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गति
थीम

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भ

31 पद-समूह।

भगवान्
  • समस्त ऐश्वर्य और दिव्यता से संपन्न (श्लोक 15.8)
भयम्
भव-अम्भोधौ
भवतः विश्वम्
भवान्
भवान् कर्ता न वा भोक्ता
  • तुम न तो कर्ता हो और न ही भोक्ता हो (श्लोक 15.4)
भवासंसक्तिमात्रेण
भाति
भाव-अभाव-विभाविनाम्
  • भाव (होने) और अभाव (न होने) को जानने वाली आत्मा के (श्लोक 18.4)
भावना-अभावना-सक्ता
  • किसी वस्तु के होने (भाव) अथवा न होने (अभाव) में आसक्त रहती है (श्लोक 18.63)
भावाभावविकारः च
  • उत्पत्ति और विनाश आदि समस्त विकार (श्लोक 11.1)
भावेषु
  • संसार के समस्त पदार्थों और घटनाओं में (श्लोक 13.7)
भावेषु शोभना-अशोभना
  • सांसारिक पदार्थों में ‘यह अच्छा है और यह बुरा है’ के भेद से (श्लोक 18.91)
भाव्य-भावनया
  • चिंतनीय वस्तु और चिंतन की प्रक्रिया के पार होकर (श्लोक 18.63)
भिक्षुः वा भूपतिः वा अपि
  • चाहे वह भिखारी हो अथवा कोई राजा (सम्राट) हो (श्लोक 18.91)
भुवनकल्लोलैः
भूतमात्रान् यथार्थतः
भूतविकारान्
  • भूतों के विकार (देह, इन्द्रिय आदि) (श्लोक 9.7)
भूरिशः आलोक्य
भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैः च
  • सेवकों, पुत्रों और स्त्रियों द्वारा (श्लोक 18.55)
भेषजम्
भोक्ता
भोग-मोक्ष-निराकाङ्क्षी
  • किंतु भोग और मोक्ष दोनों की आकांक्षा से रहित (श्लोक 17.5)
  • वह न भोग की इच्छा रखता है और न मोक्ष की (श्लोक 18.68)
भोगः
भोगम् कर्म समाधिम् वा कुरु
  • तुम चाहे भोग भोगो, कर्म करो या समाधि लगाओ (श्लोक 16.2)
भोगेषु भुक्तेषु
  • प्रारब्धवश सामने आए भोगों को भोग लेने पर भी (श्लोक 17.4)
भोज्यमानः
भ्रमं मुक्त्वा
भ्रमात्
भ्रान्तस्य इव
  • संसारी लोगों को किसी मतवाले या उन्मत्त की भाँति प्रतीत होने वाले ज्ञानी की (श्लोक 14.4)
भ्रान्तिः