दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
त
- तज्ज्ञस्य
- उस पद को जानने वाले का
- ततः
- उसके बाद
- तत् कथम् कस्य कथ्यते
- वह भला कैसे और किसको कहा जा सकता है? (वह सर्वथा अनिर्वचनीय है)
- तत् कृत्वा
- उसे अनासक्त भाव से पूरा करके
- तत् त्यक्त्वा
- उन सब कृत्रिम क्लेशों को छोड़कर
- तत् त्वम् एव
- वह अधिष्ठान तत्त्व तुम ही हो
- तत्क्षणात्
- उसी क्षण
- तत्त्यागः वासनात्यागात्
- उनका त्याग वासना के त्याग से है
- तत्त्व-निश्चय-मात्रेण
- केवल अपने आत्मतत्त्व के अटल निश्चय मात्र से
- तत्त्वतः
- तत्त्व दृष्टि से विचार करने पर
- यथार्थ रूप से
- तत्र अभ्यास-पराः जनाः
- क्योंकि वे केवल बाह्य क्रियाओं और हठ-अभ्यास में ही उलझे रहते हैं
- तत्र एकः त्वम् एव प्रतिभाससे
- उसमें केवल एक तुम ही भिन्न-भिन्न रूपों में भास रहे हो
- तत्र विमुह्यति
- उस आत्मतत्त्व में भ्रमित ही रहता है
- तत्र स्थितः योगी
- उस पद में स्थित योगी
- तथा एव उपरमः
- वैसे ही कर्मों को हठपूर्वक छोड़ना भी अज्ञान ही है
- तथा जीविते मरणे
- और जीने अथवा मरने में भी
- तथा देहे अपि ममता
- और शरीर में 'यह मेरा शरीर है' का मोह बना हुआ है
- तथा योग-अभ्यास-फलम् प्राप्तम्
- और उसी ने योगाभ्यास का सच्चा फल पाया है
- तथापि
- तो भी
- फिर भी
- तदा
- तब वह मन
- तदा तत् कुरुते
- तब वह उसी कार्य को सहजता से कर देता है
- तदा बन्धः
- तब बंध है
- तदा मुक्तिः
- तब मुक्ति है
- तदा मोक्षः
- तब मोक्ष है
- तदा समस्ताः चित्त-वृत्तयः
- तब चित्त की सारी लहरें और वासनाएँ
- तन्तुमात्रः
- केवल धागे
- तन्नाशः
- उसका नाश
- तमः क्व प्रकाशः वा क्व
- अंधकार (अज्ञान) कहाँ और प्रकाश (ज्ञान) कहाँ?
- तम् आत्मानम् न जानन्ति
- वे उस आत्मा को नहीं जान पाते
- तया हीनः
- वह उस चिंता से मुक्त होकर
- तरंगाः इव सागरे
- समुद्र में लहरों की तरह
- तव अज्ञानतः एव विश्वम्
- तुम्हारे ही अज्ञान से यह द्वैतमय विश्व भासता है
- तव जन्मनि जन्मनि
- तेरे हर जन्म में
- तव स्वास्थ्यम् न
- तुम्हारी आत्म-स्वरूप में सच्ची विश्रांति कदापि नहीं हो सकती
- तुम्हारी स्वरूप-स्थिति (आत्म-स्वास्थ्य) नहीं हो सकती
- तस्मात्
- इसलिए
- इसलिए वह
- तस्मात् तत् भावनम् त्यक्त्वा
- इसलिए उस चिंतन की चेष्टा को भी छोड़कर
- तस्मिन् अपि न खिद्यते
- वह संसार में रहते हुए भी तनिक भी दुखी या क्लेशित नहीं होता
- तस्मै सुख-एक-रूपाय
- उस केवल आनन्दस्वरूप
- तस्य
- उस ज्ञानी महापुरुष को
- तस्य आत्मनः दर्शनम् क्व
- उस मनुष्य को आत्मदर्शन कैसे हो सकता है
- तस्य आलस्य-धुरीणस्य सुखम्
- उस अक्रियता में श्रेष्ठ पुरुष को ही सच्चा सुख है
- तस्य चेष्टा हि बालवत्
- क्योंकि उसकी चेष्टा एक बालक के समान निष्पाप और अहंकार-शून्य होती है
- तस्य ताम् ताम् आश्चर्य-दशाम्
- उस ज्ञानी की इस अत्यंत विस्मयकारी अलौकिक दशा को
- तस्य शुद्धस्य
- उस परम शुद्ध ज्ञानी को
- ताः ताः दशाः
- उन गूढ़ आंतरिक अवस्थाओं को
- तात
- हे प्रिय
- हे प्रिय जनक!
- हे प्रिय पुत्र / हे वत्स!
- तादृशः भव-दुर्लभः
- वैसा महात्मा इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है
- तादृशाः एव जानते
- उसके जैसे ही अन्य ज्ञानी पुरुष समझ सकते हैं
- केवल उसके जैसे आत्मज्ञानी महापुरुष ही जान सकते हैं
- तानि उपेक्ष्य
- उनकी उपेक्षा कर (उन पर ध्यान न टिकाकर)
- तापत्रितयदूषितम्
- तीन प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुख) से दूषित
- तावत् भ्रमः
- यह समस्त संसार रूपी भ्रम
- तावत् हेय-उपादेयता
- तब तक 'यह त्यागने योग्य है और यह ग्रहण करने योग्य' का भेद
- तिष्ठति आयाति याति च
- रहता है, उत्पन्न होता है और नष्ट होता है
- तिष्ठन्
- बैठते हुए
- तु अन्तः विषय-लालसः
- किंतु अंदर से वह विषय-भोगों की लालसा से भरा रहता है
- तु कुशलः कृत्यानि कुर्वन् अपि
- किंतु कुशल ज्ञानी कर्तव्य कर्मों को करता हुआ भी
- तु मुक्तस्य बुद्धिः
- किंतु जीवनमुक्त की बुद्धि
- तु संमोहात् न जानन्ति
- किंतु मोह के कारण वे उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करते
- तु सस्पृह-चित्तस्य मूढस्य
- किंतु वासनाओं से भरे चित्त वाले अज्ञानी की
- तु स्वस्थस्य सा दृष्टिः
- किंतु अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) ज्ञानी की वह दृष्टि
- तुलना
- तुलना, बराबरी
- तुलना केन जायते
- तुलना किसके साथ की जा सकती है? (वह सर्वथा अतुलनीय है)
- तूर्ध्वम्
- पहले (आरंभ में)
- तूष्णीम्-भूतस्य योगिनः
- परम मौन में स्थित हुए योगी की
- तृप्तः
- वह सदा संतुष्ट रहकर
- सदा आत्म-संतुष्ट रहता है
- तृष्णामात्रात्मकः बन्धः
- तृष्णा-मात्र-स्वरूप बंध
- ते अत्यर्थम् रोचयिष्यति
- तुम्हें परम आनंद और संतोष प्रदान करेगा
- ते उपदेष्टा यदि हरः
- तुम्हारे गुरु या उपदेशक चाहे स्वयं भगवान् शिव (हर) हों
- ते देहः न
- और न यह शरीर तुम्हारा है
- ते बन्धः न अस्ति
- तुममें न कोई बंधन कभी था
- ते वृद्धिः न
- न तुम्हारी कोई वृद्धि होती है
- तेन ज्ञान-फलम्
- उसी ने वास्तव में ज्ञान का फल प्राप्त किया है
- तोष
- संतोष
- त्यक्तः
- यह ज्ञान छोड़ दिया जाता है (वे इससे दूर भागते हैं)
- त्यागः च वा क्व
- और त्याग कहाँ है?
- त्यागपरः
- त्याग की ओर झुका हुआ
- त्यागादाने विहाय
- त्याग और संग्रह—दोनों के मानसिक आग्रह को छोड़कर
- त्याज्यम्
- त्यागने योग्य
- त्रस्यति
- डरता है
- त्रितयम्
- तीनों
- त्वत्तः अन्यः
- तुमसे भिन्न
- त्वम् आत्मा मुक्तः एव असि
- तुम स्वयं नित्य-मुक्त आत्मा ही हो
- त्वम् एकः चेतनः शुद्धः
- तू एक, चेतन और शुद्ध है
- त्वम् चिन्मात्र-रूपः असि
- तुम केवल शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हो
- त्वम् ज्ञानस्वरूपः
- तुम स्वयं ज्ञानस्वरूप हो
- त्वम् देहः न
- तुम शरीर नहीं हो
- त्वम् निर्विकल्पः
- तुम संकल्प-विकल्पों से रहित
- त्वम् सुखी भव
- तुम परमानंद में सुखी हो जाओ
- त्वया व्याप्तम्
- तुझसे व्याप्त है
- त्वयि अनन्त-महाम्भोधौ
- तुम अनंत चेतना रूपी महासागर में
- त्वयि प्रोतम्
- तुझमें पिरोया हुआ है