दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

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य

62 पद-समूह।

यः एवम् एव स्वभावः
  • और जिसका ऐसा ही स्वाभाविक स्वरूप सिद्ध हो गया है (श्लोक 12.8)
यः तारयति संसृतेः
यः तु
यः दृष्टम् अवलम्बते
  • जो आँखों से दिखने वाले दृश्यों का सहारा लेता है (श्लोक 18.40)
यः निर्बन्धम् करोति वै
  • जो मन को रोकने का हठपूर्वक प्रयास करता है (श्लोक 18.41)
यः निष्कामः सः शोभते
  • जो वास्तव में निष्काम है, वही सच्चा सुशोभित होता है (श्लोक 18.91)
यः प्रकृत्या शून्यचित्तः
  • जो पुरुष स्वभाव से ही संकल्प-विकल्पों और वासनाओं से शून्य चित्त वाला है (श्लोक 14.1)
यः मुनिः
यः सर्व-भावेषु समः
  • जो जीवन की समस्त परिस्थितियों और पदार्थों में समभाव रहता है (श्लोक 18.65)
यतः एकेन तेन
  • क्योंकि उस अकेले एक आत्मस्वरूप से ही (श्लोक 17.2)
यतः भवितुम् इच्छति
  • क्योंकि वह ब्रह्म बनने (होने) की इच्छा करता है (श्लोक 18.37)
यतः शमितुम् इच्छति
  • क्योंकि वह मन को शांत करने का हठ (प्रयास) करता है (श्लोक 18.39)
यत् कर्तुम् आयाति
  • जो कर्तव्य स्वाभाविक रूप से सामने आ जाता है (श्लोक 13.3)
यत् चित्तम् न प्रवर्तते
  • जिसका चित्त किसी उद्देश्य से प्रवृत्त नहीं होता (श्लोक 18.31)
यत् त्वम् पश्यसि
  • तुम जो कुछ भी संसार में देखते हो (श्लोक 15.14)
यत् पदम्
यत् वेत्ति तत् सः कुरुते
यत्नवतः सिद्धिः न वा
  • और प्रयास करने से कोई नई आत्मसिद्धि नहीं बन जाती (आत्मा नित्यसिद्ध है) (श्लोक 13.6)
यत्र
यत्र अस्तमित-शायिनः
  • और जहाँ सूर्यास्त हो जाए, वहीं रात को सो जाता है (श्लोक 18.85)
यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्
  • जिसमें मनुष्यों के लिए द्वन्द्व न हों (श्लोक 9.4)
यत्र यत्र भवेत् तृष्णा
यथा इच्छसि तथा कुरु
  • अब जैसा तुम उचित समझो, वैसा करो (श्लोक 15.2)
यथा कर्मानुष्ठानम् अज्ञानात्
  • जैसे कर्तापन के अज्ञान से कर्मों का अनुष्ठान होता है (श्लोक 12.6)
यथा-जीविकया
  • प्रारब्धानुसार जो भी आजीविका सहज मिल जाए उससे (श्लोक 17.7)
यथा-तथा यत्र-तत्र
  • वह जैसे-तैसे, जहाँ-कहीं भी (प्रारब्धवश) रहे (श्लोक 18.100)
यथा-पतित-वर्तिनः
  • जो बिना माँगे जो कुछ सामने आ जाए उसी में संतुष्ट रहता है (श्लोक 18.85)
यथा-सुखम् आस्ते
  • सदा आनंदपूर्वक सहज स्थिति में रहता है (श्लोक 17.8)
यथातथा उपदेशेन
  • संक्षिप्त या सहज उपदेश मात्र से (श्लोक 15.1)
यथाप्राप्तवर्ती
  • जो मिल जाए उसी में वर्तने वाला (श्लोक 9.4)
यथार्थतः
यथार्थम् तत्त्वम् आकर्ण्य
  • परम सत्य तत्त्व को ज्यों का त्यों सुनकर (श्लोक 18.32)
यथासुखम् आसे
यथासुखम् आस्ते
  • परम सुखपूर्वक और सहजता से रहता है (श्लोक 18.47)
यदा
यदा अहम् तदा बन्धनम्
यदा चित्तम् न वाञ्छति
यदा चित्तम् वाञ्छति
यदा न अहम्
यदा मनः
यदा मन्यते
  • जब मनुष्य अपने अंतःकरण में यह दृढ़ निश्चय कर लेता है (श्लोक 18.51)
यदा मे स्पृहा गलिता
  • जब मेरी समस्त तृष्णा और सांसारिक चाह भीतर से गलकर समाप्त हो गई (श्लोक 14.2)
यदा यत् कर्तुम् आयाति
  • जब जो कार्य प्रारब्धवश सामने आ जाता है (श्लोक 18.49)
यदि जड-धीः जहाति
  • यदि मंदबुद्धि (अज्ञानी) मनुष्य छोड़ देता है (श्लोक 18.75)
यदृच्छया आगतः
यदृच्छया कुर्वतः अस्य
  • और प्रारब्धवश प्राप्त कार्यों को अनायास करते हुए (श्लोक 18.24)
यदृच्छया वर्तमानम्
यद् वाङ्मनसगोचरम्
यस्य अन्तः अहङ्कारः स्यात्
  • जिसके अंतःकरण में कर्तापन का अहंकार बना रहता है (श्लोक 18.29)
यस्य बोध-उदये
यस्य मतिः गलिता
  • जिसकी बुद्धि सर्वथा गल (समाप्त हो) चुकी है (श्लोक 18.91)
यस्य मे नास्ति किञ्चन
यस्य मोक्षे अपि अभिमानः
  • जिसके मन में 'मैं मुक्त हो गया हूँ' का भी अहंकार है (श्लोक 16.10)
यस्य समाधिः वर्तते
यस्य स्वभावात् न एव आर्तिः
  • जिसके स्वभाव में तनिक भी कोई पीड़ा या संताप नहीं होता (श्लोक 18.60)
यावज्जीवम् अनिर्वृताः
  • और जीवनभर अशांत और अतृप्त ही बने रहते हैं (श्लोक 18.43)
यावत् स्पृहा जीवति
  • जब तक मन में किसी वस्तु की चाह या वासना जीवित रहती है (श्लोक 16.7)
येन
येन एवम् एव कृतम्
  • जिसने इस प्रकार सहज आत्मस्थिति को पा लिया है (श्लोक 12.8)
येन महात्मना ज्ञातम्
योग-दृष्ट्या किञ्चन न
  • सर्वोच्च तत्त्व-दृष्टि से वास्तव में कुछ भी नहीं है (श्लोक 18.80)
योगी मनाक् विकृतिम् न याति
  • योगी पुरुष तनिक भी विकार (क्रोध या क्षोभ) को प्राप्त नहीं होता (श्लोक 18.55)