, ११ भुरिगार्च्नुष्टुप्, १२ याजुषी जगती, १६ २३ आसुरी बृहती, २४ त्रिपदा प्राजापत्या बृहती, २६ आर्च्युष्णिक्, २७-२९ साम्नी बृहती, (२८-२९ भुरिक्), ३० याजुषी त्रिष्टुप्, ३१ अल्पशः पङ्क्तिरुत याजुषी।तस्यौ॑द॒नस्य॒ बृहस्पतिः॒ शिरो॒ ब्रह्म॒ मुख॑म्

odanaḥ| (1) 1-31 atharvā| odanaḥ (bārhaspatyaudanaḥ|) ( trayaḥ paryāyā)| 1, 14 āsurī gāyatrī, 2 tripadā samaviṣamā gāyatrī, 3, 6, 10 āsurī paṅktiḥ, 4, 8 sāmnyanuṣṭup, 5, 13, 15, 25 sāmnyuṣṇik, 7, 19-22 prājāpatyā'nuṣṭup, 9, 17-18 āsuryanuṣṭup, 11 bhurigārcnuṣṭup, 12 yājuṣī jagatī, 16 23 āsurī bṛhatī, 24 tripadā prājāpatyā bṛhatī, 26 ārcyuṣṇik, 27-29 sāmnī bṛhatī, (28-29 bhurik), 30 yājuṣī triṣṭup, 31 alpaśaḥ paṅktiruta yājuṣī| tasyaudanasya bṛhaspatiḥ śiro brahma mukham

हिन्दी अर्थ

खानां प्रकरणानुसार संहार करना) । स्वकीय राष्ट्र का पालन तथा कां० ११। सु० २ भरथवेवेद-माष्य . ३७ मुञ्जतीभ्यः==भथवा इकटूठे होकर भोजन करने वाली सेनाग्रं के १ क, १्मेखरकी सेनाभ्रों रौर उन के प्रति नमस्कारो का वर्णन

English

Pasupati, Lord of victims. Be gracious to the quadruped and biped of the believer in the

अध्याय ११

श्लोक 3.1-2

(२) ३२-४९ मन्त्रोक्ताः।३२, ३८, ४१ (प्रथमा), ३२-४९ (सप्तमी) साम्नी त्रिष्टुप्, ३२, ३५,४२ (द्वितीया), ३२-४९ (तृतीया) ३३-३४, ४४-४८ (पञ्चमी) एकपदाऽऽसुरी गायत्री, ३२, ४१, ४३, ४७ दैवी जगती, ३८, ४४, ४६ (द्विo), ३२, ३५-४३, ४९ (पञ्चo) एकपदाऽऽसुर्यनुष्टुप्, ३२-४९ (षष्ठी) साम्न्यनुष्टुप्, ३२-४९ (प्रo) आर्च्यनुष्टुप्, ३७ (प्रo) साम्नी पङ्क्तिः, ३३, ३६, ४०, ४७-४८ (द्विo) आसुरी जगती, ३४, ३७, ४१, ४३, ४५ (द्विo) आसुरी पङ्क्तिः, ३४ (चo) आसुरी त्रिष्टुप्, ३५, ४६, ४८ (चo) याजुषी गायत्री, ३६-३७, ४० (चo) दैवी पङ्क्तिः ३८-३९ (चo) प्राजापत्या गायत्री, ३९ (द्विo) आसुर्युष्णिक्, ४२, ४५, ४९ (चo) दैवी त्रिष्टुप्, ४९ (द्विo) एकपदा भुरिक्साम्नी बृहती।तत॑श्चैनम॒न्येन॑ शी॒र्ष्णा प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

(2) 32-49 mantroktāḥ| 32, 38, 41 (prathamā), 32-49 (saptamī) sāmnī triṣṭup, 32, 35,42 (dvitīyā), 32-49 (tṛtīyā) 33-34, 44-48 (pañcamī) ekapadā''surī gāyatrī, 32, 41, 43, 47 daivī jagatī, 38, 44, 46 (dvio), 32, 35-43, 49 (pañcao) ekapadā''suryanuṣṭup, 32-49 (ṣaṣṭhī) sāmnyanuṣṭup, 32-49 (prao) ārcyanuṣṭup, 37 (prao) sāmnī paṅktiḥ, 33, 36, 40, 47-48 (dvio) āsurī jagatī, 34, 37, 41, 43, 45 (dvio) āsurī paṅktiḥ, 34 (cao) āsurī triṣṭup, 35, 46, 48 (cao) yājuṣī gāyatrī, 36-37, 40 (cao) daivī paṅktiḥ 38-39 (cao) prājāpatyā gāyatrī, 39 (dvio) āsuryuṣṇik, 42, 45, 49 (cao) daivī triṣṭup, 49 (dvio) ekapadā bhuriksāmnī bṛhatī| tataścainamanyena śīrṣṇā prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

संहारक । ये दोनों नाम एकही परमेदवर-देव के हैँ । गुण-कर्मे भेद के कारण परमेदवर भव भी दहै, श्रौर शवं मी । (श्रभियातम् =मभियन = गाव अदवाः पुरवा भ्रजावयः” (श्रथवं° ११।२। €) 1 सूक्त २ के देवता को ३ नामों द्वारा सम्बोधित किया है, सव, दावं भ्रौर द्र । मव रौर शवं तो प्राणियौ की, उन के बुरे कमोँ दवारा, दण्डित कर खलाने वाला है, ताकिवे दुःख मोग कर सन्मे गामी हो सके 11 रि नै कोष्ठे मा शरीराणि कतैनलिक्छवेभ्यो माक्षिकास्ते पदयते वयांसि ते पिधेसे मा विदन्त ॥२॥ (शने) कृत्तौ के लिये, (कोष्ट) गीदडो क लिये, (अलिक्लवेभ्यः)

English

Pasupati, Lord of victims. Be gracious to the quadruped and biped of the believer in the

अध्याय ११

श्लोक 3.1-3

३२॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

32|| tataścainamanyābhyāṃ śrotrābhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

परौर (ये) जो (अविष्यवः) मांसभ्रिय (कृष्णाः). काले कौए ह, उन के लिये, (पशपत) है पशु क श्रधिपति ! (ति) तेरी जो (मक्षिकाः) मक्छियां द, (वते) 'तेरे जो (वयांसि) श्रन्थ पक्षी है .उन के, लिये, (शरीराणि) हमारे (मा विदन्त) हमारे शरीरो को न प्राप्त करे ।

English

Foremost we go to meet his car, the chariot of the long-haired God,

अध्याय ११

श्लोक 3.1-4

३३॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑म॒क्षीभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

33|| tataścainamanyābhyāmakṣībhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

हमारे मृत शरीरो को युद्ध भूमि म पशुपक्षी न खाएं । बेद दुष्टिमेतो ॥ रुलाने वाले, (सहस्राक्षाय) हजारों पापि्यो का क्षय करने वाले (ते) तेरे प्रति (नमः) नमस्कार (कृण्मः) हम करते है । परमेदवरः" (सायण). रोपयः = परमेश्वर की विमोहक राक्तियां नाना दातृत्व भ्रादि,-परमेदवर की राक्तियां तथा विभूतियां नाना ई, जोकि हमे विमुग्ध करती है । इन सबके लिये हम परमेश्वर.को नमस्कारः करते

English

Drawn by brown horses, dusky, black, o’erthrowing, slaying, terrible. Let reverence be paid to him.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-5

३४॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॒ मुखे॑न॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

34|| tataścainamanyena mukhena prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

क्षय करने बाले (ते) तेरे लिये (नमः) नमस्कार (कृष्मः) हम करते सव ्रोर शरन्धकार से वाजित (दिवः) च.लोक सि (रार); ऊपर त्रतेमान ४० भ्रथरव॑वेद-भाष्य कां० ११।सूु०२ (१ मुख के लिये (तुभे (नमः) नमस्कार हो, .(यानि चक्षू षि). जो चक्षए है तदथं (ते) तुमे नमस्कार हो । (त्वचे) त्वचा के लिये, (रूपाय) रूप के . लिये, (संदृशे) सम्यक् दरदौन के लिये (प्रतीचीनाय)

English

Cast not thy club at us, thy heavenly weapon. Lord of Beasts, be not wroth with us. Let reverence be paid to thee.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-6

३५॥ तत॑श्चैनम॒न्यया॑ जि॒ह्वया॒ प्राशी॒र्यया॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

35|| tataścainamanyayā jihvayā prāśīryayā caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

(ददभ्यः) दान्तो के लिये, (गन्धाय) गन्ध के लिये (ते नमः) तुमे नमस्कार हों ॥६॥ ॥ . के लिये = तेरी इन वस्तुभ्रौं के परिज्ान के निमित्त । “मुखाय मुखादि केःस्वरूप निम्न लिखित है-- सकम्म का पुल है बरहम भर्थातु वेद या बरहावेद, भयवंवेद ९। “चक्षुषि” = चकषुरङ्किरसो भवन्” (भ्रथववे9 १०।७।१८१३४) जिसं की चद्मुए ह सुय । की रमयां तथा.सूयं श्रौर चान्द (्रथवं० १०।७।३२) । “त्वचे "= ¦ निज ति स्वरूप सेषेरा हृभरा है, जैसे कि भ्रस्मदादि के शरीरों

English

Shake thy celestial branch above some others elsewhere, not o’er us. Do us no harm, but comfort us: avoid thou us, and be not wroth. Never let us contend with

अध्याय ११

श्लोक 3.1-7

३६॥ तत॑श्चैनम॒न्यैर्दन्तैः॒ प्राशी॒र्यैश्चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

36|| tataścainamanyairdantaiḥ prāśīryaiścaitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

जगत् को सुरक्षित कररहा है । सूपाय = रूपयतीतिः सूपम् 1 परमेश्वर का० ११ सु° २ भयवंवेद-भाष्य रः क ४१ परिज्ञान के लिए परमेश्वर को नमस्कार है ।५॥ “जिह्वाये = “जिह्वां मधुक्चामुत" (अथवं० १०।८।१९) मे मधुका

English

thee. Covet not thou our kine or men, covet not thou our goats or sheep.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-8

३७॥ तत॑श्चैनम॒न्यैः प्रा॑णापा॒नैः प्राशी॒र्यैश्चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

37|| tataścainamanyaiḥ prāṇāpānaiḥ prāśīryaiścaitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

(निषं० १।११) वाणी को कशा इस लियः कहते है कि यह् भ्रं को प्रकाधित करती है । तथा जिह्वा.वाड नाम (निषंऽ १।११) =“श्रास्याय'" = “्रन्निं हिन प्राणियों का उपलक्षक हैः । गन्धाय पद भी पदमेर्वर की संहारक. मे भ्रत्यधिकंदहैँ।ये है रोगकीटाणु । येःरोग कीटाणु प्रतिवर्षं लाखो की संख्या मे प्रजा का संहार करते रहते हैँ । ॥

English

Elsewhither, strong One! turn thine aim: destroy the mockers’ family. Homage to him whose weapon, Cough or Fever, assails one like the neighing of a stallion; to

अध्याय ११

श्लोक 3.1-9

३८॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॒ व्यच॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

38|| tataścainamanyena vyacasā prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

रखना चाहिए किं मन्व भे (ते). पद परमेश्वर के भङ्गो का बण॑न नहीं करते, जिन द्वारा कि परमेरवर को शरीरधारी मानने का नरम हो सके, (अस्त्रा) वच फकने वाले, (नीलशिलण्डेन ) नीलमेषरूपी , केश संनिवेश वाजे, (सहस्राक्षेण) हजारों का क्षय करने , वाले, (वाजिना) करने वाले का हनन करने वाले, (स्द्रेण) रखुलाने वाले (तेन) उस पर-

English

him who draws one forth and then another! Homage be paid him with ten Sakvari verses who stands established in the air’s mid-region,

अध्याय ११

श्लोक 3.1-10

३९॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॑ पृ॒ष्ठेन॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

39|| tataścainamanyena pṛṣṭhena prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

मेदवर के साथ (मा समरामि) हम समरु्माकवना वालेनं हो, उस के. नियमों का उत्लंघन करने वाले न हो. नीले भ्र्थात् घने.मेष मानो उसके कंश संनिवेश है, वह हजारों का क्षय करने वाला है । वालिना वाजः बलनाम (निवं० र ९) तदुक्तेन । प्ररेच्वर भी विद्युद्-देव के सदृश महाबली है । वह उस का घात करता है जोकि सूद् द्वारा निजधन की वद्धि करता, भ्रौर निजघन को परोपकार , लिये उपस्थित किया है (निरुक्त ६।६।३२) ; यथा-- ..

English

slaying non-sacrificing God-despisers!

अध्याय ११

श्लोक 3.1-11

४०॥ तत॑श्चैनम॒न्येनोर॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

40|| tataścainamanyenorasā prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

कुलीनः । एसे व्यविति को “नैचाशाख . कटा ह, भर्थात् नीघकुल वाला । पसे व्यक्ति को धनं से 1 करनेके लिये प्राथनाकी गई है श्रानो भर ॥ १, राजा दवारा मिरिष्ट नियमों का उल्लंषन करना मानो उस के सथ ॥ 1 भ्यहच्च'" इति च्लेः भ्रडः (सायण) । श ।

English

For thee were forest beasts and sylvan creatures placed in the wood, and small birds, swans, and eagles.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-12

४१॥ तत॑श्चैनम॒न्येनो॒दरे॑ण॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

41|| tataścainamanyenodareṇa prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

दुःखो मे (नः) हमें (परि वृणक्तु) छृडाए, (भ्रापः इव अ्रग्निः) जसे परमेद्वर (नः) हमे (परिवृणक्तु) दुःखो से चडाए । (नः, मा, भ्रमि- मास्त)" मव हमारी हिसा न करे । (रस्म नमः भ्स्तु) इसे हमारा नमः (पशुपते) है पशुभ्रों के पति ! (इमे) ये (गावः श्रद्वा पुरुषाः ्रजावयः) गौए, भ्रर्व, पुरुष, बकरियां, मेड (पशवः) प्रशु, (पञ्च विभक्ताः). जो कि पांच विभागों मे विभक्त है, (तव) तेरे है (ते भवाय) मष्ट त्पादक तेरे लिये (चतुः नमः) चार वार नमस्कार हो, (अष्ट कत्वः) भ्राठ वार तथा (दशकृत्वः) दस वार (नमः) नमस्कार हो । ं मे नमस्कार हो । अष्टकृत्वः चार मृख्यदिशाभरों तथा चार उप-

English

Floods, Lord of Beasts! contain thy living beings: to swell thy strength flow the celestial Waters.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-13

४२॥ तत॑श्चैनम॒न्येन॑ व॒स्तिना॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

42|| tataścainamanyena vastinā prāśīryena caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

न भ्रथवेवेद-माष्य का० ११ सु०र२ परिक्रमा करते हृए परमेद्वर को नमस्कार करने कां विधान हुभरा है। चतुः, ्रष्ट श्रौर द, - ये वक्रत्पिक हैँ । हई दिवाए' (तव) तेरी है, (दौः) दयलोक (तव) तेरा है, (पृथिवी तव) मे विद्यमान है, इसलिये वह सात्मक हुम्रा-हुभा है

English

Porpoises, serpents, strange aquatic monsters, fishes, and things unclean at which thou shootest.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-14

४३॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑मू॒रुभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

43|| tataścainamanyābhyāmūrubhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

(पशुपते) है पशु्रो के स्वामिन ! (श्रयम्) "यह (वसुषानः) सस्प- तियो का निधिभरूत (उरुः कोशः) विस्तृत खजाना (तव) तेरा है, (यस्मिन् (नः) हमे (मृड) उस कोश द्वारा सुखी कर, (ते नमः) तुे (नमः) करने वाले गीदड़ तथा कृत्तं (परः) दर हो; (परः) परे (यन्तु) हो जायं

English

Nothing is far for thee, naught checks thee, Bhava! The whole earth in a moment thou surveyest. From the east sea thou smitest in the northern.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-15

४४॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्या॑मष्ठी॒वद्भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

44|| tataścainamanyābhyāmaṣṭhīvadbhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

. (अषख्दः) पापो के कारण रोने वाली (विकेश्यः) विकीणं कशो वाज्ली . ¦ ॥ २. नियमो के फलन कराने मे -उग्ररू्प । परमेष्वर ने जो नियम संस्मरके लन के लिय, वथा हमारे जीवनो के लिये, निर्मित कयि हृं ह, उन क भिपररीत /. चलने पर परमेदवर हैमे दण्डित करता है, भरतः वह उग्रहं।

English

O’erwhelm us not with Fever or with poison, nor, Rudra! with the fire that comes from heaven. Elsewhere, and not on us, cast down this lightning.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-16

४५॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ पादा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

45|| tataścainamanyābhyāṃ pādābhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

कां० ११। सु०२ भ्रथवेवेद-माष्य ४५ खजाना है । इम खजाने द्वारा सुली होने की प्रार्थना की गई है, भ्रौर ्रत्युपकार मं परमेदवरं को नमस्कार भेट क्यिरह । पराभवकारी प्रौर उन्हें केवल ्राक्रो करने वाले तथा डरपोक कहा है, जैसे किं “गीदड- (शिखण्डिन् -=नीलशिखण्डिन्) है नीलेमेघरूपी केशसंनिवेा वाले.

English

Ruler of heaven and Lord of earth is Bhava: Bhava hath filled the spacious air’s mid-region. Where’er he be, to him be paid our homage!

अध्याय ११

श्लोक 3.1-17

४६॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ प्रप॑दाभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

46|| tataścainamanyābhyāṃ prapadābhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

(सहस्षध्नि) हजाये का हनन करने वाले, (शतवधम्) सेकंडों प्रकार की विधियो से व करवै वाले (हिरण्यम्) परन्तु. परिणाम मे हितकर भौर रमणीय (धनुः) धनुष् को (विभर्षि) तू शरणं. करता है । (द्रस्य) तु खुलाने वाले की, (देवहेतिः) दिव्यास्त्र रूपी . (इषुः) इषु, (इतः) इस पर चलती है (तस्य) उस के निराकरणार्थं (नमः) तुभे नमस्कार है। है, भ्रौर जो महासंहारी. वज्रूपी-दषु का . प्रहार करता है । इस -दृष्टि से परमेइवर भौर विद्य द्-देव परस्पर सदश है, भौर दोनो ही खल्प है, धानुष्क के हाथमेंदही रहता है। चलाई जाती है इषु । . प्रतः इसी इषु के वजंनाथ, निराकरणाथं खर को नमस्कार किया हैः ताकि वह् भ्रनुकल होकर,

English

King Bhava, favour him who offers worship, for thou art Pasupati, Lord of victims.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-18

४७॥ तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ हस्ता॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

47|| tataścainamanyābhyāṃ hastābhyāṃ prāśīryābhyāṃ caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

योभियांतो निलयते तां खद निचिकींषेति । किया है, (निलयते) भ्रौर यदि वह्ज्छिप जातादहै, (ख) है रुनाने वाले परमेदवर ! जो इस प्रकार (त्वां निचिकीषंति) तेरा श्रपमानं करना चाहता (पदनीः) पद खोजी श्षिकारी, (विद्धस्य) बीन्वे गए शिकार का पीछा भ्रभिप्राय यह किं श््र-परमेरवर जिसे दण्डित करता है वह उस के.

English

Be gracious to the quadruped and biped of the believer in the Gods’ existence.

अध्याय ११

श्लोक 3.1-19

४८॥ तत॑श्चैनम॒न्यया॑ प्रति॒ष्ठया॒ प्राशी॒र्यया॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न्

48|| tataścainamanyayā pratiṣṭhayā prāśīryayā caitaṃ pūrva ṛṣayaḥ prāśnan

हिन्दी अर्थ

धंसारोत्फादकं तथा पापियों को रुलाने वाले परमेदवर के दोनों स्वरूप, (वीर्याय). श्रपनी-भषनी . शवित कै प्रद्ेन के लिये, (चरतः) विचरते है । . उन दोर्नौ स्वद््पो के लिये (नमः) नमस्कार हों । दतः सावं विभव्त्तिकः तसिः । परमेश्वर के दोनो स्वरूपो के गुण-

English

Harm thou among us neither great nor little, not one who bears us, not our future bearers. Injure no sire among us, harm no mother. Forbear to injure our own bodies, Rudra.

अध्याय ११

श्लोक 3.2

द्यावा॑पृथि॒वी श्रोत्रे॑ सूर्याचन्द्र॒मसा॒वक्षि॑णी सप्तऋ॒षयः॑ प्राणापा॒नाः

dyāvāpṛthivī śrotre sūryācandramasāvakṣiṇī saptaṛṣayaḥ prāṇāpānāḥ

हिन्दी अर्थ

ज्वरप्रौर कधसिका-कासिका “कुक्करूवांसी" प्रतीत 'होती है, । , जिसे कि “शप६६१8, तथा ११०७ 98-0०४४ करते ह. यह हः की तरह खांसते समय, ऊचा शब्द करती. है । -यह् परिल किसी एक व्यक्ति कमजोर व्यविति को मानो स्वयं चूनने का नि्णेय करतीदहै। हषा कै नथनों का शब्द, हिनहिनाना ॥8

English

Agni. 37. And thence, etc. . . With other teeth . . . Thy teeth will fall out . . . With the

अध्याय ११

श्लोक 3.2-2

ज्ये॒ष्ठ॒तस्ते॑ प्र॒जा म॑रिष्य॒तीत्ये॑नमाह

jyeṣṭhataste prajā mariṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

भी प्रतीत हो रहा है,.जिस तेरी-सत्ता के कारण जलीय प्राणी जीवित ै॥ की. वृद्धि.कर.रहे द ।.. जलप्रवाहः पररभेदवर के निमित्त .हो रहा है, देखो तेरे लिये, (न दूरम्) कोई दूर नही, (ते) तेरे लिये (न परिष्ठा अस्ति) भ (परि पर्यसि). पू्णेतया तु देखता है, (भूमिम्) बरौर समग्र भूमि को

English

Agni. 37. And thence, etc. . . With other teeth . . . Thy teeth will fall out . . . With the

अध्याय ११

श्लोक 3.2-3

ब॒धि॒रो भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह

badhiro bhaviṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

. शिश्ुमाराःशिष्युमार आदि पाथिव प्राणी प्रतीत नहीं .होते, भ्रपितु ये च लोकस्थ तारामण्डल है । जसे कि मेष, वृष, ककं, सिह, वृरिचक मकर, मीन, ये राशियां पशुनाम वाली ह, इसी प्रकार शिशुमार भादि ऋक्षः तथा घुवभध्य कहते है । इस मे ७ चमकते तारे है । देखो प° १८९. - . एणणक्ष प्रातण 4 ऽप्रकाशार (कालिनाथ मुकर जी) तथा नक्शा ; ं . एम्म राकिके पूवं मे भ्रौर मेष राधिके समीपह। “तिमि"को चित्रनं०् में , शवंव्यापक है । श्रथवा तेरे मागे मे कोई -बाधास्प मे स्थितं नहीं ।

English

20. Whereon in order rest the three, the ocean, and the heaven, and earth. 21. Within the residue whereof the Gods arranged six eightieth parts—

अध्याय ११

श्लोक 3.2-4

अ॒न्धो भ॑वि॒ष्य॒सीत्ये॑नमाह

andho bhaviṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

म है, दसे चित्र नं०.१ मे शिशुमार शब्द दारा दर्दाया हं ॥ दिग्री १९० से हिगृरी बहा रिशुमार तारामण्डल की स्थिति ( कां० ११।सूु०२ भरथववेद-माष्य , ४३ क अजगराः == महाकाय सपं ।ये ्लोकमेंनानार्ह। ये स्वाकृतियोौं मेभीनानार्ै, रौर निज ताराभ्रों की-भी-दृष्टिसे नाना रहै। यथा (१) तक्षक-तारामण्डल (200) जो किं शिशुमार-मण्डल के समीप

English

22. I ask thee, of this Odana what is the mighty magnitude. 23. He who may know the magnitude of the Odana. 24. Would say,

अध्याय ११

श्लोक 3.2-5

मु॒ख॒तस्ते॑ प्र॒जा म॑रिष्य॒तीत्ये॑नमाह

mukhataste prajā mariṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

(00५) 668) । (३) हद सपेमण्डल जो किं १४० डिग्री से २२९ दश्री. तक फलाहम्रारहै, भौर. जिसकी. पुछ लुलाराि को छ्ृतीदहै (11९ भरथल 72166, या त+८।8) । इस का मुखं मिथुनराशि के समीप है, श्रौर पूछ तुलाराकषि के समीप तक गर्हहै। पुरीकयाः"= इस तारामण्डल का स्वरूप भनुसन्धेय -है । जषा: मषाः । ये बृहदाकार मछली है जिसे मीन रा्चि- कहते है, इस्र मे रेवती-नक्षत्रहै। १, एक महाकाय सपं “तक्षक” है, जो कि दिषयुमार तारामण्डल के दक्षिण मर , कुण्डलि मारे लेटा पडा है, रौर २१० डिगरी भ्रौर ३०० डिगरी तक की रेखां

English

Not small, nor devoid of moistening sauce; not this, nor any- thing whatever. 25. He would not declare it to be greater than the giver imagines it to be. 26. The theologians say, Thou hast

अध्याय ११

श्लोक 3.2-6

जि॒ह्वा ते॑ मरिष्य॒तीत्ये॑नमाह

jihvā te mariṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

दूसरा मह्य काय सपं है ““हृदस्पं मण्डल” जो कि चित्र नं ० २ में १४० डिमरी से २२० डिगरी के मध्य र्मे तुलारादितक फलाहृभराहै। तीसरा महाकाय सपं है ““सरपंघारिमण्डल” जोकि चित्र नं ० २ में डिग्री २४० से डिगरी २७५ के लगमग तक फला हृभा हं . ३. यह मीन-राि ह । मीन = मच्छलीं । तथा “तिमि” तारामण्डल । तिमि -=मशली । लेटिन भाषा मे इसे 0618, तथा भप्रेजी मे इते 86871008 शून्य हडिगरी से ३५. डिगरी के भीतर दशयि हं ।

English

eaten the averted Odana and the Odana turned hither- ward. 27. Thou hast eaten the Odana and the Odana will eat thee. 28. Thou hast eaten this averted; thy inward breath will leave

अध्याय ११

श्लोक 3.2-7

दन्ता॑स्ते शत्स्य॒न्तीत्ये॑नमाह

dantāste śatsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

मीन मण्डल) चित्र नं०२ मे डिगरी ३३० भौर डिगरी ई३४०.के मध्य मे, कुम्भ राशि एाश१९ 080) । इन सबःके चित्र “70 णभ प्राय ऽ्फाश्रा म दिये ह । इन काः चित्रपट.संलगन है । = विभाति (मृुण्ड० उप० २।२।१०) । वैर्दिक' सिद्धान्तानुसार इन संब कीं

English

thee; so he said to this one. 29. Thou hast eaten this turned hitherward; thy downward breath will leave thee; so he said to this one. 30. I indeed have not eaten the Odana, nor has the

अध्याय ११

श्लोक 3.2-8

प्रा॒णा॒पा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह

prāṇāpānāstvā hāsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

हंसि = हन् हिसागत्योः 1 हंसि मे हन् घातु तयर्थक है । ह, न कि उत्तर दिशावरती समुद्र । इस वणेन पर धरनुसंघान भक्त है : (रुद्र) है पापियों को खलाने व्राले ! (नः ) हम, सुक्ियों को; (तवमंना) जीवन को कष्टमय करने वाले ज्वर के साथ (मासाः) न

English

Odana eaten me. 31. The Odana has just eaten the Odana. 32. And thence he said to this one, Thou hast eaten this with a different head from that with

अध्याय ११

श्लोक 3.2-9

रा॒ज॒य॒क्ष्मस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह

rājayakṣmastvā haniṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

संबद्ध कर, (मां विषेण) न विष के साथ (मा) न -(नः ) -हमे (दिग्येन संल्राः=संसुज (लुङ. लकार) +“ तक्मनान्=तकिं कृच्छर जीवने + का०..११ भूर र् भरथवेवेद-माष्यः ९. स्याम्) जिस किंसी भी. (दिक्षा) दिका मे वह॒ है, - (इतः) -यहां से' . (तस्म) उसे नभः) नभस्कारहों।. श परमेद्वर वभौ लोकों मे भौर सव दिशा म व्याप्त है । जिस ं दिशा की भ्रौरं भीं तम मुखं करके उसे नमस्कार कर सकते हो" वह

English

which the ancient Rishis ate: thy offspring, reckoning from the eldest, will die. I have eaten it neither turned downward, nor turned away, nor turned hitherward. With Brihaspati as head:

अध्याय ११

श्लोक 3.2-10

वि॒द्युत् त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह

vidyut tvā haniṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

यः -भदूदधातिं सन्ति देवा इति चतुष्पदं द्िपदेऽस्य गड ॥२८॥ कर्मं करने वाले को (मृड) सुखी कर, (हि). यतः; (पशूनाम्) प्राणि का के (चतुष्पदे ) चौपायों को (द्विपदे) प्रौर दुपायो को (मृड) सुखी कर । (मा) न, (नः) हमारे (महान्वम्). बुध पुरषः की, उत) भ्ौर (मा नः. श्रमकृम्) न हमारे शिशु की, (मा नः. वहन्तम्) न हमःरे गृह-मार का वहन करने वाली कौ, (उत् मानः वक्षयत्रः)- भौर न. जो .कि हमारे गृह-मार का वहन करेगा उस की, (मा नः पितरम् मातरम् च ) न हमारे पिता श्रौर माता की (हिसीः) हिंसा कर, ख है पाधियों को खुलने

English

with him I have eaten, with him have I come to it. Now this Odana is complete with all members, joints, and body. Complete, verily, with all his members, joints, and body is he

अध्याय ११

श्लोक 3.2-11

कृ॒ष्या न रा॑त्स्य॒सीत्ये॑नमाह

kṛṣyā na rātsyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

हे! मुकेजोतनेत्रुनेदी है वहतोतैरी.दी तन् है उस भरपनी तन -दरसयैखवकारेभ्योऽसंसुक्तगिरष्य॑ः । (रेलवकारेम्यः) विलासी-क्मो के करने वालो के लिये, (म्रसंसुक्त- पापियों को खलाने वाले परमेरवर का (नमः) वच्पात हो, रेस के लिये

English

who possess this knowledge. 33. And thence he said to him, Thou hast eaten this with other ears than those with which the

अध्याय ११

श्लोक 3.2-12

उ॒द॒र॒दा॒रस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह

udaradārastvā haniṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

(श्रकरम्, नमः) ने भी दरतः नमस्कार कियाद, यथा “ूरतो इजना रिलवकारेभ्यः = एलां विलासे +-स्वाथं भण् + मतुबथक “व ¬+ व्यक्तयो का निर्देश किया है, जोकि कुपथ द्वारा, या लूट-मार कर, दूसरों महामुखी या महाखाऊ कृत्तं कहा है । ये व्यक्ति पापी है, हसलियेये ख के .

English

ancient Rishis ate it. Thou wilt be deaf. I have eaten it neither, etc. (as in verse 32).

अध्याय ११

श्लोक 3.2-13

अ॒प्सु म॑रिष्य॒सीत्ये॑नमाह

apsu mariṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

कार । परमेदवरसे प्रा्थनाकीदहै किं वहु इन परर निज वचर प्रहार इन्दे दूरतः नमस्क्रार करदे इन का सामाजिकं वायकाटं करे, क्योंकि एसे भाषण मी मीठे भ्रौर प्रेम संसिक्त विधि से करना चाहिए, जसे कि मनुने से न कहे, उन्हें भी प्रिय वचनो क-कंहे ।

English

With Heaven and Earth as ears, with these I have eaten it, with these I have come to it. Now this Odana, etc. (as in 32).

अध्याय ११

श्लोक 3.2-14

ऊ॒रू ते॑ मरिष्यत॒ इत्ये॑नमाह

ūrū te mariṣyata ityenamāha

हिन्दी अर्थ

नम॑स्ते घोषिणौभ्यो नम॑स्ते केशिनीभ्यः 1 हे खर ! (ते) तेरी (घोषिणीम्यः+) नगारे तथा दुन्दुभि ।का घोष -करने वाली सेनार््रो को (नमः) हमारा नमस्कार हो,. (ते) तेरी (केशिनी- हमारा नमस्कार हो । (नमस्कृताभ्यः) पूवंकाल से चलती भाई" जं कि १. भथवा विजय के घोर्षो को कृरने वाली सेनाधों के लिये ।

English

34. And thence he said to him. Thou hast eaten this with other eyes . . . thou wilt be blind. With Sun and Moon, etc.

अध्याय ११

श्लोक 3.2-15

स्रा॒मो भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह

srāmo bhaviṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

का० ११। सू०२ भ्रथवंवेद-माष्य ५७ (नमः) हमारा नमस्कार हो, (देव) है देव ! (ते) तेरी (सेनाभ्यः) उक्त सव प्रकार की सेनाश्रों को (नमः) हमारा नमस्कार हो, जिस से (नः)हमारी राष्टरिय-सेनाभ्नौं को खदररूप-सेनापति के प्रबन्ध में रखना चाहिए प्रौर इन्द समना चाहिए कि ये रद्र परमेदवर की सेना ह, भौर इन का धर्मात्माभ्रों के पालन के लिये करना है ।

English

35. And thence, etc. . . with other month. Thy offspring will die, reckoning from the head . . . With Brahma as mouth.

अध्याय ११

श्लोक 3.2-16

ब॒हुचा॒री भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह

bahucārī bhaviṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

पाथिवाग्नि तथा विचत् (१२।३।२५१२६) । नमस्कार इन सेनार््रौ के परति भँ शेष बचे श्रोदन मे ६२८८० देव निज साम्यं वाले होते ह । करता है, विनष्ट नहीं होता उस श्रोदन द्वारा म भृत्यु-नदः से तैर जाऊ । नुव । यस्मिन् वेदा निहिता .बिरवस्ासतेनोदतेनाति तराधि . मृत्युम

English

36. And thence, etc. . . . with other tongue . . . Thy tongue will die . . . With the tongue of Agni. 37. And thence, etc. . .

अध्याय ११

श्लोक 3.2-17

स॒र्पस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह

sarpastvā haniṣyatītyenamāha

हिन्दी अर्थ

कां० ११।सु०३ भ्रथवंवेद-भाष्य ४९ गायत्री का भ्रधिपति हरा है, जिस में विद्व का निरूपण करने वाले वेदं निदित.है, उस श्रोदन द्वारा मै मृत्युं को तैर जाऊ । तथा इस भ्रोदन को निज .जीवन मे उस कीं स्थिति परिपक्व करता हूं । इस प्रकार सूक्त ३३ रवे

English

With other teeth . . . Thy teeth will fall out . . . With the Seasons as teeth. 38. And thence, etc. . . . with other vital airs. . . . Thy vital airs will leave

अध्याय ११

श्लोक 3.2-18

ब्रा॒ह्म॒णं ह॑निष्य॒सीत्ये॑नमाह

brāhmaṇaṃ haniṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

१६ श्यामम् श्रयः (काला लोहा) मांसानि मन्व ७ ६० भ्रथवंवेद-माष्य का० ११।सूु०३ (ग) उपरि लिखित प्रतिरूपो के भमिप्राय तथा प्रथंः- (१) बृहस्पतिः = बृहती वाक् तस्याः पतिः, वेदवाणीज्ञः । बृहती में भ्रग्रभूत वेदवाणी के साथ दर्शाया है। भ प

English

thee . . . With the Seven Rishis as the vital airs. 39. And thence, etc. . . . with other expanse . . . Consumption will

अध्याय ११

श्लोक 3.2-19

अ॒प्र॒ति॒ष्ठा॒नोऽनायत॒नो म॑रिष्य॒सीत्ये॑नमाह

apratiṣṭhāno'nāyatano mariṣyasītyenamāha

हिन्दी अर्थ

जोकि वाक् के साधनैः सिरर्मेहीर्है। कां०.११।सु०६ भ्रथर्वैवेद-भाष्य । ६१ (तेत्ति० उप० भृगुवल्ली, अनु ° १० । इन दोनों प्रकार के भ्रोदनों के रारन कर्त्रा को “वृहस्यतिः” तथा िरः” कहा है । वेदो .का पति वेदिक तथा उहा कर लेनी चाहिए । शेष प्रतिरूपो के यथा सम्भव भिप्रायः

English

destroy thee . . . With the firmament as expanse. 40 And thence, etc. . . . with other back. . . . Lightning will slay thee. . . With the heaven as back. 41. And thence, etc. . . . with other

अध्याय ११

श्लोक 3.3

चक्षु॒र्मुस॑लं॒ काम॑ उ॒लूख॑लम्

cakṣurmusalaṃ kāma ulūkhalam

हिन्दी अर्थ

६६ अथवंवेद-माष्य का० ११।सू०३ (योग १।१६) । ये कार्येजगत् विरक्त होते है" भरतः हैत्य नहीं होते । इति. तकार लोपे, “चोः कुः” इति कृत्वम् । अश्वा; कणा गाव॑स्तण्डुला मशकास्तुषांः ॥४॥

English

The plants are wakened into life, and every herd that grows on ground. The man who knows this truth of thee, O Prāna, and what bears thee up

अध्याय ११

श्लोक 3.3-2

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॑ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

तुष ह ब्रीहि के छिलके । तुष हाथ में चुबते है, मच्छर भी काते है। भतः इन का सम्बन्ध परमेइ्वरोदन के साथ है 1 भ्रतः इन में प्रतिरूपता है । क्र फडीकरंणाः शरोऽ्रम् ॥६॥ (शरभम्) मेष है (शरः) उबलते तण्डुलो की सरग के स्थानी । कब्रके स्थानम सायणने “कश्रु" पाठ मान करः “कं शिर एव

English

The plants are wakened into life, and every herd that grows on ground. The man who knows this truth of thee, O Prāna, and what bears thee up

अध्याय ११

श्लोक 3.3-3

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

मौर अर्थं किया है (८४० ए०प8) । “कन” -पद का स्यान्तर “कंवर” तथां “कब्” शब्द प्रतीत होते है, जिन के भ्रथं है “४1९8160 00107; (वेता० उप ४।५) हारा. भरङृति-पदाथं को विविधरगी दर्शाया है । भ्रवहत ब्रीहि मी, समूहरूप मे, विविधरंगी होते है, तण्डुल तुष, तिनके--इन का मिधित खूप विविधरगी ही होता है, इसे फलीकरणावस्था कह -सकते कां०११। सुर ३ भ्रथववेद-भाष्य ६७ ह । “शरः” का भरं मलाई भी होता है जोकि उबलते तण्डुलो की फाग की

English

Cattle and beasts rejoice thereat: Now great will he our strength, they cry. Watered by Prāna’s rain the plants have raised their voices in accord:

अध्याय ११

श्लोक 3.3-4

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

तरह सुफद होती है । इस सादृर्य से फाग को “शर कहा हो । कद्रु, भ्रमु का सम्बन्ध परमेदवरोदन के साथै, नौर फलीकरणो भ्रौर फाग (शर) का कृष्योदन के साथ । इस प्रकार परस्पर प्रतिरूपता है । “अदिति” भी लाल भ्रोदन सम्बन्धी लालिमा स्थानी है ।

English

Thou hast prolonged our life, they say, and given fragrance to us all. Homage to thee when coming nigh, homage to thee departing hence!

अध्याय ११

श्लोक 3.3-5

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

साठीकेषघानका कौनसा भाग मांसस्थानीदहै, श्रौर उस की प्रतिरूपता, काले-लोहे के साथ किस प्रकार सम्भव है-यह विचारणीय है । मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ (बृहदा ० उप ० ३।९।२८) मे, पुरुष के सवृ, रपुं भसम हरितं वणेः पुष्करस्य गन्धः ॥८॥ त्रपु काला सा होता है, भोदन पाकानन्तर बची भस्म भी काली सी होती है। केसर का. पुट देकर भ्रोदन का निखरा पीत वणं सुवणं के पीतवणं के सदृश होता है । तथा इसे इसप्रकार पकाना त्राहिये कि कमल

English

Homage, O Prāna, be to thee when standing and when sitting still. Homage to thee at every breath thou drawest in and sendest forth!

अध्याय ११

श्लोक 3.3-6

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

, ६८ भरथर्वेवेद-भाष्य का० ११।सु०३ भ्रोदन-त्रह्म तथा रोदन कृषि मे दर्शाई है । .. कन्वो के साथ सम्बद्ध वो बाहुए (ईषे) शकट के भगले मागमे. लगे दौ. खलः व्रीहि के कटे-पौ्धो के पीडन का स्थान । पात्रम् शकट का

English

Homage to thee when turned away, homage to thee seen face to face! This reverence be to all of thee!

अध्याय ११

श्लोक 3.3-7

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

वह् भाग जिस मे कटे-त्रीहि-पौघौ को डालकर खलियान तक लाया जाता जाता है । जसे कि रथोपस्थ “रथोपस्थ उपाविशत्” (गीता) । तथा उपस्थः (सायण) ,उच समवाये । ईषे शकट के दो पावो से भ्रागे बढ़ हुए दो दण्डे, . जिन के मध्य मे जोतने क लिए ब॑ल खड़ा किया-जाता है 1 “श्रनुक्या' के

English

Prāna, communicate to us thy dear, thy very dearest form. Whatever healing balm thou hast, give us thereof that we may live.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-8

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

स्थानी है, जिन द्वारा कि बैल को शकट के साथ जुभ्रा के साथ जोता जाती है, (गदाः) गुदा की नाडियां (वरत्राः) चम की पेटीरूप रज्बु स्थानी हं । ¦ का० -११। सू० ३ अरथर्ववेद-भाष्य ६६ (कृषि) के साथ है, ये मानुष रचनाएं ह । इन दोनों प्रकार के धटकीं मे प्रतिरूपता दयाई है । .

English

Prāna robes living creatures as a father his beloved son. Prāna is sovran Lord of all, of all that breathes not, all that breathes

अध्याय ११

श्लोक 3.3-9

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

जात हृए ओदन की (कुम्भी ) देगचीस्थानी (भवति) होती है भ्रौर (चौः) द लोक (भ्रपिधानम्) ढकना स्थानी होता है । रीनषे भर्थात् पकाए जाते हए कृष्योदन की एक तो होती ह कुम्भी रथात् देगची श्रौर दूसरा होता है उस पर कना । इसी प्रकार रीन्वे -जाते रथात् पृथिवी रौर च लोक की रचनार््रो- को दृष्टिगोचर करके, रचयिता काभानया ध्यान किया जाता है, यह है इस की श्राराधना। त्था. पृथिवी (पक्वः) छाती की पसलियां (सीताः) इल चलाने की. रेखाभ्रो भर्थात्

English

Prāna is Fever, he is Death. Prāna is worshipped by the Gods. Prāna sets in the loftiest sphere the man who speaks the words of truth.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-10

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

खेत मँ हल चलाने पर जो गहरी खार्यां . पड़ जाती है, भ्रौर खार्ईयों के दो भ्रोर उन्नत ढेर हो जाते है, वे पसलि्यो की भ्राृति के सदुश है । पस- लियो के मध्य खाली स्थान खादइयां सी होती है, उन क दोनों म्रोर पसलियां उमरी हई होती है । पर्शवः भरर सिकताः परमेखवरीय रचनाए है । भ्रौर ७० अथर्ववेद-माष्य .का० ११। सु° ३ ऋतं हस्तावनेजनं कस्य पसेच॑नग् ॥२२॥

English

Prāna is Deshtri, and Virāj Prāna is reverenced by all. He is the Sun, he is the Moon. Prāna is called Prajāpati.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-11

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

की कतियां है, हस्तावनेजन भ्रौर उपसेचन मानुष कतियां है । इस प्रकार परमेरवरीय भौर मानुष कृतियों मे प्रतिरूपता है । (परिगृहीता) श्रग्नि से उतार कर ग्रहण कर लौ गई है, (साम्ना) सामवेद का उच्चारण कर . परिपाक करे का विधान मन्व - १४, १५ मेंह्भ्रादहै। सम्बन्धे हृ्रा है । ५4 परमेदवरोदन के सम्बन्ध ये, ज्ञानाग्नि पर परमेरवरीय भावना

English

Both breaths are rice and barley, and Prāna is called the toiling ox:

अध्याय ११

श्लोक 3.3-12

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

का परिपाक करना चादिये, भ्रौर वह परिपाक वेदों के प्रतिपादन के भ्रनुसार विज्ञान पूरवंक होना चाहिए.। परमेर्वरोदंन के परिपक्व करने के लिए कुम्भी का० ११। सु० ३ भय्ववेद-माष्य ७१ (बृहत्) बृहत् नामक सामगान है (आयवनम्). उदक भं डाले गणए

English

In barley is the inbreath laid, and rice is named the outward breath. The human infant in the womb draws vital breath and sends it

अध्याय ११

श्लोक 3.3-13

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

गान है (दविः) श्रोदन के उद्धरण का उपकरण । परमेश्वर रूपी भ्रोदन को बृहत् सामगाने दवारा निज जीवनीय रस- (ऋतवः) ऋतुएं हँ (षक्तारः) भरोदन के उपादान भूत ब्रीहिको परमेदवर पक्ष मे भिन्न-भिन्न ऋतु काल तथा ऋतु कालों मँ प्रतीय मान परमेदवरीय भिन्न-भिन्न कृतियां परमेदवर सम्बन्धी भावनाभो को ्रदीप्त करती है, भौर खेतों म ब्रीहि को ऋतु काल पकाते ह ।

English

Lout:

अध्याय ११

श्लोक 3.3-14

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

चुर. पञ्बिलमुखं धर्मो मीन्धि ॥१८॥ भ्रभितप्त करती है । तथा भरुतपञ्चकरूपी पांच बिलों वाली पुथिवीको पृथिवी = कुर्मी (मन्व ११) । हृष्योदन -के परिपाक के लिये कुम्भी भर्थात् देगची परं के ठकने मे ५ छ? होने चाहिए, एेसी विधि प्रतीत हेतौ है । इ विधि द्वार मी की माप का नियन होता सहता है ।

English

When thou, O Prāna, quickenest the babe it springs anew to life. The name of Prāna is bestowed on Mātarisvan and on Wind.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-15

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

शचोदुनेनं यहवचः सवै लोकाः संमाप्या; ॥१९॥ सब लोक प्राप्त हो जतेर्है। ४२ ७२ भरथरवेवेद-भाष्य का० ११. सु० ३ श्रोदन-बरह्य जब जीवन में परिपक्व हो जातादहै, ्रउसदढारा

English

On Prāna, past and future, yea, on Prāna everything depends.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-16

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

देखो श्रथवं ० (९।६। पर्याय ४), इस में केवल प्रतिथि यज्ञ दारा सब तरकार के यज्ञो के फलो.की प्राप्ति कही है । भर्थात् परस्पर नीचे-ऊपर रूप मे, (भिताः) आधित है। जोकि शारीरिक भोजन है। श्रमिप्रायः यहं पाकलालीय भ्रोदन दारा है कृष्योदन को नहीं । षडकरीतयः ६ ८० देवतां पर सम्भवतः निम्न- लिखित मन्त्र कुछ प्रकाच डाल.सके । यथा--

English

All herbs and plants spring forth and grow when thou, O Prāna quickenest, Plants of Atharvan, Angiras, plants of the deities and men.

अध्याय ११

श्लोक 3.3-17

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

्ष्टापूतंमवतु नः पितृणामामु ददे हरसा हैव्येन ।। भयव ०२।१२।४॥ कां० ११। सु० ३ भ्रथरवैवेद-माष्य ७३ कंही हैँ । इस कै द्वितीय पाद मँ “भ्रादित्येभिः+, वसुभिः + 1 केदेवोंकांवर्णन हूभादहै। यदि इन धा 1 का भ्रन्वय किया जाय तो इन की समुदित संख्या भी तीन वा (३ ना ८०) हो जातीरहै। ३ गुना ८० सामग, तथा भादि- मग भादि सब मिल कर “षडशीतयः” संख्या उपपन्न हो सकती है । (त्वा) तुम से (रोदनस्य) भरोदन की (पृच्छामि) पूता : (यः (तम् ) उस महिमा को महिमा) महामहिमा 8 । ॥। ) जो कि ( भस्य) इस भ्रोदन की ( महान

English

When Prāna hath poured down his flood of rain upon the mighty earth,

अध्याय ११

श्लोक 3.3-18

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

नाय इतिं श्रयान्नालुंपसेचन इति नेदं च कि चेति ॥२४। दोप्रकारसेकी जा सकती है । सृष्टि की रचना ् 1 नाको देखं कर “सुष्टिकर्ता । करना होता है 1. यह उपासना “उच्छिष्ट ज्रह्मोपासना"" है । ६८८ वाना भ्रभिप्राय भरनुसन्धेय है 1 1 चाहिए “"भज्ञीतिभिस्तिभुभिः » मसीतिमिस्तवृनिरादितेभिवुभिरङ्खोमिः

English

The plants are wakened into life, and every herd that grows on ground. The man who knows this truth of thee, O Prāna, and what bears thee up

अध्याय ११

श्लोक 3.3-19

तं वा अ॒हं नार्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म्

taṃ vā ahaṃ nārvāñcaṃ na parāñcaṃ na pratyañcam

हिन्दी अर्थ

श्रादित्येभिः, वसुभिः दवाय ४८ वषं भ्रौर २४ वषो के पोषि क १. ब्रह्मचारियों का 3 तत्त्वो का नहीं । “अङ्किरोभिः” तथा “सामगेभिः" के व । : प च अभु भाषिमौतिक ही प्रतीत होते है । जड़ भ्ादित्य भौर वसु सामगान नहीं कर सकते । गौण अथं भे सामगान की कल्पना व्यथं है । ७४ ्रथर्वेवेद-भाष्य कां ११।सू०३

English

To him will all present their gift of tribute in that loftiest will all present their gift of tribute in

अध्याय ११

श्लोक 3.4

दितिः॒ शूर्प॒मदि॑तिः शूर्पग्रा॒ही वातोऽपा॑विनक्

ditiḥ śūrpamaditiḥ śūrpagrāhī vāto'pāvinak

हिन्दी अर्थ

से चाहता है कि इस ““उपसेचन"" की विधि का भो उपदेक्ष दिया जाय । उपदे का श्रवणमात्र ही होता है, इस से भ्रधिक का नहीं । भ्रधिकं उपदेश के लिये उपदेष्टा जब श्रोता को ्रधिकारी जान लेगा तो वह॒ निज कपा से (दाता) दाता (यावत्) जितना (श्रभिमनस्थेत) देने का मन करे, (तत् न भरति बेत्) उस से भषिक के लिये नं कहे ।

English

Lighted by fuel goes the Brahmachāri, clad in black-buck skin, consecrate, long-bearded. Swiftly he goes from east to northern ocean, grasping the worlds, oft bringing them anear

अध्याय ११

श्लोक 3.4-2

बृह॒स्पति॑ना शी॒र्ष्णा

bṛhaspatinā śīrṣṇā

हिन्दी अर्थ

है कि दाता जितना देना चाहे उस से श्रधिक न मागि । यदि भ्रोदन, . विना . दाल-सब्जी के, दाता ने दिये है, तो उस से इन उपसेधनो की माग न करे। यह उपदेश धनादि के दान के सम्बन्व म भी समना चाहिए 11 (वादिनः बदति) बहा प्रवचन करते बाले क भत् का० ११।सु०३ ग्रथवेवेद-माष्य ७१.

English

Filled with a babe, mid deities he wanders: grown; near at hand, he springs again to being. That Father, grown the present and the future, hath past into the son with mighty powers.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-3

द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्याम्

dyāvāpṛthivībhyāṃ śrotrābhyām

हिन्दी अर्थ

परमेदवर के शरीररूप मेँ वणित किया है, भरोर 4४ के श्रवयवों र जसे भस्मदादि -दारीर ्रौर शरीरावयव जीवात्मा के ज्ञान, इच्छा तथा प्र० २ खण्ड ३).द्वारा प्रकट किया.है। करता है, या केवल चिदानन्द स्वरूप ४ मे ही लीन रहता + ४

English

Hansa, what time he rises up, leaves in the flood one foot un- moved.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-4

सू॒र्या॒च॒न्द्र॒म॒साभ्या॑म॒क्षीभ्या॑म्

sūryācandramasābhyāmakṣībhyām

हिन्दी अर्थ

(त्वाभ्) तेरा (ग्रोदनः इति) भरोदन ने प्रादान कियाहै! जगत् का मोग करने वाला जगृत् का भोग. नहीं करता जगत् ह्वी उस मोक्ता. कां भोग कर रहा होता है। “मोगा न भुक्ता भ्राह) इस प्रकार इस जगद् भोक्ता को कहे । ।

English

If he withdrew it there would be no more tomorrow or to-day, Never would there be night, no more would daylight shine or morning flush.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-5

ब्रह्म॑णा॒ मुखे॑न

brahmaṇā mukhena

हिन्दी अर्थ

परमेदवर सम्बन्धी कथन है, परमेदवर कहता है कि “यै श्रत हूं"श्रौर जीवन में जीवनीय शक्ति का हास होता ही है। जीवनीयद्यक्ति है, प्राण । “भोगे रोगभयम्", भोगो हारा रोगों का भय होता है, श्रौर रोगोंके विरत रहने का निर्देश किया है ।

English

It rolleth on, eight-wheeled and single-fellied, and with a thousand eyes, forward and

अध्याय ११

श्लोक 3.4-6

अ॒ग्नेर्जि॒ह्वया॑

agnerjihvayā

हिन्दी अर्थ

भ्रल्लाद भी है । परमेरवर के भजन श्रौर उपासना में अ्जरधिक लीन रहने, भौर खान-पान तथा शारीरिक स्वास्थ्य से लापरवाह हो जानं पर श्रपान वायु विक्त हो जाती है, भ्रपान वायु का यथोचितलू्प में भ्रपसरण नहीं होतां । यह् भरपान का त्यागा जाना है । । का० ११। सू०३ भथ्वंवेद-माष्य ७७ किया है। तो- किस्त ने किसर का प्राशन किया, इसका उत्तर ३१

English

backward. With one half it engendered all creation. What sign is there to tell us of the other?

अध्याय ११

श्लोक 3.4-7

ऋ॒तुभि॒र्दन्तैः॑

ṛtubhirdantaiḥ

हिन्दी अर्थ

रेतसः पुरुषः, स वा एष पुरुषः भ्रननरसमयः' (तेत्तिरीयोपनिषद्) । भोदन पुरुष शरीर , इसलिये पुरुष शरीर श्रननरसमय है । इस भ्रन या म्रोदन रूपी शरीर ते निज - भ्रावद्यकतानुसान्, न कि. भोग॒ भावना से। ग्रोदन का प्रादान किया है: भरतः इसु प्राशन मे कोई दोष नही. । रौर भरात्म- (२) ष्योदन का प्राशन किस विधि से करना चाये, भौर इस

English

Homage, O Prāna unto thee armed with swift bow among the rest,

अध्याय ११

श्लोक 3.4-8

स॒प्त॒ऋषिभिः॑ प्राणापा॒नैः

saptaṛṣibhiḥ prāṇāpānaiḥ

हिन्दी अर्थ

कां०११॥ सु० ३. ग्रथवेवेद-माष्य ७९ देकर रोदन प्राशन करेगा तो भ्रोदन प्राशन उस के लिये सुफल होगा, ३२-४९ मन्त्रोक्त देवताः । प्रथम चरण ३२, ३८, ४१, स० चण ३२-४९ भन्त्रो को अनुक्मणौ में “दण्डक कहा है ।

English

In whose dominion is this All of varied sort that stirs and works! May he who rules this Universe of varied sort, that stirs and works,

अध्याय ११

श्लोक 3.4-9

अ॒न्तरि॑क्षेण॒ व्यच॑सा

antarikṣeṇa vyacasā

हिन्दी अर्थ

सर्व॑तन्ः सं मवति य एवं वेदं ॥३२॥ ८9 । . भ्रथवेवेद-माष्य कां० ११1 सूु०३ (पुवं ऋषयः) पूवं काल के या सदगर्णो से पूरित ऋषियों ने (येन इस प्राशन करने वाले को कटे 1. (तम्) उस भ्रोदन को (वं) निद्चय से,

English

Prāna, alert and resolute, assist me through the prayer I pray.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-10

दि॒वा पृ॒ष्ठेन॑

divā pṛṣṭhena

हिन्दी अर्थ

बृहस्पति रूप सिर से मै ने उस श्रोदन का प्रादान किया है। (तेने) उस पूवं ऋषयः = पुवं पूरणे, सदगणों से सम्पूणं । प्रजा ज्येष्ठतः = वि ग्रास बनी रहेगी । शरीर है जीवात्मा की पुरी भ्रौर इस पुरी मे रहने वाले भनोदन केः प्रान का निषेव किया है । इस प्राशन को विचार पूर्वक करना चाहिए

English

Erect among the sleepers he wakes, and is never laid at length, No one hath ever heard that he hath been asleep while others slept.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-11

पृ॒थि॒व्योर॑सा

pṛthivyorasā

हिन्दी अर्थ

का० ११। सू०३ भ्रथवंवेद-भाष्य । ८१ उसे सर्वानुग्रहकारीरूप मेँ जान कर उसका रैनि प्राशन किया है । का प्रवेश कटा है । प्रादनकर्ता कहता है कि मैने सिर को बृहस्पति जान सम्पूणं हो जाता है । यह फल निर्देश. किया है । भरथवं० ११।३।१ मे “शिरः”

English

Thou, Prāna, never shalt be hid, never shalt be estranged from me.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-12

स॒त्येनो॒दरे॑ण

satyenodareṇa

हिन्दी अर्थ

कृष्योदन में प्रतिरूपता दर्गाई है । जीवनम दो प्रकार के श्रोदर्नो की भावद्यकताह। एक कीतो सवीज्ञ एव सर्वपरः सर्व॑तनूः स मवति य एवं वेदं ॥३३॥ (पूर्वं ऋषयः) पूवं काल के यां सद्गुणं से पूरित ऋषियों ने ।

English

I bind thee on myself for life, O Prāna, like the Waters’ germ. A glorification of the Brahmachgri or religious student

अध्याय ११

श्लोक 3.4-13

स॒मु॒द्रेण॑ व॒स्तिना॑

samudreṇa vastinā

हिन्दी अर्थ

किया है तो. (वधिरो भविष्यति) तु बहरा हो जायेगा (इति) यहं (एनम्) (यः) जो श्रोता (एवम्) ईस प्रकार से (वेद) ब्रहूीदनं को जनता है, वह . ¦: युक्त, (सवेतनूः) सम्पूणं शरीर वाला (सं भवति) हो जाता है +. श्रवण से ब्रह्मौदन का प्राशन करना है। इस के लिये शनो को च.लोकं भनौर परथिवी का रूप देना होगा । च् लोक भ्रौरं पृथिवी क भीतर नाना-

English

Stirring both worlds the Brahmachāri moveth: in him the deities are all one-minded.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-14

मि॒त्राव॑रुणयोरू॒रुभ्या॑म्

mitrāvaruṇayorūrubhyām

हिन्दी अर्थ

का० ११। मु० ३ भ्रथवंवेद-माष्य प न 8 निविकार रूप मे वतंमान रहते है । इसी प्रकार निज शरोत्रं श्रवण के उन्मुख करना होगा । बधिरो भविष्यसि यदि तूने चावाप्रृथिवी ्रौर णसा ही रहेगा । जैसे कि वेदवाणी के सम्बन्ध मे कहा है कि “उत त्वः

English

He hath established firmly earth and heaven: he satisfies his Master with his Fervour.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-15

त्वष्टु॑रष्ठी॒वद्भ्या॑म्

tvaṣṭuraṣṭhīvadbhyām

हिन्दी अर्थ

सर्वाङ्गः एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भ॑वति य एवं वेद ॥३४॥ इधर गति करते हुए को, (न पराञ्चम्) न दूरके लोकों में गति करते युक्त, (सवंतनूः) सम्पूणं शरीरं वाला (सं भवति) हो जाता है । क्४ भ्रथंवंवेद-माष्य को० ११।सूु०३

English

After the Brahmachārī go the Fathers, the heavenly hosts, all

अध्याय ११

श्लोक 3.4-16

अ॒श्विनोः॒ पादा॑भ्याम्

aśvinoḥ pādābhyām

हिन्दी अर्थ

सूयं श्रौ र चन्द्ररूपी ्रंखे सव को समरूप से देखती हँ । इसी भाव कों गीता मे (१२।१६) कहा है “समः शत्रौ च मित्र च । तथा “समः सर्वेषु भूतेषु” (पूवं ऋषयः) पूवं काल कै या सद्गुणो से पूरित ऋषियों ने(येन मुखेन) दवारा दो स्थानों मे प्राषयों मे भेद दर्शय है । कां०११। सु०द' न्रथर्ववेद-भाव्य क ॥ छथ

English

Gods in separate order. After him too have the Gandharvas followed, thirty and three, three hundred, and six

अध्याय ११

श्लोक 3.4-17

स॒वि॒तुः प्रप॑दाभ्याम्

savituḥ prapadābhyām

हिन्दी अर्थ

मे पहुचाया है । (एष वा श्रोदनः सर्वाङ्खः सवंपरः सवतनूः) यह. भ्रोदनं प्रकार भरोदन को जानता है वह॒ (सर्वाङ्गं एव सवेपरः सर्व॑तनूः सं भवति) सर्वाङ्गं सम्पुष्ट हो जाता है। नियम से बद्ध हो कर भक्षण करता है, स्वाद, लोम श्रौर लालच से नहीं। लालच से नहीं, ्रौर नियत समय मे प्रारानः करना चाहिए । यतः ३५ वं

English

thousand. He satisfies all Gods with his devotion.

अध्याय ११

श्लोक 3.4-18

ऋ॒तस्य॒ हस्ता॑भ्याम्

ṛtasya hastābhyām

हिन्दी अर्थ

प्रपितु उदारता पूवंकं धर्मं भावना से दिये गये, या स्वोपांजित भ्रोदन का सेवन करना चाहिए, श्रौर इसे सर्वाङ्गं सम्पूणं भोजन जानना चाहिए । यह मव कल्याणकारी, भवलास अर्थात् बलक्षय को. दूर करते, खानेमे मधुर, ८६ भ्रथर्वेवेद-माष्य का० ११।सूु०३

English

The Master, welcoming his new disciple, into his bowels takes the Brahmachāri. Three nights he holds and bears him in this belly. When he is born, the Gods convene to see

अध्याय ११

श्लोक 3.4-19

स॒त्ये प्र॑ति॒ष्ठाय॑

satye pratiṣṭhāya

हिन्दी अर्थ

(पूवं ऋषयः) पूरवंकाल के या सदृ गुणो से पूरित ऋषियों ने (यया जायेगी, (इति) यह (एनम्) - इस प्रादान - कर्ता को विन्न (राह) कहे) को (श्रजीगमम्) मैने उदरादि मे पहुंचाया है । (स वा भ्रोदनः"“"वेद) भ्रथं . । । श्रोदन का प्राश्न करने वाला कहता है कि मैने निज जिह्वा. दारा

English

him.

अध्याय ११

श्लोक 3.5

अश्वाः॒ कणा॒ गाव॑स्तण्डु॒ला म॒शका॒स्तुषाः॑

aśvāḥ kaṇā gāvastaṇḍulā maśakāstuṣāḥ

हिन्दी अर्थ

किया है! मनुषी-जिह्वा तो चटपटी, राजसिकः तामसिक, तथा प्रवेष मास - ¦ ॥ बती है, भविङ्ृत रूपा है । भग्निदेव के भ्रति मांसाहृति वेदविष्ढ है । त्यैनमाह । तं वा अहं नावांञं न परां न मत्य् । बतुभिहैन्तैः । (पूर्वे ऋषयः) पूव॑काल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों ने (येः .

English

Mitra from his loftiest soul. The pupil is the Master, yea, the pupil is Prajāpati.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-2

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

प५्) इस रोदन का (भ्रजीगमम्) मने उदरादि मे पहुंचाया है । सं वीं भ्रौदनः?०“वेद) अथं पर्ववत्, मनर ३५ । . ऋतु-ऋतु के श्रनुसार व्यञ्जनो मे यथोचित परिवर्तन के साथ, तथा ऋतु-ऋतु के मरनुसार भ्रोदन के परिपाको को तम्यार कर, भ्रोदन के मन्व रँ ऋतुचर्या का विचार दिया है । (वे ऋषयः) पूवं काल के या सगुणो से परिह ऋष्यो ने (येः)

English

The Brahmachāri, earlier born than Brahma, sprang up through

अध्याय ११

श्लोक 3.5-3

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

खाया 8, (ततः) उस से (च = चेत्) यदि (श्रन्यैः) भिज्ञ रकार के (एष वा भद्रन“ "वेद ) पूर्ववत् मन्व ३ ५। सप्तषि दो पभरकार के है (१) च लोकस्थ, (२) शरीरस्थ । मन्तमे शरीरस्थ सप्तषियो का कथन किया है । यथा “सप्त ऋषया प्रतिहिताः

English

Fervour, robed in hot libation. From him sprang heavenly lore, the highest Brahma, and all the

अध्याय ११

श्लोक 3.5-4

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

मस्तिष्क मे सात ऋषि साथ-साथ उपविष्ट है । इस पर निरुक्त मे कहा ह स्वेतनूः सं भ॑वति य एवं वेद॑ ॥३९॥ वे ऋषयः) पूर्वकाल के. या सदृगणो से. परित ऋषियों ने (येन , कां० ११।सू्० ३ अ्रथववेद-भाष्य ८९

English

Gods, with life that lasts for ever.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-5

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(पुवं ऋषयः) पूवं काल के या .सदुगुणो से पूरित ऋषियों ने (येन विजली (त्वा) तेरी (हनिष्यति) हत्या करेगी,- इति ) यह ( एनम् ) धयु क्षयरोग होने नहीं देती । यइ बुद्ध वायु फेफडो मे जा कर, रणत को शुद्ध करके, समग्र शरीर तया शरीरावयवों को स्वस्थ करती है । , ९० . श्रथरवेवेद-माष्य -कां० ११ सु०३

English

Lighted by fuel goes the Brahmachāri, clad in black-buck skin, consecrate, long-bearded. Swiftly he goes from east to northern ocean, grasping the worlds, oft bringing them anear

अध्याय ११

श्लोक 3.5-6

तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्

tayainaṃ prāśiṣaṃ tayainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

शरीरके पृष्ट भाग मे मस्तिष्क ( छं? ), सुषुम्णा नादी सेवन इस प्रकार करने का विधान किया है जिस से किं चुलोकात्मक' नाडी देती है । महात्मा के सिरोंके चारों भ्रोरं जो प्रभामण्डल होते. हवे. नसएणा हपट १० एषा" (्रन्यकार (दारिणां ह ¢पतला०0, 4. 0.

English

him.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-7

तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्

tairenaṃ prāśiṣaṃ tairenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

के निम्नलिखित उद्धरण विशेष प्रकारश्च डालते है यथा-- १. दुषुम्णानाड़ी के चक् तथा तनतु काः तान-्रतान, शरीर भे मका ( (नधत) का हेतु है । तथा “दिवं, मश्वके सूरबनम्” (भथ १०।७।३९) दवा पूवा ॥ (पूर्वे ऋषयः) पूरवेकाल के या सद्गुणो से प्रित ऋषिर्यो ने (येन

English

The Brahmachāri, fathering Prayer, world, Waters, Virāj, Prajā- pati, and Parameshthin, Lay as a germ within the Immortal’s bosom, then became Indra and destroyed the demons.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-8

तैरे॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तैरे॑नमजीगमम्

tairenaṃ prāśiṣaṃ tairenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

तो (कृष्या) कृषिकमं दवाय (न रात्स्यसि) तु समृद्ध नहीं होगा-- (इति) ( भ्रजीगमम् ) मैने उदरादि रङ्गो मे पहुंचाया है । (एष वा भरोदन वेद) पृथिव्या उरसा जिस प्रकारं प्रथिवी, बीज का एक दाना खा कर, उसे रूपान्तरित कर, उस से करई गुना बीज दानो को उत्पन्न कर, प्राणियों की रक्षा करती है, इसी प्रकार मैने वक्षः स्थल कूपी पृथिवी मे वीरता भौर . (वं ऋषयः) पूवं काल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों उदरेण) जिस उदर से (एतम्) इस भ्रोदन का नि ४५ ।

English

The Master fashioned both these cloudy regions, profound and spacious pair, the earth and

अध्याय ११

श्लोक 3.5-9

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

६२. भ्रथववेद-माष्य कां० १९१ सू० ३ (ततः) उस से (अन्येन उदरेण) . भिन्न भ्रकार के उदर से (चं चेत्) यदि (एनम्) इस भ्रोदन का (प्राशः) तूने प्राशन किया है, तो (उदरदारः ). (एनम्) इस ओदन का (प्रािषम्) मैने भराशन किया है, (तेन) उस द्वारा (निषं १।१२) । उदक के उचित मात्रा में सेवक करने से भ्रान्तो की खुद्की दुर हो कर, शौचक्रिपाके हो जाने से, उदर व्यथा नहीं होने पातीः-यह

English

heaven. The Brahmachāri guards them with his Fervour. In him the deities are all one-minded.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-10

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

अथवं० ४।१६।६.७ मे भ्रनृतमाषणं का सम्बन्ध उदर के संज्ञाव के - । मी उचित मात्रा में होना चाहिए । २. इस मन्त्र मँ ““भनृत-भाषण" को उदर-संज्ाव का हेतु दर्शाया है । उदर- कां० ११। सू० ३ भ्रथववेद-माष्य ९३ (पूरवे ऋषयः) पूवंकाल के या सदृगुणों से पूरित ऋषियों ने. (येन

English

The Brahmachāri first of all brought hither this ample earth as alms, and heaven above it.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-11

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

चेत्) यदि (एनम्) इस भ्रोदन का (पराशषीः) तूने प्राशन किया है, तो (भ्रमु) जलो मे (मरिष्यति) तु मरेगां, (इति) यहं (एनम्) इस प्राशन समुद्र खारी होता ह, भ्म्ल नहीं ! भोजन भें मोज्य पदां ेसा होना चाहिए जो कि मूत्रमे भ्रम्लपेदा न करे, तथा जलपान भी इसी बना देता है, श्रौर मधुमेह जसे रोगों को उत्पन्न कर देता.है । तथा णप् जलपान प्रभूत मात्रा मेँ होना चाहिए, इस से वस्तिरोग नदीं सर्वेपडः स्वेतनः सं भवति य एवं वेदं ॥४४॥

English

He makes these twain two fuel-logs, and worships, On these sup- ported rest all living creatures.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-12

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(पूवे ऋषयः) पूवं काल के या. सद्गुणो से -पुरित ऋषियों ने भे भोज होताहै, जिससे ऊरु समग्र शरीर के भारको उठाए रखते है । भोजन दस प्रकार का भ्रौर इस दुष्टि से करना चाहिए जिस से ऊर््रो में उदित होता है, भ्रौर चन्द्रमा परिचम दिशा से । वरण, परिचम दिदाका म्रधिपति है । यथा “प्रतीची दिग् बरुणोऽचिपतिः” (रथव. -३।२७।३) । सूयं नौर चन्द्रमा कीः किरणे इन दोनों के ऊर है । ये बड़ भोज वाति है । मानो इन को किरण रूपी ऊर ने इन भारी सूये भ्ौर चान्द के बोम को उठाया ॥

English

Both treasuries of sacred lore lie hidden, one hitherward, beyond heaven’s ridge the other.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-13

तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम्

tenainaṃ prāśiṣaṃ tenainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

छवङ्ग एव सर्वपरः सर्व॑तनूः स मैवति य एवं वेद् ॥४५॥ (पूवं ऋषयः ) पूरवेकाल के या सद्गरणों से पूरित ऋषिर्यो ने कां ११।सु० ३ .. भथर्ववेद-भाष्य ९५ . भरोदन का. (भालीः) तूने प्रान किया है तो (सामः) लामरोग वाला

English

The Brahmachārī with his Fervour guards them. He makes this all his own as knowing Brahma.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-14

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

भरस्थियां ह करकाः, श्रोले । ये ओले जब पृथिवी प्र गिरते ह तो कल्निा- ५ दृढावस्था मे होते है । इसी प्रकार घुटनों की वृदावस्था हनो चाहिए. . घुटनों की श्रस्थियों के ढीला पड़ जाने से घुटकों मे पीड़ाहो दिया-ह । ज्लामः=शुष्कजङ्खः (सायण) । का सर्वाङ्गः एव सरव॑परः सर्व॑तनूः सं भ॑वति य एवं वेदं ॥४६॥ (पूर्वे ऋषयः) पूवेकाल के या सदुगृणों से पूरित ऋषियों ने (याम्यां

English

Hitherward one, hence from the earth the other, two Agnis meet between these cloudy

अध्याय ११

श्लोक 3.5-15

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

(बहुचारी भविष्यसि) बहुत विच॑रने वाला तु होगा, (इति) यह (एनम्). भररिवयों के उनदो पादो से (एनम्) इस मोदन का (प्रारिषम्) सेने पटुचाया है । (एष वा भोदनः'“ "वेद ) भ्रं पूववत् मन्त्र २५। ९६ श्रथरवेवेद-माष्य का० ११। सुण द

English

regions. Close to these two firm rays of light are clinging. The Brahma- chāri enters them through

अध्याय ११

श्लोक 3.5-16

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

रोगों के उपचार कै लिये भिन्न-भिन्न स्थानों मेँ घूमना निष्ट किया है । ६।३४) । पादरोग का शमन सम्भवतः सूयं की शुश्न रदिमियो या इस की सप्तरदिमयो मे से किसी ररिम द्वारा हो सकता हि । भ्रुयं कौ शुन्न रदिमयों . को 8९८४) द्वारा ७ रर्मियों मेँ विमक्त किया जा सकता है । वैदिक साहित्य मे श्रदिवयों को “देवानां भिषजौ” द्वारा वणित . मी किया जाता

English

Fervour.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-17

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

ररिमिभिः” (यजु० १,३१) । सूर्यं को रदिमयों को हस मन््रपाद मै , ञ्रभिप्राय यहहो कि तेरी टंगो. तथा परो मे भ्रस्थिरता तथा लड़- खडाना रोग हो जायगा, जिसका कि उपचार “्रदिविनोः पादाम्याम् हारा हो सकेगा । “बहुचारी" पदं मे “चर का भ्रथं “गतिमात्र" भ्रभिप्रेत हने.पर परो की श्रस्थिरता तथा लडखडाना भी गति ही. है । शारीरिक रोगो का मुख्य कारण, उदर तथा खानपान में भ्रसंयम है 1 सवौ एव स्वपः सर्वतनूः से म॑वति य एवं वेदं ॥४७॥ (पूवं ऋषयः) पूरवेकाल के या सदुगृर्ो से पूरित ऋषियों ने (या-

English

Thundering, shouting, ruddy-hued, and pallid, he bears along the earth great manly vigour. Down on the ridge of earth the Brahmachāri pours seed, and this gives life to heaven’s four

अध्याय ११

श्लोक 3.5-18

ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम्

tābhyāmenaṃ prāśiṣaṃ tābhyāmenamajīgamam

हिन्दी अर्थ

पादाग्रों सै (चं चेत् ) यदि (एनम् ) इस भ्रोदन का (आसीः) । यदि (एनम्) इस. ५ :) तूने प्राशन क्या है तो (त्वा) तुभे (सपः) सपं ( ) मार डालेगा, या प्राप्त म पहुंचाया है । एष वा रोदन “““वेद) भ्रथं पूरवेवत् मन्त्र ३५ 1. भ्रपहत हो जाय भ्रौर द्युलोक रदिमियों से भराकोणं हो जाय, भ्रौर नीचे पृथिवी पर भ्रभी तमस् श्रन्धकार हो तो वह सविता काकाल है। इस

English

regions.

अध्याय ११

श्लोक 3.5-19

तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम्

tayainaṃ prāśiṣaṃ tayainamajīgamam

हिन्दी अर्थ

इस.काल में भोदन. रादि का प्राशन, बर्थात् प्रातराश करना चाहिए, न कि द्रस.से पूवं । इम समय से पूरवंकाल मेँ भरन्वेरा भ्रधिक होता है, मरतः सपं प्रादि के काटने का भय रहता है । हनिष्यति =संपं मार डालेगा, या सर्वो्गः एव सरव॑परः सर्वतनूः सं भ॑वति य एवं वेद॑ ।॥४८॥ (पुवं ऋषयः) पूवं काल के या सदृगुणों ऋषियों 4 अथववेवेद-माष्य कां० ११1 सूु०३े

English

The Brahmachāri stores with fuel Waters, and Fire, and Sun, and Moon, and Mātarisvan.

अध्याय ११

श्लोक 3.6

कब्रु॑ फली॒कर॑णाः॒ शरो॒ऽभ्रम्

kabru phalīkaraṇāḥ śaro'bhram

हिन्दी अर्थ

मी, परमेश्वरीयेच्छा के अभाव मे, मेष बरसता नहं । मेध तो परमेश्वराय कृति है, भमौर पत्थर की मूतति मानुषङ्ृति है । पत्थर की मूत से मनुष्य . के कौशल की तो प्रशंसा हो सकती है, परमेश्वर की नहीं । ्रोषधि्यों को (रभि) लक्षय कर के (कन्दति) नादया ध्वनि करता है,

English

May Soma free me, God to whom they give the name of Chan- dramās. All creatures both of heaven and earth, wild beasts and sylvan animals,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-2

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

, (भूम्याम् भ्रधि) पृथिवी पर है। खूप हो जानाः उन की प्रसन्नता है । : का० ११।यु०४ भ्रथवेवेद-माष्य . १०५ निर्चय से (नः) हमारे लिये (महः) महान् भरत (भविष्यति) होगा ॥

English

By self-restraint the ox and horse seek to win fodder for them- selves.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-3

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

प्राणे के.साथ (समवादिरन्) संवादं किया किं (वे) निरचय से (नः भ्रायुः) हमारी श्राय को (परातीत्रः) तूने बढ़ा दिया है, रौर (नः सर्वाः) हम सब कों (सुरमीः) सुगन्धित (श्रकः) तने कर दिया है। नमस्कार हो, (परायते) परे जाते हृएं (नमः, भ्रस्तु) नमस्कार हो । (तिष्ठते) स्थिर होते हृए (ते) तुभे (नमः) नमस्कार हो, (उत) तथा (भ्रासोनाय) बेठे हृए (ते नमः) तुभे नमस्कार 'हो । न, फफडों के मोतर श्रातां, तथा भोतरसे बाहिर जातादहै । प्राणायाम की श्रल्पकालिक तथा दीषंकालिक कुम्भक कह सकते है । विशेष परिज्ञान के

English

By Fervour and by self-restraint the Gods draye Death away from them, And Indra brought by self-restraint heaven’s lustre to the deities.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-4

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्वपरुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

१०९६ श्रथवेवेद-भाष्य कां० ११।५यु४ परमेद्वर का देन भी भल्याधिक काल तक होने लमतां है । पहिले परमेदवर का अत्यल्प काल के - लिये दर्चंन होताः (श्रायते) ; भौर पुनः दन का श्रमावहो जाता, विलोप हयो जाता (परायते) । कालान्तर मे पूर्णतया परिपक्व हौ जाने पर परमे्वर भानो चित्त मे भ्रासीन हौ जाता देना । परायते चित्त से प्ररे-चला जाना, ्र्थात् दशेन का विलोप हो जाना । इस प्रकार का अभिप्राय “तिष्ठते” रौर शभासीनाय का 9.१ मन्तरमें पराण-श्रपान या स्वास-उच्छवास रूप व्रायु के व व

English

The plants, what is and what shall be, day, night, the tall tree of the wood,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-5

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

चेतन- देवता को सूचित करता है । इस लिये व्यं मन्त्रमे भी शश्राण" से राण) है भ्राण ! (श्राणते) प्राण क्रिया करने वाले (ते नमः) तु गति करने वाले (ते नमः) तु नमस्कार हो,(मतीचीनाय ) शरीर के भ्रति भ्र्थात् शरीर के भीतर की भोर गति करने वाले (ते नमः) तुमे नमस्कार हो, (सर्वस्मै ) जगत् की सब प्रकार की करियाभो को करने वाले (ते) तु (इदं नमः) यहं नमस्कार हो.। - (१) प्राणायाम के ४ भाग। अरयवा चतु भाग = “बाह्याभ्यन्तरविषया-

English

The year with seasons of the year, all from the Brahmachāri sprang. All creatures of the earth and heaven, tame animals and sylvan beasts,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-6

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

नमस्कार हो । (पराचीनाय) पराड सुख भर्थात् शरीर से बाहिर की भ्रोर का० ११। सु० ४ भ्रथववेद-भाष्य , : १०७ ग्रपान वायु की क्रिया । पराचीनायपरा (परे) +-भव्च् ( गतौ, पराञ्चनाय, परागमनकरे । मन्व ७ मँ परायते भौर मन्त ८ मे पराचौनाय भ्राण रूप परमेर्वर के प्रति नमस्कार है ।

English

Winged and wingless creatures, from the Brahmachāri sprang to life,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-7

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

अथो यद् मेंषजं तव॒ तस्य॑ नो पेहि जीवसे ॥९॥ (प्राण) है प्राण ! (या, ते, त्रिया, तनू) जो तेरी प्रियरूपा तनु है, भ्रवयवों को, परमेदवर की तनू तथा . तन् के श्रङ्खोके रूपमे वणित किया परमेदवर भेषजलूप भी है, भौषध रूप भी है -(भिषज् चिकित्सायाम्) । यथा “भेषजमसि भेषजं गवेऽदवाय पुरुषाय भेषजम् । -सुखं मेषाय मेष्ये ॥ (यजु ° ३।५९ । इस .मन्तर मे रद्रनामक परमेच्वर को सम्बोधित करके, १९८ अरयवेवेद-माष्य कां० ११1 सू०४

English

All children of Prajāpati have breath distinctly in themselves. The Brahma that is stored within the Brahmachāri guards them all.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-8

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतीत होता है. इन दो स्थरूपों को उपनिषदों में प्रेय भ्रौर शेय का है । शरीर मे अर शरीवयवो मे प्रेरणा चेतन-जीवात्मा द्वाराः होती है। इसी म,.तथा सरवेदवर का वणन मरस्यरूप मे अभिप्रेत है । भाणो मृत्युः भ्राणस्तक्मा भराणं देवा उपांसते ।

English

Piled up on high, but never yet ascended, that power of deities is brightly shining.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-9

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भाणो हं सत्यवादिगयुत्तमे छक आ द् षत् ।॥११॥ (भ्रा दधत्) स्थापित करता. हैः । क कां०-११। सुन भरथ्ववेद-माष्य १०४. मृ्यु-देवता नहीं .। यभा “स एव मृत्युः सोऽमृतं सोऽभ्वं स॒ रक्षः” (अथव ° १३।४। पर्याय ३१२५) । परमेदवर ही प्राणियों के क्मंफलरूप मे मृत्युः

English

From that sprang heavenly lore, the loftiest Brahma, and all the Gods with, life that lasts for ever.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-10

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(सरवे) सब (उपासते) उपासना करते हैँ । (सूयः) सूयं (ह) .निक्चय से है, (ब्रीहिः) षान (श्रपानः उच्यते) भ्रपानं कहा जाताः है । ४ ब्रीहि घान, जिस के भीतर तण्डुल होता है । शकट या गाड़ी क्योंकि बैल की सहायतासे खेत के . जूत .जाने के पदचात् बीजावाप से ब्रीहि भैर यव पैदा होते है । ब्रीहि भौर यवे के सेवन से प्राणं भौर भयान. ११० भ्रथर्ववेद-भाष्य का० ११। सु०३

English

The Brahmachāri wields the radiant Brahma wherein all Gods are woven close together;

अध्याय ११

श्लोक 3.6-11

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(पुरषः) पुरुष (मर्भे) मातुगभं के -(भन्तरा) . भीतर (श्रपानति, भणति) अपान रौर प्राणकौी क्रिथाए करता है १ (प्राण) है प्राण ! यदा जब. (त्वम्) तू (जिन्वसि) उसे पृरिुष्ट कर देता है (रथ) तव (सः) वह् (पुनः जायते) पुनजन्म लेता है । । पुरषः =दरीरपुरी मे शयन करने वाचाया वास करे वाला जीवात्मा । जीवात्मा कारीरं धारण करना ही उसका जन्मंहै। इस. प्राण कहते है, (वातः ह) सं वारी तथा रोगनाशक' वायु भी (प्राणः उच्यते)

English

Creating breath, inhaling and exhaling, voice, mind, and heart, Brahma and holy wisdom.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-12

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भरायणेणोरां्गिरसीहैवीभेतष्यजा उत । जबकि हि प्राण ! तु उन्हं प्रीणित करता ह । ( १ बात, रोगनाणक भेषज तथा विदवभेषज है । यथा “प्रा बात ना जेषं लि वात वाहि य्, रपः । तवं हि निस्वभेषन देवाना त ह्यते" (भयव ०

English

Bestow on us the power of sight and hearing, glory and food and seed and blood and belly.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-13

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

कां ११-५सु० ४ अयरववेद-माष्यं ११४ कता है कि “तुमे शान्ति देने वाली भौर तु स्वस्थ. करने वाली को र्म प्रेरित करता हूं" ।. शि १ प्रयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः । भ्यं मे विदवभेषजोऽयं िवाभिमंञन; 1 (श्रथरवं० ४।१३।६), “यह मेरा हाय माग्यक्लाली है, यह मेरा भ्रधिक भाग्यशाली हैँ । यहं मेरा सब रोगों का भरौषधरूप है, यह शने

English

These, standing on the flood, the Brahmachāri formed practising in sea his hot devotion. When he hath bathed, brown, yellow-hued, he shines exceedingly on earth.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-14

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

द्वारा, रोगीःके रोग को दुर करने का भ्रादवासन दिया है) इस प्रकारकी मनोबल चिकित्सा भ्राथर्वणी-्रोषधि चिकित्सा है । भर्थात् रोगजेनक कीटाणुरभ्रो का हन करने वाला. तथा "“इममीवचातनः” खूप है । भ्रोषधि-=जलन तथा दोषो का चयन करने वाली । गृह्याग्निहोत्र

English

A prayer to all Divinities and Sanctities for deliverance from distress

अध्याय ११

श्लोक 3.6-15

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

भ्नोषधयः” में बहुवचन भी उपपन्न हो जाता है । ११२ भरथवेवेद-माष्य का० ११।सू०४ गा। उर्होनि कटा कि वह कहां है कि जिस ने हमे इस प्रकार विजय दिलाई. भङ्से प्राण निकल जाता है वह-वह सुख जाता है ।

English

We call on Agni, on the trees lords of the forest, herbs and. plants, Indra, Sūrya, Brihaspati: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-16

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन हुभ्ना है । नासिका,. मुख श्रौर उरः स्थल मे संचार करने वाली वायु . : रोगनिवारक होने से महौषघ रूप है । यही मुख्य प्राण, भअरपान, न्यानः यमान, भ्रौर उदान रूष में विभक्त हौ कर जीवनचर्या का कारण बन रहा है, रतः “श्राङ्कखिरसीः भोषधयः" रूपं ह । । हैवीः-पुथिवी, रप्, तेज श्रर वायु हैवी भ्रोषधियां है 1 पृथिवी होतो है (ग्रथरवे० १।४।४; ६।५।१-४) 1 तेज भर्थात् श्रागनेय, सौर, तथा . “

English

We call on Vishnu, Bhaga, on Mitra and Varuna the King,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-17

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

कां ११।सु०४ श्रथवेवेद-भाष्य ११३ ओषधयः प्रजायन्तेऽथो याः काश्च वोरुषंः ॥१७॥ धियां (याः काः च वीशुद्धः) भ्रौर. जो कोई विरोहण्ील लतां भ्रादि यस्तं प्राणेदं वेद यस्मिासि परतिष्ठितः ।

English

Ansa Vivasvān we address: may they deliver us from woe. We call on Savitar the God, on Pūshan the establisher,

अध्याय ११

श्लोक 3.6-18

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

(प्राण) है प्राण ! (यः) जो (ते) तेरे (इदम्) इस स्वरूपम को लोके) उस उत्तम लोक मे (बलिम्, हरान्) भेटं प्रदान. करते है । यां स्थान मेँ रहने वाले के लिये, या भावी उत्तम जन्म में भी भटे प्रदान. करते है । मन््रमें प्राण हारा परमेदवर का.वणेनहुभराहै, वह प्र्णोका कर तेरी प्रेरणा के भ्रनुसार जीवनचर्या करता है; . वह सब - के लिये पूज्य

English

Tvashtar the foremost we address: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.6-19

ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः

eṣa vā odanaḥ sarvāṅgaḥ sarvaparuḥ sarvatanūḥ

हिन्दी अर्थ

ये ब प्रजाए › (तुभ्यम्) तेरे लिये, (बलिहृतः) उपहार लाती है, (एवा) इसी प्रकार (तस्मे ) उस कै" लिये (वतिम्) उपहार (हरान्) -लाए् ११४ भरथववेद-भाष्य कां ११ सु० ४ जोकि प्राण लेता है, जो शब्द सुनता है । मू न मानने वाले या भ्रमनन- शील वे मनुष्य मेरे भ्राश्चय पर निवास करते रहै, है श्रवण करने वले!

English

Gandharvas and Apsarases; the Asvins, Brāhmanaspati, Aryaman, God, by name we call: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7

श्या॒ममयो॑ऽस्य मां॒सानि॒ लोहि॑तमस्य॒ लोहि॑तम्

śyāmamayo'sya māṃsāni lohitamasya lohitam

हिन्दी अर्थ

अन्तगं्भशरति देवताखवाभूतो भूतः स घं जायते पुनं । (श्नाभूतः) सर्वं विद्यमान, (मूतः) भनादि परमेश्वर, (देवतासु विचरता है, (सः.उ) वहः ही (पुनः) बार-बार (जायते) सृष्टिर्यो में प्रकट होता है । (सः) - वह (भूतः) श्रनादि (पिता) परमेश्वर-पिता

English

We speak to the collected Gods, faithful, maintainers of the

अध्याय ११

श्लोक 3.7-2

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

मे प्रत्यक्ष होकर प्रकट होतार । करता हृश्रा, उडता हृभा, (एकं पादम्) एक पेर को (न उत्विदति) नहीं कां० ११ । सुम अर्थवेवेद-माष्य ११५. देत्) उखाड़ दे तो व्यक्ति के लिये . (न एव भय) न हा आज हो,

English

All the Ādityas we address: may they deliver us from woe. Vāta, Parjanya we address, the Quarters, and the Firmament,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-3

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(न कदाचन व्युच्छेत्) न कृभी उवा चमके । हंख षद द्वारा प्राणवायु कावर्णेनहृग्राहै 1 हेस जल के वासी है, इसलिये सलिल का प्रयोग हरभ्रा है । प्राणवायुरूपी हंस, रक्तरूपी जल के भाखयभूत हदय के समीपस्थ फफड़ं से छस्थान कर उडतां है नासिका दाया श्रीरसि बाहर जावादहै। बाहर उङ् कर जाताहुभ्राभो वह मानो भपना एक पाद शरीरं के साथ जमाए रखता हैः । जसे कि सूत द्वारा से, उस के लिये ्राज-कल, रात्री-दिन तथा उषा भादि का व्यवहार नहीं

English

And all the Regions of the sky: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-4

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

-हंसः= हन् + सः (षणु दाने) +डः ॥ प्राण वायु के कारण शरीरगत दुगेन्व का हनन भौर नवौन वायु का प्रदान होता रहता है । इारीरगत दगन्व गन्दी वायु है, जो कि नासिका वारा बहिरगंत होती रहती है । सूर्यं ल्मे भी भन्त्राथं सुसङ्गतं होता ह । थधन विश्वं युवन जनान यद॑स्यां कतमः सः केतुः ॥२२॥ भागे की.भओर (निं पदचा) भ्रौर नितरां पीठे की भोर (वतंते) विद्यमान रूप है, (सः केतुः) वह॒ ज्ञानमय है, विञ्ञानघन है ।

English

From all that brings a curse may Day and Night and Dawn deliver me, May Soma free me, God to whom they give the name of Chan- dramās.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-5

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

११६. श्रथरवेवेद-भाष्य का० ११।सू०४ भ्राधित तथा चलायमान हो रहा है.1 रथ में चक्र तो भ्रत्प परिमाण होते. एकनेमिः नेमि लोहे का च्रहोता है जोकि रथ के पियो पर मिलाए रखने के लिये उन कै बीच मे दण्डा लगा रहता है जिसे किं भक्ष

English

All creatures both of heaven and earth, wild beasts and sylvan animals,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-6

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भी भ्रं है, समृद्ध है । कतमः कः (सुखम्) + तमप् (्रतिकांयने) । हो जातादहै। शरीर में किसी भी भ्रत्य भरवयवंकी गति इतनी घीघ्र नहीं होती जितनी गति कि प्राणापान की होती है! प्राणवायु के प्रतिपादित गुणों की श्रपेक्षया परमेदवर मेँ इन गुणो का अतिशय है ! परमेश्वर की ही है । इस प्रकारं प्राणवायु के वर्णन के साथ-साथ परमेश्वर का भी वणन मन्व मै हमरा है । वस्तुतः “नमः” .पद परमेरवर को लक्ष्य करके ही - पठित

English

And winged birds of air we call: may they deliver us from woe. Bhava and Sarva we address, and Rudra who is Lord of Beasts,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-7

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कर्म॑शील । चीः == कमं (निधं. २५२), प्रज्ञानाम (निधं ०-३।९) + र(वाला) । स्थिति द्वारा जीवन की भ्रभिलाषा तभी फलवती हो रकती है यदि जीवन जागता है प्राण या परमेवर (तिर्यक्) टेढ़ा होकर (न, नु) नहीं कभी (निपद्यते) नेता, नहीं सोता । (सुप्तेषु) सोए हृशमो भें (अरस्य) इस प्राण

English

Their arrows which we feel and know: may they be ever kind to us.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-8

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

१. भनूर्लकाणे (ष्टा ० १।४।८४) । या परमेश्वर के (सुतम्) सोने को (भनु) वंशपरम्परा से (कश्चन) किती ने (न, शुश्राव) नहीं सुना । । अपां मर्मेमिव जीवसे राणं बध्नामि तवा मयि ॥२६॥ (आण) है प्राण! (मत्) मुर से (मा, पर्यावृतः) न पराङ मुल हो, (जीषसे) जीने के लिये, (रपा, गर्भम् इव) जंसे माता ग्मिय के जल

English

We speak to Constellations, Heaven, to Earth, to Genii, and to Hills,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-9

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

से अरन्य भर्थात् परिचित न होगा“ अतः मुर भ्रपना परिचित जान कर प्रकट करता है। परमेश्वर को भी धारणा-ध्यान आदि उपायों दवारा उपास भ्रपते साय बान्धे रने का संकल्प करता है । “बध्नामि "यथा का० ११1 सू०.५ अथवेवेद-माष्य ११९ ३. ब्रहाचयं जीवन म विद्यप्राप्ठि के साथ-साथ. “तपः का विशेषं महत्व है (श.रे०४८ १०) । =

English

To Seas, to Rivers, and to Lakes: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-10

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

४. ब्रह्मचारी का उपनयने श्रौर उसका. तीन रात तक गर्म-निवास ४. ब्रह्मचारी की १,२ तथा. भ्रधिक समिषा (४,९,१३) । ७. ब्रह्मचारी के ज्ञानां पृथिवी रौर दयलोक क नसूर्नो (7० 0५8) का निर्माण भ्राचायं द्वारा (८) । ९. ब्रह्मचारी की ज्ञान-निधियां (१०) ५ र

English

Or the Seven Rishis we address, Waters divine, Prajāpati, Fathers with Yama at their head: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-11

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कां प्रा-स्थित होना (११) 1 - र ११. भ्राचार्यं के नानारूप (१४) ॥ १२० भथववेवेद-माष्य का० ११. सुभ १५. कन्याश्रों का ब्रह्मचयेवास (१८) । २३ धुरोबाहंतातिनागतगर्भा; . २५ एकावसानाच्युं हिणक्; २६ मध्ये-

English

Gods whose abode is in the heaven and those who dwell in middle air,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-12

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

्रहमचारीष्णंरति रोद॑सी डमे तसम् देवाः सनतो. भवन्ति । दोनों (रोदसी) चलोक भौर भूलोक मे (चरति) विचरता है; (तस्मिन्) उस ब्रह्माचारी मे (देवाः) देव (संमनसः) एकं मन वाले (भवन्ति) हो जाते है । (खः) -वह् (पृथिवीं, दिवं च॑) पृथिवी भौर दुलोकं के ज्ञान को : (दाधार) निज चित्त में धारण करता है, (सः) वह॒ (भ्रावार्यम्) निज के लिये यत्नशीलं होना चाहिए । ठथा तपदधर्या कां जीवन व्यतीत करना यामय जीवन को देख कर भ्रात्रायं प्रसन्नता से मरपूर हो जातादहै।

English

And Mighty ones who rest on earth: may they deliver us from. woe. Ādityas, Rudra, Vasus, Gods aloft in heaven, Atharvan’s sons,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-13

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

अर्थात् इस मनुष्य मेँ सभी देवता रहते हँ जसे किं गोशाला मे गौएं रहती पम्रौर विकास. कियाजा सकतादहै । ब्रह्मचारी के जीवन मे इन शक्तियों के विकास मे संमनस्कता हो जाती है। उस के जीवन में देवासुर-संग्राम नहीं होता, क्योंकि उस के जीवन में निवास देवोँकाही होता है, भासुरी सनन रहता है; सांमनस्य . रहता है पिपति पृ पालनपूरणयोः । ब्रह्मचारिणं पिनरौ देवजनाः पृथग् देवा अनुसंय॑न्ति सरवे ।

English

The sages, sons of Angiras: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-14

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(पितरः) पितृवर्ग, (देवजनाः) विद्वान् तथा दिन्यकोटि के लोग, पृथिवी का धारण करने वाले ६३३३ देवं (एनम्, भनु भ्रायन्) शसं की श्रभिप्रेत हो, तब ६३३३ सस्या इन शसक-प्रधिकारि्यो की वेद ने नियत ' की है, जोकि सावं मौमे शासना होनी चाहिए । इस संख्या. की उत्पत्ति

English

To sacrifice, to worshipper, hymns, songs, and healing charms, we speak, To priestly acts and Yajus texts: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-15

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

१२२ श्रथ्व॑वेद-भाष्य कांर ११। सु०५ (१) लासन के लिये वेद ने त्रीणि. सदांसि" श्रर्थात् तीन सभाए कही हैँ । यथा “त्रीणि राजानां विदथे पुरूणि परि विदवानि भूषथः सर्दा- सि" (ऋ०.३।३०८।६) । तीन समाए' है “विद्यायंसमा, धर्मांसमा भ्रौर लिये, घरम्यंसभां नियमनिर्माण तथा तदनुसार न्याय के लिये, तथा रा जा्यसभा राज्य-शासन के लिये । सत्याथंप्रकाशं मे इन सभाश्रों के साथ (२) “सावंमौमदासक” सर्वोपरि शक्ति है, जोकि. समग्र पृथिवी की प्रजाश्रों द्वारा वरण किंया'गया है । इस केः निरीक्षण मे तीन सभाए

English

To the five kingdoms of the plants which Soma rules as Lord we speak.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-16

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

पारिषद्य यां पारिषद । इसे मनु मे “दक्षावरो घा परिषव्” कहा ह । १ सभापति भ्रौर १० पाररिषद्यो को “देवा एकाक्ष" कहा है (यजु०.२०। ११).।.य “एकादशवेवाः” ३ भागों या समाभ्रों मे विभक्त हैँ श्रया देवा - दिव्य सभासरदो मे एक-एक पुरोहित हीता है, मुखिया होता है. जिसे कि बृहस्पति कहा है “बृहस्पतिपुरोहिता” (यजु ° २०।११) ।'ये तीन सभाए सावभौम राजा की रक्षा कर्ती है “देव वेवैरवत्तु भा”. (यजु° २०।११) । (४१ प्रत्येक समौ कौ सभापति तो समो का प्रबन्धक है, भौर शेष

English

Darbha, hemp, barley, mighty power: may these deliver us from woe, To demons and fierce fiends we speak, to Holy Genii, Fathers,.

अध्याय ११

श्लोक 3.7-17

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भ्रौर शासको को भिलाकर तीन सभाभ्रों मे ११८२३२३ होतेै। ये ३३ . देव है, दिव्यकोटि के शासक है; सावभौम शासक हैँ । (५) ददावरा परिषदो के दस-दस शासकों मे प्रत्येक के भ्रघीन दस-दस उपासक हों । इस प्रकार प्रत्येकं परिषद् के भरधीने दध-दस उपक्लासकों की संख्या होती है १०० । भ्रतः तीन परिषदो के उपश्ासक ३०० होते है । संख्या (४). के ३३ देव तथा संख्या (५) कै ३०० देव मिल . से सक्त मे प्राधिमौतिक् वणेन है । इसलिये ६३३३

English

Snakes,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-18

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

शासक होते है ३०००९२० = ६००० । मरतः कूल योग देव भो भाषिमौतिक ही प्रतीत होते ह । से दष्टिगोचर सम्भवतः ६३३३ तारा हों। ह्यण्डे तथा पिण्डे” के भरनुसार सम्भवतः

English

And to the hundred deaths and one: may these deliver us from woe. We speak to Seasons, Season-Lords, to years and sections of the year,

अध्याय ११

श्लोक 3.7-19

सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

sarvāṅga eva sarvaparuḥ sarvatanūḥ saṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(८) आधिहैविक दृष्टि से, विना दुरबीन नाडयो की संख्या निम्न प्रकार दर्चाई है बृहदारण्यकोपनिषद् मे केवल हृदय मकं नाईि है, जोकि हृदय से पुरीत

English

To Months, half-months, and years complete: may they deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.8

त्रपु॒ भस्म॒ हरि॑तं॒ वर्णः॒ पुष्क॑रमस्य ग॒न्धः

trapu bhasma haritaṃ varṇaḥ puṣkaramasya gandhaḥ

हिन्दी अर्थ

. = - स्थल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर शरीर में एेन्द्रियिक शा्वि्तयां = १० सौ वषे काल में ्ञारीरिकं परिवतंने = १०० देन्द्रियिक परिवर्तनं के दो भाग कूल . १९४ अथवंवेद-भाष्य का० ११।स्०५

English

Right. Present with their collective Dames: may these deliver us from woe.

अध्याय ११

श्लोक 3.9

खलः॒ पात्रं॒ स्फ्यावंसा॑वी॒षे अ॑नू॒क्येऽ

khalaḥ pātraṃ sphyāvaṃsāvīṣe anūkye'

हिन्दी अर्थ

इस सख्या के सम्बन्ध मे निदिचतरूप में कुछ कहा नहीं जा सकता। सायणा- चायं ने लिखा है किं “वेहवदेवनिविदि देवानां संख्या उत्तरोत्तरं भरयसी तं रा्रीस्ठिस उदरं बिभति तं जातं द्रष्टंममिसयन्ति देवाः ॥३॥ भूत को (तिसः रात्रीः) तीन रात्री पयन्तं (उदरे). उदर मे (बिभति) देखने के लिये (श्रभि) उस के संमुखं (देवाः) देवकोटि के लोग (संयन्ति)

English

The spirit, yea, the spirits’ Lord, ruler of spirits, we address.

अध्याय ११

श्लोक 3.10

आ॒न्त्राणि॑ ज॒त्रवो॒ गुदा॑ वर॒त्राः

āntrāṇi jatravo gudā varatrāḥ

हिन्दी अर्थ

(भ्ूतपती) है त मौर भौतिक जगत् के भ्रषिपतियो ! (पशुपती) हि साथ लींची गई इषु को (मा विन्नाष्टम्) हमारी भ्रोर न छोड़ो । (नः) . (मारे (द्विपदः) दो पंस वालि सम्बन्बियो,.. तथा (चतुष्पदः) चोपायो की ३८ . अथववंवेद-माष्य का० ११।सू०२

English

Be homage, Rudra, unto thee approaching and departing hence! Homage to thee when standing still, to thee when seated and at rest!

अध्याय ११

श्लोक 3.11

इ॒यमे॒व पृ॑थि॒वी कु॒म्भी भ॑वति॒ राध्य॑मानस्यौद॒नस्य॒ द्यौर॑पि॒धान॑म्

iyameva pṛthivī kumbhī bhavati rādhyamānasyaudanasya dyaurapidhānam

हिन्दी अर्थ

मान हो, उस दिशा ओ मुख कर, .उस के प्रति नमरकार करने चाहिए । -॥§ भी हो रहा हो, उत निनकमों का फल ही समना चाहिए । -इस निमित्तं परमेरवर की भवंहेलती न करते हुए उसे नमस्कार ही करने चोद्ये । कां० ११।सु०२ भरथर्वेवेद-माष्य ॑ ४७

English

Gods’ existence. Harm thou among us neither great nor little, not one who bears us, not our future bearers.

अध्याय ११

श्लोक 3.12

सीताः॒ पर्श॑वः॒ सिक॑ता॒ ऊब॑ध्यम्

sītāḥ parśavaḥ sikatā ūbadhyam

हिन्दी अर्थ

काल में (तिष्ठते) कुछ काल . तक स्थिर रूपमे देन देते हृए (ते नमः) तेरे प्रति नमस्कार हो, (उत) तथा (आ्रासीनाय) समाधि काल मेँ चिरकाल तकं मानो रासनं लगा कर उपविष्ट हुए(ते)तेरे प्रति(नमः) नमस्कार हो । म्रवायं च शुर्वायं चोभाम्यामकरं नम॑ः ॥१६॥ (नमः) नमस्कार हो, (दिवा) दिनके समय (नमः) नमस्कार हो। दोनों सन्ध्या कालों मे, रात्रि मे सोते समय, प्रातः जागरणं के समय, परमेश्वर को नमस्कार करना चाहिए । संहारावस्था मे, तथा . उत्पादकतावस्था मे, परमेश्वर को नमस्कार करना चाहिए ।

English

Injure no sire among us, harm no mother. Forbear to injure our own bodies, Rudra. This lowly reverence have I paid to Rudra’s dogs with mighty mouths,

अध्याय ११

श्लोक 3.13

ऋ॒तं ह॑स्ताव॒नेज॑नं कु॒ल्योऽप॒सेच॑नम्

ṛtaṃ hastāvanejanaṃ kulyo'pasecanam

हिन्दी अर्थ

कौ निरसनं करने वाले, ( विपंदिचतस्) मेघावी, (बहुधा ईयमानम्) प्राय बहुधा ईयमानम् == इन पदों द्वारा यह दर्चायाः है कि प्रातः कालं पूवे दिला मं मुखकर समाधि का भ्रभ्यास करनेवाले को प्रायः रद्र-परमेदवर के दोन होते है, वह समाधि भवस्य में चित्त से.भ्राता है, प्रकट होता है । नराय" पद द्वारा यह प्रकट कियाहैकि समोचि के ठीक प्रकारन लगने पदयम में दूर तङ, देखने मे खद को सहस्राक्ष भर्थात्' हजारो भरांखो वाला

English

Hounds terrible with bark and howl, who gorge unmasticated food. Homage to thy loud-shouting hosts and thy long-haired followers!

अध्याय ११

श्लोक 3.14

ऋ॒चा कु॒म्भ्यधि॑हि॒तार्त्विज्येन॒ प्रेषि॑ता

ṛcā kumbhyadhihitārtvijyena preṣitā

हिन्दी अर्थ

हिसा करने वाले, (मीमम्) भयप्रद, ( केशिनः रथम्) किरणो वाले सूयं ¦ रथ को (पादयन्तम्) नीचे गिराने वाले रुद्र को (पूवं) प्रथम भावी हमं यथा "केकी केशा रहमथः तनन्" (निक्त १२।३।२५) । रथ भर्थात् सूयं पिण्ड म्नौर ररिमयों वाला सूयं भिन्न-मित्न नहीं है । “शा ॥ इयावाद्वम् दयाव पद ““दयैड.” गतौ का रूप है । -यौगिकदृष्टिर्म

English

Homage to hosts that are adored, homage to armies that enjoy Homage to all thy troops, O God. Security and bliss be ours!

अध्याय ११

श्लोक 3.15

ब्रह्म॑णा॒ परि॑गृहीता॒ साम्ना॒ पर्यू॑ढा

brahmaṇā parigṛhītā sāmnā paryūḍhā

हिन्दी अर्थ

रहती है इन ररिमयों से शुक्त सूयं है । भ्रथवा “स्याव शब्द, “कलेननीने रंगों वाली सौर-रदिमयों का बोधक है 1 सूर्यं भ्रमी उदय व हरा तथा च, चख पूवं काले अथवा नीले नभस पर जब सूये की . उतिक्षप्त होतो है तब दस भिभितवणं को स्याव कहा है । यहं समय उपासना का है का०.११ ॥। सु०२ . अ्य्वेवेद-माष्य ४९

English

A glorification of the Odana or oblation of boiled rice 1.Of that Odana Brihaspati is the head, Brahma the mouth.

अध्याय ११

श्लोक 3.16

बृ॒हदा॒यव॑नं रथन्त॒रं दर्विः॑

bṛhadāyavanaṃ rathantaraṃ darviḥ

हिन्दी अर्थ

भरितम् = मर षिञ् बन्धने +क्त । सूये सदा विचरता है, दिन भें भी भ्रौररातंमेभी। जो कड दो वहं स्वतन्व्रतापवंक सदा विचर नहीं परिचम मे पटक देता है, रतं: सूयं दिखाई नहीं देता । ‹ पूरवे = प्रथमा के बहुवचन तथां सप्तमी के एकः वचन में “पूर्वे” रूप भयुक्त होता है । जो उपासक पूर्व-पूवं काल में परमेदवर का ध्यान करते है वे प्रथम भावी हो कर प्रथम देन परमात्मा का करते ह, यथा “पुरवः पुव है पूवं प्रदेश में । भर्थात् पूवं की भोर मुख केर ध्यान करने वाला उपासक

English

Heaven and Earth are the ears, the Sun and Moon are the eyes, the seven Rishis are the vital airs inhaled and exhaled.

अध्याय ११

श्लोक 3.17

ऋ॒तवः॑ प॒क्तार॑ आर्त॒वाः समि॑न्धते

ṛtavaḥ paktāra ārtavāḥ samindhate

हिन्दी अर्थ

करने का विधान मन्त्र में हुभ्रा है । जो दीखता नहीं उसे नमस्कार कंसा ? मा नोऽभि स्ञां मत्यं देवेति मा सैः कुषः पञुपते नम॑स्ते । न (अभिन्नाः) फक, (नः) हमारे प्रति (मा रषः). करोव न कर, (पशुपते) - जब वियत् चमकती है तो काम्पती हुई शाखा सी, प्रतीत होती है

English

Vision is the pestle, Desire the mortar. 4. Diti is the winnowing basket, Aditi is she who holds it, Vāta is the sifter.

अध्याय ११

श्लोक 3.18

च॒रुं पञ्च॑बिलमु॒खं घ॒र्मो॒३भी॑न्धे

caruṃ pañcabilamukhaṃ gharmo3bhīndhe

हिन्दी अर्थ

५० म्रथववेद-भाष्यं का०-१११स्०२ (नः) हमारी (मा हिसीः) हिसा न कर, भषितुं (नः) हमे (्रधि- ब्रहि) स्वाधिकार पूवंक सदुपदेश दे ।॥ (नः) हमे (परि वृड गधि) हिसमकमं से छोड दे, (माक्रषः) हम पर क्रोघन कर (त्वया). तेरे साथ (मा समरामहि) हम समर भावनामें न हो, श्र्थात् तेरे नियमों तथा .सदुपदेों के विपरीत हम.न चलं । अन्यर्ोग्र 'वि व॑सेय पियांरूणां जां जहि ।२१॥ (नः) मासे (गोषु) गौ तया (परे) पुरषो के सम्बन्य भं.

English

Horses are the grains, oxen the winnowed ricegrains, gnats the husks. 6. Kabru is the husked grain, the rain cloud is the reed. 7. Grey iron is its flesh, copper its blood. 8. Tin is its

अध्याय ११

श्लोक 3.19

ओ॒द॒नेन॑ यज्ञव॒चः सर्वे॑ लो॒काः स॑मा॒प्याः

odanena yajñavacaḥ sarve lokāḥ samāpyāḥ

हिन्दी अर्थ

कर, (मा) नः (नः) 'हमारी (ग्रजविंषु) (यस्य) जिसं परमेदवर -का (तक्मा) ज्वर; तेथा (कालिका) कुत्सित : शाब्द करने बालो खांसी (हेतिः) भरस्तरःहै, जो. खांसीः (एकम्) किसी "एकर की (इव) तरह (एति) 'प्राप्तं होती हैः त वह हेति निणेग्रवे) : मानो. स्वर

English

ashes, gold its colour, the blue lotus flower its scent. 9. The threshing-floor is its dish, the 173

अध्याय ११

श्लोक 3.20

यस्मि॑न्त्समु॒द्रो द्यौर्भूमि॒स्त्रयो॑ऽवरप॒रं श्रि॒ताः

yasmintsamudro dyaurbhūmistrayo'varaparaṃ śritāḥ

हिन्दी अर्थ

हिसा करता हमा ८ तिष्ठति) स्थित है, ( तस्म) उस के प्रति , शक्वरीभिः = दाक्वरी शब्द यथपि बाहु वाचक है, “शक्वरी बाहुनाम'. (निषं९. २।४),परन्तु यहां १० शवत्ररियो दवारा, १० ड् गुलियां को स्मपित किये हृए है, तेरे भ्राश्चय पर जीवित । (पशुपते) है सब . ्रारप्यवासी पशु, तथा वनोपवनों में रहने वाले मृग, तथां भ्रा

English

as it is cooking. 12. Furrows are its ribs, sandy soils the undigested contents of its stomach. 13. Law is its

अध्याय ११

श्लोक 3.21

यस्य॑ दे॒वा अक॑ल्प॒न्तोच्छि॑ष्टे॒ षड॑शी॒तयः॑

yasya devā akalpantocchiṣṭe ṣaḍaśītayaḥ

हिन्दी अर्थ

दितिः=दो भवखण्डने याः दीड क्षये, क्षीण होने वाला कार्यजगतू 1 भ्रदितिःन क्षीण होनेः वाली प्रकृति 1 वि फलीकरणाः == खलियान मे, खेत कटे ब्रीहि पौवों के भ्रवहनन से शरः तण्डुलो को उबालते समय उठी हई सफद माग वि मांसानि =सदूढी या साठो (“षष्टिका" चावल ) तपदूलों के पकने पर उन. का पिण्ड गुच्छा-न आना, श्रलग-अलग दानो का न होना । लोहितम् = सद्ठी या साठी" के चावलो पर का लाल -भ्च । . पात्रम् शकट, जिस. भे कि खेत कटे ब्रीहि पौषे डाल कर होते हं । षष्टिका का भन्न श है । घद्ढी भौर साटी ।

English

Seasons as teeth. 38. And thence, etc. . . . with other vital airs. . . . Thy vital airs will leave thee . . . With the Seven

अध्याय ११

श्लोक 3.22

तं त्वौ॑द॒नस्य॑ पृच्छामि॒ यो अ॑स्य महि॒मा म॒हान्

taṃ tvaudanasya pṛcchāmi yo asya mahimā mahān

हिन्दी अर्थ

६२ भरयर्वेवेद-भाष्य कां० ११। सु० इ ईषे = शकट के श्रग्रमागमें दोनों भरोरभागेकीभ्रोरलगे दा दण्डे जिन के दो किनारो पर जुभ्रा-दण्ड (४५०). लगा रहता. है, जिसे कि बेल की गर्दन पर रखा जाता, है । सीताः हल जोतने पर खेत म पडीं हल की पद्धतियां, भागे । ऊबध्यम् =भ्राधा पका, बल के उदरस्थ शकत । कुल्या =भ्रल्पा सरित् (सायण), या संचने के लिये खेत की

English

Rishis as the vital airs. 39. And thence, etc. . . . with other expanse . . . Consumption will destroy thee . . . With the firmament as expanse. 40 And thence, etc. . . . with other back. . . .

अध्याय ११

श्लोक 3.23

स य ओ॑द॒नस्य॑ महि॒मानं॑ वि॒द्यात्

sa ya odanasya mahimānaṃ vidyāt

हिन्दी अर्थ

, दविः = पके भ्रोदनों को कुम्भी से निकालने की कड्छी । घर्मः भ्रभीन्धे = गरम रादित्य तपाता है। ग्निः म्रभीन्वे=-पाथव-भ्रमि तपाती है। . - के स्वरूप का ज्ञान होता है । ग्रौर “शिरः"--शीषंक के. नीचे दिये पदार्थौ द्वारा भ्रोदन (ङृष्यन्न) के स्वरूप का ज्ञान होता) है ।

English

Lightning will slay thee. . . With the heaven as back. 41. And thence, etc. . . . with other breast . . . Thou wilt fail in agriculture. . . . With the earth as breast. 42. And thence, etc. . . .

अध्याय ११

श्लोक 3.24

नाल्प॒ इति॑ ब्रूया॒न्नानु॑पसेच॒न इति॒ नेदं च॒ किं चेति॑

nālpa iti brūyānnānupasecana iti nedaṃ ca kiṃ ceti

हिन्दी अर्थ

खाच तण्डल की बटलोई को, पाथिव-अरिनि पकाती है । भ्रायवनम् उदक मे डाले तण्डंलों के मिश्रण का साधन भूत कां० ११।सु० ३ भ्रथवेवेद-भाष्य ६३. (अथववेद ४।३५।१-७) में ग्रोदनरूप-परमेश्वर का -विस्तृत वर्णेन हृधा है ।

English

with other belly . . . colic will destroy thee . . . With truth as belly. 43. And thence, etc. . . . with other abdomen . . . Thou wilt die in the

अध्याय ११

श्लोक 3.25

याव॑द् दा॒ताभि॑मन॒स्येत॒ तन्नाति॑ वदेत्

yāvad dātābhimanasyeta tannāti vadet

हिन्दी अर्थ

(१) जो लोकों का धारण करता है, विनष्ट नहीं होता, उस श्रोदन दवारा मै मृल्यु-नद से तैर जाऊ, पर हो जाऊं (मनर १) । गायत्री का श्रधिपति है, जिस मे विद्व क्रा निरूपण करने वाले वेद निहित विदवजितं पचामि” (मन्तं ७) मै विद्वविजयी ब्रह्मरूपी भरोदन का परिपाक केरता हं, निज जीवनं में उस की स्थिति परिपक्व करता हूं । इस निमित्त काण्ड ११ । सूक्तं ३ । पर्याय १ के मनर (१९-२१)भी विशेषतया द्रष्टव्य है ।

English

water . . . With the sea as abdomen. 44. And thence, etc. . . . with other thighs . . . 174

अध्याय ११

श्लोक 3.26

ब्र॒ह्म॒वा॒दिनो॑ वदन्ति॒ परा॑ञ्चमोद॒नं प्राशीः३ प्र॒त्यञ्चा३मिति॑

brahmavādino vadanti parāñcamodanaṃ prāśīḥ3 pratyañcā3miti

हिन्दी अर्थ

६४ भ्रथरववेद-माष्य का० ११।सु०३ कंहा है । यथा “श्रहुमन्नम्" (तं्ि° उप० भृगुवल्ली, अनुवाक १०) । इस का श्रास्मिक प्रारन करते ह । “किरः भी बृहस्पति है, बृहती लौकिकीं वाक् तस्याः पतिः । पशु्रो रौर मनुष्यों मे एक भारी भेद है "लौकिकी वाक्" का 1 इस लौकिंको-वाक्

English

Thy thigh will perish . . . With Mitra-Varuna as thighs. 45. And thence, etc. . . . with other knees . . . Thou wilt become a sick man . . . With the

अध्याय ११

श्लोक 3.27

त्वमो॑द॒नं प्राशी३स्त्वामो॑द॒ना३ इति॑

tvamodanaṃ prāśī3stvāmodanā3 iti

हिन्दी अर्थ

३१।११) । ब्राह्मण" निज मुख द्वारा, श्रोदन का शारीरिक भोजनया द्यक है, ्रध्यारिमक भ्रौर शारीरिक । उस श्नोदन के (चावापृथिवी) द्य लोक श्नौर् पृथिवीलोकं (रोते) द्यावापृथिवी को करन्दसी मी कहते है, यथा “थं कऋन्दसीऽग्रवसा

English

knees of Tvashtar. 46. And thence, etc. . . . with other feet . . . Thou wilt become a wanderer . . . With the feet of the Asvins. 47. And thence, etc. . . with other fore-parts of the feet . . . A

अध्याय ११

श्लोक 3.28

परा॑ञ्चं चैनं॒ प्राशीः॑ प्रा॒णास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह

parāñcaṃ cainaṃ prāśīḥ prāṇāstvā hāsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

१. यदपि ब्राह्ाणेतर मी भोदन का प्राशन करते ह 1. परन्तु वंदिक समाज (अये १०।७।३२)› भर्यात् सूर श्रौर चद्रमा को परमे्वर ने चु के. का प्राणापान के साथं सम्बन्धः विचारणीय है । ५ । (कामः) श्रौर कामना (उलूखलम्) भोखली स्थानी है । ति

English

serpent will kill thee . . . With the fore-parts of Savitar’s feet. 48. And thence, etc. . . . with other hands . . . The Brāhmana (divine power) will kill thee . . . With the hands of Right. 49.

अध्याय ११

श्लोक 3.29

प्र॒त्यञ्चं॑ चैनं॒ प्राशी॑रपा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह

pratyañcaṃ cainaṃ prāśīrapānāstvā hāsyantītyenamāha

हिन्दी अर्थ

सृष्टिरचना मेँ परमेश्वर मे. भरथम, ईक्षण होता है । यथा “ है । यथा “श्ोऽकरामयतः' (वृ उप० १।४-७) । कष्योदन .के लिये ब्रीहि मरथातू.घान के भ्रवेहनन में प्रथम मुसल को उठते भ्रौर उसका प्रहार (रद) ) 4 + व्यक्ति का स्थानी दहै, (वातः) वाथु (अरपाविनक् लो के विवेचयिता भर्थात् २, तथा “स ई्वाचके'" (बृहदा० उप० भ्र ° १। ब्जा ४। ख० ए।४

English

And thence, etc. . . . with other basis . . . Without standing-ground and resting-place thou wilt die . . . Having taken my stand on truth. With this I ate it, with this I came to it. Now this

अध्याय ११

श्लोक 3.30

नैवाहमो॑द॒नं न मामो॑द॒नः

naivāhamodanaṃ na māmodanaḥ

हिन्दी अर्थ

(अदवाः कणाः) दव कण स्थानी है, (गावः तण्ड्लाः) गौए तण्डुल स्थानी है (मशकाः तुषाः) मच्छर तुष स्थानी हं । टूट तण्डल जो किं कणरूप होते है उन्हं भ्रदव कहा है वायु के कारण कण ठेसे उडते है जंसे ' कि श्रव वेग से भागते दँ । भ्रनटूटे तण्ड्लों सात्विक है। गावः=गोदुग्ध । यथा “गोभिः शुणीत मत्सरम् (ऋ ९।४६।४) की व्याख्या म कहा है कि “इति पयसः" (निरक्त २।२।५) ।

English

A glorification of Prāna, Breath or Vital Spirit Homage to Prāna, him who hath dominion o’er the universe,

अध्याय ११

श्लोक 3.31

ओ॒द॒न ए॒वौद॒नं प्राशी॑त्

odana evaudanaṃ prāśīt

हिन्दी अर्थ

(यः) जो (म्रोदनस्य) भोदन की . (महिमानम्) महिमा को. परनुपसेचनः इति) न कहे कि यह उपसेचन से रहित है, (न इदम् चः कि च : इति) न कटे कि यह ही, न कहे कि क्या भ्नौरं नहीं ।॥॥२४॥ श्नौर दीजिये, न कहे किं भ्रोदन का स्वरूप केवलं इतना ही है ? न कहे कि कुछ श्रौर भ्रोदन क स्वरूप पर प्रकार डालिये 1 उपसेचन = यजुवद ३१।९

English

To him will all present their gift of tribute in that loftiest will all present their gift of tribute in

अध्याय ११

श्लोक 3.50

४९॥ (३) ५०-५६ मन्त्रोक्ताः।५० आसुर्यनुष्टुप्, ५१ आर्च्युष्णिक्, ५२ त्रिपदा भुरिक्साम्नी त्रिष्टुप्, ५३ आसुरी बृहती, ५४ द्विपदा भुरिक्साम्नी बृहती, ५५ साम्न्युष्णिक्, ५६ प्राजापत्या बृहती।ए॒तद् वै ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॒ यदो॑द॒नः

49|| (3) 50-56 mantroktāḥ| 50 āsuryanuṣṭup, 51 ārcyuṣṇik, 52 tripadā bhuriksāmnī triṣṭup, 53 āsurī bṛhatī, 54 dvipadā bhuriksāmnī bṛhatī, 55 sāmnyuṣṇik, 56 prājāpatyā bṛhatī| etad vai bradhnasya viṣṭapaṃ yadodanaḥ

हिन्दी अर्थ

मेवति य एवं वेद् ॥४९॥ . (पूर्वे ऋषयः) पूर्वकाल के या सद्गुणो से पूरित ऋषियों ने (यया तनः). आ्आाश्चय-रदित (मरिष्यसि) मर जायेगा, (इति) यह् (एनम्) इस श्रोदन““वेद ) भ्रथं पुवेवत् मन्त ३५॥ ११५. भरथरवेवेद-माष्य का० ११।सू०३

English

Prajāpati shines bright; the bright Virāj grew potent Indra’s self.

अध्याय ११

श्लोक 3.51

ब्र॒ध्नलो॑को भवति ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपि॑ श्रयते॒ य ए॒वं वेद॑

bradhnaloko bhavati bradhnasya viṣṭapi śrayate ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(वेद) जान लेता है उसे (्रघ्नलोकः) महान् सू्लोक (भवति) प्राप्त परमेदवर में (श्रयते) वह प्राश्यं पाता है । है, ऊच्वं गति करता है, जितनी देर मन को सूयं तक उत्क्षेपण मेँ लगती म प्रविष्ट भी है, रौर सूयं का भ्राश्चय भी. ।

English

By Fervour and by self-restraint the King protects the realm he rules. By self-restraint the Master seeks a Brahmachari to instruct.

अध्याय ११

श्लोक 3.52

ए॒तस्मा॒द् वा ओ॑द॒नात् त्रय॑स्त्रिंशतं लो॒कान् निर॑मिमीत प्र॒जाप॑तिः

etasmād vā odanāt trayastriṃśataṃ lokān niramimīta prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

(निरमिमीत) उसने निभ्नित किया, भर्थात् ३३ देवो के ३३ स्थानो को का० ११५ ३ भरवषेद-भाष्य . । १५९१. प्रजापति ने चंसार-यज्ञ को रचा,ताकिं इस यज्ञ के घटक ३३ लोका का यथाथं स्वरूप जाना जा सके । ,. (सः) वह (यः) जो पुरुष. (एवं विदुषः) हस प्रकार के बरहा का, (उपद्रष्टा भवति) उस के समीपं रह कर, उस का देन रा ही करता रहता

English

By self-restraint a maiden finds a youth to be her wedded lord.

अध्याय ११

श्लोक 3.53

तेषां॑ प्र॒ज्ञाना॑य य॒ज्ञम॑सृजत

teṣāṃ prajñānāya yajñamasṛjata

हिन्दी अर्थ

डालता.है, भरपितु (सज्यानि जीग्रते) समग्र जीवन कों हानिं पहुंचाता है । , (नच) भ्रौरन केवल (सरवैज्यानि जोयते) -समश्रं जीवन को हानि ही पहुंबाता है, पितुं (जरसः पुरा) जरावरस्था से पहिले (एनम्) इसे (प्राणः जंहाति) प्राण त्याग देता है ।. ' (२) पृष्ट-पंन को बहौ यत्त कहा.है।. सुध्टःके होते ही पृष के षट १०२ भ्रथर्वेवेद-माष्य का ११ सू० ४

English

By self-restraint the ox and horse seek to win fodder for them- selves. By Fervour and by self-restraint the Gods draye Death away from them,

अध्याय ११

श्लोक 3.54

स य ए॒वं वि॒दुष॑ उपद्र॒ष्टा भ॑वति प्रा॒णं रु॑णद्धि

sa ya evaṃ viduṣa upadraṣṭā bhavati prāṇaṃ ruṇaddhi

हिन्दी अर्थ

कारण होने से प्राणियों को प्राण देते ह (२-५; १७) । ३. प्राणं वायु तथा परमेरुवर, दोनों की प्राणरूपता (७, र) । ७. राण है-्रोहि धान्य , यव जौ तथा भ्रनङ्वान् बेल (१३), ९. प्राण है, मातरिश्वा भ्रौर वात (१५) । रसीः, हैवीः, मनुष्यजाः (१६) । ११. प्राणज्ञ की महिमा, तथा उत के प्रति उपहार (१९) । १२. प्राण-पस्मेवर को रज्ञा या कथन का श्रवण (१९) । १५. प्राण के दो बराबर-बराबर के ब्र्धमाग (२२). 1 १६. प्राण के प्रति नमः (२३) ।

English

And Indra brought by self-restraint heaven’s lustre to the deities.

अध्याय ११

श्लोक 3.55

न च॑ प्रा॒णं रु॒णद्धि॑ सर्वज्या॒निं जी॑यते

na ca prāṇaṃ ruṇaddhi sarvajyāniṃ jīyate

हिन्दी अर्थ

१८. भ्राण का सदा जागरण (२४) । ति १६. जीवन के लिये प्राण को बान्धे रखना (२६) ॥ कां० ११। सु र) अथरववेद-भाष्य १०३ (प्राणाय नमः) भाण को. नमस्कार हो, .(यस्य) जिस के (वरे) , समग्र जगत् का गुख्य-पराण परमेर्वर है ॥ जड़-चेतन जगत के. . प्रत्येक पदां भँ भ्रपना पनां प्राण है, जिस के कारण उस-उस पदाथ की

English

The plants, what is and what shall be, day, night, the tall tree of the wood, The year with seasons of the year, all from the Brahmachāri sprang.

अध्याय ११

श्लोक 3.56

न च॑ सर्वज्या॒निं जी॒यते॑ पु॒रैनं॑ ज॒रसः॑ प्रा॒णो ज॑हाति

na ca sarvajyāniṃ jīyate purainaṃ jarasaḥ prāṇo jahāti

हिन्दी अर्थ

के नियमानुसार, जब परमेदबर, इन पदार्थो भे प्राणदा, भर्थात् इन की स्थिति. को कायम रखने की शक्ति को हर लेता है तो उस महाप्रलय मे. सब पदां प्रकृतिरूपी उपादान कारण भे विलीन हो जते है,. भ्रौर प्राण- (माण) है प्राण (क्रन्दाय) नाद या ध्वनि करते हुए (ते नमः) तुभे नमस्कार हो, - (स्तनयित्नवे) गरजते हए (ते) तुर (नमः) नमस्कार हो । (प्राण) है प्राण !- ( विद्युते ) चमकते हृए (ते. नमः) तुमे नमस्कार हो, (प्राण) है प्राण ! (वर्षते) बरसते हए (ठे नमः) तुमे पराप्त करता है । इस की गेरजना, नाद, . चमकना शौर बरसना परमेदवरा- घीन है । जंसे छरीर जड़ है, भौर शरीरस्थ जीवात्मा चेतन है । -इस चेतग १०४. भ्रथर्वैवेद-भाष्य का० ११। सु9४ के कारण शरीर की स्थिति तथा चेष्टाएं होती हैः जीवात्मा के निकल जाने पर शरीर भरम्नि के अर्पित हो जातादहै, इती प्रकार मेष भौर पर

English

All creatures of the earth and heaven, tame animals and sylvan beasts,

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Atharva Veda — Chapter 11
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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