Matsya Purana· Matsya Purāṇa
150
अध्याय 150 / 176

Adhyaya 150

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पूर्ण अध्याय पाठ68 श्लोक

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अध्याय १५०

श्लोक 175

स्थिता वमन्तो धावन्तो गलद्रक्तवसासृजः दानवानां सहस्राणि व्यदृश्यन्त मृतानि तु

sthitā vamanto dhāvanto galadraktavasāsṛjaḥ dānavānāṃ sahasrāṇi vyadṛśyanta mṛtāni tu

हिन्दी अर्थ

जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे। संलीनगात्रचरणे कणैर्व्यक्तिमुपागते कान्तप्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी। करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा

English

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अध्याय १५०

श्लोक 176

संक्षये दानवेन्द्राणां तस्मिन्महति वर्तिते प्रकोपोद्भूतताम्राक्षः कालनेमी रुषातुरः

saṃkṣaye dānavendrāṇāṃ tasminmahati vartite prakopodbhūtatāmrākṣaḥ kālanemī ruṣāturaḥ

हिन्दी अर्थ

दुढाङ्कसंधिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने। अनुव्रजति धावन्तीं प्रियामुद्धतमुत्सुक: ख्नहार्द्रभावात् कर्षन्ती भर्तारं शृङ्गकोटिना

English

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अध्याय १५०

श्लोक 177

अभवत्कल्पमेघाभः स्फुरद्भूरिशतह्रदः गम्भीरास्फोटनिर्ह्रादजगद्धृदयघट्टकः

abhavatkalpameghābhaḥ sphuradbhūriśatahradaḥ gambhīrāsphoṭanirhrādajagaddhṛdayaghaṭṭakaḥ

हिन्दी अर्थ

आम्र-मञ्जरीका स्वाद ले रहा है। कौआ वृक्षके अग्रभागपर बैठकर पंखोंसे बच्चेको छिपाकर बैठी हुई अपनी प्रसूता पल्लीको चोंचके अग्रभागसे आनन्दित कर रहा है। अपनी पत्नीके साथ कामदेवसे अभिभूत हुआ तरुण कपिंजल (तीतर) निचले भूभागपर बैठा हुआ आहार भी नहीं ग्रहण कर रहा है। विशालनेत्रे! चटक (गौरैया) अपनी प्रियाकी गोदमें स्थित हो बारम्बार रमण करता हुआ कामीजनोंको उत्कण्ठित कर रहा है। अपनी प्रियाके साथ वृक्षको डालीपर बैठा हुआ यह शुक पंजेसे शाखाको खींचता हुआ उसे फलयुक्त-सा कर रहा है। इस वनमें मांसाहारसे तृप्त युवा सिंह निद्रामें लीन हो सो रहा है और उसकी प्रियतमा उसके पैरोंके मध्यभागमें

English

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अध्याय १५०

श्लोक 178

प्रच्छाद्य गगनाभोगं रविमायां व्यनाशयत् शीतं ववर्ष सलिलं दानवेन्द्रबलं प्रति

pracchādya gaganābhogaṃ ravimāyāṃ vyanāśayat śītaṃ vavarṣa salilaṃ dānavendrabalaṃ prati

हिन्दी अर्थ

शयन कर रही है। पर्वतकी कन्दरामें बैठे हुए व्याघ्र- दम्पत्तिको देखो, जिनके नेत्रोंकी कान्तिसे गुफा भिन्न- सी दिखायी दे रही है। यह गैंडा अपनी प्रियाको जीभके अग्रभागसे बारम्बार चाट रहा है और अपनी उस प्रियाद्वारा चाटे जानेपर आनन्दका अनुभव कर रहा है। वह वानरी अपनी गोदमें सिर रखकर गाढ़ निद्रामें सोते हुए पतिको जूक आदि जन्तुओंको निकालकर सुख दे

English

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अध्याय १५०

श्लोक 179

दैत्यास्तां वृष्टिमासाद्य समाश्वस्तास्ततः क्रमात् बीजाङ्कुरा इवाम्लानाः प्राप्य वृष्टिं धरातले

daityāstāṃ vṛṣṭimāsādya samāśvastāstataḥ kramāt bījāṅkurā ivāmlānāḥ prāpya vṛṣṭiṃ dharātale

हिन्दी अर्थ

रही है। वह बिडाल पृथ्वीपर लेटकर पेटको दिखाती हुई अपनी प्रियतमाको नखों और दाँतोंसे काट रहा है, परंतु वास्तवमें बह पीड़ा नहीं दे रहा है ये खरगोश-दम्पति पीड़ित होकर अपने पैरोंको शरीरमें छिपाकर सो रहे हैं। ये कानोंद्वारा ही जाने जा सकते हैं। सूक्ष्माङ्गि! कामार्त हाथी कमलयुक्त सरोवरमें स्नान कर कमल-डंठलोंके ग्रासोंसे प्रियाको संतुष्ट कर

English

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अध्याय १५०

श्लोक 180

ततः स मेघरूपी तु कालनेमिर्महासुरः शस्त्रवृष्टिं ववर्षोग्रां देवानीकेषु दुर्जयाम्

tataḥ sa megharūpī tu kālanemirmahāsuraḥ śastravṛṣṭiṃ vavarṣogrāṃ devānīkeṣu durjayām

हिन्दी अर्थ

रहा है। पीछे-पीछे चलनेवाले अपने बच्चोंसे घिरी हुई शूकरी प्रियतमके मार्गपर चलती हुई प्रियतमके द्वारा उखाड़े गये मोथोंको खाती जा रही है। इस वनमें दृढ़ अङ्गोंवाला एवं शरीरमें कीचड़ पोते हुए कामार्त महिष भागती हुई प्रियाके पीछे दौड़ रहा है। सुन्दरि! अपनी प्रियाके सहित इस मृगको देखो, जो कुतूहलवश मुझे मनोहर कटाक्षोंसे देख रहा है। देखो, वह मृगी स्नेहयुक्त हो अपने सींगोंके अग्रभागसे प्रियतमको ढकेलती

English

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अध्याय १५०

श्लोक 181

तया वृष्ट्या बाध्यमाना दैत्येन्द्राणां महौजसाम् गतिं कां च न पश्यन्तो गावः शीतार्दिता इव

tayā vṛṣṭyā bādhyamānā daityendrāṇāṃ mahaujasām gatiṃ kāṃ ca na paśyanto gāvaḥ śītārditā iva

हिन्दी अर्थ

हुई पिछले पैरसे मुखको खुजला रही है। अरे, उस अन्वास्ते चमरः कामी मां च पश्यति गर्वितः रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकं ककुदि वारयन्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 182

परस्परं व्यलीयन्त पृष्ठेषु व्यस्त्रपाणयः स्वेषु बाधे व्यलीयन्त गजेषु तुरगेषु च

parasparaṃ vyalīyanta pṛṣṭheṣu vyastrapāṇayaḥ sveṣu bādhe vyalīyanta gajeṣu turageṣu ca

हिन्दी अर्थ

विपुले बदरीस्कन्धे बदराशनकाम्यया सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः। करोति पद्मिनीं कान्तां सुपुष्पामिव सुन्दरि

English

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अध्याय १५०

श्लोक 183

रथेषु त्वमरास्त्रस्तास् तत्र तत्र निलिल्यिरे अपरे कुञ्चितैर्गात्रैः स्वहस्तपिहिताननाः

ratheṣu tvamarāstrastās tatra tatra nililyire apare kuñcitairgātraiḥ svahastapihitānanāḥ

हिन्दी अर्थ

इन्धनं न कृतं सुश्रु तत्करिष्यामि साम्प्रतम् एवमेतत् करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया । दूरं कान्त न कर्तव्यो बिभेमि गहने वने

English

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अध्याय १५०

श्लोक 184

इतश्चेतश्च संभ्रान्ता बभ्रमुर्वै दिशो दश एवंविधे तु संग्रामे तुमुले देवसंक्षये

itaścetaśca saṃbhrāntā babhramurvai diśo daśa evaṃvidhe tu saṃgrāme tumule devasaṃkṣaye

हिन्दी अर्थ

ततः स काष्ठानि चकार तस्मिन् श्वेत चमरी गायको देखो, जो चमरके पीछे चली जा रही है। इधर कामार्तत चमर खड़ा है और गर्वके साथ मेरी ओर देख रहा है। धूपमें बैठे हुए उस नीलगायको देखो, जो अपनी प्रियाके साथ आनन्दपूर्वक जुगाली कर रहा

English

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अध्याय १५०

श्लोक 185

दृश्यन्ते पतिता भूमौ शस्त्रभिन्नाङ्गसंधयः विभुजा भिन्नमूर्धानस् तथा छिन्नोरुजानवः

dṛśyante patitā bhūmau śastrabhinnāṅgasaṃdhayaḥ vibhujā bhinnamūrdhānas tathā chinnorujānavaḥ

हिन्दी अर्थ

है और ककुद्पर बैठे हुए कौवेका निवारण कर रहा है। प्रियाके साथ उस बकरेको देखो, जो वेर वृक्षकी मोटी शाखापर फल खानेकी इच्छासे अगले दोनों पैरोंको रखे हुए है। सरोवरमें विचरण करते हुए हंसिनीसहित उस अत्यन्त निर्मल हंसको देखो, जो सुप्रकाशित चन्द्रबिम्बकी शोभा धारण कर रहा है। सुन्दरि! चक्रवाक अपनी प्रियाके साथ कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें अपनी प्रियाको फूली हुई पद्मिनीके समान कर रहा है। (ऐसा कहकर सत्यवानूने फिर कहा--) सुन्दर भौंहोंबाली ! मैं फलोंको एकत्र कर चुका तथा तुम पुष्पोंको एकत्र कर चुकी, किंतु अभी ईधनका कोई प्रबन्ध नहीं किया गया, अतः अब मैं उसे एकत्र करूँगा। भामिनि! तबतक तुम इस

English

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अध्याय १५०

श्लोक 186

विपर्यस्तरथासङ्गा निष्पिष्टध्वजपङ्क्तयः निर्भिन्नाङ्गैस्तुरंगैस्तु गजैश्चाचलसंनिभैः

viparyastarathāsaṅgā niṣpiṣṭadhvajapaṅktayaḥ nirbhinnāṅgaisturaṃgaistu gajaiścācalasaṃnibhaiḥ

हिन्दी अर्थ

सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो॥ २१--३३॥ सावित्री बोली-कान्त! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, परंतु आप मेरे नेत्रोके सामनेसे दूर न जायं; क्योंकि मैं इस घने वनमें डर रही हूँ

English

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अध्याय १५०

श्लोक 187

स्रुतरक्तह्रदैर्भूमिर् विकृताविकृता बभौ एवमाजौ बली दैत्यः कालनेमिर्महासुरः

srutaraktahradairbhūmir vikṛtāvikṛtā babhau evamājau balī daityaḥ kālanemirmahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानने कहा--राजन्! सावित्रीके ऐसा कहनेपर सत्यवान् उस वनमें राजपुत्रीके सम्मुख ही उस सरोवरसे थोड़ी ही दूरपर काष्ठ एकत्र करने लगे, परंतु राजपुत्री उतनी मेने च सा तं मृतमेव राजन्॥ ३५ दूर जानेपर भी उन्हें मरा हुआ-सा मानने लगी इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित््युपाख्याने वनदर्शनं नाम नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 188

जघ्ने मुहूर्तमात्रेण गन्धर्वाणां दशायुतम् यक्षाणां पञ्च लक्षाणि रक्षसामयुतानि षट्

jaghne muhūrtamātreṇa gandharvāṇāṃ daśāyutam yakṣāṇāṃ pañca lakṣāṇi rakṣasāmayutāni ṣaṭ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें वनदर्शन नामक दो सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ यमराजका सत्यवानके प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप

English

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अध्याय १५०

श्लोक 189

त्रीणि लक्षाणि जघ्ने स किंनराणां तरस्विनाम् जघ्ने पिशाचमुख्यानां सप्त लक्षाणि निर्भयः

trīṇi lakṣāṇi jaghne sa kiṃnarāṇāṃ tarasvinām jaghne piśācamukhyānāṃ sapta lakṣāṇi nirbhayaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य पाटयतः काष्ठं जज्ञे शिरसि वेदना। स वेदनार्तः संगम्य भार्या वचनमब्रवीत् आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना। तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किञ्जन पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका

English

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अध्याय १५०

श्लोक 190

इतरेषामसंख्याताः सुरजातिनिकायिनाम् जघ्ने स कोटीः संक्रुद्धश् चित्रास्त्रैरस्त्रकोविदः

itareṣāmasaṃkhyātāḥ surajātinikāyinām jaghne sa koṭīḥ saṃkruddhaś citrāstrairastrakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम्। नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम् तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना

English

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अध्याय १५०

श्लोक 191

एवं परिभवे भीमे तदा त्वमरसंक्षये संक्रुद्धावश्विनौ देवौ चित्रास्त्रकवचोज्ज्वलौ

evaṃ paribhave bhīme tadā tvamarasaṃkṣaye saṃkruddhāvaśvinau devau citrāstrakavacojjvalau

हिन्दी अर्थ

अनुवव्राज गच्छन्तं धर्मराजमतन्द्रिता। कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम्। गुरुशुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः। अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 192

जघ्नतुः समरे दैत्यं कृतान्तानलसंनिभम् तमासाद्य रणे घोरम् एकैकः षष्टिभिः शरैः

jaghnatuḥ samare daityaṃ kṛtāntānalasaṃnibham tamāsādya raṇe ghoram ekaikaḥ ṣaṣṭibhiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः तत्तन्निवेदयेत् तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः।

English

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अध्याय १५०

श्लोक 193

जघ्ने मर्मसु तीक्ष्णाग्रैर् असुरं भीमदर्शनम् ताभ्यां बाणप्रहारैः स किंचिदायस्तचेतनः

jaghne marmasu tīkṣṇāgrair asuraṃ bhīmadarśanam tābhyāṃ bāṇaprahāraiḥ sa kiṃcidāyastacetanaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा-राजन्! लकड़ी काटते हुए सत्यवानूके सिरमें पीड़ा उत्पन्न हुई, तब वे पीड़ासे व्याकुल हो पत्नीके पास आकर इस प्रकार कहने लगे--'इस परिश्रमसे मेरे सिरमें बहुत पीड़ा हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अन्धकारमें प्रविष्ट हो रहा हूँ । मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। इस समय मैं तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सोना चाहता हूँ ।' राजन्! राजपुत्रीसे ऐसा कहकर सत्यवान् उस समय उसको गोदमें सो गये । जब सावित्रीकी गोंदमें सिर रखकर सोते हुए सत्यवानूके नेत्र निद्रावश मुँद

English

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अध्याय १५०

श्लोक 194

जग्राह चक्रमष्टारं तैलधौतं रणान्तकम् तेन चक्रेण सो ऽश्विभ्यां चिछेद रथकूबरम्

jagrāha cakramaṣṭāraṃ tailadhautaṃ raṇāntakam tena cakreṇa so 'śvibhyāṃ cicheda rathakūbaram

हिन्दी अर्थ

स्थानपर आये हुए सामर्थ्यशाली स्वयं धर्मराजको देखा, जो नीले कमलके-से श्यामवर्णसे सुशोभित और पीताम्बर धारण किये हुए थे। वे चमकती हुई बिजलियोंसे युक्त जलपूर्ण मेघ-जैसे दीख रहे थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट और दो कुण्डलोंसे सुशोभित थे। उनके वक्ष:स्थलपर हार लटक रहा था। वे बाजूबंदसे विभूषित थे तथा उनके पीछे मृत्युसहित महाकाल भी था। धर्मराजने उस स्थानपर पहुँचकर उस समय सत्यवान्के शरीरसे अंगूठेके परिमाणवाले

English

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अध्याय १५०

श्लोक 195

जग्राहाथ धनुर्दैत्यः शरांश्चाशीविषोपमान् ववर्ष भिषजो मूर्ध्नि संछाद्याकाशगोचरम्

jagrāhātha dhanurdaityaḥ śarāṃścāśīviṣopamān vavarṣa bhiṣajo mūrdhni saṃchādyākāśagocaram

हिन्दी अर्थ

पुरुषको पाशमें बाँधकर अपने अधीन किया और उसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। तब आलस्यरहित हो सुन्दरी सावित्री पतिको प्राणरहित देखकर जाते हुए धर्मराजके पीछे-पीछे चली और काँपते हुए हृदयसे अञ्जलि बाँधकर धर्मराजसे बोली--'माताकी भक्तिसे इस लोक, पिताकी भक्तिसे मध्यम लोक और गुरुको शुश्रूषासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो इन तीनोंका आदर करता है, उसने मानो सभी धर्मोका पालन कर लिया तथा जिसने इन तीनोंका आदर नहीं किया, उसकी सारी सत्क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहें, तबतक किसी अन्य धर्मके पालनकी आवश्यकता नहीं है। उनके प्रिय एवं सुखके कार्योमें

English

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अध्याय १५०

श्लोक 196

तावप्यस्त्रैश्चिछिदतुः शितैस्तैर्दैत्यसायकान् तच्च कर्म तयोर्दृष्ट्वा विस्मितः कोपमाविशत्

tāvapyastraiścichidatuḥ śitaistairdaityasāyakān tacca karma tayordṛṣṭvā vismitaḥ kopamāviśat

हिन्दी अर्थ

तत्पर रहकर नित्य उनको शुश्रूषा करनी चाहिए। उनकी आज्ञासे यदि कभी परतन्त्रता भी स्वीकार करनी पड़े तो वह सब मन-वचन-कर्मद्वारा उन्हें निवेदित कर देना चाहिए। पुरुषके सारे कर्म माता, पिता और गुरु--इन्हीं त्रिष्वप्येतेषु कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते॥ १४ तीनोंमें समाप्त हो जाते हैं

English

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अध्याय १५०

श्लोक 197

महता स तु कोपेन सर्वायोमयसादनम् जग्राह मुद्गरं भीमं कालदण्डविभीषणम्

mahatā sa tu kopena sarvāyomayasādanam jagrāha mudgaraṃ bhīmaṃ kāladaṇḍavibhīṣaṇam

हिन्दी अर्थ

कामेन निवर्तयाशु धर्मो न तेभ्योऽपि हि उच्यते च। विनिवर्तस्व धर्मज्ञे ग्लानिर्भवति तेऽधुना पतिर्हि हैवतं स्त्रीणां पतिरेव परायणम्।

English

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अध्याय १५०

श्लोक 198

स ततो भ्राम्य वेगेन चिक्षेपाश्विरथं प्रति तं तु मुद्गरम् आयान्तम् आलोक्याम्बरगोचरम्

sa tato bhrāmya vegena cikṣepāśvirathaṃ prati taṃ tu mudgaram āyāntam ālokyāmbaragocaram

हिन्दी अर्थ

अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत् पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा। त्वां देव न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 199

त्यक्त्वा रथौ तु तौ वेगाद् आप्लुतौ तरसाश्विनौ तौ रथौ स तु निष्पिष्य मुद्गरो ऽचलसंनिभः

tyaktvā rathau tu tau vegād āplutau tarasāśvinau tau rathau sa tu niṣpiṣya mudgaro 'calasaṃnibhaḥ

हिन्दी अर्थ

मनस्विनी तु या काचिद्वैधव्याक्षरदूषिता। मुहूर्तमपि जीवेत मण्डनाहा ह्यमण्डिता विनष्टचक्षुषो राज्यं चक्षुषा सह कारय। च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ श्वशुरस्य महात्मनः यमराजने कहा-तुम हमसे जिस कामनाको पूर्ण करानेके लिये आ रही हो उस कामनाको छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ। सचमुच संसारमें माता-पिता तथा गुरुकी सेवासे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। तुम्हारे

English

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अध्याय १५०

श्लोक 200

दारयामास धरणीं हेमजालपरिष्कृतः तस्य कर्माश्विनौ दृष्ट्वा भिषजौ चित्रयोधिनौ

dārayāmāsa dharaṇīṃ hemajālapariṣkṛtaḥ tasya karmāśvinau dṛṣṭvā bhiṣajau citrayodhinau

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पीछे-पीछे आनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ रहा है और तुम भी थकावटसे चूर हो रही हो। इसलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ। धर्मज्ञे! तुम्हारा पति सचमुच गुरुजनोंकी पूजामें प्रेम करनेवाला है और तुम भी पतिव्रता साध्वी हो। इस समय तुम्हें कष्ट हो रहा है, अतः तुम लौट जाओ

English

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अध्याय १५०

श्लोक 201

वज्रास्त्रं तु प्रकुर्वाते दानवेन्द्रनिवारणम् ततो वज्रमयं वर्षं प्रावर्तद् अतिदारुणम्

vajrāstraṃ tu prakurvāte dānavendranivāraṇam tato vajramayaṃ varṣaṃ prāvartad atidāruṇam

हिन्दी अर्थ

सावित्री बोली--स्त्रियोंका पति ही देवता है, पति ही उसको शरण देनेवाला है, इसलिये साध्वी रित्रयोंको प्राणपति प्रियतमका अनुगमन करना चाहिए। पिता, भाई तथा पुत्र परिमित सम्पत्ति देनेवाले हैं, किंतु पति अपरिमित सम्पत्तिका दाता है। भला, ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी। सुरोत्तम! आप मेरे पतिको जहाँ ले जा रहे हैं अथवा स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी यथाशक्ति जाना चाहिए। देव! मेरे प्राणपतिको ले जाते हुए आपके पीछे चलनेमें यदि मैं समर्थ न हो सकूँगी तो प्राणोंको त्याग दूँगी । जो कोई मनस्विनी स्त्री वैधव्य-धर्मसे दूषित होकर मुहूर्तभर जीवित रहती है तो वह सभी आभूषणोंसे अलंकृत होते हुए भी भाग्यहीन है ॥१७--२१॥

English

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अध्याय १५०

श्लोक 202

घोरवज्रप्रहारैस्तु दैत्येन्द्रः स परिष्कृतः रथो ध्वजो धनुश्चक्रं कवचं चापि काञ्चनम्

ghoravajraprahāraistu daityendraḥ sa pariṣkṛtaḥ ratho dhvajo dhanuścakraṃ kavacaṃ cāpi kāñcanam

हिन्दी अर्थ

यमने कहा-महाभाग्यशालिनी पतिव्रते ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः शुभे! सत्यवानके प्राणोंको छोड़कर कोई भी वरदान माँग लो, देर मत करो सावित्री बोली धर्मज्ञ! जो राज्यसे च्युत हो गये हैं तथा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे मेरे महात्मा श्वशुरको राज्य और नेत्रसे संयुक्त कर दीजिये

English

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अध्याय १५०

श्लोक 203

क्षणेन तिलशो जातं सर्वसैन्यस्य पश्यतः तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म सो ऽश्विभ्यां भीमविक्रमः

kṣaṇena tilaśo jātaṃ sarvasainyasya paśyataḥ taddṛṣṭvā duṣkaraṃ karma so 'śvibhyāṃ bhīmavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

यमराजने कहा--भद्रे! तुम बहुत दूरतक चली आयी हो, अतः अब लौट जाओ। तुम्हारी यह सब अभिलाषा पूर्ण होगी। तुम्हारे मेरे पीछे चलनेसे' मेरे काममें विघ्न पड़ेगा और तुम्हें भी थकावट होगी, इसीलिये इस समय मैं तुमसे ऐसा कह रहा हूँ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्रुपाख्याने प्रथमवरलाभो नाम दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 204

नारायणास्त्रं बलवान् मुमोच रणमूर्धनि वज्रास्त्रं शमयामास दानवेन्द्रो ऽस्त्रतेजसा

nārāyaṇāstraṃ balavān mumoca raṇamūrdhani vajrāstraṃ śamayāmāsa dānavendro 'stratejasā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें प्रथम वरलाभ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

English

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अध्याय १५०

श्लोक 205

तस्मिन्प्रशान्ते वज्रास्त्रे कालनेमिरनन्तरम् जीवग्राहं ग्राहयितुम् अश्विनौ तु प्रचक्रमे

tasminpraśānte vajrāstre kālanemiranantaram jīvagrāhaṃ grāhayitum aśvinau tu pracakrame

हिन्दी अर्थ

अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्। परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 206

तावश्विनौ रणाद्भीतौ सहस्राक्षरथं प्रति प्रयातौ वेपमानौ तु पदा शस्त्रविवर्जितौ

tāvaśvinau raṇādbhītau sahasrākṣarathaṃ prati prayātau vepamānau tu padā śastravivarjitau

हिन्दी अर्थ

निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगदुरुः। असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 207

तयोरनुगतो दैत्यः कालनेमिर्महाबलः प्राप्येन्द्रस्य रथं क्रूरो दैत्यानीकपदानुगः

tayoranugato daityaḥ kālanemirmahābalaḥ prāpyendrasya rathaṃ krūro daityānīkapadānugaḥ

हिन्दी अर्थ

नरान् परीक्षयेद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा । निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः ७ निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्। एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना

English

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अध्याय १५०

श्लोक 208

तं दृष्ट्वा सर्वभूतानि वित्रेसुर्विह्वलानि तु दृष्ट्वा दैत्यस्य तत्क्रौर्यं सर्वभूतानि मेनिरे

taṃ dṛṣṭvā sarvabhūtāni vitresurvihvalāni tu dṛṣṭvā daityasya tatkrauryaṃ sarvabhūtāni menire

हिन्दी अर्थ

राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते। असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात् तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे

English

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अध्याय १५०

श्लोक 209

पराजयं महेन्द्रस्य सर्वलोकक्षयावहम् चेलुः शिखरिणो मुख्याः पेतुरुल्का नभस्तलात्

parājayaṃ mahendrasya sarvalokakṣayāvaham celuḥ śikhariṇo mukhyāḥ peturulkā nabhastalāt

हिन्दी अर्थ

सावित्रीने कहा-देवश्रेष्ठ ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है। चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सञ्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हें । विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगतूसे वैर करनेवाले दुष्टोसे होता है। जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं। जिस

English

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अध्याय १५०

श्लोक 210

जगर्जुर्जलदा दिक्षु ह्य् उद्भूताश्च महार्णवाः तां भूतविकृतिं दृष्ट्वा भगवान्गरुडध्वजः

jagarjurjaladā dikṣu hy udbhūtāśca mahārṇavāḥ tāṃ bhūtavikṛtiṃ dṛṣṭvā bhagavāngaruḍadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

परलोककी प्रा्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते। स्वयं जगदुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है। राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है। सत्पुरुषोंको सम्मान देने

English

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अध्याय १५०

श्लोक 211

व्यबुध्यताहिपर्यङ्के योगनिद्रां विहाय तु लक्ष्मीकरयुगाजस्रलालिताङ्घ्रिसरोरुहः

vyabudhyatāhiparyaṅke yoganidrāṃ vihāya tu lakṣmīkarayugājasralālitāṅghrisaroruhaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है।. स्वर्ग-प्रा्िकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिए। जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है। उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सकते, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं। यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते

English

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अध्याय १५०

श्लोक 212

शरदम्बरनीलाब्जकान्तदेहछविर्विभुः कौस्तुभोद्भासितोरस्कः कान्तकेयूरभास्वरः

śaradambaranīlābjakāntadehachavirvibhuḥ kaustubhodbhāsitoraskaḥ kāntakeyūrabhāsvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ १९ हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः। विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 213

विमृश्य सुरसंक्षोभं वैनतेयं समाह्वयत् आहूते ऽवस्थिते तस्मिन् नागावस्थितवर्ष्मणि

vimṛśya surasaṃkṣobhaṃ vainateyaṃ samāhvayat āhūte 'vasthite tasmin nāgāvasthitavarṣmaṇi

हिन्दी अर्थ

सहोदराणां भ्रातृणां कामयामि शतं विभो। अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः। पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्त मम यास्यसि

English

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अध्याय १५०

श्लोक 214

दिव्यनानास्त्रतीक्ष्णार्चिर् आरुह्यागात् सुरान्स्वयम् तत्रापश्यत देवेन्द्रम् अभिद्रुतमभिप्लुतैः

divyanānāstratīkṣṇārcir āruhyāgāt surānsvayam tatrāpaśyata devendram abhidrutamabhiplutaiḥ

हिन्दी अर्थ

एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता। मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे। पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा

English

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अध्याय १५०

श्लोक 215

दानवेन्द्रैर्नवाम्भोदसच्छायैः पौरुषोत्कटैः यथा हि पुरुषं घोरैर् अभाग्यैर्वंशशालिभिः

dānavendrairnavāmbhodasacchāyaiḥ pauruṣotkaṭaiḥ yathā hi puruṣaṃ ghorair abhāgyairvaṃśaśālibhiḥ

हिन्दी अर्थ

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः। माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तु वर्षशतैरपि न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 216

परित्राणायाशु कृतं सुक्षेत्रे कर्म निर्मलम् अथापश्यन्त दैतेया वियति ज्योतिर्मण्डलम्

paritrāṇāyāśu kṛtaṃ sukṣetre karma nirmalam athāpaśyanta daiteyā viyati jyotirmaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः। त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः यमराज बोले--विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवानुके प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो

English

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अध्याय १५०

श्लोक 217

स्फुरन्तमुदयाद्रिस्थं सूर्यमुष्णत्विषा इव प्रभावं ज्ञातुमिच्छन्तो दानवास्तस्य तेजसः

sphurantamudayādristhaṃ sūryamuṣṇatviṣā iva prabhāvaṃ jñātumicchanto dānavāstasya tejasaḥ

हिन्दी अर्थ

सावित्रीने कहा-विभो ! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ । मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों तब यमराजने सावित्रीसे कहा--' अनिन्दिते ! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वहैहिक क्रियाओंके लिये यत्र करो। अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अत: तुम इसके पीछे नहीं चल मेरे साथ चल सकती हो। भद्रे! सत्यवानूने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ। सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुको सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिए। सत्यवानूने वनमें

English

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अध्याय १५०

श्लोक 218

गरुत्मन्तमपश्यन्तः कल्पान्तानलसंनिभम् तमास्थितं च मेघौघद्युतिमक्षयमच्युतम्

garutmantamapaśyantaḥ kalpāntānalasaṃnibham tamāsthitaṃ ca meghaughadyutimakṣayamacyutam

हिन्दी अर्थ

इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है । शुभे ! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्यं तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं, अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिए; क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्वीका और भाई अपना ही स्वरूप है। मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों

English

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अध्याय १५०

श्लोक 219

तम् आलोक्यासुरेन्द्रास्तु हर्षसम्पूर्णमानसाः अयं वै देवसर्वस्वं जिते ऽस्मिन्निर्जिताः सुराः

tam ālokyāsurendrāstu harṣasampūrṇamānasāḥ ayaṃ vai devasarvasvaṃ jite 'sminnirjitāḥ surāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्षोमें भी नहीं चुकाया जा सकता । अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिए; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं। इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अत: उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिए। वे ही तीनों लोक हैं, बे ही तीनों आश्रम वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं। पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६ गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं।

English

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अध्याय १५०

श्लोक 220

अयं स दैत्यचक्राणां कृतान्तः केशवो ऽरिहा एनमाश्रित्य लोकेषु यज्ञभागभुजो ऽमराः

ayaṃ sa daityacakrāṇāṃ kṛtāntaḥ keśavo 'rihā enamāśritya lokeṣu yajñabhāgabhujo 'marāḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही । दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते कामेन निवर्त भद्रे

English

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अध्याय १५०

श्लोक 221

इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे परिवार्य समन्ततः निजघ्नुर्विविधैरस्त्रैस् ते तम् आयान्तम् आहवे

ityuktvā dānavāḥ sarve parivārya samantataḥ nijaghnurvividhairastrais te tam āyāntam āhave

हिन्दी अर्थ

जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो बातें पूर्ण होंगी । इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये ्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ ॥१३--२८॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 222

कालनेमिप्रभृतयो दश दैत्या महारथाः षष्ट्या विव्याध बाणानां कालनेमिर्जनार्दनम्

kālanemiprabhṛtayo daśa daityā mahārathāḥ ṣaṣṭyā vivyādha bāṇānāṃ kālanemirjanārdanam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें द्वितीय वरका लाभ नामक दो सो ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ यमराज-सावित्री-संवाद तथा समराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति

English

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अध्याय १५०

श्लोक 223

निमिः शतेन बाणानां मथनो ऽशीतिभिः शरैः जम्भकश्चैव सप्तत्या शुम्भो दशभिरेव च

nimiḥ śatena bāṇānāṃ mathano 'śītibhiḥ śaraiḥ jambhakaścaiva saptatyā śumbho daśabhireva ca

हिन्दी अर्थ

धर्मार्जने सुरश्रेष्ठ कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा। त्वत्पादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम् धर्मार्जनं तथा कार्य पुरुषेण विजानता। तल्लाभः सर्वलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम्। धर्महीनस्य कामार्थौ वन्ध्यासुतसमौ प्रभौ

English

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अध्याय १५०

श्लोक 224

शेषा दैत्येश्वराः सर्वे विष्णुमेकैकशः शरैः दशभिश्चैव यत्तास्ते जघ्नुः सगरुडं रणे

śeṣā daityeśvarāḥ sarve viṣṇumekaikaśaḥ śaraiḥ daśabhiścaiva yattāste jaghnuḥ sagaruḍaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा। धर्म एकोऽनुयात्येनं यत्र क्कचनगामिनम्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 225

तेषाम् अमृष्य तत्कर्म विष्णुर्दानवसूदनः एकैकं दानवं जघ्ने षड्भिः षड्भिरजिह्मगैः

teṣām amṛṣya tatkarma viṣṇurdānavasūdanaḥ ekaikaṃ dānavaṃ jaghne ṣaḍbhiḥ ṣaḍbhirajihmagaiḥ

हिन्दी अर्थ

एको हि जायते जन्तुरेक एव विपद्यते धर्मस्तमनुयात्येको न सुहुन्न च बान्धवाः। क्रिया सौभाग्यलावण्यं सर्वं धर्मेण लभ्यते

English

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अध्याय १५०

श्लोक 226

आकर्णकृष्टैर्भूयश्च कालनेमिस् त्रिभिः शरैः विष्णुं विव्याध हृदये क्रोधाद्रक्तविलोचनः

ākarṇakṛṣṭairbhūyaśca kālanemis tribhiḥ śaraiḥ viṣṇuṃ vivyādha hṛdaye krodhādraktavilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रहमनद्रोपेनद्रसर्वेन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् । वस्वश्चिधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 227

तस्याशोभन्त ते बाणा हृदये तप्तकाञ्चनाः मयूखानीव दीप्तानि कौस्तुभस्य स्फुटत्विषः

tasyāśobhanta te bāṇā hṛdaye taptakāñcanāḥ mayūkhānīva dīptāni kaustubhasya sphuṭatviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक। प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः। नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानि यानि च

English

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अध्याय १५०

श्लोक 228

तैर्बाणैः किंचिदायस्तो हरिर्जग्राह मुद्गरम् सततं भ्राम्य वेगेन दानवाय व्यसर्जयत्

tairbāṇaiḥ kiṃcidāyasto harirjagrāha mudgaram satataṃ bhrāmya vegena dānavāya vyasarjayat

हिन्दी अर्थ

सावित्रीने कहा-देवश्रेष्ठ ! धर्मोपार्जनके कार्यमें कैसी ग्लानि और कैसा कष्ट? आपके चरणमूलकी सेवा ही परम धर्मका कारण है। देव! ज्ञानी पुरुषको सर्वदा धर्मोपार्जन करना चाहिए; क्योंकि उसका लाभ सभी लाभोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। प्रभो! धर्म, अर्थ और कामये तीनों एक साथ संसारमें जन्म लेनेके फल हैं; क्योंकि धर्महीन पुरुषके अर्थ और काम वन्ध्याके पुत्रकी भाँति निष्फल हैं। धर्मसे अर्थ और

English

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अध्याय १५०

श्लोक 229

दानवेन्द्रस्तमप्राप्तं वियत्येव शतैः शरैः चिछेद तिलशः क्रुद्धो दर्शयन्पाणिलाघवम्

dānavendrastamaprāptaṃ viyatyeva śataiḥ śaraiḥ cicheda tilaśaḥ kruddho darśayanpāṇilāghavam

हिन्दी अर्थ

कामको प्राप्ति होती है तथा धर्मसे ही दोनों लोक सिद्ध होते हैं। जहाँ-कहीं भी जानेवाले प्राणीके पीछे अकेले धर्म ही जाता है। अन्य सभी वस्तुएँ शरीरके साथ ही नष्ट हो जाती हैं। प्राणी अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। एक धर्म ही उसके पीछे- पीछे जाता है, मित्र एवं भाई-बन्धु कोई भी साथ नहीं देता। कार्योमें सफलता, सौभाग्य और सौन्दर्य आदि सब कुछ धर्मसे ही प्राप्त होते हैं। पुरुषान्तक! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, शिव, चन्द्रमा, यम, सूर्य, अग्नि, वायु, वरुण, वसुगण, अश्विनीकुमार एवं कुबेर आदि देवताओंके जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले लोक हैं, उन सबको मनुष्य धर्मके द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य मनोहर द्वीपों

English

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अध्याय १५०

श्लोक 230

ततो विष्णुः प्रकुपितः प्रासं जग्राह भैरवम् तेन दैत्यस्य हृदयं ताडयामास गाढतः

tato viṣṇuḥ prakupitaḥ prāsaṃ jagrāha bhairavam tena daityasya hṛdayaṃ tāḍayāmāsa gāḍhataḥ

हिन्दी अर्थ

एवं सुखदायी वर्षाको धर्मके द्वारा ही प्राप्त करते हैं। पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग, विचित्र विमान

English

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अध्याय १५०

श्लोक 231

क्षणेन लब्धसंज्ञस्तु कालनेमिर्महासुरः शक्तिं जग्राह तीक्ष्णाग्रां हेमघण्टाट्टहासिनीम्

kṣaṇena labdhasaṃjñastu kālanemirmahāsuraḥ śaktiṃ jagrāha tīkṣṇāgrāṃ hemaghaṇṭāṭṭahāsinīm

हिन्दी अर्थ

विमानानि विचित्राणि तथैवाप्सरसः शुभाः ॥ १० और सुन्दर अप्सराएँ पुण्यसे ही प्राप्त होती हैं ॥१--१०॥ राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्द्विस्तथेप्सिता संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते । रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदूशानि च

English

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अध्याय १५०

श्लोक 232

तया वामभुजं विष्णोर् बिभेद दितिनन्दनः भिन्नः शक्त्या भुजस्तस्य स्रुतशोणित आबभौ

tayā vāmabhujaṃ viṣṇor bibheda ditinandanaḥ bhinnaḥ śaktyā bhujastasya srutaśoṇita ābabhau

हिन्दी अर्थ

चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्। पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना धार्यतां याति च्छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा। जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 233

पद्मरागमयेनेव केयूरेण विभूषितः ततो विष्णुः प्रकुपितो जग्राह विपुलं धनुः

padmarāgamayeneva keyūreṇa vibhūṣitaḥ tato viṣṇuḥ prakupito jagrāha vipulaṃ dhanuḥ

हिन्दी अर्थ

वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः। वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः। रूपौदार्यगुणोपेताः स््त्रयश्चातिमनोहराः वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्। सुवर्णकि ङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 234

सप्तदश च नाराचांस् तीक्ष्णान्मर्मविभेदिनः दैत्यस्य हृदयं षड्भिर् विव्याध च त्रिभिः शरैः

saptadaśa ca nārācāṃs tīkṣṇānmarmavibhedinaḥ daityasya hṛdayaṃ ṣaḍbhir vivyādha ca tribhiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा। हेमकक्षेश्च मातड्लैश्वलत्पर्वतसंनिभे: खेलद्धि: पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा। सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे

English

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अध्याय १५०

श्लोक 235

चतुर्भिः सारथिं चास्य ध्वजं चैकेन पत्त्रिणा द्वाभ्यां ज्याधनुषी चापि भुजं सव्यं च पत्त्रिणा

caturbhiḥ sārathiṃ cāsya dhvajaṃ caikena pattriṇā dvābhyāṃ jyādhanuṣī cāpi bhujaṃ savyaṃ ca pattriṇā

हिन्दी अर्थ

वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा। तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ब्रह्मचर्य तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्। स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 236

स विद्धो हृदये गाढं दैत्यो हरिशिलीमुखैः स्रुतरक्तारुणप्रांशुः पीडाकुलितमानसः

sa viddho hṛdaye gāḍhaṃ daityo hariśilīmukhaiḥ srutaraktāruṇaprāṃśuḥ pīḍākulitamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता। न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् बाल एव चरेद् धर्मनित्यं देव जीवितम्। को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति

English

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अध्याय १५०

श्लोक 237

चकम्पे मारुतेनेव नोदितः किंशुकद्रुमः तमाकम्पितमालक्ष्य गदां जग्राह केशवः

cakampe māruteneva noditaḥ kiṃśukadrumaḥ tamākampitamālakṣya gadāṃ jagrāha keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्। अमरस्येब चरितमत्याश्चर्य॑ सुरोत्तम पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंको सिद्धि तथा मुख्य संस्कारये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं। देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है। विजयकी सूचना देनेवाले

English

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अध्याय १५०

श्लोक 238

तां च वेगेन चिक्षेप कालनेमिरथं प्रति सा पपात शिरस्युग्रा विपुला कालनेमिनः

tāṃ ca vegena cikṣepa kālanemirathaṃ prati sā papāta śirasyugrā vipulā kālaneminaḥ

हिन्दी अर्थ

शङ्खु-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है। उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, पुण्यकर्मोके फल हैं। सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त

English

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अध्याय १५०

श्लोक 239

संचूर्णितोत्तमाङ्गस्तु निष्पिष्टमुकुटो ऽसुरः स्रुतरक्तौघरन्ध्रस्तु स्रुतधातुरिवाचलः

saṃcūrṇitottamāṅgastu niṣpiṣṭamukuṭo 'suraḥ srutaraktaugharandhrastu srutadhāturivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं। देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं। चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती हे। देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हें । उसकी प्रापिके उपाय हैं-यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रुषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य ।

English

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अध्याय १५०

श्लोक 240

प्रापतत्स्वे रथे भग्ने विसंज्ञः शिष्टजीवितः पतितस्य रथोपस्थे दानवस्याच्युतो ऽरिहा

prāpatatsve rathe bhagne visaṃjñaḥ śiṣṭajīvitaḥ patitasya rathopasthe dānavasyācyuto 'rihā

हिन्दी अर्थ

इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिए; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं। देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिए; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी। सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है-यह महान्

English

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अध्याय १५०

श्लोक 241

स्मितपूर्वमुवाचेदं वाक्यं चक्रायुधः प्रभुः गच्छासुर विमुक्तो ऽसि साम्प्रतं जीव निर्भयः

smitapūrvamuvācedaṃ vākyaṃ cakrāyudhaḥ prabhuḥ gacchāsura vimukto 'si sāmprataṃ jīva nirbhayaḥ

हिन्दी अर्थ

आश्चर्य है। युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है। तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गति: । तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः

English

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अध्याय १५०

श्लोक 242

ततः स्वल्पेन कालेन अहमेव तवान्तकः एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य सारथिः कालनेमिनः अपवाह्य रथं दूरम् अनयत्कालनेमिनः

tataḥ svalpena kālena ahameva tavāntakaḥ etacchrutvā vacastasya sārathiḥ kālaneminaḥ apavāhya rathaṃ dūram anayatkālaneminaḥ

हिन्दी अर्थ

तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः। अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 150
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.