दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
व
- वक्तुम् एव न किञ्चन
- और न उसके पास कहने के लिए कुछ बचता है
- वदन् व्रजन्
- बोलते और पैरों से चलते हुए भी
- वन्द्यमानः न प्रीयते
- दूसरों द्वारा वंदना और पूजा किए जाने पर वह प्रसन्न (अहंकारी) नहीं होता
- वस्तु-श्रवण-मात्रेण
- केवल यथार्थ आत्मतत्त्व के श्रवण मात्र से
- वस्तुतः न स्थितम्
- वास्तव में स्थित नहीं
- वा तत्त्व-विनिश्चयः क्व
- और तत्त्व का निश्चय कहाँ? (वह इन सभी मानसिक अवस्थाओं से परे है)
- वा निरातङ्कता अपि क्व
- और निर्भयता भी कहाँ? (वह इन सभी सद्गुणों की सीमाओं से भी परे है)
- वा मृत्युम् समुपस्थितम् दृष्ट्वा
- अथवा सामने साक्षात मृत्यु को उपस्थित देखकर भी
- वा मोक्षः च क्व
- और मोक्ष कहाँ है?
- वा विश्वम् क्व
- और यह विश्व कहाँ?
- वाग्मि-प्राज्ञ-महोद्योगम् जनम्
- वाचाल, चतुर और अत्यधिक भागदौड़ करने वाले मनुष्य को भी
- वाग्विस्तरासहः
- वाणी के विस्तार और शास्त्र-चर्चा को सहने में असमर्थ हुआ
- वारि सूर्यकरे
- सूर्य की किरणों में जल
- वारिधेः इव बुद्बुदः
- समुद्र से बुलबुले की तरह
- वासना एव संसारः
- वासनाएँ ही संसार हैं
- वासनाशून्यः
- समस्त वासनाओं और कामनाओं से रहित होकर
- वास्तवम् न अस्ति
- यथार्थ से नहीं है
- विकलः
- व्याकुल
- विकल्पना क्षीणा
- समस्त मानसिक कल्पनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं
- विकल्पितम्
- कल्पित
- विक्षेपे अपि न विक्षिप्तः
- संसार के कोलाहल (विक्षेप) में भी वह तनिक भी विक्षिप्त (अशांत) नहीं होता
- विक्षेपैकाग्र्यहृदयः
- चित्त के भटकाव और बलपूर्वक एकाग्रता—दोनों के द्वन्द्व से मुक्त होकर
- विगतकौतुकः
- जिसकी कौतूहल या अज्ञानता चली गई
- विचारतः
- विचार करने पर
- विचित्रैः
- अनेक प्रकार के
- विज्ञ
- हे बुद्धिमान् पुरुष!
- विज्ञस्य एव
- ज्ञानी का ही
- विज्ञाय
- जानकर
- प्रत्यक्ष अनुभव करके
- विज्वरः भव
- तुम संताप और चिंताओं के ज्वर से मुक्त हो जाओ
- विदेहः इव राजते
- मानो देहरहित (विदेह) होकर ही शोभा पाता है
- विद्धि
- जानो
- विद्या च क्व
- विद्या (ज्ञान की साधना) कहाँ?
- विनश्वरः
- नाश हुआ है
- विनिर्धूत-रजस्-तमः
- और जिसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा धुल (नष्ट) चुके हैं
- विप्रादिकः वर्णः
- ब्राह्मण आदि वर्ण, जाति
- विभीषिका
- भय
- विभुः
- व्यापक
- विभो
- हे व्यापक, सर्वव्यापी
- विमूढः मोक्षम् न आप्नोति
- अज्ञानी पुरुष मोक्ष को प्राप्त नहीं कर पाता
- विमूढताम् न जहाति
- अपनी मूर्खता और अज्ञान को नहीं छोड़ता
- विमूढस्य निरोधः क्व
- उस अज्ञानी का चित्त-निरोध कहाँ सिद्ध हो सकता है
- विमृश्य किम् करिष्यसि
- अब व्यर्थ का विचार-मंथन करके क्या करोगे?
- विमृश्यतः
- विचार करते हुए
- विरक्तस्य
- विरक्त का
- विवेकित्वम् क्व
- विवेकशीलता कहाँ?
- विशेषः न एव अस्ति
- तनिक भी कोई भेद या अंतर नहीं होता
- विश्रान्तिम् आगतः धीरः
- जो ज्ञानी अपनी आत्मा में परम विश्राम को प्राप्त हो चुका है
- विश्राम्य तिष्ठसि
- विश्राम करके, चित्त को टिकाकर स्थित रहता है
- विश्व-विलये वाञ्छा न
- न तो इस संसार के नष्ट (प्रलय) होने की कोई चाह होती है
- विश्व-वीचिः
- यह संपूर्ण विश्व रूपी लहर
- विश्वं नाम विकल्पना
- विश्व निश्चय से कल्पना-मात्र है
- विश्वपोतः
- विश्व-रूपी नौका
- विश्वम्
- संसार
- विश्वम् इदम्
- यह संसार
- विश्वसाक्षी
- संसार का साक्षी
- विश्वासामृतम्
- विश्वासरूपी अमृत
- विषय-दन्तिनः तूष्णीम्
- विषय-भोग रूपी हाथी चुपचाप
- विषय-द्वीपिनः वीक्ष्य
- संसार के विषय-भोग रूपी चीतों (बाघों) को देखकर
- विषय-द्वेष्टा विरक्तः
- सांसारिक विषयों से घृणा या द्वेष करने वाला विरक्त कहलाता है
- विषय-लोलुपः रागी
- और विषयों में लिप्त रहने वाला रागी कहलाता है
- विषय-वैरस्यम्
- इंद्रियों के भोगों के प्रति विरक्ति और उदासीनता
- विषयभ्रमगोचरे
- विषय के भ्रम के होने पर
- विषयान्
- इन्द्रियों के विषयों को
- विषयेषु च निष्कामः
- और सांसारिक विषय-भोगों के प्रति सर्वथा निष्काम
- विषवत् त्यज
- विष के समान छोड़ दे
- विस्मृत-अशेष-संसृतेः
- वह संपूर्ण संसार-भ्रम को पूरी तरह भूल चुका है
- विहस्य धिक्कृतः अपि
- हँसी उड़ाये जाने और धिक्कारे जाने पर भी
- विहाय
- इसे मिथ्या जानकर छोड़ देने पर
- छोड़कर
- वीचिसन्निभः
- तरंगों के तुल्य
- वीत-शोकाः विराजन्ते
- शोक से सर्वथा मुक्त होकर दिव्य रूप से प्रकाशित होते हैं
- वीततृष्णः
- तृष्णा से रहित
- वीतरागः हि निर्दुःखः
- किंतु राग-रहित पुरुष तो स्वभाव से ही निर्दुःख है
- वैतृष्ण्यात् सर्वत्र समः
- तृष्णा के अभाव से सब जगह और सब काल में समभाव रहता है
- वैराग्यम्
- वैराग्य, विषयों के प्रति मानसिक निर्भरता से स्वतंत्रता
- वैराग्यम् क्व
- वैराग्य कहाँ है?
- वैरिणम् कामम्
- वैरी-रूप कामना को
- वैषयिकः रसः
- और विषयों में आसक्ति (रस लेना)
- व्यवहारसमाधये
- और स्वाभाविक व्यवहार भी समाधि का ही रूप है
- व्यवहारे अपि
- लौकिक व्यवहार करते हुए भी वह सदा सुख में ही रहता है
- व्याप्ता
- व्याप्त
- व्याप्य
- फैलकर, आच्छादित करके
- व्यामोह-मात्र-विरतौ
- केवल मोह (अज्ञान) के शांत हो जाने पर