दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
य
- यः एवम् एव स्वभावः
- और जिसका ऐसा ही स्वाभाविक स्वरूप सिद्ध हो गया है
- यः तारयति संसृतेः
- जो संसार से तारता है
- यः तु
- जो पुरुष
- यः दृष्टम् अवलम्बते
- जो आँखों से दिखने वाले दृश्यों का सहारा लेता है
- यः निर्बन्धम् करोति वै
- जो मन को रोकने का हठपूर्वक प्रयास करता है
- यः निष्कामः सः शोभते
- जो वास्तव में निष्काम है, वही सच्चा सुशोभित होता है
- यः प्रकृत्या शून्यचित्तः
- जो पुरुष स्वभाव से ही संकल्प-विकल्पों और वासनाओं से शून्य चित्त वाला है
- यः मुनिः
- जो मननशील ज्ञानी
- यः सर्व-भावेषु समः
- जो जीवन की समस्त परिस्थितियों और पदार्थों में समभाव रहता है
- यतः एकेन तेन
- क्योंकि उस अकेले एक आत्मस्वरूप से ही
- यतः भवितुम् इच्छति
- क्योंकि वह ब्रह्म बनने (होने) की इच्छा करता है
- यतः शमितुम् इच्छति
- क्योंकि वह मन को शांत करने का हठ (प्रयास) करता है
- यत् कर्तुम् आयाति
- जो कर्तव्य स्वाभाविक रूप से सामने आ जाता है
- यत् चित्तम् न प्रवर्तते
- जिसका चित्त किसी उद्देश्य से प्रवृत्त नहीं होता
- यत् त्वम् पश्यसि
- तुम जो कुछ भी संसार में देखते हो
- यत् पदम्
- जिस पद को
- यत् वेत्ति तत् सः कुरुते
- जो जानता है, वही करता है
- यत्नवतः सिद्धिः न वा
- और प्रयास करने से कोई नई आत्मसिद्धि नहीं बन जाती (आत्मा नित्यसिद्ध है)
- यत्र
- जिस आधार में
- जिसमें
- यत्र अस्तमित-शायिनः
- और जहाँ सूर्यास्त हो जाए, वहीं रात को सो जाता है
- यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्
- जिसमें मनुष्यों के लिए द्वन्द्व न हों
- यत्र यत्र भवेत् तृष्णा
- जिस-जिस विषय में तृष्णा हो
- यथा इच्छसि तथा कुरु
- अब जैसा तुम उचित समझो, वैसा करो
- यथा कर्मानुष्ठानम् अज्ञानात्
- जैसे कर्तापन के अज्ञान से कर्मों का अनुष्ठान होता है
- यथा-जीविकया
- प्रारब्धानुसार जो भी आजीविका सहज मिल जाए उससे
- यथा-तथा यत्र-तत्र
- वह जैसे-तैसे, जहाँ-कहीं भी (प्रारब्धवश) रहे
- यथा-पतित-वर्तिनः
- जो बिना माँगे जो कुछ सामने आ जाए उसी में संतुष्ट रहता है
- यथा-सुखम् आस्ते
- सदा आनंदपूर्वक सहज स्थिति में रहता है
- यथातथा उपदेशेन
- संक्षिप्त या सहज उपदेश मात्र से
- यथाप्राप्तवर्ती
- जो मिल जाए उसी में वर्तने वाला
- यथार्थतः
- परमार्थ से, वास्तव में
- यथार्थम् तत्त्वम् आकर्ण्य
- परम सत्य तत्त्व को ज्यों का त्यों सुनकर
- यथासुखम् आसे
- मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ
- सहज सुखपूर्वक अपने स्वरूप में स्थित हूँ
- यथासुखम् आस्ते
- परम सुखपूर्वक और सहजता से रहता है
- यदा
- जब
- यदा अहम् तदा बन्धनम्
- जब ‘मैं’ है तब बंधन है
- यदा चित्तम् न वाञ्छति
- जब मन नहीं चाहता
- यदा चित्तम् वाञ्छति
- जब मन कुछ चाहता है
- यदा न अहम्
- जब ‘मैं’ नहीं
- यदा मनः
- जब साधक का मन
- यदा मन्यते
- जब मनुष्य अपने अंतःकरण में यह दृढ़ निश्चय कर लेता है
- यदा मे स्पृहा गलिता
- जब मेरी समस्त तृष्णा और सांसारिक चाह भीतर से गलकर समाप्त हो गई
- यदा यत् कर्तुम् आयाति
- जब जो कार्य प्रारब्धवश सामने आ जाता है
- यदि जड-धीः जहाति
- यदि मंदबुद्धि (अज्ञानी) मनुष्य छोड़ देता है
- यदृच्छया आगतः
- दैवयोग से, सहज प्राप्त
- यदृच्छया कुर्वतः अस्य
- और प्रारब्धवश प्राप्त कार्यों को अनायास करते हुए
- यदृच्छया वर्तमानम्
- प्रारब्धवश वर्तमान
- यद् वाङ्मनसगोचरम्
- जो कुछ वाणी और मन का विषय है
- यस्य अन्तः अहङ्कारः स्यात्
- जिसके अंतःकरण में कर्तापन का अहंकार बना रहता है
- यस्य बोध-उदये
- जिस आत्मज्ञान के उदय होते ही
- यस्य मतिः गलिता
- जिसकी बुद्धि सर्वथा गल (समाप्त हो) चुकी है
- यस्य मे नास्ति किञ्चन
- जिसका कुछ भी (अपना) नहीं है
- यस्य मोक्षे अपि अभिमानः
- जिसके मन में 'मैं मुक्त हो गया हूँ' का भी अहंकार है
- यस्य समाधिः वर्तते
- जिसकी समाधि निरंतर बनी रहती है
- यस्य स्वभावात् न एव आर्तिः
- जिसके स्वभाव में तनिक भी कोई पीड़ा या संताप नहीं होता
- यावज्जीवम् अनिर्वृताः
- और जीवनभर अशांत और अतृप्त ही बने रहते हैं
- यावत् स्पृहा जीवति
- जब तक मन में किसी वस्तु की चाह या वासना जीवित रहती है
- येन
- जिसने
- येन एवम् एव कृतम्
- जिसने इस प्रकार सहज आत्मस्थिति को पा लिया है
- येन महात्मना ज्ञातम्
- जिस महात्मा ने जाना
- योग-दृष्ट्या किञ्चन न
- सर्वोच्च तत्त्व-दृष्टि से वास्तव में कुछ भी नहीं है
- योगी मनाक् विकृतिम् न याति
- योगी पुरुष तनिक भी विकार (क्रोध या क्षोभ) को प्राप्त नहीं होता