अध्याय १५४
श्लोक 304
चित्रकन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम् विहङ्गसंघसंजुष्टं कल्पपादपसंकटम्
citrakandarasaṃsthānaṃ guhāgṛhamanoharam vihaṅgasaṃghasaṃjuṣṭaṃ kalpapādapasaṃkaṭam
हिन्दी अर्थ
अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः । ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे "आओ '-- ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं । इसी तरह पीछेसे “जाओ” यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है । कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर
English
Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.