दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
च
- च आत्मनः अदृश्यत्वेन
- और आत्मा के इंद्रियों द्वारा अदृश्य (साक्षी) होने से
- च किम् करोति
- और क्या कर्म करे?
- च प्रकृतिम् न पश्यतः
- और अपने से अलग किसी प्रकृति (संसार) को न देखने वाले ज्ञानी के लिए
- च भाव-अभावौ कल्पितौ
- और संसार के होने व न होने को केवल कल्पित जानकर
- च स्थितौ द्वेषः न
- और न संसार के बने रहने से कोई चिढ़ या द्वेष होता है
- चकिताः शरण-अर्थिनः
- भयभीत होकर शरण खोजने वाले साधक
- चतुर्विधे भूतग्रामे
- चार प्रकार के प्राणि-समूह में
- चरित-अर्थस्य योगिनः
- और अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पा चुके (कृतकृत्य) योगी के लिए
- चिति
- चैतन्य (आत्मा) में
- चित्
- चैतन्य
- चैतन्य-रूप
- चित्तम् मा क्षोभय
- अपने चित्त को विचलित या अशांत मत करो
- चित्तवाते समुद्यते
- चित्त-रूपी वायु के उठने पर
- चित्तस्वीकृतवर्जनम्
- चित्त द्वारा स्वीकार किए गए विधि-निषेध और त्याग
- चिदाकाशे त्वयि
- चेतना रूपी आकाश स्वरूप तुममें
- चिदात्मनः
- चैतन्य-आत्मा का
- चिद्रसः अमलः
- चैतन्य-रस, निर्मल
- चिद्रूपः सदा साक्षी असि
- तुम चैतन्य स्वरूप और सर्वदा साक्षी हो
- चिद्रूपम्
- चेतना-स्वरूप
- चिन्तया
- व्यर्थ की चिंता और मानसिक विकल्पों से ही
- चिन्तारूपम् भजति
- एक विचार (चिंतन) का ही रूप धारण कर लेता है
- चिन्तासहः
- मन के संकल्प-विकल्प और चिंतन को सहने में असमर्थ हुआ
- चिन्मय
- हे ज्ञानस्वरूप चेतन आत्मन्!
- चिन्मात्र-रूपिणः तव
- शुद्ध ज्ञान-स्वरूप तुम्हारी
- चिन्मात्रः
- वह केवल शुद्ध चैतन्य में स्थित होकर
- चिन्मात्रम् एव अहम्
- मैं चैतन्य-मात्र ही हूँ
- चिन्मात्रवासनः
- केवल चैतन्य में निष्ठा रखने वाला
- चिन्मूर्ते
- हे ज्ञानस्वरूप!
- चिरम् बद्धः
- बहुत समय से बँधा हुआ
- चेष्टमानम्
- चेष्टा करते हुए
- चेष्टा वृथा
- शारीरिक चेष्टाएं बिना किसी कर्तापन के निष्प्रयोजन होती हैं