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गति
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त

91 पद-समूह।

तज्ज्ञस्य
ततः
तत् कथम् कस्य कथ्यते
  • वह भला कैसे और किसको कहा जा सकता है? (वह सर्वथा अनिर्वचनीय है) (श्लोक 18.93)
तत् कृत्वा
तत् त्यक्त्वा
  • उन सब कृत्रिम क्लेशों को छोड़कर (श्लोक 13.2)
तत् त्वम् एव
तत्क्षणात्
तत्त्यागः वासनात्यागात्
  • उनका त्याग वासना के त्याग से है (श्लोक 9.8)
तत्त्व-निश्चय-मात्रेण
  • केवल अपने आत्मतत्त्व के अटल निश्चय मात्र से (श्लोक 18.34)
तत्त्वतः
तत्र अभ्यास-पराः जनाः
  • क्योंकि वे केवल बाह्य क्रियाओं और हठ-अभ्यास में ही उलझे रहते हैं (श्लोक 18.35)
तत्र एकः त्वम् एव प्रतिभाससे
  • उसमें केवल एक तुम ही भिन्न-भिन्न रूपों में भास रहे हो (श्लोक 15.14)
तत्र विमुह्यति
  • उस आत्मतत्त्व में भ्रमित ही रहता है (श्लोक 15.1)
तत्र स्थितः योगी
तथा एव उपरमः
  • वैसे ही कर्मों को हठपूर्वक छोड़ना भी अज्ञान ही है (श्लोक 12.6)
तथा जीविते मरणे
तथा देहे अपि ममता
  • और शरीर में 'यह मेरा शरीर है' का मोह बना हुआ है (श्लोक 16.10)
तथा योग-अभ्यास-फलम् प्राप्तम्
  • और उसी ने योगाभ्यास का सच्चा फल पाया है (श्लोक 17.1)
तथापि
तदा
तदा तत् कुरुते
  • तब वह उसी कार्य को सहजता से कर देता है (श्लोक 18.49)
तदा बन्धः
तदा मुक्तिः
तदा मोक्षः
तदा समस्ताः चित्त-वृत्तयः
  • तब चित्त की सारी लहरें और वासनाएँ (श्लोक 18.51)
तन्तुमात्रः
तन्नाशः
तमः क्व प्रकाशः वा क्व
  • अंधकार (अज्ञान) कहाँ और प्रकाश (ज्ञान) कहाँ? (श्लोक 18.78)
तम् आत्मानम् न जानन्ति
तया हीनः
तरंगाः इव सागरे
तव अज्ञानतः एव विश्वम्
  • तुम्हारे ही अज्ञान से यह द्वैतमय विश्व भासता है (श्लोक 15.16)
तव जन्मनि जन्मनि
तव स्वास्थ्यम् न
  • तुम्हारी आत्म-स्वरूप में सच्ची विश्रांति कदापि नहीं हो सकती (श्लोक 16.11)
  • तुम्हारी स्वरूप-स्थिति (आत्म-स्वास्थ्य) नहीं हो सकती (श्लोक 16.1)
तस्मात्
तस्मात् तत् भावनम् त्यक्त्वा
  • इसलिए उस चिंतन की चेष्टा को भी छोड़कर (श्लोक 12.7)
तस्मिन् अपि न खिद्यते
  • वह संसार में रहते हुए भी तनिक भी दुखी या क्लेशित नहीं होता (श्लोक 16.9)
तस्मै सुख-एक-रूपाय
तस्य
तस्य आत्मनः दर्शनम् क्व
  • उस मनुष्य को आत्मदर्शन कैसे हो सकता है (श्लोक 18.40)
तस्य आलस्य-धुरीणस्य सुखम्
  • उस अक्रियता में श्रेष्ठ पुरुष को ही सच्चा सुख है (श्लोक 16.4)
तस्य चेष्टा हि बालवत्
  • क्योंकि उसकी चेष्टा एक बालक के समान निष्पाप और अहंकार-शून्य होती है (श्लोक 18.49)
तस्य ताम् ताम् आश्चर्य-दशाम्
  • उस ज्ञानी की इस अत्यंत विस्मयकारी अलौकिक दशा को (श्लोक 18.56)
तस्य शुद्धस्य
ताः ताः दशाः
तात
तादृशः भव-दुर्लभः
  • वैसा महात्मा इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है (श्लोक 17.4)
तादृशाः एव जानते
  • उसके जैसे ही अन्य ज्ञानी पुरुष समझ सकते हैं (श्लोक 18.56)
  • केवल उसके जैसे आत्मज्ञानी महापुरुष ही जान सकते हैं (श्लोक 14.4)
तानि उपेक्ष्य
  • उनकी उपेक्षा कर (उन पर ध्यान न टिकाकर) (श्लोक 9.4)
तापत्रितयदूषितम्
  • तीन प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुख) से दूषित (श्लोक 9.3)
तावत् भ्रमः
तावत् हेय-उपादेयता
  • तब तक 'यह त्यागने योग्य है और यह ग्रहण करने योग्य' का भेद (श्लोक 16.7)
तिष्ठति आयाति याति च
  • रहता है, उत्पन्न होता है और नष्ट होता है (श्लोक 15.9)
तिष्ठन्
तु अन्तः विषय-लालसः
  • किंतु अंदर से वह विषय-भोगों की लालसा से भरा रहता है (श्लोक 18.76)
तु कुशलः कृत्यानि कुर्वन् अपि
  • किंतु कुशल ज्ञानी कर्तव्य कर्मों को करता हुआ भी (श्लोक 18.58)
तु मुक्तस्य बुद्धिः
तु संमोहात् न जानन्ति
  • किंतु मोह के कारण वे उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करते (श्लोक 18.43)
तु सस्पृह-चित्तस्य मूढस्य
  • किंतु वासनाओं से भरे चित्त वाले अज्ञानी की (श्लोक 18.52)
तु स्वस्थस्य सा दृष्टिः
  • किंतु अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) ज्ञानी की वह दृष्टि (श्लोक 18.63)
तुलना
तुलना केन जायते
  • तुलना किसके साथ की जा सकती है? (वह सर्वथा अतुलनीय है) (श्लोक 18.89)
तूर्ध्वम्
तूष्णीम्-भूतस्य योगिनः
तृप्तः
तृष्णामात्रात्मकः बन्धः
ते अत्यर्थम् रोचयिष्यति
  • तुम्हें परम आनंद और संतोष प्रदान करेगा (श्लोक 16.2)
ते उपदेष्टा यदि हरः
  • तुम्हारे गुरु या उपदेशक चाहे स्वयं भगवान् शिव (हर) हों (श्लोक 16.11)
ते देहः न
ते बन्धः न अस्ति
ते वृद्धिः न
तेन ज्ञान-फलम्
  • उसी ने वास्तव में ज्ञान का फल प्राप्त किया है (श्लोक 17.1)
तोष
त्यक्तः
  • यह ज्ञान छोड़ दिया जाता है (वे इससे दूर भागते हैं) (श्लोक 15.3)
त्यागः च वा क्व
त्यागपरः
त्यागादाने विहाय
  • त्याग और संग्रह—दोनों के मानसिक आग्रह को छोड़कर (श्लोक 13.1)
त्याज्यम्
त्रस्यति
त्रितयम्
त्वत्तः अन्यः
त्वम् आत्मा मुक्तः एव असि
  • तुम स्वयं नित्य-मुक्त आत्मा ही हो (श्लोक 15.20)
त्वम् एकः चेतनः शुद्धः
त्वम् चिन्मात्र-रूपः असि
त्वम् ज्ञानस्वरूपः
त्वम् देहः न
त्वम् निर्विकल्पः
त्वम् सुखी भव
त्वया व्याप्तम्
त्वयि अनन्त-महाम्भोधौ
  • तुम अनंत चेतना रूपी महासागर में (श्लोक 15.11)
त्वयि प्रोतम्