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गति
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म

66 पद-समूह।

मत्तः विनिर्गतम्
मत्समः
मनः ते कदाचन न
  • और मन कभी भी तुम्हारा स्वरूप नहीं है (श्लोक 15.5)
मनः-प्रकाश-संमोह-स्वप्न-जाड्य-विवर्जितः
  • मन के प्रकाश (सत्त्वगुण), संमोह (रजोगुण) और स्वप्न-जड़ता (तमोगुण) से सर्वथा रहित होकर (श्लोक 17.20)
मनोधर्मौ
मनोरथान् प्रलापान् च
  • मन के हवाई महल (कामनाएँ) और व्यर्थ की बकवास (श्लोक 18.75)
मन्दः तत् वस्तु श्रुत्वा अपि
  • मंदबुद्धि मनुष्य उस परम आत्मतत्त्व को सुनकर भी (श्लोक 18.76)
मन्दः मूढताम् प्राप्नोति
  • मंदबुद्धि अज्ञानी मनुष्य और अधिक भ्रमित या मूढ़ हो जाता है (श्लोक 18.32)
मम मुक्तये चिन्ता न
  • मुझे अब मुक्ति के लिए भी कोई चिंता या व्याकुलता नहीं रही (श्लोक 14.3)
ममत्वम्
मयि स्थितम् विश्वम्
मरणे न एव उद्विजति
  • मृत्यु के आने पर तनिक भी भयभीत या उद्विग्न नहीं होता (श्लोक 18.99)
महत्-आदि जगत्-द्वैतम्
  • महत्तत्त्व (बुद्धि) से लेकर यह संपूर्ण द्वैत प्रपंच (श्लोक 18.69)
महर्षीणाम् साधूनाम् योगिनाम्
  • महर्षियों, साधुओं और योगियों के (श्लोक 9.5)
महा-भोगैः विलसन्ति
  • प्रारब्धवश विशाल राजसी भोगों में विलास करते हैं (श्लोक 18.53)
महा-ह्रदः इव अक्षोभ्यः
  • एक विशाल अथाह सरोवर (झील) के समान सर्वथा अक्षोभ्य होकर (श्लोक 18.60)
महाकृष्णाहि
महात्मनः
महाशयः
महाशयः ब्रह्म एव आस्ते
  • वह उदारचेता महापुरुष स्वयं ब्रह्मरूप होकर स्थित रहता है (श्लोक 18.28)
महाशयः हि विरलः
  • विशाल-हृदय महापुरुष वास्तव में कोई विरला ही होता है (श्लोक 17.5)
महोदधिः इव अहम्
मा आगमः
मा गृहाण मा विमुञ्च
मानसानि
माया-मात्रम् विवर्तते
  • केवल माया का विवर्त (कल्पित भ्रम) मात्र है (श्लोक 18.73)
मायामात्रम्
मालिन्यम्
  • मलिनता, मूढ़ता (पुस्तक के अनुसार) (श्लोक 3.4)
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः
  • मित्र, खेत, धन, घर, स्त्री, उत्तराधिकारी आदि सम्पत्तियाँ (श्लोक 10.2)
मुक्त-आत्मनः वितृप्तस्य
  • उस पूर्ण तृप्त और मुक्त आत्मा की (श्लोक 18.89)
मुक्त-चेतसः
मुक्तः
मुक्तः अविक्रियः तिष्ठति
  • मुक्त होकर निर्विकार रूप से स्थित रहता है (श्लोक 18.36)
मुक्तः एव
मुक्तः न विषय-द्वेष्टा
  • मुक्त पुरुष न तो सांसारिक विषयों से घृणा करता है (श्लोक 17.17)
मुक्तः यथा-स्थिति-स्वस्थः
  • मुक्त ज्ञानी जैसी भी परिस्थिति हो उसी में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) रहता है (श्लोक 18.98)
मुक्तः सर्वत्र नीरसः
  • मुक्त पुरुष सांसारिक प्रपंचों में सर्वथा अनासक्त (नीरस) रहता है (श्लोक 17.13)
मुक्तप्रायः
  • (पुस्तक के शब्दार्थ में) अत्यन्त मुक्त (श्लोक 1.7)
मुक्तम् भवति
मुक्तये
मुक्तस्य चित्तम् राजते
  • जीवनमुक्त का अंतःकरण इस प्रकार प्रकाशमान शोभा पाता है (श्लोक 18.30)
मुक्ति-कारिकाम् न धत्ते
  • मुक्ति के किसी कृत्रिम साधन या नियम को धारण नहीं करता (श्लोक 18.47)
मुक्तिः भविष्यति
मुञ्चति गृह्णाति
मुनेः जानतः
मुमुक्षुः अपि दृश्यते
  • और मोक्ष की चाह रखने वाले (मुमुक्षु) भी मिल जाते हैं (श्लोक 17.5)
मुमुक्षोः बुद्धिः
  • मोक्ष चाहने वाले साधक की बुद्धि (श्लोक 18.44)
मूक-जड-अलसम् करोति
  • मौन, स्थिर और बाह्य व्यर्थ चेष्टाओं से उपराम कर देता है (श्लोक 15.3)
मूढ-धीः अकुर्वन् अपि
  • मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य कुछ न करता हुआ भी (श्लोक 18.58)
मूढः तत् ब्रह्म न आप्नोति
  • अज्ञानी उस परब्रह्म को नहीं पाता (श्लोक 18.37)
मूढः न आप्नोति निर्वृतिम्
  • अज्ञानी को शांति (निर्वृति) नहीं मिलती (श्लोक 18.34)
मूढः शान्तिम् न लभते
  • अज्ञानी शांति को प्राप्त नहीं कर पाता (श्लोक 18.39)
मूढस्य दृष्टिः सर्वदा
मूढस्य निवृत्तिः अपि
  • अज्ञानी का कर्म-त्याग (निवृत्ति) भी (श्लोक 18.61)
मूढाः निराधाराः ग्रह-व्यग्राः
  • मूढ़ लोग निराधार होते हुए भी पकड़ (आग्रह) से व्याकुल होकर (श्लोक 18.38)
मूढैः भृशम् अभ्यस्यते
  • अज्ञानी लोग बार-बार हठपूर्वक अभ्यास करते हैं (श्लोक 18.33)
मूर्तिपरिज्ञानम् चैतन्यस्य
मृदि कुम्भः
मृषा
मे अर्थ-अनर्थौ न
  • मेरा कोई लाभ या नुकसान (कल्याण या अकल्याण) नहीं होता (श्लोक 13.5)
मोक्षः
मोक्षः उच्यते
मोक्षः वा न
मोक्षकामस्य
मोक्षार्थे व्यवस्थितः
मोहेन विडंबितः