दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
प
- पटः
- कपड़ा
- परः
- किंतु अन्य (अशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य)
- परब्रह्म-स्वरूप-भाक्
- स्वयं परब्रह्मस्वरूप का ही अनुभव करता है
- परमार्थतः किञ्चित् न
- परमार्थ दृष्टि से यह वास्तव में कुछ भी नहीं है
- परमार्थतः त्वम् एकः
- वास्तविक सत्य रूप में तुम अकेले ही अद्वितीय हो
- परमेश्वरः
- परमेश्वर, परम चेतना
- परिग्रहेषु वैराग्यम्
- बाहरी वस्तुओं (धन, वस्त्र, मकान) के त्याग का वैराग्य
- परिभावय
- विचार कर, निश्चयपूर्वक भाव कर
- पलायन्ते
- दूर भाग जाते हैं
- पश्य
- देख
- पश्यतः मुनेः
- साक्षात देखने वाले मननशील ज्ञानी के लिए
- पश्यन् अपि न पश्यति
- देखता हुआ भी (भेद-दृष्टि से) नहीं देखता
- पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
- देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ
- देखते, सुनते, स्पर्श करते
- पश्यन्ति आत्मानम् अव्ययम्
- वे केवल अविनाशी आत्मा का ही नित्य दर्शन करते हैं
- पश्यसि
- तू देखता है
- पाण्डित्ये अपि न पण्डितः
- और भारी विद्वत्ता में भी वह पंडित (अहंकारी विद्वान) नहीं बनता
- पीड्यमानः
- पीड़ित होता हुआ
- पीयूषवत् भज
- अमृत के समान सेवन कर, अपनाओ
- पुण्यपापाभ्याम् स्पर्शः
- पुण्य और पाप से सम्बन्ध
- पुत्र-दारा-आदौ निःस्नेहः
- पुत्र, पत्नी आदि संबंधियों में मोह (अंधी आसक्ति) से रहित
- पुत्रक
- हे पुत्र
- पुनर्भवसम्भवः
- फिर से जन्म-संसार की उत्पत्ति
- पुरुषार्थे स्थितः
- परम पुरुषार्थ (सहज आत्मस्वरूप) में स्थित होकर
- पुष्कलान् भोगान् आप्नोति
- और प्रचुर विषय-भोगों को प्राप्त करके भी
- पूर्ण-स्व-रस-विग्रहः
- जो अपने पूर्ण आत्मानंद के रस का ही साक्षात विग्रह (मूर्त रूप) है
- पूर्णः
- पूर्ण
- पूर्णः एकः
- पूर्ण, एक
- पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, द्यौः
- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश: पाँच तत्त्व
- प्रकाशः
- प्रकाश, नित्य ज्ञान
- प्रकाशते
- प्रकाशित होता है
- प्रकाशयामि
- मैं प्रकाशित करता हूँ
- प्रकृतेः परः
- प्रकृति (माया) से परे
- प्रकृतेः परः आत्मा (असि)
- प्रकृति और उसके तीनों गुणों से परे परमात्मा हो
- प्रकृत्या शून्य-चित्तस्य
- स्वभाव से ही संकल्प-विकल्प शून्य चित्त वाले
- प्रत्यक्षम् अपि
- प्रत्यक्ष दिखता हुआ भी
- प्रपञ्चः
- संसार
- प्रभो
- हे स्वामी
- प्रमादात् भाव-भावनः
- और यदि कभी प्रारब्धवश किसी सांसारिक विषय का विचार आ भी जाए
- प्रयत्नात् अप्रयत्नात् वा
- चाहे वह हठपूर्वक प्रयत्न करे या प्रयत्न छोड़ दे
- प्रविशन्ति
- लय हो जाती हैं
- प्रवृत्तः अपि
- संसार के कार्यों में प्रवृत्त दिखता हुआ भी
- प्रवृत्तिः एव जायते
- मानसिक कर्म (प्रवृत्ति) ही बन जाता है
- प्रवृत्तौ रागः जायते
- संसार के कर्मों में उलझने पर आसक्ति (राग) बढ़ती है
- प्रशम-पीयूष-धारा-असारम् ऋते
- उस पुरुष को परम शांति रूपी अमृत की मूसलाधार वर्षा के बिना
- प्रशाम्यति
- शान्त होने पर
- प्राकृतस्य इव धीरस्य
- साधारण अज्ञानी मनुष्य की भाँति व्यवहार करते हुए भी ज्ञानी का
- प्राज्ञः निर्वृतः भवति
- किंतु बुद्धिमान ज्ञानी परम शांत हो जाता है
- प्राप्त-अप्राप्तम् उपाश्नुते
- जो मिले उसे और जो न मिले उसे भी समभाव से अनुभव करता है
- प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः
- जो प्राप्त है और जो अप्राप्त है, दोनों में सदा तृप्त रहता है
- प्राप्तितुष्टिः मुहुर्मुहुः
- बार-बार (आत्मा की) प्राप्ति और तृप्ति
- प्रायः मूढस्य दृश्यते
- प्रायः अज्ञानी साधकों में ही देखा जाता है
- प्रेप्सवः
- पाने की इच्छा करने वाले
- प्रौढवैराग्यम्
- परिपक्व, असाधारण वैराग्य