दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

क

96 पद-समूह।

कः असौ कालः वयः किं वा
कः मानवः न शाम्यति
कटक-अङ्गद-नूपुरम् भासते
  • कंगन, बाजूबंद और नूपुर (पायल) का कोई स्वतंत्र अस्तित्व भासता है? (श्लोक 15.14)
कति जन्मानि
कथम्
कथम् कुत्र
कदा शान्तानि कस्य वा
कदाचित् न खिद्यति हन्त
  • कभी भी दुखी या उदास नहीं होता, यह परम हर्ष की बात है (श्लोक 17.2)
कनके कटकम्
करवाणि
कर्तव्य-दुःख-मार्तण्ड-ज्वाला-दग्ध-अन्तरात्मनः
  • कर्तव्य के बोझ रूपी सूर्य की प्रचंड लपटों से जिसका अंतःकरण झुलस रहा है (श्लोक 18.3)
कर्तव्यता एव संसारः
  • ‘मुझे यह करना है’ का यह कर्तव्य-भाव ही वास्तव में संसार (बंधन) है (श्लोक 18.57)
कर्ता
कर्तुम् अवसरम् न आप्नोति
  • कुछ करने का अवसर (अहंकार) नहीं पाता (श्लोक 18.77)
कर्म-नैष्कर्म्य-निर्बन्ध-भावाः
  • कर्म करने अथवा कर्म छोड़ने के हठ और नियमों में बँधे रहते हैं (श्लोक 13.4)
कर्मणि क्रियमाणे अपि
कल्पनामात्रम्
कल्पितः
कल्पितम्
कल्पितम् पश्यन् निश्चित्य
  • संसार को केवल कल्पित निश्चयपूर्वक देखता हुआ (श्लोक 18.28)
कश्चित् उभय-अभावकः
  • किंतु कोई विरला ज्ञानी इन दोनों (भाव और अभाव) की कल्पना से परे है (श्लोक 18.42)
कश्चित् जानाति
कश्चित् भावस्य भावकः
  • कोई साधक भाव (संसार या ईश्वर के सगुण रूप) का ध्यान करता है (श्लोक 18.42)
कस्य अपि उदार-चित्तस्य
  • किसी विरले विशाल-हृदय ज्ञानी महापुरुष के लिए (श्लोक 17.6)
कस्य कथम् कुत्र
का अपि वासना न
  • तनिक भी कोई वासना या कामना उत्पन्न नहीं होती (श्लोक 18.54)
का बुभुत्सा तथापि ते
  • तब भी तुझे जानने की इच्छा कैसी? (श्लोक 10.5)
काम-चारः
  • अपनी इच्छा और सहज प्रेरणा से विचरण करने वाला (श्लोक 18.87)
कामम् आकाङ्क्षेत्
कामवशगः
काम् अपि दशाम् सम्प्राप्तः भवेत्
  • किसी अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा को प्राप्त हो जाता है (श्लोक 17.20)
कायकृत्यासहः
  • मैं शारीरिक कर्मों की व्यर्थ भागदौड़ को सहने में असमर्थ (उदासीन) हुआ (श्लोक 12.1)
कायेन मनसा गिरा
कालम् अन्तम् अनुश्रितः
काले
किञ्चन न
किञ्चित् कृतम् अकृतम् न
  • कर्म किए जाने पर भी वास्तव में कुछ भी नहीं किया गया होता (श्लोक 18.29)
किञ्चित् कृत्यम् न पश्यति
  • वह अपने लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं देखता (श्लोक 18.82)
किञ्चित् न अस्ति इति निश्चयी
  • वास्तव में कुछ भी नहीं है—इस प्रकार का दृढ़ निश्चय रखने वाला (श्लोक 18.70)
किन्तु इदम् निर्निमित्तम्
  • किंतु उसका चित्त बिना किसी निमित्त (कामना) के (श्लोक 18.31)
किम् अपि कृतम् न एव स्यात्
  • शुद्ध आत्मा द्वारा कुछ भी किया नहीं जाता (आत्मा अकर्ता है) (श्लोक 13.3)
किम् कृत्यम् अवशिष्यते
  • करने योग्य कौन सा कर्तव्य शेष रह जाता है? (श्लोक 18.69)
किम् त्यक्तुम् इच्छसि
किम् ब्रूते
किम् मे कार्यम्
किम् स्वर्णात् पृथक्
कुतः अहङ्कारः एव च
कुतः कर्म
कुतः जन्म
कुतः सुखम्
कुत्रचित् नाशः वा अपि न
  • और न किसी वस्तु के नष्ट होने पर कोई हानि या अभाव प्रतीत होता है (श्लोक 18.23)
कुत्रापि कायस्य खेदः
  • कहीं हठ-तपस्या से शरीर को कष्ट होता है (श्लोक 13.2)
कुत्रापि जिहासा न अस्ति
  • कहीं भी किसी वस्तु को छोड़ने (त्यागने) की इच्छा नहीं होती (श्लोक 18.23)
कुत्रापि जिह्वा खिद्यते
  • कहीं लगातार जप और पाठ से वाणी थकती है (श्लोक 13.2)
कुत्रापि मनः (खिद्यते)
  • कहीं बलपूर्वक एकाग्रता साधने से मन थकता है (श्लोक 13.2)
कुबुद्धयः भावयन्ति
  • अल्पबुद्धि लोग मन में केवल कल्पना (चिंतन) करते रहते हैं (श्लोक 18.43)
कुर्वन् अपि
कुर्वन् अपि न करोति
  • वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता (श्लोक 18.25)
  • वह बाहर से सब काम करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता (श्लोक 17.19)
कूटस्थम्
कृत-कर्तव्य-निर्वृतः
  • समस्त कर्तव्य पूरे हो जाने के कारण पूर्णतः शांत और निवृत्त है (श्लोक 18.98)
कृत-चाटवः सेवन्ते
  • चापलूसी करते हुए सेवक की तरह उसकी सेवा करने लगते हैं (श्लोक 18.46)
कृतकृत्यः
कृतम् अकृतम् न स्मरति
  • और ‘मैंने क्या किया’ और ‘क्या नहीं किया’—इसकी कोई चिंता या स्मृति नहीं रखता (श्लोक 18.98)
कृताकृते
  • किया हुआ और न किया हुआ (कर्तव्य-अकर्तव्य का आग्रह) (श्लोक 9.1)
कृतार्थः
कृत्रिमा शान्तिः न
  • बनावटी (दिखावटी) शांति कभी शोभा नहीं पाती (श्लोक 18.52)
कृत्वा
केलिशिक्षया
केवलम् आत्मानम् पश्यन्
केवलम् दुःख-भाक्
  • वह तो केवल दुख और भ्रम का ही भागीदार है (श्लोक 16.10)
कैवल्यम् इव संस्थितः
  • कैवल्य (अद्वितीय आत्म-स्वरूप) में भली-भाँति प्रतिष्ठित होकर (श्लोक 17.18)
कैवल्यम् इव सम्प्राप्तः
  • वह मानो मोक्ष (कैवल्य) को प्राप्त होकर (श्लोक 11.6)
कोऽपि अमूढः मूढवत्
  • जबकि कोई विरला तत्त्वज्ञानी बाह्य रूप से बालवत् या मूढ़ के समान शांत रहता है (श्लोक 18.32)
कौपीनत्वे अपि
  • केवल लंगोटी मात्र धारण करने वाले विरक्त में भी (श्लोक 13.1)
क्लृप्ता
क्व च वा हानिः
क्व च विज्ञानम्
क्व देहः
क्व धनानि
क्व मित्राणि
  • कहाँ मित्र और सांसारिक सम्बन्धी (श्लोक 14.2)
क्व मे विषय-दस्यवः
  • कहाँ मुझे लूटने वाले विषय-भोग रूपी डाकू (श्लोक 14.2)
क्व रागः क्व विरागता
  • उसके लिए कहाँ राग और कहाँ वैराग्य? दोनों समाप्त हो जाते हैं (श्लोक 18.62)
क्व विधीयते
  • विधि-नियम (क्या करना चाहिए) कहाँ है? (श्लोक 18.71)
क्व वृद्धिः
क्व शास्त्रम्
क्वापि न सज्जते
  • कहीं भी आसक्त या उलझा हुआ नहीं होता (श्लोक 11.2)
क्वापि न हर्षः
  • कहीं भी (अनुकूलता में) न हर्ष होता है (श्लोक 18.22)
क्वापि पर-दशा वर्तते
  • कोई एक अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा होती है! (श्लोक 17.10)
क्षमा
क्षमेत् कः
क्षीण-संसरणे नरे
  • जिसका संसार-भ्रमण सर्वथा समाप्त हो चुका है, उस ज्ञानी पुरुष में (श्लोक 17.16)
क्षीण-संसार-सागरे
  • जिसके लिए संसार रूपी सागर सर्वथा सूख चुका है, उस ज्ञानी की (श्लोक 17.9)
क्षीण-संस्मरणः (भवति)
  • वैसे ही उस विचार के संस्कार को संजोए बिना तुरंत विस्मृत करने वाला होता है (श्लोक 14.1)
क्षीणाः भवन्ति एव
  • स्वतः पूरी तरह नष्ट और शांत हो जाती हैं (श्लोक 18.51)
क्षुद्रचित्तताम्
  • क्षुद्रता, संकीर्ण चित्त की स्थिति (श्लोक 1.16)
क्षुभ्येत्