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दृश्य मोड
गति
थीम

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ए

21 पद-समूह।

एकः
एकः एव आसीत् अस्ति भविष्यति
  • केवल एक परमात्मा ही भूत, वर्तमान और भविष्य में था, है और रहेगा (श्लोक 15.18)
एकः द्रष्टा
एकम्
एकम् आत्मानम् ज्ञात्वा
एकस्मिन् अव्यये शान्ते अमले
एकाग्रता निरोधः वा
  • मन की एकाग्रता अथवा चित्त-वृत्तियों के निरोध का (श्लोक 18.33)
एतत् एव अहम् आस्थितः
एतत् मम विकल्पम् वीक्ष्य
  • इन सबको अपने मन की ही कल्पना (विकल्प) देखकर (श्लोक 12.5)
एतत्तत्त्वोपदेशेन
एतयोः हेतुम् धर्मम् अपि
  • इन दोनों के कारण-रूप धर्म को भी (श्लोक 10.1)
एतस्य अनर्थ-मूलस्य
  • इस समस्त अनर्थ के कारण अहंकार रूपी मूल को (श्लोक 18.38)
एतस्य न त्यागः न ग्रहः लयः
  • इसमें न त्याग है, न ग्रहण, न लय (श्लोक 6.1)
एतावत् एव विज्ञानम्
  • बस इतना ही सम्पूर्ण ज्ञान (विज्ञान) है (श्लोक 15.2)
एनम् कश्चन न जानाति
  • इस सरल रहस्य को कोई अज्ञानी नहीं समझ पाता (श्लोक 16.3)
एनम् किम् अनुशोचसि
  • फिर तुम इस शरीर के लिए व्यर्थ शोक क्यों करते हो? (श्लोक 15.9)
एभ्यः
एवम्
एवम् एव
  • इस प्रकार कृत्रिम समाधि के आग्रह से छूटकर (श्लोक 12.3)
  • इस प्रकार पूर्ण मौन और अचिन्त्य भाव से (श्लोक 12.7)
  • इस प्रकार सब द्वन्द्वों से छूटकर (श्लोक 12.4)
  • इस प्रकार सब संकल्प-विकल्पों को छोड़कर (श्लोक 12.5)
  • इस प्रकार समस्त तनावों से उपराम होकर (श्लोक 12.1)
  • इस प्रकार स्वाभाविक भाव से (श्लोक 12.2)
  • कर्म और त्याग दोनों के अहंकार से मुक्त होकर (श्लोक 12.6)
एवम् एव निराकुलः
  • और वह इस प्रकार सर्वथा व्याकुलता-रहित (शांत) रहता है (श्लोक 18.42)
एवम् नियमम् विलोक्य