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गति
थीम

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न

151 पद-समूह।

न
  • आत्मा में कोई विकार नहीं होता (श्लोक 11.1)
न अतिबोधः न मूढता
  • न कोई अति-पांडित्य का घमंड है और न कोई मूर्खता (श्लोक 18.10)
न अरण्यम्
  • और न जंगल की ओर (पलायन के लिए) भागता है (श्लोक 18.100)
न अहं कर्ता
न अहं देहः
न अहम् देहः
न आगन्ता
न आत्मा भावेषु
  • आत्मा देह आदि भावों में नहीं है (श्लोक 7.4)
न आश्चर्यम् न एव च क्षोभः
  • न किसी घटना पर कोई आश्चर्य होता है और न कोई मानसिक क्षोभ (श्लोक 17.16)
न उद्विग्नम् न च सन्तुष्टम्
  • न किसी दुख से उद्विग्न और न विषय-सुख से संतुष्ट (श्लोक 18.30)
न उन्मीलति न मीलति
  • और न वह आँखें खोलता है न मूँदता है (वह तुरीय में रहता है) (श्लोक 17.10)
न एव प्रपश्यति
न औद्धत्यम् न च दीनता
  • न कोई घमंडी उद्धतता होती है और न कायरता भरी दीनता (श्लोक 17.16)
न करोति सः करोति
  • वह कर्म न करता हुआ भी कर्म का फल भोगने हेतु कर्ता ही है (श्लोक 18.29)
न कल्पते न जानाति
  • वह न कोई कल्पना करता है और न ज्ञेय पदार्थों को जानता है (श्लोक 18.27)
न किं गुरुः
  • क्या वह गुरु नहीं? (पुस्तक का शब्दार्थ: गुरु नहीं) (श्लोक 9.6)
न किञ्चन
न किञ्चित्
  • वास्तव में (पारमार्थिक रूप से) कुछ भी नहीं है (श्लोक 11.8)
न किञ्चित् इति निश्चयी
  • वास्तव में इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है—ऐसा दृढ़ निश्चय रखने वाला (श्लोक 15.17)
न किञ्चित् इति निश्चितः
  • जिसका यह दृढ़ निश्चय है कि 'संसार में कुछ भी स्वतंत्र सत्य नहीं है' (श्लोक 17.19)
न किञ्चित् इव शाम्यति
  • परम मौन और शांति में विलीन हो जाता है (श्लोक 15.17)
न किञ्चित् न च किञ्चन
  • वह न कुछ विशेष है और न कुछ भी नहीं है (वह समस्त विकल्पों से परे है) (श्लोक 18.96)
न कृतम्
न गन्ता
न च किञ्चन
न च क्षतिः
न च सङ्कोचात्
  • और न किसी संकुचन या कठिन प्रयास से मिलने वाला है (श्लोक 18.5)
न च स्तौति
  • और न किसी की चापलूसी या स्तुति करता है (श्लोक 17.13)
न जागर्ति
  • वह न तो संसारी अज्ञानियों की तरह जागता है (श्लोक 17.10)
न जानाति
  • तनिक भी नहीं जानता (वह इन सबसे पार हो चुका है) (श्लोक 17.18)
न तुष्यति न कुप्यति
  • न प्रसन्न होता है न क्रोध करता है (श्लोक 3.9)
न ते सङ्गः अस्ति केन अपि
  • तेरा किसी के साथ भी संग नहीं है (श्लोक 5.1)
न त्यागः न ग्रहः लयः
न ददाति न गृह्णाति
  • न अहंकार से कुछ देता है और न लोभ से कुछ लेता है (श्लोक 17.13)
न दुःखाय च तुष्टये
  • न दुख के लिए है और न संतोष के लिए (श्लोक 3.14)
न दुष्टम् अपि निन्दति
  • और न किसी दुष्ट मनुष्य की निंदा करता है (श्लोक 18.82)
न दूरम्
न द्वैतं पश्यतः
न निद्राति
न निन्दति
  • वह न तो किसी की बुराई या निंदा करता है (श्लोक 17.13)
न भयम् तस्य कुत्रचित्
न भासते
न मम अस्ति
न मानः न अवमानता
  • न कोई मान (सम्मान) होता है और न कोई अपमान (श्लोक 18.24)
न मुञ्चति न गृह्णाति
न मुमुक्षुः न च इतरः
  • वह न मुक्ति की इच्छा वाला है और न बद्ध (संसारी) (श्लोक 18.28)
न मुमुक्षुः न वा मुक्ता
  • न वह मोक्ष चाहने वाला है और न मुक्त हुआ कोई व्यक्ति है (श्लोक 18.96)
न मृतः न च जीवति
  • वह न तो मरा हुआ है और न साधारण रूप से जीवित है (वह इन दोनों के पार है) (श्लोक 18.83)
न मे देहः
न मे वृद्धिः
न लिप्यते
  • कर्मफलों के बंधन में लिप्त नहीं होता (श्लोक 11.4)
न वा क्षतिः
न वा विषय-लोलुपः
  • और न वह विषयों का लोलुप (आसक्त) होता है (श्लोक 17.17)
न वाञ्छति न शोचति
  • न भविष्य की इच्छा करता है और न अतीत का शोक करता है (श्लोक 11.3)
न विक्षेपः न च एकाग्र्यम्
  • न मन का कोई भटकाव (विक्षेप) है और न एकाग्रता का हठ (श्लोक 18.10)
न विरक्तः न रागवान्
  • वह पुरुष न विरक्त है और न रागी (वह इन दोनों से परे है) (श्लोक 16.6)
न विरक्तः न सङ्गवान्
  • न वह वैरागी है और न आसक्त (संगी) है (श्लोक 18.96)
न विश्रान्तम् अभूत् मनः
न विषादता
  • और न (प्रतिकूलता में) विषाद (शोक) होता है (श्लोक 18.22)
न शक्ताः ते
  • और जो भागने में असमर्थ होते हैं वे (श्लोक 18.46)
न शृणोति न पश्यति
  • और न वह कान या आँख से विषयों में लिप्त होकर सुनता या देखता है (श्लोक 18.27)
न शोचति
न सन्देहः
न सुखम् न च वा दुःखम्
  • और न सांसारिक सुख है और न कोई दुख (श्लोक 18.10)
न सुखी न च वा दुःखी
  • न वह सांसारिक रूप से सुखी है और न दुखी है (श्लोक 18.96)
न स्पृहा न विरक्तिः वा
  • न उसके अंदर किसी वस्तु की चाह है और न किसी से कोई द्वेष या विरक्ति (श्लोक 17.9)
न स्मरति
  • याद नहीं करता (उनका अहंकार या पश्चाताप नहीं पालता) (श्लोक 11.6)
न स्वर्गः न एव नरकः
न हर्षम् उपगच्छति
न हिंसा न एव कारुण्यम्
  • न तो किसी के प्रति हिंसा का भाव होता है और न अहंकार-युक्त दया (श्लोक 17.16)
न हृष्यति न कुप्यति
  • न प्रशंसा पाकर खुश होता है और न अपमान पर क्रोधित होता है (श्लोक 17.13)
  • न हर्षित होता है न कुपित (श्लोक 8.2)
नरे नार्याम्
नष्टानि
नाना मतम्
नाना-विचार-सुश्रान्तः
  • अनेक प्रकार के मानसिक तर्कों और विचारों से भलीभाँति थककर (श्लोक 18.27)
नाना-शास्त्राणि अनेक-शः
  • अनेक प्रकार के शास्त्रों का बार-बार (श्लोक 16.1)
नानाश्चर्यम् इदम् विश्वम्
  • अनेक आश्चर्यों और विचित्रताओं से भरा यह विश्व (श्लोक 11.8)
नाम-मात्र-विजृम्भितम्
  • केवल नामों और कल्पनाओं का ही फैलाव है (श्लोक 18.69)
नालाभेन अनुशोचति
  • और न किसी हानि या अलाभ पर शोक करता है (श्लोक 18.81)
नाश-उल्लासौ विहाय
  • हानि के शोक और लाभ के उल्लास को त्यागकर (श्लोक 13.6)
निःशङ्कः युक्त-मानसः
  • संशय-रहित और अपनी आत्मा में नित्य समाहित ज्ञानी (श्लोक 18.47)
निःसङ्कल्पः
  • समस्त संकल्प-विकल्पों से रहित होकर (श्लोक 15.15)
निःसङ्गः
निःस्पृहम् मानसम्
निःस्वभावस्य योगिनः
  • और जो किसी भी सीमित स्वभाव या गुण से रहित है, उस योगी के लिए (श्लोक 18.79)
निजम् रूपम्
नित्यम्
नित्यम् असंसक्त-मनाः
नित्यम् एकाकी रमते
  • और जो नित्य अपने अद्वितीय आत्म-स्वरूप में ही रमण करता है (श्लोक 17.1)
नित्यानित्यविवेकिनः
  • नित्य और अनित्य का विवेक करने वाले का (श्लोक 3.8)
निद्रितः बोधितः इव
  • जैसे सोए हुए व्यक्ति को जगाने पर वह स्वप्न को तुरंत भूल जाता है (श्लोक 14.1)
निन्दायाम्
निन्दितम्
निन्द्यमानः न कुप्यति
  • और निंदा किए जाने पर तनिक भी क्रोधित नहीं होता (श्लोक 18.99)
निमेष-उन्मेषयोः अपि व्यापारे
  • पलकों के खोलने-मूँदने मात्र के व्यापार में भी (श्लोक 16.4)
निम्ब-पल्लवाः
  • कड़वे नीम के पत्तों से कभी आकर्षित नहीं होता (श्लोक 17.3)
निरञ्जनः
निरन्तरम्
निरपेक्षः
निरपेक्षम् भवेत्
  • अपेक्षा-रहित और निष्काम हो जाता है (श्लोक 16.5)
निरस्त-कल्पनाः धीराः
  • समस्त मानसिक कल्पनाओं से मुक्त ज्ञानी पुरुष (श्लोक 18.53)
निरस्त-सर्व-आशम् चित्तम्
  • समस्त आशाओं और कामनाओं से रहित हुआ चित्त ही (श्लोक 16.2)
निरहङ्कार-धीरेण
  • किंतु अहंकार-शून्य ज्ञानी पुरुष द्वारा (श्लोक 18.29)
निरहङ्कारः
निराकारः
निराकारम्
निरायासः
  • मानसिक तनाव और आंतरिक श्रम से रहित (श्लोक 11.4)
निरावरण-दृष्टयः
  • जिनकी दृष्टि का अज्ञान रूपी पर्दा पूरी तरह हट चुका है, वे (श्लोक 18.6)
निराशः बुधः शोभते
  • आशा-तृष्णा से रहित ज्ञानी पुरुष परम सुशोभित होता है (श्लोक 18.84)
निराशम् गत-सन्देहम्
  • आशा-तृष्णा से मुक्त और समस्त संशयों से परे (श्लोक 18.30)
निराशिषः
निराशेन गत-आर्तिना
  • आशा-रहित और समस्त संतापों (पीड़ाओं) से मुक्त ज्ञानी द्वारा (श्लोक 18.93)
निरोध-आदीनि कर्माणि
  • मन के निरोध और ध्यान आदि साधना के कर्मों को (श्लोक 18.75)
निरोध-ऐकाग्र्य-सिद्धये
  • चित्त के निरोध और एकाग्रता की सिद्धि के लिए (श्लोक 18.45)
निर्द्वन्द्वः एवम् एव व्यवस्थितः
  • द्वंद्वों से मुक्त होकर सहज रूप से स्थित रहता है (श्लोक 16.8)
निर्द्वन्द्वः छिन्न-संशयः
  • द्वंद्वों से मुक्त और जिसके समस्त संशय कट चुके हैं (श्लोक 18.87)
निर्द्वन्द्वस्य
  • द्वन्द्वों (सुख-दुख) से रहित का (श्लोक 3.14)
निर्ध्यातुम् चेष्टितुम् वा अपि
  • ध्यान करने में अथवा लौकिक कर्म की चेष्टा करने में (श्लोक 18.31)
निर्ध्यायति विचेष्टते
  • सहज ध्यानस्थ रहता है और सहज क्रियाएँ करता है (श्लोक 18.31)
निर्भरः
  • चिद्घन, पूर्ण (पुस्तक में ‘चिद्घन-रूप’) (श्लोक 1.17)
निर्ममः
  • ममता (मेरेपन के भाव) से सर्वथा रहित (श्लोक 18.88)
  • ममत्व (मेरे-पन) से रहित होकर (श्लोक 15.6)
निर्ममः निरहङ्कारः
  • जो ममता (मेरापन) और अहंकार (मैं-भाव) से सर्वथा रहित है (श्लोक 17.19)
निर्ममः निरहङ्कारः निष्कामः
  • ममता-रहित, अहंकार-शून्य और समस्त कामनाओं से मुक्त होकर (श्लोक 18.73)
निर्वासनः
  • समस्त वासनाओं और कामनाओं से रहित होकर (श्लोक 15.17)
निर्वासनम् हरिम् दृष्ट्वा
  • वासना-रहित ज्ञानी रूपी सिंह को देखकर (श्लोक 18.46)
निर्वासनात् ऋते कः अन्यः
  • वासना-रहित ज्ञानी के सिवा दूसरा कौन ऐसा हो सकता है? (श्लोक 18.90)
निर्विकल्पः
  • वह समस्त द्वैत और संशयों से रहित (श्लोक 11.7)
निर्विकल्पम् निरायासम्
  • जो संकल्प-विकल्प से रहित, बिना किसी प्रयास के सिद्ध, (श्लोक 18.5)
निर्विकल्पे स्थितिः
निर्विकारः
निर्विकारम् निरञ्जनम्
  • विकाररहित और सर्वथा निर्मल है (श्लोक 18.5)
निर्विकारस्य धीरस्य
  • निर्विकार और धैर्यवान ज्ञानी के लिए (श्लोक 18.78)
निर्विकाराः निरामयाः
  • समस्त विकारों से रहित और समस्त दुखों से मुक्त हो चुके हैं (श्लोक 18.57)
निर्विचार-दशा-आस्पदम् वै
  • स्पृहा समाप्त होने पर ही निर्विचार शांत अवस्था का वास होता है (श्लोक 16.7)
निर्वृत्तौ द्वेषः एव हि
  • और हठपूर्वक कर्म त्यागने पर द्वेष पैदा होता है (श्लोक 16.8)
निर्वेदम् आपन्नः
निर्वेदसमतायुक्त्या
निर्वेदात्
  • विचारपूर्वक उपजे वैराग्य से (श्लोक 9.1)
निर्व्याज-आर्जव-भूतस्य
निवृत्ति-फल-भागिनी
  • परम त्याग और शांति (निवृत्ति) का ही फल देने वाली होती है (श्लोक 18.61)
निश्चलम्
निश्चित्य शाम्यति
  • ऐसा निश्चय कर शांत हो जाता है (श्लोक 9.3)
निषेद्धुम्
निष्कामः किम् विजानाति
  • वह निष्काम ज्ञानी अब क्या जाने? (श्लोक 18.8)
निष्कामः न शान्तम् स्तौति
  • निष्काम ज्ञानी न तो किसी शांत (साधु) पुरुष की चापलूसी या स्तुति करता है (श्लोक 18.82)
निष्कृत्य
निष्क्रियः
निष्प्रपञ्चम् निरामयम्
  • जो प्रपंचरहित और समस्त विकारों से मुक्त है (श्लोक 18.35)
निस्तर्ष-मानसः
  • जिसका मन समस्त तृष्णा और प्यास से सर्वथा मुक्त है (श्लोक 18.65)
नैराश्ये अपि
  • मोक्ष में भी (आशा-रहितता में भी) (श्लोक 3.12)
नो भावः तत्र