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गति
थीम

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आ

36 पद-समूह।

आकाशवत् अनन्तः अहम्
आकाशस्य इव धीरस्य
  • आकाश के समान व्यापक और निर्लेप धीर ज्ञानी के लिए (श्लोक 18.66)
आकाशस्य धूमेन
आचक्ष्व वा शृणु
  • व्याख्यान करो अथवा दूसरों से सुनो (श्लोक 16.1)
आचारम् अनाचारम्
  • धार्मिक आचार (विधि), अनाचार (निषेध) (श्लोक 18.48)
आजीवम् अपि जिज्ञासुः
  • जीवन भर निरंतर जिज्ञासा और अध्ययन करते हुए भी (श्लोक 15.1)
आत्म-विश्रान्ति-तृप्तेन
  • अपनी ही आत्मा में विश्राम पाकर तृप्त हुए (श्लोक 18.93)
आत्मज्ञस्य धीरस्य
आत्मज्ञानतृप्तस्य
आत्मज्ञानात्
आत्मतन्मात्रम्
आत्मनः पदम्
आत्मा एव इदम् सर्वम् जगत्
आत्मा न गन्ता न आगन्ता
  • किंतु आत्मा न कहीं जाने वाली है और न कहीं आने वाली (श्लोक 15.9)
आत्मा ब्रह्म इति निश्चित्य
  • 'मेरी आत्मा ही साक्षात परब्रह्म है’ ऐसा दृढ़ निश्चय करके (श्लोक 18.8)
आत्मा सनातनः मुक्तः
  • और आत्मा नित्य सनातन-मुक्त है (श्लोक 18.7)
आत्माज्ञानात्
आत्मानम् अद्वयम्
आत्मानम् न दिदृक्षति
  • और न आत्मा को अलग से देखने की इच्छा करता है (श्लोक 18.83)
आत्मारामस्य धीरस्य
  • अपने ही आत्मस्वरूप में रमण करने वाले धैर्यवान पुरुष को (श्लोक 18.23)
आदर्शमध्यस्थे रूपे
  • दर्पण के भीतर दिखने वाले प्रतिबिम्ब में (श्लोक 1.19)
आनन्द-विग्रहे स्वात्मनि
आनन्दपरमानन्दः
आपदः सम्पदः
  • कष्ट (विपत्तियाँ) और सुख (सम्पत्तियाँ) (श्लोक 11.3)
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्
  • ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक सम्पूर्ण सृष्टि में (श्लोक 11.7)
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते
  • ब्रह्मा से लेकर तृण (चींटी) तक (श्लोक 4.5)
आभासः अहम्
आभासः च क्व
आयासात् सकलः दुःखी
  • सतत प्रयत्न और मानसिक तनाव के कारण ही सारा संसार दुखी है (श्लोक 16.3)
आर्जव
आलम्बम् अन्तरेण न विद्यते
  • किसी सहारे (आलंबन) के बिना ठहर नहीं सकती (श्लोक 18.44)
आशानैराश्ययोः समः
आश्रमानाश्रमम्
आश्रमी
आश्रित्य
आस्थितः परमाद्वैतम्