दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अ
- अकर्तृ स्पन्द-वर्जितम्
- कर्तापन से रहित और चंचलता (कम्पन) से शून्य
- अकिञ्चनः
- परिग्रह (संपत्ति के अभिमान) से रहित
- अकिञ्चनभवम्
- परिग्रह और ममता-शून्यता से मिलने वाली
- अकृतम् कृतम्
- न किए हुए और किए हुए कर्मों को
- अक्रियः
- क्रिया-रहित
- अक्षगोचरः
- आँख आदि इन्द्रियों का विषय
- अक्षयम् गत-सन्तापम् आत्मानम्
- अविनाशी और समस्त संतापों से रहित अपनी आत्मा को
- अक्षुब्धः
- क्षोभ-रहित
- अखिलान् अर्थान् अर्जयित्वा
- संसार के सारे धन-संपत्ति को कमाकर
- अगाधबुद्धिः
- अथाह बोध वाला
- अङ्गनाम् भूपतिम् प्रियम्
- सुंदर स्त्री, राजा अथवा किसी प्रियजन को
- अचिन्त्यम् चिन्त्यमानः अपि
- चिंतन से परे (अचिन्त्य) आत्मा का जब चिंतन किया जाता है
- अज्ञानात्
- अज्ञान से
- अज्ञानात् भाति
- अज्ञान से भासता है
- अतः
- इसलिए
- इसी कारण से
- अतत्क्षणात् आप्नोति कर्तुम्
- तो वह तुरंत करने लग जाता है
- अतद्वादी इव कुरुते
- जो अकर्ता होने पर भी साधारण कर्ता के समान आचरण करता है
- अतिदुर्बलः
- अत्यन्त दुर्बल
- अतिरिक्तः न
- अलग नहीं
- अतिशान्तः
- अत्यन्त शान्त
- अतिसुन्दरम्
- अत्यन्त सुन्दर
- अत्यन्तसंसक्तः
- अत्यन्त आसक्त हुआ
- अत्र बहुना उक्तेन किम्
- यहाँ बहुत अधिक कहने से क्या लाभ?
- अत्र मोहम् न कुरुष्व भोः
- इस विषय में लेशमात्र भी संशय या भ्रम मत करो
- अथ
- फिर
- अथवा
- या
- अथवा सङ्कोचम् याति
- अथवा भयवश संकोच में पड़ जाता है
- अदृष्टि-रूपिणी
- अदृष्टि-रूप (शुद्ध दृष्टा-स्वरूप) हो जाती है
- अद्य अपि उपरम्यताम्
- अब तो उपराम (विराम) कर
- अद्य एव वा पुनः गच्छतु
- अथवा आज ही अभी इसी क्षण नष्ट हो जाए
- अद्य हे ब्रह्मन्
- आज हे गुरुदेव (हे ब्रह्मन्)!
- अद्वैतम्
- अद्वैत, दूसरे से रहित
- अधिवासितः न भवति
- उनसे संस्कारित (आसक्त या लिप्त) नहीं होता
- अधुना एव
- अभी ही
- अनन्त-रूपेण स्फुरतः
- अनंत रूपों में प्रकाशित होने वाले
- अनन्तमहाम्भोधौ
- अनन्त महासमुद्र में
- अपार महासागर में
- अनन्ते निरञ्जने
- अनन्त, निर्द्वन्द्व आत्मा में
- अनर्थसंकुलम् अर्थम्
- अनर्थ से भरे अर्थ (धन) को
- अनवच्छिन्ने अकृत्रिमः
- अनंत अखंड ब्रह्म में स्वाभाविक (बिना किसी प्रयास के)
- अनित्यम्
- अस्थायी
- अनिर्वाच्य-स्वभावस्य
- जिसका स्वभाव वाणी द्वारा अनिर्वचनीय (शब्दों से परे) है
- अनुवर्तते
- बनी रहती है
- अनृतम्
- मिथ्या, अस्थायी
- अनेन एव उपदेशेन
- गुरु के केवल इसी एक उपदेश से
- अनेन ज्ञानेन कृतार्थः
- इस आत्मज्ञान से वह पूर्ण कृतकृत्य हो चुका है
- अन्तः न जायते
- अन्तःकरण में नहीं होता
- अन्तः परितः
- भीतर और चारों ओर
- अन्तः यत् अनुभूयेत
- भीतर जो अलौकिक परमानंद अनुभव किया जाता है
- अन्तर्-गलित-सर्व-आशः
- जिसके भीतर की समस्त आशाएं और तृष्णाएं पूरी तरह विगलित हो चुकी हैं
- अन्तर्गलितसर्वाशः
- जिसके भीतर की समस्त आशाएँ और तृष्णाएँ गल चुकी हैं
- अन्तर्विकल्प-शून्यस्य
- भीतर से समस्त संकल्प-विकल्पों और अहंकार से रहित
- अन्तस्त्यक्तकषायस्य
- जिसने भीतर से विषय-वासनारूपी कषाय त्याग दिया
- अन्यशरीरवत्
- दूसरे के शरीर की तरह
- अन्यस्य कस्यचित् न
- अन्य किसी कर्ता-अभिमानी को वह सुख नहीं मिल सकता
- अपरः न किञ्चित् भावकः
- कोई दूसरा शून्य या शून्यता का चिंतन करता है
- अबद्धाः मुक्त-बुद्धयः
- सर्वथा अबद्ध (असंग) और मुक्त बुद्धि वाले होकर
- अभाग्यात्
- अभाग्य से
- अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी
- और जो भोग न मिले हों उनके प्रति पूर्ण आकांक्षारहित रहता है
- अभोक्तृत्वम्
- और सर्वथा अभोक्ता (फल न भोगने वाली) है
- अभ्यास-रूपिणा कर्मणा
- हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यासरूपी कर्मों से
- अमले त्वयि
- तुझ निर्मल में
- अमी के अपि विषयाः
- ये संसार के तुच्छ विषय-भोग
- अयम् अहम् न
- अथवा ‘यह दृश्य जगत मैं नहीं हूँ’
- अयम् तत्त्व-बोधः
- यह आत्मतत्त्व का सच्चा ज्ञान
- अयम् न अहम् इति
- और 'यह (शरीर आदि) मैं नहीं हूँ’ ऐसी
- अयम् भवः भावना-मात्रः
- यह संसार केवल मन की कल्पना और विचार मात्र है
- अयम् सः अहम्
- 'यह वह (ब्रह्म) मैं हूँ’
- ‘यह वह परमात्मा मैं हूँ’
- अरण्यम् इव
- वन के समान
- अर्थार्जने रतिः
- धन कमाने में प्रीति
- अलक्ष्य-स्फुरणः शुद्धः
- इंद्रियों से न देखे जा सकने वाले आत्म-प्रकाश से युक्त शुद्ध ज्ञानी
- अलम् अर्थेन कामेन
- अर्थ और काम से बस (बहुत हो चुका)
- अवधार्य
- धारण करके, जानकर
- अवस्तुत्वात्
- वास्तव में वस्तु न होने से
- अविद्या अपि न किञ्चित्
- अविद्या भी कुछ नहीं
- अविनाशिनम्
- नाश-रहित
- अविह्वल-मनाः
- जिसका मन तनिक भी विचलित, व्याकुल या भयभीत नहीं होता
- अव्रती
- व्रत-आग्रह से रहित (पुस्तक: हठ-रहित)
- असंसारस्य तु
- संसार (जन्म-मरण के भ्रम) से सर्वथा मुक्त पुरुष को
- असंसारी च कश्चन न
- और न कोई तुमसे अलग मुक्त होने वाला ज्ञानी है
- असंस्पृश्य शरीरेण
- शरीर से स्पर्श किए बिना
- असक्तः अस्पृहः शान्तः
- संग-रहित, इच्छा-रहित, शान्त
- असक्तम् सर्वदृष्टिषु
- सब विषयों में आसक्ति-रहित
- असङ्गः
- संग-रहित, किसी से बँधा नहीं
- असङ्गः निःस्पृहः
- संग-रहित, इच्छा-रहित
- असमाधेः अविक्षेपात्
- न समाधि का हठ होने से और न चित्त में विक्षेप होने से
- असहिष्णुता
- असहनशीलता
- असारम्
- सार-रहित
- असौ
- तो यह मन
- असौ न च ज्ञानी न वा योगी
- वह पुरुष न ज्ञानी है और न योगी
- असौ सर्वदा अकृत्रिमः
- यह निरोध सदा स्वाभाविक (अकृत्रिम) रूप से बना रहता है
- अस्तम् आयातु
- लय को प्राप्त हो
- अस्मात्
- इस कारण
- इसलिए
- अस्मिन् जगति तत्त्वज्ञः
- इस संसार में आत्मतत्त्व को जानने वाला ज्ञानी
- अस्मिन् शरीरे
- इस शरीर में
- अस्य महात्मनः चिन्ता न
- इस महात्मा ज्ञानी को इसकी तनिक भी कोई चिंता नहीं होती
- अहं कर्ता
- मैं करने वाला हूँ
- अहंभासः
- मेरे प्रकाश से
- अहंमान
- अहंकार का अभिमान
- अहम्
- मैं
- अहम् आस्थितः
- मैं अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थित हूँ
- मैं अपने आत्मस्वरूप में स्थित हूँ
- मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ
- मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ
- अहम् एव
- मैं ही एक चेतन आत्मा व्याप्त हूँ
- अहम् मम इति वा क्व
- और ‘यह मैं हूँ’ अथवा ‘यह मेरा है’ का भाव कहाँ?
- अहम् यथासुखम् आसे
- मैं परम सुख और तृप्ति में स्थित रहता हूँ
- मैं सर्वदा सहज सुख में स्थित रहता हूँ
- मैं सहज सुख में स्थित रहता हूँ
- अहम् शुक्तिसंकाशः
- मैं सीप के तुल्य हूँ
- अहिः
- साँप
- अहो
- अहो! आश्चर्य है कि
- आश्चर्य है