दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
म
- मत्तः विनिर्गतम्
- मुझसे उत्पन्न हुआ
- मत्समः
- मेरे तुल्य
- मनः ते कदाचन न
- और मन कभी भी तुम्हारा स्वरूप नहीं है
- मनः-प्रकाश-संमोह-स्वप्न-जाड्य-विवर्जितः
- मन के प्रकाश (सत्त्वगुण), संमोह (रजोगुण) और स्वप्न-जड़ता (तमोगुण) से सर्वथा रहित होकर
- मनोधर्मौ
- मन के धर्म और वृत्तियाँ हैं
- मनोरथान् प्रलापान् च
- मन के हवाई महल (कामनाएँ) और व्यर्थ की बकवास
- मन्दः तत् वस्तु श्रुत्वा अपि
- मंदबुद्धि मनुष्य उस परम आत्मतत्त्व को सुनकर भी
- मन्दः मूढताम् प्राप्नोति
- मंदबुद्धि अज्ञानी मनुष्य और अधिक भ्रमित या मूढ़ हो जाता है
- मम मुक्तये चिन्ता न
- मुझे अब मुक्ति के लिए भी कोई चिंता या व्याकुलता नहीं रही
- ममत्वम्
- ममता
- मयि स्थितम् विश्वम्
- मुझमें स्थित विश्व
- मरणे न एव उद्विजति
- मृत्यु के आने पर तनिक भी भयभीत या उद्विग्न नहीं होता
- महत्-आदि जगत्-द्वैतम्
- महत्तत्त्व (बुद्धि) से लेकर यह संपूर्ण द्वैत प्रपंच
- महर्षीणाम् साधूनाम् योगिनाम्
- महर्षियों, साधुओं और योगियों के
- महा-भोगैः विलसन्ति
- प्रारब्धवश विशाल राजसी भोगों में विलास करते हैं
- महा-ह्रदः इव अक्षोभ्यः
- एक विशाल अथाह सरोवर (झील) के समान सर्वथा अक्षोभ्य होकर
- महाकृष्णाहि
- बड़ा काला साँप
- महात्मनः
- महात्मा का
- महाशयः
- उदार हृदय वाला
- महाशयः ब्रह्म एव आस्ते
- वह उदारचेता महापुरुष स्वयं ब्रह्मरूप होकर स्थित रहता है
- महाशयः हि विरलः
- विशाल-हृदय महापुरुष वास्तव में कोई विरला ही होता है
- महोदधिः इव अहम्
- मैं महासमुद्र की तरह हूँ
- मा आगमः
- मत प्राप्त हो
- मा गृहाण मा विमुञ्च
- न ग्रहण कर, न त्याग कर
- मानसानि
- मन से संबंधित
- माया-मात्रम् विवर्तते
- केवल माया का विवर्त (कल्पित भ्रम) मात्र है
- मायामात्रम्
- माया-रूप, माया का कार्य
- मालिन्यम्
- मलिनता, मूढ़ता (पुस्तक के अनुसार)
- मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः
- मित्र, खेत, धन, घर, स्त्री, उत्तराधिकारी आदि सम्पत्तियाँ
- मुक्त-आत्मनः वितृप्तस्य
- उस पूर्ण तृप्त और मुक्त आत्मा की
- मुक्त-चेतसः
- मुक्त चित्त वाले महापुरुष की
- मुक्तः
- वह मुक्त महापुरुष
- मुक्तः अविक्रियः तिष्ठति
- मुक्त होकर निर्विकार रूप से स्थित रहता है
- मुक्तः एव
- निश्चय ही सर्वथा मुक्त ही है
- मुक्तः न विषय-द्वेष्टा
- मुक्त पुरुष न तो सांसारिक विषयों से घृणा करता है
- मुक्तः यथा-स्थिति-स्वस्थः
- मुक्त ज्ञानी जैसी भी परिस्थिति हो उसी में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) रहता है
- मुक्तः सर्वत्र नीरसः
- मुक्त पुरुष सांसारिक प्रपंचों में सर्वथा अनासक्त (नीरस) रहता है
- मुक्तप्रायः
- (पुस्तक के शब्दार्थ में) अत्यन्त मुक्त
- मुक्तम् भवति
- सर्वथा मुक्त हो जाता है
- मुक्तये
- मुक्ति के लिए
- मुक्तस्य चित्तम् राजते
- जीवनमुक्त का अंतःकरण इस प्रकार प्रकाशमान शोभा पाता है
- मुक्ति-कारिकाम् न धत्ते
- मुक्ति के किसी कृत्रिम साधन या नियम को धारण नहीं करता
- मुक्तिः भविष्यति
- मुक्ति होगी
- मुञ्चति गृह्णाति
- छोड़ता है, ग्रहण करता है
- मुनेः जानतः
- जानते हुए मुनि का
- मुमुक्षुः अपि दृश्यते
- और मोक्ष की चाह रखने वाले (मुमुक्षु) भी मिल जाते हैं
- मुमुक्षोः बुद्धिः
- मोक्ष चाहने वाले साधक की बुद्धि
- मूक-जड-अलसम् करोति
- मौन, स्थिर और बाह्य व्यर्थ चेष्टाओं से उपराम कर देता है
- मूढ-धीः अकुर्वन् अपि
- मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य कुछ न करता हुआ भी
- मूढः तत् ब्रह्म न आप्नोति
- अज्ञानी उस परब्रह्म को नहीं पाता
- मूढः न आप्नोति निर्वृतिम्
- अज्ञानी को शांति (निर्वृति) नहीं मिलती
- मूढः शान्तिम् न लभते
- अज्ञानी शांति को प्राप्त नहीं कर पाता
- मूढस्य दृष्टिः सर्वदा
- अज्ञानी की दृष्टि सदा ही
- मूढस्य निवृत्तिः अपि
- अज्ञानी का कर्म-त्याग (निवृत्ति) भी
- मूढाः निराधाराः ग्रह-व्यग्राः
- मूढ़ लोग निराधार होते हुए भी पकड़ (आग्रह) से व्याकुल होकर
- मूढैः भृशम् अभ्यस्यते
- अज्ञानी लोग बार-बार हठपूर्वक अभ्यास करते हैं
- मूर्तिपरिज्ञानम् चैतन्यस्य
- चैतन्य के स्वरूप का ज्ञान
- मृदि कुम्भः
- मिट्टी में घड़ा
- मृषा
- झूठ, मिथ्या
- मे अर्थ-अनर्थौ न
- मेरा कोई लाभ या नुकसान (कल्याण या अकल्याण) नहीं होता
- मोक्षः
- वास्तविक मोक्ष है
- मोक्षः उच्यते
- मोक्ष कहा जाता है
- मोक्षः वा न
- और न कोई मोक्ष की आवश्यकता है
- मोक्षकामस्य
- मोक्ष चाहने वाले का
- मोक्षार्थे व्यवस्थितः
- मोक्ष के लिए तत्पर
- मोहेन विडंबितः
- अज्ञान से ठगा गया