Matsya Purana· Matsya Purāṇa
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

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अध्याय १५४

श्लोक 304

चित्रकन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम् विहङ्गसंघसंजुष्टं कल्पपादपसंकटम्

citrakandarasaṃsthānaṃ guhāgṛhamanoharam vihaṅgasaṃghasaṃjuṣṭaṃ kalpapādapasaṃkaṭam

हिन्दी अर्थ

अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः । ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे "आओ '-- ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं । इसी तरह पीछेसे “जाओ” यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है । कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर

English

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अध्याय १५४

श्लोक 305

तत्रापश्यन्महाशाखं शाखिनं हरितच्छदम् सर्वर्तुकुसुमोपेतं मनोरथशतोज्ज्वलम्

tatrāpaśyanmahāśākhaṃ śākhinaṃ haritacchadam sarvartukusumopetaṃ manorathaśatojjvalam

हिन्दी अर्थ

मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिए कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड्नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिए ॥ २--१३३॥

English

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अध्याय १५४

श्लोक 306

नानापुष्पसमाकीर्णं नानाविधफलान्वितम् नतं सूर्यस्य रुचिभिर् भिन्नसंहृतपल्लवम्

nānāpuṣpasamākīrṇaṃ nānāvidhaphalānvitam nataṃ sūryasya rucibhir bhinnasaṃhṛtapallavam

हिन्दी अर्थ

अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ । राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोडे, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं

English

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अध्याय १५४

श्लोक 307

तत्राम्बराणि संत्यज्य भूषणानि च शैलजा संवीता वल्कलैर्दिव्यैर् दर्भनिर्मितमेखला

tatrāmbarāṇi saṃtyajya bhūṣaṇāni ca śailajā saṃvītā valkalairdivyair darbhanirmitamekhalā

हिन्दी अर्थ

माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिए। अनुकूल दिशामें सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 308

त्रिःस्नाता पाटलाहारा बभूव शरदां शतम् शतमेकेन शीर्णेन पर्णेनावर्तयत्तदा

triḥsnātā pāṭalāhārā babhūva śaradāṃ śatam śatamekena śīrṇena parṇenāvartayattadā

हिन्दी अर्थ

१. ऐसे स्तोत्रॉमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) “जितं ते पुण्डरीकाक्ष आदि श्रेष्ठ हैं। २. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो! (बृहत्संहिता ५३। ३४) ३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३) ४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)

English

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अध्याय १५४

श्लोक 309

निराहारा शतं साभूत् समानां तपसां निधिः तत उद्वेजिताः सर्वे प्राणिनस्तत्तपो ऽग्निना

nirāhārā śataṃ sābhūt samānāṃ tapasāṃ nidhiḥ tata udvejitāḥ sarve prāṇinastattapo 'gninā

हिन्दी अर्थ

हाथियोंकी चिग्घाड़के समान गम्भीर शब्द करनेवाले चिकने शस्तान्येतानि धर्मज्ञ यच्च स्यान्मनसः प्रियम्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 310

ततः सस्मार भगवान् मुनीन्सप्त शतक्रतुः ते समागम्य मुनयः सर्वे समुदितास्ततः

tataḥ sasmāra bhagavān munīnsapta śatakratuḥ te samāgamya munayaḥ sarve samuditāstataḥ

हिन्दी अर्थ

मङ्गल्यलब्धिः श्रवणं च राजन् घने मेघ शुभदायी होते हैं । पीछेसे चमकनेवाली बिजलीका प्रकाश तथा इन्द्रधनुष प्रशंसनीय हैं । यात्रामें सूर्य एवं चन्द्रमाके मण्डल तथा घनघोर वृष्टिको अशुभ समझना चाहिए। अनुकूल दिशामें उदित हुए ग्रहोंको, विशेषकर बृहस्पतिको शुभसूचक कहा गया है धर्मज्ञ! (यात्राकालमें) आस्तिकता, श्रद्धा, पूज्योंके प्रति पूज्यभाव और मनकी प्रसन्नता-ये सभी प्रशंसनीय हैं । यात्राकालमें मनका संतोष विजयका परम लक्षण है तुलनामें एक ओर सभी शुभ शकुन और एक ओर

English

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अध्याय १५४

श्लोक 311

पूजिताश्च महेन्द्रेण पप्रच्छुस्तं प्रयोजनम् किमर्थं तु सुरश्रेष्ठ संस्मृतास्तु वयं त्वया

pūjitāśca mahendreṇa papracchustaṃ prayojanam kimarthaṃ tu suraśreṣṭha saṃsmṛtāstu vayaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

अपने मनकी प्रसन्नताको मानना चाहिए । राजन्! वाहनोंकी उत्सुकता, मनका आनन्दातिरेक, शुभ शकुनोंकी प्राप्ति, विजयसूचक प्रवाद, माङ्गलिक वस्तुओंको उपलब्धि तथा ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि॥ २८ श्रवण--इन्हें नित्य विजयप्रद जानना चाहिए ॥ १४--२८॥

English

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अध्याय १५४

श्लोक 312

शक्रः प्रोवाच शृण्वन्तु भगवन्तः प्रयोजनम् हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा तस्या ह्यभिमतं कामं भवन्तः कर्तुमर्हथ

śakraḥ provāca śṛṇvantu bhagavantaḥ prayojanam himācale tapo ghoraṃ tapyate bhūdharātmajā tasyā hyabhimataṃ kāmaṃ bhavantaḥ kartumarhatha

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते मङ्गलाध्यायो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके यात्रा-प्रसंगमें मङ्गलाध्याय नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्कमें श्रीभगवानद्वारा

English

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अध्याय १५४

श्लोक 313

ततः समापतन्देव्या जगदर्थं त्वरान्विताः तथेत्युक्त्वा तु शैलेन्द्रं सिद्धसंघातसेवितम्

tataḥ samāpatandevyā jagadarthaṃ tvarānvitāḥ tathetyuktvā tu śailendraṃ siddhasaṃghātasevitam

हिन्दी अर्थ

राजधर्मस्त्वया सूत कथितो विस्तरेण तु। तथैवाद्भुतमङ्गल्यं स्वप्नदर्शनमेव च क्रमतः कीहृशं रूपमासील्लोकत्रये हरेः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 314

ऊचुरागत्य मुनयस् तामथो मधुराक्षरम् पुत्रि किं ते व्यवसितः कामः कमललोचने

ūcurāgatya munayas tāmatho madhurākṣaram putri kiṃ te vyavasitaḥ kāmaḥ kamalalocane

हिन्दी अर्थ

एतदेव पुरा पृष्टः कुरुक्षेत्रे तपोधनः। शौनकस्तीर्थयात्रायां वामनायतने पुरा धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वामनायतने स्थित: । ऋषियोंने पूछा--सूतजी! आपने विस्तारपूर्वक राजधर्मका वर्णन तो कर दिया, उसी प्रकार अद्भुत शकुन एवं स्वप्नदर्शनका भी निरूपण कर दिया। अब आप पुनः भगवान् विष्णुके माहात्म्यका वर्णन कीजिये। किस प्रकार

English

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अध्याय १५४

श्लोक 315

तानुवाच ततो देवी सलज्जा गौरवान्मुनीन् तपस्यतो महाभागाः प्राप्य मौने भवादृशान्

tānuvāca tato devī salajjā gauravānmunīn tapasyato mahābhāgāḥ prāpya maune bhavādṛśān

हिन्दी अर्थ

भगवानूने वामनस्वरूप धारणकर दानवराज बलिको बाँधा था और नापते समय किस प्रकार भगवानका वह शरीर बढ़कर तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया था? सूतजी कहते हैं-मुनिगण! इसी वृत्तान्तको प्राचीनकालमें तीर्थ-यात्राके समय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें अर्जुनने तपस्वी शौनकजीसे पूछा था। जिस समय उन्होंने द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए युधिष्ठिरके नियमोंका

English

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अध्याय १५४

श्लोक 316

वन्दनाय नियुक्ता धीः पावयत्यविकल्पितम् प्रश्नोन्मुखत्वाद्भवतां युक्तमासनमादितः

vandanāya niyuktā dhīḥ pāvayatyavikalpitam praśnonmukhatvādbhavatāṃ yuktamāsanamāditaḥ

हिन्दी अर्थ

उल्लङ्घन किया था, उस समय वे उस पापकी शान्तिके लिये तीर्थयात्रामें गये हुए थे। उस समय धर्ममय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें पहुँचकर वामनभगवानूका दर्शन दृष्टा स वामनं तत्र अर्जुनो वाक्यमब्रवीत्॥ ५ कर अर्जुने इस प्रकार प्रश्‍न किया था॥ ३--५॥ कि निमित्तमयं देवो वामनाकृतिरिज्यते। वराहरूपी भगवान् कस्मात् पूज्योऽभवत् पुरा।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 317

उपविष्टाः श्रमोन्मुक्तास् ततः प्रक्ष्यथ मामतः इत्युक्त्वा सा ततश्चक्रे कृतासनपरिग्रहान्

upaviṣṭāḥ śramonmuktās tataḥ prakṣyatha māmataḥ ityuktvā sā tataścakre kṛtāsanaparigrahān

हिन्दी अर्थ

चिन्तयामास देवानां जननी पुनरुदद्भवम् अदितिर्देवमाता च परमं दुश्चरं तपः। तीव्रं चचार वर्षाणां सहस्त्रं पृथिवीपते

English

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अध्याय १५४

श्लोक 318

सा तु तान्विधिवत्पूज्यान् पूजयित्वा विधानतः उवाचादित्यसंकाशान् मुनीन्सप्त सती शनैः

sā tu tānvidhivatpūjyān pūjayitvā vidhānataḥ uvācādityasaṃkāśān munīnsapta satī śanaiḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्यैर्निराकृतान् दृष्टा तनयान् कुरुनन्दन देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् नमः सर्वार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 319

त्यक्त्वा व्रतात्मकं मौनं मौनं जग्राह ह्रीमयम् भावं तस्यास्तु मौनान्तं तस्याः सप्तर्षयो यथा

tyaktvā vratātmakaṃ maunaṃ maunaṃ jagrāha hrīmayam bhāvaṃ tasyāstu maunāntaṃ tasyāḥ saptarṣayo yathā

हिन्दी अर्थ

नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे श्रियः कान्ताय दान्ताय परमार्थाय चक्रिणे

English

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अध्याय १५४

श्लोक 320

गौरवाधीनतां प्राप्ताः पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा सापि गौरवगर्भेण मनसा चारुहासिनी

gauravādhīnatāṃ prāptāḥ papracchustāṃ punastathā sāpi gauravagarbheṇa manasā cāruhāsinī

हिन्दी अर्थ

नमः शङ्खासिहस्ताय नमः कनकरेतसे निर्गुणायाविशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्क्रिणे

English

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अध्याय १५४

श्लोक 321

मुनीञ्शान्तकथालापान् प्रेक्ष्य प्रोवाच वाग्यमम् भगवन्तो विजानन्ति प्राणिनां मानसं हितम्

munīñśāntakathālāpān prekṣya provāca vāgyamam bhagavanto vijānanti prāṇināṃ mānasaṃ hitam

हिन्दी अर्थ

अपश्यद्भिर्जगत्यत्र स देवो हृदि संस्थितः पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे

English

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अध्याय १५४

श्लोक 322

मनोगतीभिरत्यर्थं कदर्थन्ते हि देहिनः केचित् तु निपुणास्तत्र घटन्ते विबुधोद्यमैः

manogatībhiratyarthaṃ kadarthante hi dehinaḥ kecit tu nipuṇāstatra ghaṭante vibudhodyamaiḥ

हिन्दी अर्थ

अर्जुनने पूछा--महर्षे! किस फलको प्राप्तिके लिये वामनभगवान्की पूजा की जाती है? प्राचीनकालमें वराहरूपधारी भगवान् किस कारण पूज्य माने गये और किस निमित्तसे यह क्षेत्र भगवान् वामनको प्रिय शौनकजी बोले--कुरुनन्दन! मैं भगवान् वामन एवं ज्ञानस्वरूप वराहके माहात्म्यको संक्षेपमें पुनः तुम्हें बतला रहा हुँ। प्राचीनकालमें दानवोंद्वारा देवताओंके पराजित हो जानेपर तथा इन्द्रको निर्वासित कर दिये जानेपर देवमाता अपने पुत्रोंके पुनरुत्थानके लिये चिन्ता करने लगीं । राजन्! देवमाता अदितिने एक हजार वर्षोतक परम दुष्कर तप किया। उस समय वे मौन होकर वायुका आहार करती हुई श्रीकृष्णको आराधनामें तत्पर

English

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अध्याय १५४

श्लोक 323

उपायैर्दुर्लभान्भावान् प्राप्नुवन्ति ह्यतन्द्रिताः अपरे तु परिच्छिन्ना नानाकाराभ्युपक्रमाः

upāyairdurlabhānbhāvān prāpnuvanti hyatandritāḥ apare tu paricchinnā nānākārābhyupakramāḥ

हिन्दी अर्थ

थीं। कुरुनन्दन! वे अपने पुत्रोंको हैत्योंद्वारा तिरस्कृत हुआ देखकर “मैं निष्फल पुत्रवाली हूँ', इस दुःखसे दुःखी होकर श्रीहरिकी शरणागत हुई । तत्पश्चात् परमार्थको समझनेवाली अदिति देवाधिदेव, इन्द्रियोंके स्वामी, सर्वव्यापी श्रीहरिको नमस्कार कर अभीष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति करने लगीं

English

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अध्याय १५४

श्लोक 324

देहान्तरार्थमारम्भम् आश्रयन्ति हितप्रदम् मम त्वाकाशसम्भूतपुष्पदामा विभूषितम्

dehāntarārthamārambham āśrayanti hitapradam mama tvākāśasambhūtapuṣpadāmā vibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

अदिति बोलीं--सभीके दुःखोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कमल-मालाधारीको प्रणाम है। परम कल्याणके भी कल्याणस्वरूप एवं आदिविधाताको अभिवादन है। आप कमलनेत्र, कमलनाभि, लक्ष्मीपति, दमनकर्ता, परमार्थस्वरूप और चक्रधारी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्माको उत्पत्तिके स्थानस्वरूप एवं आत्मयोनिको प्रणाम है। आप हाथोंमें शङ्ख और खड्ग धारण करनेवाले एवं स्वर्णरेता हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। आप आत्मज्ञान-विज्ञानके योगियोंद्वारा चिन्तनीय, आत्मयोगी, निर्गुण, अविशेष, ब्रह्मस्वरूप श्रीहरि है । आप समस्त जगत्में स्थित हैं, परंतु जगतृद्वारा देखे नहीं जाते, आप स्थूल और अति सूक्ष्मस्वरूप हैं

English

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अध्याय १५४

श्लोक 325

वन्ध्या सुतं प्राप्तुकामा मनः प्रसरते मुहुः अहं किल भवं देवं पतिं प्राप्तुं समुद्यता

vandhyā sutaṃ prāptukāmā manaḥ prasarate muhuḥ ahaṃ kila bhavaṃ devaṃ patiṃ prāptuṃ samudyatā

हिन्दी अर्थ

आप शार्ङ्ग-धनुषधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगतको देखते हुए भी मनुष्य जिसे देख नहीं पाते, वह देवता इस जगत्में उन्हींके हृदयमें स्थित हैं। यह सारा जगत् उन्हींमें लीन हो जाता है। जिसका यह समस्त जगत् है और जो समस्त जगतूके आधार हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है। जो आद्य प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, प्रभुओंके भी प्रभु, परात्पर और देवताओंके स्वामी हैं, उन आदिकर्ता कृष्णको

English

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अध्याय १५४

श्लोक 326

प्रकृत्यैव दुराधर्षं तपस्यन्तं तु संप्रति सुरासुरैरनिर्णीतं परमार्थक्रियाश्रयम्

prakṛtyaiva durādharṣaṃ tapasyantaṃ tu saṃprati surāsurairanirṇītaṃ paramārthakriyāśrayam

हिन्दी अर्थ

९३२ मत्स्यपुराण यः प्रवृत्तौ निवृत्तौ च इज्यते कर्मभिः स्वकैः । स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते यश्चिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति। नमस्तस्मै विशुद्धाय पराय हरिवेधसे

English

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अध्याय १५४

श्लोक 327

सांप्रतं चापि निर्दग्धमदनं वीतरागिणम् कथमाराधयेदीशं मादृशी तादृशं शिवम्

sāṃprataṃ cāpi nirdagdhamadanaṃ vītarāgiṇam kathamārādhayedīśaṃ mādṛśī tādṛśaṃ śivam

हिन्दी अर्थ

यं बुद्ध्वा सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम्। न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति नमामि तम् यो यज्ञे यज्ञपरमैरीज्यते यज्ञसंज्ञितः। तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 328

इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतां मनसस्ततः ज्ञातुमस्या वचः प्रोचुः प्रक्रमात्प्रकृतार्थकम्

ityuktā munayaste tu sthiratāṃ manasastataḥ jñātumasyā vacaḥ procuḥ prakramātprakṛtārthakam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम्। मायाजालं समुत्तर्तु तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा। तरन्त्यविद्यामखिलां तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 329

द्विविधं तु सुखं तावत् पुत्रि लोकेषु भाव्यते शरीरस्यास्य संभोगैश् चेतसश्चापि निर्वृतिः

dvividhaṃ tu sukhaṃ tāvat putri lokeṣu bhāvyate śarīrasyāsya saṃbhogaiś cetasaścāpi nirvṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् रात्रिजंसूर्यरूपीव तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 330

प्रकृत्या स तु दिग्वासा भीमः पितृवणेशयः कपाली भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षः स्थिरक्रियः

prakṛtyā sa tu digvāsā bhīmaḥ pitṛvaṇeśayaḥ kapālī bhikṣuko nagno virūpākṣaḥ sthirakriyaḥ

हिन्दी अर्थ

हन्ति ज्ञानप्रदानेन तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्। पश्यतः कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम् नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाप्ययम्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 331

प्रमत्तोन्मत्तकाकारो बीभत्सकृतसंग्रहः यतिना तेन कस्ते ऽर्थो मूर्तानर्थेन काङ्क्षितः

pramattonmattakākāro bībhatsakṛtasaṃgrahaḥ yatinā tena kaste 'rtho mūrtānarthena kāṅkṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिवादन है। जो प्रवृत्ति और निवृत्तिमें अपने कर्मोद्वारा पूजित होते हैं तथा स्वर्ग और अपवर्गके फलदाता हैं, उन गदाधारीको नमस्कार है। जो मनसे चिन्तन किये जानेपर शीघ्र ही पापको नष्ट कर देते हैं, उन आदिकर्ता परात्पर विशुद्ध हरिको प्रणाम है। समस्त प्राणी जिन अविनाशी देवदेवेश्वरको जानकर पुनः जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते, उन्हें अभिवादन है। जो यज्ञपरायण लोगोंद्वारा यज्ञमें यज्ञनामसे पूजित होते हैं, उन सामर्थ्यशाली परमेश्वर

English

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अध्याय १५४

श्लोक 332

यदि ह्यस्य शरीरस्य भोगमिच्छसि सांप्रतम् तत्कथं ते महादेवाद् भयभाजो जुगुप्सितात्

yadi hyasya śarīrasya bhogamicchasi sāṃpratam tatkathaṃ te mahādevād bhayabhājo jugupsitāt

हिन्दी अर्थ

यज्ञपुरुष विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ विद्वानोंके स्वामी जो भगवान् वेदवेत्ताओंद्वारा सम्पूर्ण वेदोंमें गाये जाते हैं, उन वेदोंद्वारा जाननेयोग्य विजयशील विष्णुको प्रणाम है। जिससे विश्व उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह लीन हो जायगा, उन वेद-मर्यादाके रक्षक महात्मा विष्णुको अभिवादन है। जिसके द्वारा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस विश्वका विस्तार हुआ है, उन उपेन्द्रको मायाजालसे उद्धार पानेके लिये मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जलरूपसे स्थित होकर सम्पूर्ण

English

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अध्याय १५४

श्लोक 333

स्रवद्रक्तवसाभ्यक्तकपालकृतभूषणात् श्वसदुग्रभुजंगेन्द्रकृतभूषणभीषणात्

sravadraktavasābhyaktakapālakṛtabhūṣaṇāt śvasadugrabhujaṃgendrakṛtabhūṣaṇabhīṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

विश्वका भरण-पोषण करते हैं, उन विश्वेश्वर प्रजापति विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। विशुद्ध मन, वचन एवं कर्मद्वारा जिनकी आराधना कर मनुष्य सम्पूर्ण अविद्याको पार कर जाते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जो सभी चराचर जीवोंमें विद्यमान रहकर सुख- दुःखसे उत्पन्न हुए दुःख, संतोष और क्रोध आदिके वशीभूत हो निरन्तर नाचते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जो रात्रिजन्य अन्धकारको सूर्यकी

English

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अध्याय १५४

श्लोक 334

श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतात् सति सुरेन्द्रमुकुटव्रातनिघृष्टचरणो ऽरिहा

śmaśānavāsino raudrapramathānugatāt sati surendramukuṭavrātanighṛṣṭacaraṇo 'rihā

हिन्दी अर्थ

तरह असुरमय मूर्तिमान् अन्धकारका विनाश करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कपिल आदि महर्षियोंके रूपमें स्थित होकर ज्ञानदानद्वारा आज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जिनके नेत्रस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य समस्त संसारके शुभाशुभ कर्माको बराबर देखते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ । जिन सर्वेश्वरके लिये मैंने इन सभी विशेषणोंको सत्यरूपसे वर्णन किया है, मिथ्या नहीं, उन अजन्मा एवं उत्पत्ति-विनाशके कारणभूत विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। मैंने उनके विषयमें जितनी सत्य बातें कही हैं, जनार्दन उससे भी बढ़कर हैं। इस सत्यके

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 335

हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तो ऽनन्तमूर्तिमान् नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः

harirasti jagaddhātā śrīkānto 'nantamūrtimān nātho yajñabhujāmasti tathendraḥ pākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

एवं स्तुतः स भगवान् वासुंदेब उवाच ताम्। अदृश्य: सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 336

देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनः सर्वकामकृत् वायुरस्ति जगद्धाता यः प्राणः सर्वदेहिनाम्

devatānāṃ nidhiścāsti jvalanaḥ sarvakāmakṛt vāyurasti jagaddhātā yaḥ prāṇaḥ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

तमाशु व्रियतां कामं श्रेयस्ते सम्भविष्यति। मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति यदि देव प्रसन्नस्त्वं मद्भक्त्या भक्तवत्सल। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः हृतं राज्यं हृताश्चास्य यज्ञभागा महासुरैः । त्वयि प्रसन्ने वरदे तान् प्राप्नोतु सुतो मम

English

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अध्याय १५४

श्लोक 337

तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमतिमान्विभुः एभ्य एकतमं कस्मान् न त्वं सम्प्राप्तुमिच्छसि

tathā vaiśravaṇo rājā sarvārthamatimānvibhuḥ ebhya ekatamaṃ kasmān na tvaṃ samprāptumicchasi

हिन्दी अर्थ

हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव। सापत्नाद् दायनिभ्रशो बाधां नः कुरुते ह॒दि श्रीभगवानुवाच कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितः। स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 338

उतान्यदेहसंप्राप्त्या सुखं ते मनसेप्सितम् एवमेतत्तवाप्यत्र प्रभवो नाकसंपदाम् अस्मिन्नेव पराः सर्वाः कल्याणप्राप्तयस्तव

utānyadehasaṃprāptyā sukhaṃ te manasepsitam evametattavāpyatra prabhavo nākasaṃpadām asminneva parāḥ sarvāḥ kalyāṇaprāptayastava

हिन्दी अर्थ

प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन। नाहं त्वामुदरे देव वोढुं शक्ष्यामि केशव प्रतिष्ठितं न मां शक्ता वोढं सेन्द्रा दिबौकसः किंत्वहं सकलाँल्लोकान् सदेवासुरमानुषान्। जङ्गमान् स्थावरान् सर्वास्त्वां च देवि सकश्यपाम्।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 339

पितुरेवास्ति तत्सर्वं सुरेभ्यो यन्न विद्यते अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स वाप्यत्राफलस्तव

piturevāsti tatsarvaṃ surebhyo yanna vidyate atastatprāptaye kleśaḥ sa vāpyatrāphalastava

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने कहा--इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् वासुदेव, जो समस्त प्राणियोंके लिये अदर्शनीय हैं, अदितिके समक्ष उपस्थित होकर उनसे इस प्रकार बोले श्रीभगवान्ने कहा--धर्मज्ञा अदिते! तुम जिन अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करना चाहती हो उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें संदेह नहीं है। महाभाग्यशालिनि! सुनो, तुम्हारे हृदयमें जो वरदान स्थित है उसे शीघ्र ही

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 340

प्रायेण प्रार्थितो भद्रे सुस्वल्पो ह्यतिदुर्लभः अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि

prāyeṇa prārthito bhadre susvalpo hyatidurlabhaḥ asya te vidhiyogasya dhātā kartātra caiva hi

हिन्दी अर्थ

इच्छानुसार माँग लो। तुम्हारा कल्याण होगा; क्योंकि मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता अदिति बोलीं भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र पुनः त्रिलोकीका स्वामी हो जाय। महान् असुरोंद्वारा मेरे पुत्रका राज्य छीन लिया गया है तथा उसके यज्ञभागोंपर भी अधिकार कर लिया गया है। अब आप-जैसे वरदानीके प्रसन्न हो जानेपर मेरा पुत्र पुनः उन्हें प्राप्त करे। केशव ! मेरे पुत्रका छीना हुआ राज्य मुझे उतना कष्ट नहीं दे रहा है, जितना सौतेले पुत्रँद्वारा मेरे पुत्रोंका अपने हिस्सेसे भ्रष्ट हो जाना

English

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अध्याय १५४

श्लोक 341

इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिवर्येषु शैलजा उवाच कोपरक्ताक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदैः

ityuktā sā tu kupitā munivaryeṣu śailajā uvāca koparaktākṣī sphuradbhirdaśanacchadaiḥ

हिन्दी अर्थ

मेरे हृदयमें चुभ रहा है॥ ३८--४०॥ श्रीभगवानूने कहा--देवि ! मैंने तुम्हारे इच्छानुसार तुमपर कृपा की है। मैं अपने अंशसे युक्त कश्यपके सम्पर्कसे तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होऊँगा। इस प्रकार तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होकर मैं देवताओंके उन सभी

English

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अध्याय १५४

श्लोक 342

असद्ग्रहस्य का प्रीतिर् व्यसनस्य क्व यन्त्रणा विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः

asadgrahasya kā prītir vyasanasya kva yantraṇā viparītārthaboddhāraḥ satpathe kena yojitāḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंका वध करूँगा। नन्दिनि! अब तुम तपसे निवृत्त हो जाओ अदिति बोलीं--जगत्कर्ता देवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप मुझपर कृपा कीजिये। केशव! मैं आपको गर्भमें धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकती। यह सारा विश्व जिसमें स्थित है तथा जो स्वयं इस विश्वके स्वामी हैं, उन दुर्धर्ष आपको मैं अपने गर्भमें धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ

English

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अध्याय १५४

श्लोक 343

एवं मां वेत्थ दुष्प्रज्ञां ह्य् अस्थानासद्ग्रहप्रियाम् न मां प्रतिविचारो ऽस्ति यत्रेहासद्ग्रहावितौ

evaṃ māṃ vettha duṣprajñāṃ hy asthānāsadgrahapriyām na māṃ prativicāro 'sti yatrehāsadgrahāvitau

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवानने कहा-- महाभागे! तुम सच कह रही हो। यह सारा जगत् मुझमें स्थित है, अतः इन्द्रसहित समस्त देवता मेरा भार वहन करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, किंतु देवि! मैं देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सभी लोकोंको, सम्पूर्ण चराचरको तथा

English

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अध्याय १५४

श्लोक 344

प्रजापतिसमाः सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्

prajāpatisamāḥ sarve bhavantaḥ sarvadarśinaḥ nūnaṃ na vettha taṃ devaṃ śāśvataṃ jagataḥ prabhum

हिन्दी अर्थ

धारयिष्यामि भद्रं ते तदलं सम्भ्रमेण ते॥ ४६ कश्यपसहित तुमको धारण करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो, ९३४ मत्स्यपुराण न ते ग्लानिर्न ते खेदो गर्भस्थे भविता मयि । अब तुम्हें विकल नहीं होना चाहिए । तुम्हारे गर्भमें मेरे दाक्षायणि प्रसादं ते करोम्यन्यैः सुदुर्लभम्॥ ४७ स्थित होनेपर तुम्हें न तो ग्लानि होगी, न खेद होगा ।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 345

अजमीशानमव्यक्तम् अमेयमहिमोदयम्

ajamīśānamavyaktam ameyamahimodayam

हिन्दी अर्थ

दि दाक्षायणि! मैं तुमपर .ऐसी कृपा करूँगा जो दूसरोंके गर्भस्थे मयि पुत्राणां तव योउरिभविष्यति। लिये परम दुर्लभ है । मेरे गर्भमें स्थित रहनेपर तुम्हारे तेजसस्तस्य हानिं च करिष्ये मा व्यथां कृथाः ॥ ४८ पुत्रोंका जो शत्रु होगा उसके तेजोबलको मैं विनष्ट कर शौनक उवाच दूँगा। तुम दुःख मत करो॥ ४५--४८॥ एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः। शौनकजी बोले--कुरुश्रेष्ठ ऐसा कहकर भगवान्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 346

आस्तां तद्धर्मसद्भावसंबोधस्तावदद्भुतः विदुर्यं न हरिब्रह्मप्रमुखा हि सुरेश्वराः

āstāṃ taddharmasadbhāvasaṃbodhastāvadadbhutaḥ viduryaṃ na haribrahmapramukhā hi sureśvarāḥ

हिन्दी अर्थ

सापि कालेन तं गर्भमवाप कुरुसत्तम॥ तुरंत अन्तर्हित हो ग हि तात कुरुकत ४३ उस गर्भको धारण किया। भगवान् विष्णुके गर्भस्थित चकम्पिरे महाशैलाः क्षोभं जग्मुस्तथाब्धयः॥ ५० काँपने लगे तथा समुद्रमें ज्वार-भाटा उठने लगा। सुन्दर पद रखती थीं, वहाँ-वहाँ भारके कारण पृथ्वी ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम वसुधाधिप॥ ५ विनम्र हो जाती थी। भगवान् विष्णुके गर्भस्थ होनेपर

English

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अध्याय १५४

श्लोक 347

यत्तस्य विभवात्स्वोत्थं भुवनेषु विजृम्भितम् प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यत्र न वेत्थ किम्

yattasya vibhavātsvotthaṃ bhuvaneṣu vijṛmbhitam prakaṭaṃ sarvabhūtānāṃ tadapyatra na vettha kim

हिन्दी अर्थ

हैत्यानामथ सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने। सभी हैत्योंके तेज बिलकुल मन्द हो गये, जैसा कि बभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ५२ भगवान्ने अदितिसे पहले कहा था॥ ४९--५२॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावेऽदितिवरप्रदानं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 348

कस्यैतद्गगनं भूरितः कस्याग्निः कस्य मारुतः कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः

kasyaitadgaganaṃ bhūritaḥ kasyāgniḥ kasya mārutaḥ kasya bhūḥ kasya varuṇaḥ kaścandrārkavilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव-प्रसंगमें अदितिको वरदान नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्मादका उन्हें शाप, बलिका अनुनय, ब्रह्माजीद्वारा वामनभगवानूका स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान शौनक उवाच शौनकजीने कहा-असुरराज बलिने समस्त निस्तेजसोऽसुरान् दृष्टा समस्तानसुरेश्वरः। हैत्योंको निस्तेज देखकर अपने पितामह प्रह्वादसे प्रह्मादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम्॥ १ प्रश्‍न किया

English

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अध्याय १५४

श्लोक 349

कस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गं भक्त्या सुरासुराः यं ब्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राद्या महर्षयः

kasyārcayanti lokeṣu liṅgaṃ bhaktyā surāsurāḥ yaṃ bruvantīśvaraṃ devā vidhīndrādyā maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

याचे बलिने पूछा--तात! क्या बात है कि आज सहसा ये हैत्यगण अग्निसे जले हुएके समान निस्तेज तात निस्तेजसो हैत्या निर्दग्धा इव वहिना। ब्रहमदण्डसे मारे हुएकी भाँति निर्बल दिखायी पड़ने

English

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अध्याय १५४

श्लोक 350

प्रभावं प्रभवं चैष तेषामपि न वेत्थ किम् अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दनः

prabhāvaṃ prabhavaṃ caiṣa teṣāmapi na vettha kim aditiḥ kasya māteyaṃ kasmājjāto janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव॥२लगे हैं? क्या हैत्योके ऊपर कोई अरिष्ट आ गया है? र Fe या वैरियोंद्वारा निर्मित कोई कृत्या इनका विनाश करनेके अरिष्टं किं नु हैत्यानां किं कृत्या वैरिनिर्मिता। लिये प्रकट हुई है, जिससे ये असुर तेजोहीन- हो जाशायैषा समुद्भूता यया निस्तेजसोऽसुराः॥ ३ गये हैं ? इति हैत्यपतिर्धीरः पृष्टः पौत्रेण पार्थिव। चिरं ध्यात्वा जगाहैनमसुरेन्द्रं बलिं तदा

English

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अध्याय १५४

श्लोक 351

अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्य् अदितिर्दक्षपुत्रिका

aditeḥ kaśyapājjātā devā nārāyaṇādayaḥ marīceḥ kaśyapaḥ putro hy aditirdakṣaputrikā

हिन्दी अर्थ

सर्वे समुद्राः क्षुभिता हैत्या निस्तेजसः कृता: देवानां च परा लक्ष्मीः कारणैरनुमीयते

English

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अध्याय १५४

श्लोक 352

मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल ब्रह्मा हिरण्मयात्त्वण्डाद् दिव्यसिद्धिविभूतिकम्

marīciścāpi dakṣaśca putrau tau brahmaṇaḥ kila brahmā hiraṇmayāttvaṇḍād divyasiddhivibhūtikam

हिन्दी अर्थ

महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर। न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्य सुरार्दन अत्यन्तभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् विचारयामास ततो यतो देवो जनार्दनः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 353

कस्य प्रादुरभूद्ध्यानात् प्रक्षुब्धाः प्राकृतांशकाः प्रकृतौ तु तृतीयायां मधुद्विड्जननक्रिया

kasya prādurabhūddhyānāt prakṣubdhāḥ prākṛtāṃśakāḥ prakṛtau tu tṛtīyāyāṃ madhudviḍjananakriyā

हिन्दी अर्थ

अन्तःस्थान् बिश्नतं सप्त लोकानादिप्रजापतिम् वयोमनुष्यानखिलांस्तथैव च सरीसृपान्। समस्तलोकस््रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च। ग्रहनक्षत्रनागांश्च॒ दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 354

जाता ससर्ज षड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान् स्वकर्मजान् अजातको ऽभवद्वेधा ब्रह्मणो ऽव्यक्तजन्मनः

jātā sasarja ṣaḍvargān buddhipūrvān svakarmajān ajātako 'bhavadvedhā brahmaṇo 'vyaktajanmanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रह्मादः प्राह हैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं तदा देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिकृत्। अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः शौनकजीने कहा--राजन्! इस प्रकार अपने पौत्र बलिद्वारा पूछे जानेपर धेर्यशाली हैत्यपति प्रह्णादने बहुत देरतक ध्यानकर उस असुरनायक बलिसे कहा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 355

यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्रकृतिं कृतवानिदम् ब्रह्मणः सिद्धसर्वार्थम् ऐश्वर्यं लोककर्तृताम्

yaḥ svayogena saṃkṣobhya prakṛtiṃ kṛtavānidam brahmaṇaḥ siddhasarvārtham aiśvaryaṃ lokakartṛtām

हिन्दी अर्थ

प्रह्लाद बोले--दानवराज बलि! इस समय पर्वत काँप उठे हैं, पृथ्वीने अपनी स्वाभाविक धीरता छोड़ दी है, सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे हैं और हैत्यगण तेजोहीन कर दिये गये हैं। ग्रहगण सूर्योदय होनेपर जिस प्रकार पहले सूर्यका अनुगमन करते थे वैसा अब नहीं कर रहे हैं। कुछ कारणोंसे ऐसा अनुमान होता है कि

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 356

विदुर्विष्ण्वादयो यच्च स्वमहिम्ना सदैव हि कृत्वान्यं देहम् अन्या दृक् तादृक् कृत्वा पुनर्हरिः

vidurviṣṇvādayo yacca svamahimnā sadaiva hi kṛtvānyaṃ deham anyā dṛk tādṛk kṛtvā punarhariḥ

हिन्दी अर्थ

इसका कोई महान् कारण है। सुरार्दन ! तुम्हें इस कार्यको तुच्छ नहीं मानना चाहिए शौनकजीने कहा--परम भक्त असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद दानवराज बलिसे ऐसा कहकर मन-ही-मन देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये। तत्पश्चात् प्रह्लाद परम मनोहर ध्यानयोगका आश्रय लेकर देवाधिदेव जनार्दनका ध्यान करने लगे। तब उन्होंने अदितिके उदरमें वामनरूपमें उन आदिप्रजापतिको देखा जिनके भीतर सातों लोक विराजमान थे। उस समय प्रह्णादने भगवान्के भीतर वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, विश्वेदेव, आदित्य,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 357

कुरुते जगतः कृत्यम् उत्तमाधममध्यमम् एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः

kurute jagataḥ kṛtyam uttamādhamamadhyamam evameva hi saṃsāro yo janmamaraṇātmakaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने-आप, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्र, वृक्ष, नदियाँ, सरोवर, पशु, मृग, पक्षी, मनुष्य, सर्पादि जीव, सभी लोकोंके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, शिव, ग्रह, नक्षत्र, नाग तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। यह देखकर प्रह्माद आश्चर्यचकित हो गये। पुनः क्षणभर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 358

कर्मणश्च फलं ह्येतन् नानारूपसमुद्भवम् अथ नारायणो देवः स्वकां छायां समाश्रयत्

karmaṇaśca phalaṃ hyetan nānārūpasamudbhavam atha nārāyaṇo devaḥ svakāṃ chāyāṃ samāśrayat

हिन्दी अर्थ

बलिसे इस प्रकार कहा प्रह्लाद बोले--वत्स! जिस कारण तुम राक्षसोंके यह हानि उत्पन्न हुई है उस सारे रहस्यको मैं जान गया। उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो। जो देवाधिदेव, जगतूके उत्पत्तिस्थान, अजन्मा, जगतके आदिकर्ता, अनादि, विश्वके आदिं, सर्वश्रेष्ठ, वरदायक,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 359

तत्प्रेरितः प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम् सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम्

tatpreritaḥ prakurute janma nānāprakārakam sāpi karmaṇa evoktā preraṇā vivaśātmanām

हिन्दी अर्थ

प्रमाणं च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः मनादिमध्यो भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेष

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 360

यथोन्मादादिजुष्टस्य मतिरेव हि सा भवेत् इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते

yathonmādādijuṣṭasya matireva hi sā bhavet iṣṭānyeva yathārthāni viparītāni manyate

हिन्दी अर्थ

कर्तु महात्मादितिजोऽवतीर्णः जानन्ति हैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 361

लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा धर्माधर्मफलावाप्तौ विष्णुरेव निबोधितः

lokasya vyavahāreṣu sṛṣṭeṣu sahate sadā dharmādharmaphalāvāptau viṣṇureva nibodhitaḥ

हिन्दी अर्थ

विशन्ति यञ्ज्ञानविधूतपापाः। तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 362

अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना न ह्यस्य जीवितं दीर्घं दृष्टं देहे तु कुत्रचित्

athānāditvamasyāsti sāmānyāttu tadātmanā na hyasya jīvitaṃ dīrghaṃ dṛṣṭaṃ dehe tu kutracit

हिन्दी अर्थ

तं वासुदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम् स्तं वासुदेवं प्रणमाम्यजस्त्रम् 'तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 363

भवद्भिर्यस्य नो दृष्टम् अन्तरग्रमथापि वा देहिनां धर्म एवैष क्वचिज्जायेत्कचिन्म्रियेत्

bhavadbhiryasya no dṛṣṭam antaragramathāpi vā dehināṃ dharma evaiṣa kvacijjāyetkacinmriyet

हिन्दी अर्थ

पापनाशक, परावरोंमें उत्तम, परात्पर, प्रमाणोंके प्रमाण, सातों लोकोंके गुरुके गुरु, प्रभुके प्रभु, पर-से-परे, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं, वे भगवान् अपने अंशसे त्रिलोकीको सनाथ करनेके लिये अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हो रहे हैं। हैत्यपते! जिनके स्वरूपको रुद्र, पद्मयोनि ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, मरीचि प्रभृति महर्षिगण नहीं जानते, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे उत्पन्न हो रहे हैं। जिन भगवानूने पूर्वकालमें

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 364

क्वचिद्गर्भगतो नश्येत् क्वचिज् जीवेज्जरामयः क्वचित्समाः शतं जीवेत् क्वचिद्बाल्ये विपद्यते

kvacidgarbhagato naśyet kvacij jīvejjarāmayaḥ kvacitsamāḥ śataṃ jīvet kvacidbālye vipadyate

हिन्दी अर्थ

अपनी एक कलाद्वारा नृसिंहरूपमें अवतीर्ण होकर मेरे पिता (हिरण्यकशिपु)-का वध किया था तथा जो सभी योगिराजोंके मनमें निवास करनेवाले हैं, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे अवतीर्ण हो रहे हैं। जिनके ज्ञानसे पापमुक्त हुए वेदवेत्ता जिन अव्यय भगवान्को जानकर उनमें प्रवेश करते हैं तथा जिनमें प्रवेश कर पुन: जन्म नहीं धारण करते, उन भगवान् वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हुँ समस्त प्राणी समुद्रसे लहरोंकी भाँति जिनसे निरन्तर उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुन: जिनमें लय हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन परम पुरुषके स्वरूप, बल, प्रभाव और भावको

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 365

शतायुः पुरुषो यस्तु सो ऽनन्तः स्वल्पजन्मनः जीवितो न म्रियत्यग्रे तस्मात्सो ऽमर उच्यते

śatāyuḥ puruṣo yastu so 'nantaḥ svalpajanmanaḥ jīvito na mriyatyagre tasmātso 'mara ucyate

हिन्दी अर्थ

शिव तथा ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं समझ पाते, उन भगवान् वासुदेवको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ। जिन भगवान् वासुदेवने मनुष्योंको स्वरूप देखनेके लिये नेत्र, स्पर्शके लिये चमड़ा, रसास्वादनके लिये जिह्वा, शब्द सुननेके लिये कान तथा सुगन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका दी है, जिन्होंने अपने एक दाँतके अग्रभागपर इस पृथ्वीको, जो सभी पर्वतोंको धारण करती है, धारण किया है, तथा जिनमें यह समस्त जगत् शयन करता है,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 366

अदृष्टजन्मनिधना ह्य् एवं विष्ण्वादयो मताः एतत्संशुद्धमैश्वर्यं संसारे को लभेदिह

adṛṣṭajanmanidhanā hy evaṃ viṣṇvādayo matāḥ etatsaṃśuddhamaiśvaryaṃ saṃsāre ko labhediha

हिन्दी अर्थ

उन आदिभूत भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ । न घ्राणचक्षुः श्रवणादिभिर्यः शक्यस्तमीड्यं मनसैव देवं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 367

तत्र क्षयादियोगात्तु नानाश्चर्यस्वरूपिणि तस्माद्दिवश्चरान्सर्वान् मलिनान्स्वल्पभूतिकान्

tatra kṣayādiyogāttu nānāścaryasvarūpiṇi tasmāddivaścarānsarvān malinānsvalpabhūtikān

हिन्दी अर्थ

नमामि तं देवमनन्तमीश- देवो जगद्योनिरयं महात्मा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 368

नाहं भद्राः किलेच्छामि ऋते शर्वात्पिनाकिनः स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमं त्विदम्

nāhaṃ bhadrāḥ kilecchāmi ṛte śarvātpinākinaḥ sthitaṃ ca tāratamyena prāṇināṃ paramaṃ tvidam

हिन्दी अर्थ

स देवमातुर्जठरं प्रविष्टो तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्। सन्ति मे शतशो हैत्या वासुदेवबलाधिकाः अयःशिराश्चाश्वशिरा भङ्गकारी महाहनुः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 369

धीबलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत् यस्मान्न किंचिदपरं सर्वं यस्मात्प्रवर्तते

dhībalaiśvaryakāryādipramāṇaṃ mahatāṃ mahat yasmānna kiṃcidaparaṃ sarvaṃ yasmātpravartate

हिन्दी अर्थ

एते चान्ये च मे सन्ति हैतेया दानवास्तथा पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्मादो हैत्यपुंगवः । धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 370

यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता एष मे व्यवसायश्च दीर्घो ऽतिविपरीतकः

yasyaiśvaryamanādyantaṃ tamahaṃ śaraṇaṃ gatā eṣa me vyavasāyaśca dīrgho 'tiviparītakaḥ

हिन्दी अर्थ

विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये हैतेयदानवाः। येषां त्वमीहशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान् देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्। त्वामृते पापसंकल्पः कोऽन्य एवं वदिष्यति य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता हैत्यदानवाः। सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 371

यात वा तिष्ठतैवाथ मुनयो मद्विधायकाः एवं निशम्य वचनं देव्या मुनिवरास्तदा

yāta vā tiṣṭhataivātha munayo madvidhāyakāḥ evaṃ niśamya vacanaṃ devyā munivarāstadā

हिन्दी अर्थ

समुद्र्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि जो अक्षयात्मा सर्वेश्वर नासिका, नेत्र और काने -आदि इन्द्रियोंद्वारा जाने नहीं जा सकते, जिन्हें केवल मनद्वारा ग्रहण किया जा सकता है उन पूज्य परमेश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने गर्भमें अपने अंशमात्रसे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 372

आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम् ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः

ānandāśruparītākṣāḥ sasvajustāṃ tapasvinīm ūcuśca paramaprītāḥ śailajāṃ madhuraṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

अवतीर्ण होकर बड़े-बड़े हैत्योंके तेजोंका हरण कर लिया है, जो समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप हैं उन अनन्त परमात्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। महासुरेन्द्र ! जो ये महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं जगत्के उत्पत्तिस्थान भगवान् विष्णु हैं, ये अपने सोलह अंशॉंसे माता अदितिके उदरमें प्रविष्ट हुए हैं, उन्होंने ही बलपूर्वक तुमलोगोंके शरीरको निस्तेज कर दिया है बलिने कहा--तात! यह हरि कौन है जिससे हम लोगोंको भय प्राप्त हो गया है? मेरे पास तो उस वासुदेवसे भी अधिक बलवान् सैकड़ों हैत्य है । विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कु, अयःशङ्क, अयःशिरा, अश्वशिरा, भङ्गकारी,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 373

अत्यद्भुतास्यहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात्

atyadbhutāsyaho putri jñānamūrtirivāmalā prasādayati no bhāvaṃ bhavabhāvapratiśrayāt

हिन्दी अर्थ

महाहनु, प्रताप, प्रघस, शुम्भ, अत्यन्त कठिनाईसे जीतने योग्य कुकुर--ये तथा इनके अतिरिक्त और भी हैत्य एवं दानव मेरे अधिकारमें हैं। ये सभी महाबली, महान् पराक्रमी तथा पृथ्वीके भारको उठानेमें समर्थ हँ । इनमेंसे एक-एकके आधे पराक्रमसे भी कृष्णकी कोई समानता नहीं है॥ ३०--३३ ॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 374

ननु विद्मो वयं तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम् त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः

nanu vidmo vayaṃ tasya devasyaiśvaryamadbhutam tvanniścayasya dṛḍhatāṃ vettuṃ vayamihāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--हैत्यश्रेष्ठ प्रहाद अपने पौत्रकी यह बात सुनकर भगवानूकी निन्दा करनेवाले उस बलिको धिक्कारते हुए बोले प्रह्मादने कहा--मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिनका तुम-जैसा अविवेकी एवं दुर्बुद्धि राजा है, उन हैत्यों और दानवोंका विनाश हो जायगा। तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा पापी होगा जो देवाधिदेव, महाभाग, अजन्मा एवं सर्वव्यापी वासुदेवको ऐसा कहेगा? तुमने जिनका नाम गिनाया है ये सभी हैत्य-दानव, ब्रह्मासहित देवगण, चराचर जगत्, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और नदोंसहित यह संसार, समुद्र, द्वीप और लोक--ये

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 375

अचिरादेव तन्वङ्गि कामस्ते ऽयं भविष्यति क्वादित्यस्य प्रभा याति रत्नेभ्यः क्व द्युतिः पृथक्

acirādeva tanvaṅgi kāmaste 'yaṃ bhaviṣyati kvādityasya prabhā yāti ratnebhyaḥ kva dyutiḥ pṛthak

हिन्दी अर्थ

सभी भगवान् केशवकी समानता नहीं कर सकते! ९३८ मत्स्यपुराण

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 376

को ऽर्थो वर्णालिकाव्यक्तः कथं त्वं गिरिशं विना यामो नैकाभ्युपायने तमभ्यर्थयितुं वयम्

ko 'rtho varṇālikāvyaktaḥ kathaṃ tvaṃ giriśaṃ vinā yāmo naikābhyupāyane tamabhyarthayituṃ vayam

हिन्दी अर्थ

एकांशेन जगत् सर्व कस्तमेवं प्रवक्ष्यति यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्य निन्दकः इति जानात्ययं लोको न भवान् दितिजाधम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 377

अस्माकमपि वै सो ऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते अतस्त्वमेव सा बुद्धिर् यतो नीतिस्त्वमेव हि

asmākamapi vai so 'rthaḥ sutarāṃ hṛdi vartate atastvameva sā buddhir yato nītistvameva hi

हिन्दी अर्थ

निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम विरोचनस्तव गुरर्गुरुस्तस्याप्यहं॑ बले।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 378

अतो निःसंशयं कायं शंकरो ऽपि विधास्यति इत्युक्त्वा पूजिता याता मुनयो गिरिकन्यया

ato niḥsaṃśayaṃ kāyaṃ śaṃkaro 'pi vidhāsyati ityuktvā pūjitā yātā munayo girikanyayā

हिन्दी अर्थ

निन्दां करोषि यस्तस्मिन् कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौः। यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादचिराद् भ्रंशमेष्यसि मम देवो जगन्नाथो बले तावज्जनार्दनः।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 379

प्रययुर्गिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत् गङ्गाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गबद्धजटासटम्

prayayurgiriśaṃ draṣṭuṃ prasthaṃ himavato mahat gaṅgāmbuplāvitātmānaṃ piṅgabaddhajaṭāsaṭam

हिन्दी अर्थ

भवत्वहमुपेक्ष्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः इति हैत्यपतिः श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम्।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 380

भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्रजम् गिरेः सम्प्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शंकराश्रमम्

bhṛṅgānuyātapāṇisthamandārakusumasrajam gireḥ samprāpya te prasthaṃ dadṛśuḥ śaṃkarāśramam

हिन्दी अर्थ

जिन सर्वव्यापी एवं वन्दनीयोंके भी वन्दनीय परमात्माके एक अंशसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, उन्हें अकेले तुम-जैसे अविवेकी, विनाशोन्मुख, कुबुद्धि, अजितात्मा, वृद्धोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवालेके हुआ, जिसके घरमें तुम्हारा नीच पिता उत्पन्न हुआ, जिसके तुम इस प्रकार देवाधिदेव विष्णुकी निन्दा करनेवाले पुत्र हुए। संसारमें जन्म लेकर उपार्जित किये गये पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान् कृष्णके चरणोंमें हैत्याधम ! भगवान् (विष्णु) -से बढ़कर मुझे अपना शरीर भी प्रिय नहीं है, इसे यह संसार जानता है, किंतु तुम्हें विदित नहीं है। मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भगवान् विष्णुको जानते हुए भी तुम मेरे गौरवकी रक्षा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 381

प्रशान्ताशेषसत्त्वौघं नवस्तिमितकाननम् निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपातं सर्वतोदिशम्

praśāntāśeṣasattvaughaṃ navastimitakānanam niḥśabdākṣobhasalilaprapātaṃ sarvatodiśam

हिन्दी अर्थ

न करते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु विरोचन है और मैं उसका भी गुरु हूँ तथा मेरे एवं समस्त संसारके गुरुके भी गुरु नारायण हैं। चूँकि तुम उन गुरुओंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इसलिये इस लोकमें शीघ्र ही ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! जगदीश्वर जनार्दन मेरे देवता हैं। वे मेरे गुरु मुझपर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 382

तत्रापश्यंस्ततो द्वारि वीरकं वेत्रपाणिनम् सप्त ते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात्

tatrāpaśyaṃstato dvāri vīrakaṃ vetrapāṇinam sapta te munayaḥ pūjyā vinītāḥ kāryagauravāt

हिन्दी अर्थ

(मुझे इसकी परवा नहीं है।) चूँकि तुमने बिना विचारे त्रिलोकोके गुरु भगवान्की जो इस प्रकार इतनी निन्दा को है, इसीलिये मैं तुम्हें शाप दे रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने मेरा सिर काट लेनेसे भी बढ़कर यह भगवान् अच्युतको निन्दा करनेवाला वचन कहा है, उसी प्रकार तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर (अवनतिके गर्तमें) गिर जाओ। जिस प्रकार इस संसारसागरमें विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई शरणदाता नहीं है, (मेरी यह बात सत्य है तो) मैं शीघ्र ही तुम्हें राज्यसे च्युत हुआ देखूँ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 383

ऊचुर्मधुरभाषिण्या वाचा ते वाग्मिनां वराः द्रष्टुं वयमिहायाताः शरण्यं गणनायकम्

ūcurmadhurabhāṣiṇyā vācā te vāgmināṃ varāḥ draṣṭuṃ vayamihāyātāḥ śaraṇyaṃ gaṇanāyakam

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले हैत्यराज बलिने अपने पितामह प्रह्दादकी ऐसी अप्रिय बात सुनकर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर सभी प्रकारसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहना प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि । बलावलेपमत्तेन मयैतद् वाक्यमीरितम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 384

त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः त्वमेव नो गतिस्तत्त्वं यथा कालानतिक्रमः

trilocanaṃ vijānīhi surakāryapracoditāḥ tvameva no gatistattvaṃ yathā kālānatikramaḥ

हिन्दी अर्थ

मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम। यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम् राज्यश्चंशं वसुश्रंशं सम्प्राप्स्यामीति न त्वहम्। विषण्णोऽस्मि यथा तात तवैवाविनये कृते त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नाति दुर्लभम्। संसारे दुर्लभास्ते तु गुरवो ये भवद्विधाः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 385

सा प्रार्थनैषा प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः इत्युक्तो मुनिभिः सो ऽथ गौरवात्तानुवाच सः

sā prārthanaiṣā prāyeṇa pratīhāramayaḥ prabhuḥ ityukto munibhiḥ so 'tha gauravāttānuvāca saḥ

हिन्दी अर्थ

तत् प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि हैत्यप। त्वत्कोपदृष्ट्या ताताहं परितप्ये न शापतः वत्स कोपेन मोहो मे जनितस्तेन ते मया। शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 386

सवनस्यापरां संध्यां स्नातुं मन्दाकिनीजले क्षणेन भविता विप्रास् तत्र द्रक्ष्यथ शूलिनम्

savanasyāparāṃ saṃdhyāṃ snātuṃ mandākinījale kṣaṇena bhavitā viprās tatra drakṣyatha śūlinam

हिन्दी अर्थ

तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं किंचिच्छपाम्यहम् अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ। भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति यथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 387

इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस् ते तत्कालप्रतीक्षिणः गम्भीराम्बुधरं प्रावृट्तृषिताश्चातका यथा

ityuktā munayastasthus te tatkālapratīkṣiṇaḥ gambhīrāmbudharaṃ prāvṛṭtṛṣitāścātakā yathā

हिन्दी अर्थ

एवमुक्त्वा स हैत्येन्द्रं विरराम महामतिः। अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः देवाश्च मुमुचुर्दःखं देवमातादितिस्तथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 388

ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधानक्रियाविधिः वीरासनं बिभेदेशो मृगचर्मनिवासितम्

tataḥ kṣaṇena niṣpannasamādhānakriyāvidhiḥ vīrāsanaṃ bibhedeśo mṛgacarmanivāsitam

हिन्दी अर्थ

धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत नोद्वेगश्चाप्यभूत् तत्र मनुजेनद्रासुरेष्वपि। तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्बरदिवौकसाम् तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्टा च पार्थिव।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 389

ततो विनीतो जानुभ्याम् अवलम्ब्य महीस्थितिम् उवाच वीरको देवं प्रणामैकसमाश्रयः

tato vinīto jānubhyām avalambya mahīsthitim uvāca vīrako devaṃ praṇāmaikasamāśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--तात! प्रसन्न हो जाइये। आज्ञानसे मारे हुए मुझपर क्रोध मत कीजिये। मैंने बलके गर्वसे उन्मत्त होकर ऐसी बात कह दी है। हैत्यश्रेष्ठ ! मेरा सारा ज्ञान मोहसे नष्ट हो गया है, मैं पापी और दुराचारी हूँ। अतः आपने जो मुझे यह शाप दिया है, वह अच्छा ही किया है। तात! मैं राज्यसे च्युत और सम्पत्तिसे रहित हो जाऊँगा-इससे मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आपके साथ अविनयपूर्ण व्यवहार करनेसे मुझे कष्ट हो

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 390

सम्प्राप्ता मुनयः सप्त त्वां द्रष्टुं दीप्ततेजसः विभो समादिश द्रष्टुम् अवगन्तुम् इहार्हसि ते ऽब्रुवन्देवकार्येण तव दर्शनलालसाः

samprāptā munayaḥ sapta tvāṃ draṣṭuṃ dīptatejasaḥ vibho samādiśa draṣṭum avagantum ihārhasi te 'bruvandevakāryeṇa tava darśanalālasāḥ

हिन्दी अर्थ

रहा है। त्रिलोकीका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई भी वस्तु अत्यन्त दुर्लभ नहीं है, परंतु आपके समान जो गुरुजन हैं, वे विश्वमें अवश्य दुर्लभ है । इसलिये हैत्योंके पालक! आप प्रसन्न हो जाइये, मुझपर क्रोध न कीजिये। तात! मैं आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे दुःखी हो रहा हूँ, शापसे नहीं प्रह्लाद बोले--वत्स ! कोपके कारण मुझे मोह उत्पन्न हो गया, जिससे अभिभूत होकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया; क्योंकि मोहने मेरे विवेकको नष्ट कर दिया था। महासुर! यदि मोहके द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट हुआ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 391

इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना भूभङ्गसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा

ityukto dhūrjaṭistena vīrakeṇa mahātmanā bhūbhaṅgasaṃjñayā teṣāṃ praveśājñāṃ dadau tadā

हिन्दी अर्थ

होता तो भगवान् विष्णुको सर्वव्यापी जानता हुआ मैं शाप क्यों देता? असुरश्रेष्ठ ! मैंने तुम्हें जो यह शाप दिया है, यह तुम्हारे लिये अवश्य घटित होगा, अतः तुम विषाद मत करो। आजसे जो देवेश्वर, कभी च्युत न होनेवाले और शास्ता हैं, उन भगवान् श्रीहरिके प्रति तुम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 392

मूर्ध्नः कम्पेन तान्सर्वान् वीरको ऽपि महामुनीन् आजुहावाविदूरस्थान् दर्शनाय पिनाकिनः

mūrdhnaḥ kampena tānsarvān vīrako 'pi mahāmunīn ājuhāvāvidūrasthān darśanāya pinākinaḥ

हिन्दी अर्थ

इस शापके घटित होनेपर तुम मेरा स्मरण करना। तुम जैसे स्मरण करोगे वैसे ही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे तुम कल्याणके भागी होओगे। हैत्यराज बलिसे ऐसा कहकर महामतिमान् प्रह्लाद चुप हो गये। उधर भगवान् गोविन्द वामनरूपमें प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी उन जगन्नाथके अवतरित होनेपर देवगण तथा देवमाता अदिति दुःखसे विमुक्त हो गयीं। उस समय सुख-स्पर्शी वायु बहने लगी, आकाश निर्मल हो गया और सभी प्राणियोंकी बुद्धि धर्में संलग्न हो गयी। तभीसे राजाओं और राक्षसोंके तथा पृथ्वी, आकाश और स्वर्गमें निवास करनेवाले सभी जीवोंके मनोंमें उद्ठेग नहीं हुआ। राजन्! भगवानूके उत्पन्न होते ही लोकपितामह

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 393

त्वराबद्धार्धचूडास्ते लम्बमानाजिनाम्बराः विविशुर्वेदिकां सिद्धां गिरिशस्य विभूतिभिः

tvarābaddhārdhacūḍāste lambamānājināmbarāḥ viviśurvedikāṃ siddhāṃ giriśasya vibhūtibhiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् ब्रह्माने उनका जातकर्म आदि संस्कार किया। तत्पश्चात् उन देवदेवेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन कर वे ऋषियोंके तुष्टाव देवदेवेशमृषीणां चैव शृण्वताम्॥ ६६ सुनते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥५७=६६॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 394

बद्धपाणिपुटाक्षिप्तनाकपुष्पोत्करास्ततः पिनाकिपादयुगलं वन्द्यं नाकनिवासिनाम्

baddhapāṇipuṭākṣiptanākapuṣpotkarāstataḥ pinākipādayugalaṃ vandyaṃ nākanivāsinām

हिन्दी अर्थ

जयाद्योश जयाजेय जय सर्वात्मकात्मक। जय जन्मजरापेत जयानन्त जयाच्युत जयाशेषजगत्साक्षिञ्जगत्कर्तर्जगदगुरो । जगतोऽस्यन्तकृद् देव स्थिति पालयितुं जय जय स्थूलातिसूक्ष्म त्वं जयातीन्द्रिय सेन्द्रिय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 395

ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना मन्मथारिं ततो हृष्टाः समं तुष्टुवुरादृताः

tataḥ snigdhekṣitāḥ śāntā munayaḥ śūlapāṇinā manmathāriṃ tato hṛṣṭāḥ samaṃ tuṣṭuvurādṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

नृकेसरिन् जयारातिवक्षःस्थलविदारण। साम्प्रतं जय विश्वात्मन् जय वामन केशव वर्धस्व वर्धिताशेषविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 396

अहो कृतार्था वयमेव सांप्रतं सुरेश्वरो ऽप्यत्र वरो भविष्यति भवत्प्रसादामलवारिसेकतः फलेन काचित् तपसा नियुज्यते

aho kṛtārthā vayameva sāṃprataṃ sureśvaro 'pyatra varo bhaviṣyati bhavatprasādāmalavārisekataḥ phalena kācit tapasā niyujyate

हिन्दी अर्थ

न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्या न योगिनः स एव केवलो देव वेत्ति त्वां नेतरे जनाः ब्रह्मा बोले आदि परमेश्वर! आपकी जय हो। अजेय! आपकी जय हो । सर्वात्मस्वरूप ! आपकी जय हो। आप जन्म एवं वृद्धतासे विमुक्त, अन्तरहित तथा कभी च्युत होनेवाले नहीं हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 397

जयत्यसौ धन्यतरो हिमाचलस् तदाश्रयं यस्य सुता तपस्यति स दैत्यराजो ऽपि महाफलोदयो विमूलिताशेषसुरो हि तारकः

jayatyasau dhanyataro himācalas tadāśrayaṃ yasya sutā tapasyati sa daityarājo 'pi mahāphalodayo vimūlitāśeṣasuro hi tārakaḥ

हिन्दी अर्थ

अजित, अमेय और अव्यक्त स्थितिवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो । आप परमार्थके प्रयोजनस्वरूप, सर्वज्ञ, ज्ञानद्वारा जानने योग्य और अपनी महिमासे प्रकट होनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण जगतूके साक्षी, जगत्के कर्ता और. जगतूके गुरु हैं, आपकी जय हो। देव! आप जगतूकी स्थिति, पालन और अन्त करनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप शेषरूप, अशेषरूप तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 398

त्वदीयमंशं प्रविलोक्य कल्मषात् स्वकं शरीरं परिमोक्ष्यते हि यः स धन्यधीर्लोकपिता चतुर्मुखो हरिश्च यत्संभ्रमवह्निदीपितः

tvadīyamaṃśaṃ pravilokya kalmaṣāt svakaṃ śarīraṃ parimokṣyate hi yaḥ sa dhanyadhīrlokapitā caturmukho hariśca yatsaṃbhramavahnidīpitaḥ

हिन्दी अर्थ

हो। आप जगत्के आदि, मध्य और अन्त हैं, आपकी जय हो। सर्वज्ञाननिधे! आपकी जय हो। आप मोक्षार्थीजनोंद्वारा आज्ञात, स्वयंदृष्ट, ईश्वर, योगियोंको मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले और दम आदि गुणोंसे विभूषित हैं, आपकी जय और अतीन्द्रिय हैं, आपकी बारंबार जय हो। आप अपनी योगमायामें स्थित रहनेवाले, शेषनागके फणपर शयन करनेवाले और अव्यय हैं, आपकी जय हो । आप एक दाँतके अग्रभागपर वसुंधराको उठाकर रख लेनेवाले (आदिवराह) शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंह! आपकी जय हो। विश्वात्मन्! इस समय आप वामनरूपमें प्रकट हैं आपकी जय हो। केशव! आपकी जय हो। जगन्मूर्ति जनार्दन! आप अपनी मायाके आवरणसे छिपे रहते हैं, आपकी जय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 399

त्वदङ्घ्रियुग्मं हृदयेन बिभ्रतो महाभितापप्रशमैकहेतुकम् त्वमेव चैको विविधाकृतक्रियः किलेति वाचा विधुरैर् विभाष्यते

tvadaṅghriyugmaṃ hṛdayena bibhrato mahābhitāpapraśamaikahetukam tvameva caiko vividhākṛtakriyaḥ kileti vācā vidhurair vibhāṣyate

हिन्दी अर्थ

हो। प्रभो! आप अचिन्त्य, अनेक स्वरूप धारण करनेवाले और एकरूप हैं, आपकी जय हो। हरे! आप सम्पूर्ण प्रकृतिके विकारोंसे युक्त हैं, आपकी वृद्धि हो। आप परमेश्वरमें जगतूकी यह धर्ममर्यादा स्थित है। हरे! न मैं, न शंकर, न इन्द्रादि देवगण, न सनकादि मुनिगण और न योगीजन ही आपको जाननेमें समर्थ हैं। जगदीश्वर सर्वेश! इस जगत्में आपकी मायारूपी वस्त्रसे लिपटा हुआ कौन मनुष्य आपकी कृपाके बिना आपको जान सकता है।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 400

अथाद्य एकस्त्वमवादि नान्यथा जगत्तथा निर्घृणतां तव स्पृशेत् न वेत्सि वा दुःखमिदं प्रजात्मकं विहन्यते ते खलु सर्वतः क्रिया

athādya ekastvamavādi nānyathā jagattathā nirghṛṇatāṃ tava spṛśet na vetsi vā duḥkhamidaṃ prajātmakaṃ vihanyate te khalu sarvataḥ kriyā

हिन्दी अर्थ

प्रसन्नतासे सुन्दर मुखवाले देव! जिसने आपकी आराधना को है, केवल वही आपको जानता है, अन्य लोग नहीं। विश्वात्मन्! आप बड़े-बड़े नेत्रॉसे सुशोभित एवं नन्दीश्वरके स्वामी शंकररूप हैं। सामर्थ्यशाली वामन! आप इस विश्वकी उन्नतिके लिये वृद्धिको प्राप्त हों॥ ७४--८०॥ एवं स्तुतो हृषीकेशः स॒ तदा वामनाकृतिः। प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाब्जसमुद्भवम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 401

उपेक्षसे चेज् जगतामुपद्रवं दयामयत्वं तव केन कथ्यते स्वयोगमायामहिमागुहाश्रयं न विद्यते निर्मलभूतिगौरवम्

upekṣase cej jagatāmupadravaṃ dayāmayatvaṃ tava kena kathyate svayogamāyāmahimāguhāśrayaṃ na vidyate nirmalabhūtigauravam

हिन्दी अर्थ

यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः। भविष्यति सहस्त्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 402

वयं च ते धन्यतराः शरीरिणां यदीदृशं त्वां प्रविलोकयामहे अदर्शनं तेन मनोरथो यथा प्रयाति साफल्यतया मनोगतम्

vayaṃ ca te dhanyatarāḥ śarīriṇāṃ yadīdṛśaṃ tvāṃ pravilokayāmahe adarśanaṃ tena manoratho yathā prayāti sāphalyatayā manogatam

हिन्दी अर्थ

ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै बृहस्पतिः आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः। कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं वेदमथाङ्गिराः सर्वदेवमयो भूप बलेरध्वरमभ्यगात्। यत्र यत्र पदं भूयो भूभागे वामनो ददौ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 403

जगद्विधानैकविधौ जगन्मुखे करिष्यसे ऽतो बलभिच्चरा वयम् विनेमुरित्थं मुनयो विसृज्य तां गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसंनिधौ

jagadvidhānaikavidhau jaganmukhe kariṣyase 'to balabhiccarā vayam vinemuritthaṃ munayo visṛjya tāṃ giraṃ girīśaśrutibhūmisaṃnidhau

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--राजन्! ब्रह्माद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वामनस्वरूपधारी भगवान् हषीकेशने उस समय हँसकर कमलजन्मा ब्रह्मासे भावोंसे युक्त गम्भीर वाणीमें कहा-- ब्रह्मन्! प्राचीनकालमें इन्द्रादि थी, उस समय मैंने आपलोगोंसे इन्द्रको त्रिभुवन दिलानेको प्रतिज्ञा की थी। पुनः अदितिने भी मेरी स्तुति की थी और मैंने उससे भी प्रतिज्ञा की थी कि इन्द्रको कण्टकरहित त्रिलोकीका राज्य समर्पित

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 404

उत्कृष्टकेदार इवावनीतले सुबीजमुष्टिं सुफलाय कर्षकाः

utkṛṣṭakedāra ivāvanītale subījamuṣṭiṃ suphalāya karṣakāḥ

हिन्दी अर्थ

करूँगा। वही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सहस्राक्ष इन्द्र पुनः जगत्के अधिपति होंगे, यह मैं आपलोगोंसे सत्य कह रहा हूँ।' तदनन्तर ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्णमृगका चर्म दिया। भगवान् बृहस्पतिने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदान किया। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने दो श्वेत वस्त्र समर्पित किये। फिर प्रणवके स्वरोंसे विभूषित वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सांख्ययोगकी उक्तियाँ उनके निकट उपस्थित हुई। राजन्! तत्पश्चात् सर्वदेवमय भगवान् वामन जटा, दण्ड, छत्र और

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 405

तेषां श्रुत्वा तु तां रम्यां प्रक्रमोपक्रमक्रियाम् वाचं वाचस्पतिस्तुष्टः प्रोवाच स्मितसुन्दरीम्

teṣāṃ śrutvā tu tāṃ ramyāṃ prakramopakramakriyām vācaṃ vācaspatistuṣṭaḥ provāca smitasundarīm

हिन्दी अर्थ

कमण्डलु धारण करके बलिके यज्ञकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय भगवान् वामन पृथ्वीतलपर जहाँ- जहाँ अपने चरणोंको रखते थे वहाँ-वहाँ अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण पृथ्वीमें दरारें पड़ जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंद गतिसे चलते हुए भगवान्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 406

जाने लोकविधानस्य कन्या सत्कार्यमुत्तमम् जाता प्रालेयशैलस्य संकेतकनिरूपणाः

jāne lokavidhānasya kanyā satkāryamuttamam jātā prāleyaśailasya saṃketakanirūpaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

साब्धिद्वीपवतीं सर्वा चालयामास मेदिनीम्॥ ९० पृथ्वीको चलायमान कर दिया इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावे वामनोत्पत्तिर्नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामन-प्रादुर्भाव-प्रसंगमें वामन-जन्म नामक दो सौ पैतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 407

सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे देवकार्यार्थमुद्यताः तेषां त्वरन्ति चेतांसि किंतु कार्यं विवक्षितम्

satyamutkaṇṭhitāḥ sarve devakāryārthamudyatāḥ teṣāṃ tvaranti cetāṃsi kiṃtu kāryaṃ vivakṣitam

हिन्दी अर्थ

बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्दवारा उन्हें तीन

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 408

लोकयात्रानुगन्तव्या विशेषेण विचक्षणैः सेवन्ते ते यतो धर्मं तत्प्रामाण्यात्परे स्थिताः

lokayātrānugantavyā viśeṣeṇa vicakṣaṇaiḥ sevante te yato dharmaṃ tatprāmāṇyātpare sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्ृय: इति पृष्ठोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वर: । उवाच हैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 409

इत्युक्ता मुनयो जग्मुस् त्वरितास्तु हिमाचलम् तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम् ऊचुर्मुनिवराः प्रीताः स्वल्पवर्णं त्वरान्विताः

ityuktā munayo jagmus tvaritāstu himācalam tatra te pūjitāstena himaśailena sādaram ūcurmunivarāḥ prītāḥ svalpavarṇaṃ tvarānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव। कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 410

देवो दुहितरं साक्षात् पिनाकी तव मार्गते तच्छीघ्रं पावयात्मानम् आहुत्येवानलार्पणात्

devo duhitaraṃ sākṣāt pinākī tava mārgate tacchīghraṃ pāvayātmānam āhutyevānalārpaṇāt

हिन्दी अर्थ

सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 411

कार्यमेतच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते जगदुद्धरणायैष क्रियतां वै समुद्यमः

kāryametacca devānāṃ suciraṃ parivartate jagaduddharaṇāyaiṣa kriyatāṃ vai samudyamaḥ

हिन्दी अर्थ

द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति होता भागप्रदोऽयं च यमुदगाता च गायति। तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 412

इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टो ऽवदन्मुनीन् असमर्थो ऽभवद्वक्तुम् उत्तरं प्रार्थयञ्छिवम्

ityuktastaistadā śailo harṣāviṣṭo 'vadanmunīn asamartho 'bhavadvaktum uttaraṃ prārthayañchivam

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने कहा--पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा- आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं ?' बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके हैत्यराज बलिसे बोले--' दानवश्रेष्ठ! जगतूके उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। बही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 413

ततो मेना मुनीन्वीक्ष्य प्रोवाच स्नेहविक्लवा दुहितुस्तान्मुनींश्चैव चरणाश्रयम् अर्थवित्

tato menā munīnvīkṣya provāca snehaviklavā duhitustānmunīṃścaiva caraṇāśrayam arthavit

हिन्दी अर्थ

समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं । जगतूके लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवानूके

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 414

यदर्थं दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम् तदेवोपस्थितं सर्वं प्रक्रमेणैव सांप्रतम्

yadarthaṃ duhiturjanma necchantyapi mahāphalam tadevopasthitaṃ sarvaṃ prakrameṇaiva sāṃpratam

हिन्दी अर्थ

समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं' बलिने कहा--ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी!

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 415

कुलजन्मवयोरूपविभूत्यृद्धियुतो ऽपि यः वरस्तस्यापि चाहूय सुता देया ह्ययाचतः

kulajanmavayorūpavibhūtyṛddhiyuto 'pi yaḥ varastasyāpi cāhūya sutā deyā hyayācataḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 416

तत्समस्ततपोघोरं कथं पुत्री प्रयास्यति पुत्रीवाक्याद्यदत्रास्ति विधेयं तद्विधीयताम्

tatsamastatapoghoraṃ kathaṃ putrī prayāsyati putrīvākyādyadatrāsti vidheyaṃ tadvidhīyatām

हिन्दी अर्थ

यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर। त्वया तु दानवा हैत्या मखभागभुजः कृताः अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम्। विसृष्टेरनु चान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः त्वत्कृते भविता नूनं देवो विष्णुः स्थितौ स्थितः। विदित्वैतन्महाभाग कुरु यत्नमनागतम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 417

इत्युक्ता मुनयस्ते तु प्रियया हिमभूभृतः ऊचुः पुनरुदारार्थं नारीचित्तप्रसादकम्

ityuktā munayaste tu priyayā himabhūbhṛtaḥ ūcuḥ punarudārārthaṃ nārīcittaprasādakam

हिन्दी अर्थ

त्वया हि हैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि। प्रतिज्ञा न हि वोढव्या वाच्यं साम वृथाफलम् नालं दातुमहं देव हैत्य वाच्यं त्वया वचः। कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 418

ऐश्वर्यमवगच्छस्व शंकरस्य सुरासुरैः आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात्सुनिर्वृतैः

aiśvaryamavagacchasva śaṃkarasya surāsuraiḥ ārādhyamānapādābjayugalatvātsunirvṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः। नास्तीति किमु देवेन संसाराघौघहारिणा यज्ञाः क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति वक्ष्यति तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं मम। यन्मया दत्तमीशेशः स्वयमादास्यते हरिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 419

यस्योपयोगि यद्रूपं सा च तत्प्राप्तये चिरम् घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृतिः

yasyopayogi yadrūpaṃ sā ca tatprāptaye ciram ghoraṃ tapasyate bālā tena rūpeṇa nirvṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

नास्ति नास्तीत्यहं वक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम्। यदा वञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तज्जन्मनः फलम् यज्ञेऽस्मिन् यदि यज्ञेशो याचते मां जनार्दन: । निजमूर्धानमप्यत्र तद् दास्याम्यविचारितम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 420

यस्तद्व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम् तत्र सावहिता तावत् तस्मात् सैव भविष्यति

yastadvratāni divyāni nayiṣyati samāpanam tatra sāvahitā tāvat tasmāt saiva bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

नाबाधकारि यद् दानं तदमङ्कलवत् स्मृतम् शुक्रने कहा--असुर ! वेदोंके प्रमाणानुसार देवगण ही यज्ञभागके अधिकारी हैं, किंतु तुमने तो हैत्यों और दानवोंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया है। ये सामर्थ्यशाली भगवान् सत्त्वगुणमें स्थित होकर सृष्टिकी उत्पत्ति और पालन करते हैं तथा प्रलयकालमें प्रजाओंको अपना ग्रास बना लेते हैं। महाभाग! वे भगवान् विष्णु तुम्हारे लिये ही भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं, अत: इसे जानकर भविष्यके लिये उपाय करो। हैत्याधिपते! तुम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 421

इत्युक्त्वा गिरिणा सार्धं ते ययुर्यत्र शैलजा जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयी ह्युमा

ityuktvā giriṇā sārdhaṃ te yayuryatra śailajā jitārkajvalanajvālā tapastejomayī hyumā

हिन्दी अर्थ

उन्हें थोड़ी-सी भी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा न करना, झूठ- ऐसा वचन कहना चाहिए कि “देव! मैं आपको कुछ भी देनेमें समर्थ नहीं हूँ'

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 422

प्रोचुस्तां मुनयः स्निग्धं संमान्य पथमागतम् रम्यं प्रियं मनोहारि मा रूपं तपसा दह

procustāṃ munayaḥ snigdhaṃ saṃmānya pathamāgatam ramyaṃ priyaṃ manohāri mā rūpaṃ tapasā daha

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा-- ब्रह्मन्! साधारण याचकोंके याचना करनेपर मैंने उन्हें कभी नकारात्मक उत्तर नहीं दिया, फिर संसारके पापसमूहोंको दूर करनेवाले परमात्माद्वारा याचना किये जानेपर मैं कैसे कहूँगा कि मेरे पास नहीं है । भला, जो श्रीहरिं विविध व्रतों और उपवासोंद्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे गोविन्द यदि ऐसा कहेंगे कि ' दो' तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी ? जिनकी प्राप्तिके लिये तप और शौच आदि गुणोंसे युक्त याज्ञिक लोग उपहार-सामग्रियोसे परिपूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे ही देवेश मुझसे 'दो' ऐसी याचना करेंगे। यदि देवाधिदेव श्रीहरि मेरे द्वारा दिये गये दानको स्वयं ग्रहण करेंगे, तब तो मेरे कर्म पुण्यमय हो

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 423

प्रातस्ते शंकरः पाणिम् एष पुत्रि ग्रहीष्यति वयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः

prātaste śaṃkaraḥ pāṇim eṣa putri grahīṣyati vayamarthitavantaste pitaraṃ pūrvamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

परमेश्वरके आनेपर भी “नहीं है, नहीं है' ऐसा कहूँ और उन्हें ठगूँ, तब. तो मेरे जन्म लेनेका फल ही व्यर्थ है। इसलिये इस यज्ञमें यदि यज्ञेश्वर जनार्दन मुझसे मेरा मस्तक भी माँगेंगे तो मैं उसे बिना हिचकिचाहरके दे डालूँगा । जब मैंने अन्य साधारण याचकोंको “नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहा, तब भला भगवान् अच्युतके आनेपर वह अनभ्यस्त कैसे कहूँगा ? दान देनेसे आनेवाली विपत्तियाँ वीर पुरुषोंके लिये प्रशंसनीय हैं । जो दान देनेके बाद बाधा नहीं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 424

पित्रा सह गृहं गच्छ वयं यामः स्वमन्दिरम्

pitrā saha gṛhaṃ gaccha vayaṃ yāmaḥ svamandiram

हिन्दी अर्थ

पहुंचाता, वह अमङ्गलके समान कहा गया है । महाभाग! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी दुःखी, दरिद्र, आतुर, भूषारहित, उद्विग्न और माला आदिसे रहित नहीं है, प्रत्युत सभी लोग दृष्ट, संतुष्ट, सुगन्धित द्रव्यासे विभूषित, तृप्त और सभी सुखोंसे सम्पन्न हैं। फिर मैं सदा सुखी हूँ, इसके लिये तो जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी॥ २८ कहना ही क्या है ?॥ १९--२८॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 425

इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य सा त्वरमाणा ययौ वेश्म पितुर्दिव्यार्थशोभितम्

ityuktā tapasaḥ satyaṃ phalamastīti cintya sā tvaramāṇā yayau veśma piturdivyārthaśobhitam

हिन्दी अर्थ

भृगुवंशसिंह ! मेरे दानरूपी बीजका ही यह फल विदितं भृगुशार्दूल मयैतत् त्वत्प्रसादतः ॥ २९ है, जो मुझे इस प्रकार दान देनेयोग्य विशिष्ट पात्र प्राप्त

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 426

सा तत्र रजनीं मेने वर्षायुतसमां सती हरदर्शनसंजातमहोत्कण्ठा हिमाद्रिजा

sā tatra rajanīṃ mene varṣāyutasamāṃ satī haradarśanasaṃjātamahotkaṇṭhā himādrijā

हिन्दी अर्थ

मत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः। उपभोगाद् दशगुणं दानं श्लाघ्यतमं मम मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः। तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत् अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम्। मां निहन्तुमनाश्चैव वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 427

ततो मुहूर्ते ब्राह्मे तु तस्याश्चक्रुः सुरस्त्रियः नानामङ्गलसंदोहान् यथावत्क्रमपूर्वकम्

tato muhūrte brāhme tu tasyāścakruḥ surastriyaḥ nānāmaṅgalasaṃdohān yathāvatkramapūrvakam

हिन्दी अर्थ

स मां हन्तुं हृषीकेशः कथं यत्नं करिष्यति एतद् विदित्वा न गुरो दानविघ्नकरेण च। त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 428

दिव्यमण्डनमङ्गानां मन्दिरे बहुमङ्गले उपासत गिरिं मूर्ता ऋतवः सार्वकामिकाः

divyamaṇḍanamaṅgānāṃ mandire bahumaṅgale upāsata giriṃ mūrtā ṛtavaḥ sārvakāmikāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् तं दृष्टा यज्ञवाटान्तःप्रविष्टमसुराः प्रभुम्। प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास चेतसा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 429

वायवो वारिदाश्चासन् संमार्जनविधौ गिरेः हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना

vāyavo vāridāścāsan saṃmārjanavidhau gireḥ harmyeṣu śrīḥ svayaṃ devī kṛtanānāprasādhanā

हिन्दी अर्थ

अथासुरपतिं प्रह्वं दृष्टा मुनिवरांश्च तान्। देवदेवपत्िः साक्षी विष्णुर्वामनरूपधृक् तुष्टाव यज्ञवह्िं च यजमानमथत्विजः। यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 430

कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्चाभवदाकुला चिन्तामणिप्रभृतयो रत्नाः शैलं समन्ततः

kāntiḥ sarveṣu bhāveṣu ṛddhiścābhavadākulā cintāmaṇiprabhṛtayo ratnāḥ śailaṃ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

होगा। यह मुझे आपकी कृपासे ही ज्ञात हुआ है। अतः गुरो! यह सब जानते हुए यदि मेरा यह दानबीज जनार्दनरूपी महापात्रमें पड़ जाय तो फिर मुझे क्या नहीं मिला अर्थात् मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। यदि परमेश्वर मुझसे दान लेकर देवताओंका पालन-पोषण करते हैं तो उनके उपभोगसे मेरा दान दसगुना प्रशंसनीय हो जायगा। इसमें सन्देह नहीं कि यज्ञद्वारा आराधित श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो गये हैं, इसी कारण दर्शन देकर उपकार करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं। यदि क्रुद्ध होकर देवभागको रोकनेवाले मुझको मार डालनेके विचारसे आ रहे हैं तो भगवानूके हाथोंसे मेरा वध भी प्रशंसनीय है! यह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 431

उपतस्थुर्नगाश्चापि कल्पकाममहाद्रुमाः ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः

upatasthurnagāścāpi kalpakāmamahādrumāḥ oṣadhyo mūrtimatyaśca divyauṣadhisamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

जिनके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है, वे ही श्रीहरि यदि मुझसे माँगनेके लिये आ रहे हैं तो यह उनके अनुग्रहके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो स्वयम्भू परमात्मा सबकी सृष्टि करते हैं और मनकी कल्पनासे ही उसका विनाश कर देते हैं, वे हृषीकेश भला मुझे मारनेके लिये क्यों यत्न करेंगे? गुरो! ऐसा जानकर मेरे यज्ञमें जगन्नाथ गोविन्दके उपस्थित होनेपर आपको मेरे दानमें विघ्न नहीं करना चाहिए॥ २९--३६॥

English

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अध्याय १५४

श्लोक 432

रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किंकराः किंकरास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिनः

rasāśca dhātavaścaiva sarve śailasya kiṃkarāḥ kiṃkarāstasya śailasya vyagrāścājñānuvartinaḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य एवं मायासे वामनरूपधारी जगदीश्वर वहाँ आ पहुँचे । यज्ञशालाके भीतर प्रविष्ट हुए उन प्रभुको देखकर सभी सभासद असुरगण क्षुब्ध हो उठे; क्योंकि वामनके तेजसे वे तेजोहीन हो गये थे। उस महान् यज्ञमें आये हुए मुनिगण जप करने लगे। बलिने अपना समस्त जीवन सफल मान लिया। इसके बाद सभी संक्षुब्ध थे, अतः किसीने भी किसीसे कुछ भी नहीं कहा। सभीने हृदयसे देवदेवेशकी पूजा की। तत्पश्चात् देवाधिदेव वामनरूपधारी साक्षात् विष्णुने विनीत बलि और उन मुनिवरोंको देखकर यज्ञाग्नि, . यज्ञकर्माधिकारी सदस्यों और यजमान, पुरोहित, कर्ममें

English

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अध्याय १५४

श्लोक 433

नद्यः समुद्रा निखिलाः स्थावरं जङ्गमं च यत् तत्सर्वं हिमशैलस्य महिमानमवर्धयत्

nadyaḥ samudrā nikhilāḥ sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca yat tatsarvaṃ himaśailasya mahimānamavardhayat

हिन्दी अर्थ

प्रस्तुत द्रव्य-सम्पत्तियोंकी प्रशंसा की। तदनन्तर यज्ञशालामें स्थित वामनभगवान्को अत्यन्त प्रसन्न देखकर उसी यज्ञवाटस्थितं वीरः साधु साध्वित्युदीरयन्॥ ४३ समय सदस्यगण 'साधु-साधु' की ध्वनि करने लगे।

English

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अध्याय १५४

श्लोक 434

अभवन्मुनयो नागा यक्षगन्धर्वकिंनराः शंकरस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्वते

abhavanmunayo nāgā yakṣagandharvakiṃnarāḥ śaṃkarasyāpi vibudhā gandhamādanaparvate

हिन्दी अर्थ

उसी समय रोमाञ्चित शरीरवाले महासुर बलिने अर्घ्य लेकर पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४४ गोविन्दकी पूजा की और इस प्रकार कहा॥ ३७--४४॥ स्त्रियो चस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्च पुष्कलान्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 435

सर्वे मण्डनसंभारास् तस्थुर्निर्मलमूर्तयः शर्वस्यापि जटाजूटे चन्द्रखण्डं पितामहः

sarve maṇḍanasaṃbhārās tasthurnirmalamūrtayaḥ śarvasyāpi jaṭājūṭe candrakhaṇḍaṃ pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

इत्युक्तो हैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः। प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पाहैः पदवतां वर। शतं शतसहस्त्राणां पदानां मार्गतां भवान्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 436

बबन्ध प्रणयोदारविस्फारितविलोचनः कपालमालां विपुलां चामुण्डा मूर्ध्न्यबन्धयत्

babandha praṇayodāravisphāritavilocanaḥ kapālamālāṃ vipulāṃ cāmuṇḍā mūrdhnyabandhayat

हिन्दी अर्थ

धर्मबुद्ध्या हैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि तावता। अन्येषामर्थिनां वित्तमीहितं दास्यते भवान् सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् पादाङ्गल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गल्यश्च गुह्यकाः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 437

उवाच चापि वचनं पुत्रं जनय शंकर यो दैत्येन्द्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति

uvāca cāpi vacanaṃ putraṃ janaya śaṃkara yo daityendrakulaṃ hatvā māṃ raktaistarpayiṣyati

हिन्दी अर्थ

विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः। यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा दृष्टौ ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः । तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 438

सौरिर् ज्वलच्छिरोरत्नमुकुटं चानलोल्बणम् भुजगाभरणं गृह्य सज्जं शंभोः पुरो ऽभवत्

saurir jvalacchiroratnamukuṭaṃ cānalolbaṇam bhujagābharaṇaṃ gṛhya sajjaṃ śaṃbhoḥ puro 'bhavat

हिन्दी अर्थ

अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः। सत्यं तस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्तथा। स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै श्रुवौ

English

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अध्याय १५४

श्लोक 439

शक्रो गजाजिनं तस्य वसाभ्यक्ताग्रपल्लवम् दध्रे सरभसं स्विद्यद् विस्तीर्णमुखपङ्कजम्

śakro gajājinaṃ tasya vasābhyaktāgrapallavam dadhre sarabhasaṃ svidyad vistīrṇamukhapaṅkajam

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह, असंख्य सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण पृथ्वी-इनमेंसे जो आपको अभीष्ट हो अथवा जिसके लिये आप वामनरूपसे आये हैं, उसे आप माँगिये। मैं आपको वह प्रदान करूँगा

English

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अध्याय १५४

श्लोक 440

वायुश्च विपुलं तीक्ष्णशृङ्गं हिमगिरिप्रभम् वृषं विभूषयामास हरयानं महौजसम्

vāyuśca vipulaṃ tīkṣṇaśṛṅgaṃ himagiriprabham vṛṣaṃ vibhūṣayāmāsa harayānaṃ mahaujasam

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--हैत्यपति बलिके ऐसा कहनेपर गम्भीररूपसे मुसकराते हुए वामनरूपधारी भगवान् प्रेमभरी वाणीमें बोले वामनभगवानूने कहा राजन्! अग्निस्थापनके आदि उनके याचकोंको प्रदान कीजिये

English

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अध्याय १५४

श्लोक 441

वितेनुर्नयनान्तःस्थाः शम्भोः सूर्यानलेन्दवः स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः

vitenurnayanāntaḥsthāḥ śambhoḥ sūryānalendavaḥ svāṃ dyutiṃ lokanāthasya jagataḥ karmasākṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग पृथ्वीसे आपका क्या काम चलेगा? आप सौ अथवा लाख पदोंके लिये याचना कीजिये वामनभगवानूने कहा--हैत्यपते ! मैं धर्मबुद्धिसे उतनेसे ही कृतार्थ हूँ। आप अन्य याचकोंको उनका अभीष्ट धन प्रदान कीजिये

English

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अध्याय १५४

श्लोक 442

चिताभस्म समाधाय कपाले रजतप्रभम् मनुजास्थिमयीं मालाम् आबबन्ध च पाणिना

citābhasma samādhāya kapāle rajataprabham manujāsthimayīṃ mālām ābabandha ca pāṇinā

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले-महात्मा वामनकी ऐसी बातें सुनकर महाबाहु बलिने उन वामनको तीन पग भूमि देनेका संकल्प कर लिया। हाथमें संकल्पका जल गिरते सर्वदेवमय रूप प्रकट कर दिया। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, आकाश मस्तक, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाचगण पैरोंकी अंगुलियाँ, गुह्यक हाथोंकी अंगुलियाँ, विश्वेदेव घुटने, सुरश्रेष्ठ साध्यगण जंघे थे। नखोंमें यक्ष, रेखाओंमें अप्सराएँ, ेत्रज्योतिमें नक्षत्रगण थे। सूर्यकिरणे केश, ताराएँ रोमकूप, महर्षिगण रोमावलि थे। उन महात्माकी भुजाओंमें दिशाओंके कोण और श्रोत्रॉमें दिशाएँ थीं । श्रवणेन्द्रियमें अश्विनीकुमार और नासिकामें वायुका निवास था। प्रसन्नतामें चन्द्रदेव

English

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अध्याय १५४

श्लोक 443

प्रेताधिपः पुरो द्वारे सगदः समवर्तत नानाकारमहारत्नभूषणं धनदाहृतम्

pretādhipaḥ puro dvāre sagadaḥ samavartata nānākāramahāratnabhūṣaṇaṃ dhanadāhṛtam

हिन्दी अर्थ

और मनमें धर्म स्थित थे। सत्य उनकी वाणी और सरस्वती देवी जिह्वा हुईं। देवमाता अदिति ग्रीवा, विद्याएँ वैश्वानर उनके मुख, प्रजापति अण्डकोष, परब्रह्म हृदय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 444

विहायोदग्रसर्पेन्द्रकटकेन स्वपाणिना कर्णोत्तंसं चकारेशो वासुकिं तक्षकं स्वयम्

vihāyodagrasarpendrakaṭakena svapāṇinā karṇottaṃsaṃ cakāreśo vāsukiṃ takṣakaṃ svayam

हिन्दी अर्थ

हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः पृष्ठेऽञस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसंधिषु। सर्वसूक्तानि दशना ज्योतींषि विमलप्रभाः वक्षःस्थले महादेवो धैर्ये चास्य महार्णवाः। उदरे चास्य गन्धर्वाः सम्भूताश्च महाबलाः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 445

जलाधीशाहृतां स्थास्नुप्रसूनावेष्टितां पृथक् ततस्तु ते गणाधीशा विनयात्तत्र वीरकम्

jalādhīśāhṛtāṃ sthāsnuprasūnāveṣṭitāṃ pṛthak tatastu te gaṇādhīśā vinayāttatra vīrakam

हिन्दी अर्थ

'लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः। सर्वज्योतींषि जानीहि तस्य तत्परमं महः तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोदभूतमुत्तमम्। स्तनौ कुक्षी च वेदाश्च उदरं च महामखाः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 446

प्रोचुर्व्यग्राकृते त्वं गां समावेदय शूलिने निष्पन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशं प्रसाधनैः

procurvyagrākṛte tvaṃ gāṃ samāvedaya śūline niṣpannābharaṇaṃ devaṃ prasādhyeśaṃ prasādhanaiḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य देवमयं रूपं दृष्टा विष्णोर्महाबलाः उपासर्पन्त हैत्येन्द्रः पतङ्गा इव पावकम्। प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः कृत्वा रूपं महाकायं जहाराशु स मेदिनीम्। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे

English

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अध्याय १५४

श्लोक 447

सप्त वारिधयस्तस्थुः कर्तुं दर्पणविभ्रमम् ततो विलोकितात्मानं महाम्बुधिजलोदरे

sapta vāridhayastasthuḥ kartuṃ darpaṇavibhramam tato vilokitātmānaṃ mahāmbudhijalodare

हिन्दी अर्थ

परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरौ विष्णोरास्तां महीपाल देवपालनकर्मणि। जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान्

English

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अध्याय १५४

श्लोक 448

धरामालिङ्ग्य जानुभ्यां स्थाणुं प्रोवाच केशवः शोभसे देव रूपेण जगदानन्ददायिना

dharāmāliṅgya jānubhyāṃ sthāṇuṃ provāca keśavaḥ śobhase deva rūpeṇa jagadānandadāyinā

हिन्दी अर्थ

पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः। सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात् बलेर्दत्त॑ भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना। अथ हैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वे श्वरेश्वर: सावर्णिके तु सम्प्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति

English

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अध्याय १५४

श्लोक 449

मातरः प्रेरयन् कामवधूं वैधव्यचिह्निताम् कालो ऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेङ्गितसंज्ञया

mātaraḥ prerayan kāmavadhūṃ vaidhavyacihnitām kālo 'yamiti cālakṣya prakāreṅgitasaṃjñayā

हिन्दी अर्थ

साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया। दत्तं चतुर्युगाणां च साधिका ह्योकसप्ततिः और कश्यप मुनि पुंस्त्व थे। उनके पीठ-भागमें वसुगण और संधिभागोंमें मरुद्गण थे। सभी सूक्त दाँत और निर्मल कान्ति ज्योतिर्गण थे॥ ५१--६० ॥

English

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अध्याय १५४

श्लोक 450

ततस्ताश्चोदिता देवम् ऊचुः प्रहसिताननाः रतिः पुरस्तव प्राप्ता नाभाति मदनोज्झिता

tatastāścoditā devam ūcuḥ prahasitānanāḥ ratiḥ purastava prāptā nābhāti madanojjhitā

हिन्दी अर्थ

उनके वक्ष:स्थलमें महादेव और धैर्यमें महासागर थे। उनके उदरमें महाबली गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सभी विद्याएँ उनके कटिप्रदेशमें थीं। सभी ज्योतियोंको उनका परम तेज जानना चाहिए। वहाँ उन देवाधिदेवका अनृपम तेज भासमान हो रहा था। उनके स्तनों और कुक्षियोंमें वेदोंका निवास था तथा उदरमें महायज्ञ, इष्टियाँ, पशुओंके बलिदान और ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ थीं। उन विष्णुके देवमय स्वरूपको देखकर महाबली हैत्यगण अग्निमें पतंगोंकी भाँति उनपर टूट पड़े। तब सर्वव्यापी परमात्माने उन सभी असुरोंको पैरों तथा हाथोंके चपेटसे मसल डाला और शीघ्र ही विशालकाय स्वरूप धारणकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 451

ततस्तां संनिर्वायाह वामहस्ताग्रसंज्ञया प्रयाणं गिरिजावक्त्रदर्शनोत्सुकमानसः

tatastāṃ saṃnirvāyāha vāmahastāgrasaṃjñayā prayāṇaṃ girijāvaktradarśanotsukamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

भूलोकको नापते समय चन्द्रमा और सूर्य भगवान्के स्तनोंके मध्यभागमें थे, अन्तरिक्षलोक नापते समय वे दोनों नाभिप्रदेशमें और उससे ऊपर जाते समय सक्थि भागमें आ गये। उससे भी ऊपर जाते समय वे दोनों प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य भगवान् विष्णुके घुरनोंके मूलभागमें स्थित हो गये। महीपाल! इस प्रकार लम्बे डगवाले भगवान् विष्णुने देवहितके लिये समूची त्रिलोकीको जीतकर और असुरश्रेष्ठोंका संहार कर तीनों लोकोंका

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 452

ततो हरो हिमगिरिकन्दराकृतिं सितं कशामृदुहतिभिः प्रचोदयत् महावृषं गणतुमुलाहितेक्षणं स भूधरानशनिरिव प्रकम्पयन्

tato haro himagirikandarākṛtiṃ sitaṃ kaśāmṛduhatibhiḥ pracodayat mahāvṛṣaṃ gaṇatumulāhitekṣaṇaṃ sa bhūdharānaśaniriva prakampayan

हिन्दी अर्थ

राज्य इन्द्रको सौंप दिया। साथ ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने भूमितलके नीचे सुतल नामक पाताललोकका राज्य बलिको दे दिया। उस समय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुने हैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ६१--७०॥ श्रीभगवान् बोले-हैत्यराज बले! जो तुमने मुझे जलका दान दिया है और मैंने उसे हाथमें ग्रहण कर लिया है, उसके फलस्वरूप तुम एक कल्पतक दीर्घजीवन प्राप्त करोगे और इस वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्र होओगे। इस समय मैंने एकहत्तर चतुर्युगीतकके लिये त्रिलोकीका सम्पूर्ण राज्य देवराज इन्द्रको दे दिया है। साथ ही इन्द्रके जितने शत्रु होंगे, उन

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 453

ततो हरिर्द्रुतपदपद्धतिः पुरः पुरःसरान्द्रुमनिकरेषु संश्रितान् धरारजःशबलितभूषणो ऽब्रवीत् प्रयात मा कुरुत पथो ऽस्य संकटम्

tato harirdrutapadapaddhatiḥ puraḥ puraḥsarāndrumanikareṣu saṃśritān dharārajaḥśabalitabhūṣaṇo 'bravīt prayāta mā kuruta patho 'sya saṃkaṭam

हिन्दी अर्थ

सबका भी मुझे नियन्त्रण करना है; क्योंकि इन्द्रने तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले॥ ७४ पूर्वकालमें परम भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 454

प्रभोः पुनः प्रथमनियोगमूर्जयन् सुतो ऽब्रवीद् भ्रुकुटिमुखो ऽपि वीरकः वियच्चरा वियति किमस्ति कान्तकं प्रयात नो धरणिधराविदूरतः

prabhoḥ punaḥ prathamaniyogamūrjayan suto 'bravīd bhrukuṭimukho 'pi vīrakaḥ viyaccarā viyati kimasti kāntakaṃ prayāta no dharaṇidharāvidūrataḥ

हिन्दी अर्थ

ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं करिष्यसि। तावदेतान् महाभोगानवाप्स्यसि महासुर यदा च देवविप्राणां विरोधं त्वं करिष्यसि। बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणास्त्वामसंशयम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 455

महार्णवाः कुरुत शिलोपमं पयः सुरद्विषागमनमहातिकर्दमम् गणेश्वराश् चपलतया न गम्यतां सुरेश्वरैः स्थिरमतिभिर् निरीक्ष्यते

mahārṇavāḥ kuruta śilopamaṃ payaḥ suradviṣāgamanamahātikardamam gaṇeśvarāś capalatayā na gamyatāṃ sureśvaraiḥ sthiramatibhir nirīkṣyate

हिन्दी अर्थ

न विरोध: सुरैः कार्यो विप्रैर्वा हैत्यसत्तम इत्येवमुक्तो देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना बलिः प्राह महाराज प्रणिपत्य मुदा युतः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 456

न भृङ्गिणा स्वतनुमवेक्ष्य नीयते पिनाकिनः पृथुमुखमण्डम् अग्रतः वृथा यमः प्रकटितदन्तकोटरं त्वमायुधं वहसि विहाय संभ्रमम्

na bhṛṅgiṇā svatanumavekṣya nīyate pinākinaḥ pṛthumukhamaṇḍam agrataḥ vṛthā yamaḥ prakaṭitadantakoṭaraṃ tvamāyudhaṃ vahasi vihāya saṃbhramam

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवानुवाच दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च। हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम् अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृता: । फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च प्रशशास यथापूर्वमिन्द्रसत्रैलोक्यपूजितः। सिषेवे च परान् कामान् बलिः पातालसंस्थित:

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 457

पदं न यद्रथतुरगैः पुरद्विषः प्रमुच्यते बहुतरमातृसंकुलम् अमी सुराः पृथगनुयायिभिर्वृताः पदातयो द्विगुणपथान् हरप्रियाः

padaṃ na yadrathaturagaiḥ puradviṣaḥ pramucyate bahutaramātṛsaṃkulam amī surāḥ pṛthaganuyāyibhirvṛtāḥ padātayo dviguṇapathān harapriyāḥ

हिन्दी अर्थ

इहैव देवदेवेन बद्धोऽसौ दानवोत्तमः। देवानां कार्यकरणे भूयोऽपि जगति स्थितः सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकायां व्यवस्थितः।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 458

स्ववाहनैः पवनविधूतचामरैश् चलध्वजैर्व्रजत विहारशालिभिः सुराः स्वकं किमिति सरागमूर्जितं विचार्यते नियतलयत्रयानुगम्

svavāhanaiḥ pavanavidhūtacāmaraiś caladhvajairvrajata vihāraśālibhiḥ surāḥ svakaṃ kimiti sarāgamūrjitaṃ vicāryate niyatalayatrayānugam

हिन्दी अर्थ

असुर! तुम सुतल नामक मनोहर पाताललोकमें जाकर मेरे आदेशका ठीक-ठीक पालन करते हुए निवास करो महासुर! जो दिव्य वनोंसे युक्त एवं सैकड़ों महलोंसे समन्वित है, जिसके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं, जहाँ शुद्ध एवं श्रेष्ठ नदियाँ बह रही हैं, जो नाच-गानसे मनको लुभानेवाला है, उस सुतललोकमें तुम सुगन्धित धूप, माला, वस्त्र और उत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा माला और चन्दनादिसे हर्षित होकर विविध प्रकारके अन्न-पान आदिका उपभोग करो और मेरी आज्ञासे सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उतने समयतक निवास करो। महासुर! जबतक तुम देवताओं और ब्राह्मणोंसे विरोध नहीं करोगे, तबतक तुम इन सभी महाभोगोंको प्राप्त

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 459

न किंनरैर् अभिभवितुं हि शक्यते विभूषणचयसमुद्भवो ध्वनिः अजातिजाः किमिति न षड्जमध्यम् अपृथुस्वरं बहुतरमत्र वक्ष्यते

na kiṃnarair abhibhavituṃ hi śakyate vibhūṣaṇacayasamudbhavo dhvaniḥ ajātijāḥ kimiti na ṣaḍjamadhyam apṛthusvaraṃ bahutaramatra vakṣyate

हिन्दी अर्थ

करते रहोगे। जब तुम देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करोगे, तब तुम्हें वरुणके पाश बाँध लेंगे-इसमें संदेह नहीं है। हैत्यश्रेष्ठ! ऐसा जानकर तुम मेरी आज्ञाओंका पूर्णरूपसे पालन करो! तुम्हें देवताओं अथवा ब्राह्मणोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिए ॥७१--८१॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 460

नतानतानतनततानतां गताः पृथक्तया समयकृता विभिन्नताम् विशङ्किता भवदतिभेदशीलिनः प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडकाः

natānatānatanatatānatāṃ gatāḥ pṛthaktayā samayakṛtā vibhinnatām viśaṅkitā bhavadatibhedaśīlinaḥ prayāntyamī drutapadameva gauḍakāḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले-महाराज! प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बलि प्रमुदित हो प्रणाम करके बोला बलिने पूछा-- भगवन्! आपके आदेशसे उस पाताललोकमें निवास करते समय मेरे लिये सुखभोगोंको प्राप्त करानेवाले कौन-से उपादान कारण होंगे ? श्रीभगवानूने कहा--जो विधानसे रहित किये गये दान, बिना श्रोत्रिय ब्राह्मणके किये गये श्राद्ध और श्रद्धाहित किये हुए हवन हैं, ये सब तुम्हें अपना फल प्रदान करेंगे। दक्षिणाहीन यज्ञ, बिना विधिके की हुई

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय १५४

श्लोक 461

विसंहताः किमिति न षाड्गवादयः स्वगीतकैर् ललितपदप्रयोगजैः प्रभोः पुरो भवति हि यस्य चाक्षतं समुद्गतार्थकमिति तत्प्रतीयते

visaṃhatāḥ kimiti na ṣāḍgavādayaḥ svagītakair lalitapadaprayogajaiḥ prabhoḥ puro bhavati hi yasya cākṣataṃ samudgatārthakamiti tatpratīyate

हिन्दी अर्थ

क्रियाएँ और ब्रह्मचर्य-व्रतसे रहित अध्ययन-ये सभी तुम्हें अपना फल देंगे शौनकजीने कहा--बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्गका राज्य देकर भगवान् विष्णु अपने उस सर्वव्यापक रूपके साथ अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् इन्द्र तीनों लोकोंमें पूजित होकर पूर्ववत् शासन करने लगे तथा

English

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अध्याय १५४

श्लोक 462

अमी पृथग्विरचितरम्यरासकं विलासिनो बहुगमकस्वभावकम् प्रयुञ्जते गिरिशयशोविसारिणं प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः

amī pṛthagviracitaramyarāsakaṃ vilāsino bahugamakasvabhāvakam prayuñjate giriśayaśovisāriṇaṃ prakīrṇakaṃ bahutaranāgajātayaḥ

हिन्दी अर्थ

बलि पातालमें स्थित होकर उत्तम मनोरथोंका सेवन करने लगे। महाभाग! वह दानवराज बलि भगवान् विष्णुद्वारा यहीं बाँधा गया था। वे भगवान् देवताओंका कार्य करनेके लिये फिर इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं, जो दानवॉका दानवानां विनाशाय भारावतरणाय च॥ ८९ विनाश तथा पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये सहायभूतः सारथ्यं करिष्यति बलानुजः

English

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अध्याय १५४

श्लोक 463

अमी कथं ककुभि कथाः प्रतिक्षणं ध्वनन्ति ते विविधवधूविमिश्रिताः न जातयो ध्वनिमुरजासमीरिता न मूर्छिताः किमिति च मूर्छनात्मकाः

amī kathaṃ kakubhi kathāḥ pratikṣaṇaṃ dhvananti te vividhavadhūvimiśritāḥ na jātayo dhvanimurajāsamīritā na mūrchitāḥ kimiti ca mūrchanātmakāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च। गङ्काद्वारमितो यास्याम्यानुज्ञां देहि मे विभो एवमुक्त्वा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः। इत्येतद् देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्। वामनस्य पठेद् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते

English

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अध्याय १५४

श्लोक 464

श्रुतिप्रियक्रमगतिभेदसाधनं ततादिकं किमिति न तुम्बरेरितम् ।न हन्यते बहुविधवाद्यडम्बरं प्रकीर्णवीणामुरजादि नाम यत्

śrutipriyakramagatibhedasādhanaṃ tatādikaṃ kimiti na tumbareritam / na hanyate bahuvidhavādyaḍambaraṃ prakīrṇavīṇāmurajādi nāma yat

हिन्दी अर्थ

कृष्णरूपसे यदुकुलमें उत्पन्न होकर विराजमान हैं। वे तुम्हारे सम्बन्धी हैं। बलरामके छोटे भाई वे श्रीकृष्ण तुम्हारे शत्रुओंके निग्रहके समय सारथिरूपसे तुम्हारी सहायता करेंगे। महावीर अर्जुन! बुद्धिमान् वामनके अवतारकी यह सारी कथा मैंने तुमसे वर्णन कर दी, जिसे अर्जुन बोले--विभो ! भगवान् विष्णुके माहात्म्यको, जिसे मैंने पूछा था, उसे मैं आपके मुखसे सुन चुका। अब मैं यहाँसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) जाना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये

English

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अध्याय १५४

श्लोक 465

इतीरते गिरिमवधानशालिनः सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया नियामिताः प्रययुरतीव हर्षिताश् चराचरं जगदखिलं ह्यपूरयन्

itīrate girimavadhānaśālinaḥ surāsurāḥ sapadi tu vīrakājñayā niyāmitāḥ prayayuratīva harṣitāś carācaraṃ jagadakhilaṃ hyapūrayan

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, बह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 154
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.